कश्मीर की इन विधवाओं की दास्तां में फ़र्क़ गोली का

जवाहिरा बानो

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    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से बीबीसी हिंदी के लिए

भारत प्रशासित कश्मीर के अनंतनाग कस्बे में 50 वर्ष की जवाहिरा के एक कमरे के घर में गहरा सन्नाटा और मायूसी ठहर से गए हैं.

यहां से कुछ ही दूरी पर जवाहिरा के जैसी एक और विधवा भी रहती है.

जवाहिरा बानो और 40 साल की रूबी जान की कहानी में फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि एक का पति चरमपंथी होने के लिए मारा गया और दूसरे के पति चरमपंथियों के ख़िलाफ़ काम करने के लिए मारा गया.

दोनों ही विधवा ज़िन्दगी की जंग लड़ रही हैं. दोनों ही अपने पतियों को 'शहीद' कहकर याद करती हैं.

1990 में कश्मीर में हथियारबंद आंदोलन की शुरुआत हुई थी, उसी साल जवाहिरा बानो के पति की मौत हो गई थी.

जवाहिरा के पति की तस्वीर

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कांटों भरी ज़िंदगी

जवाहिरा कहती हैं, "शुरू-शुरू में मेरे पति बशीर अहमद घर से गायब रहते थे. बाद में मुझे मेरे पड़ोसियों ने बताया कि आपके पति चरमपंथियों के साथ उठते-बैठते हैं. मैंने कई बार अपने पति से पूछा भी कि आप ऐसा क्यों करते हैं लेकिन वो नहीं माने. वो मेरे साथ झगड़ते थे. उस समय मेरी शादी को छह साल बीत गए थे. मैं उन्हें इस काम से दूर करने के लिए उन पर ज़्यादा दबाव भी नहीं डालती थी. सोचती कि उनके पास हथियार हैं, वो मार डालेंगे. छोटे-छोटे बच्चे थे. फिर अचानक सुरक्षाबलों ने पकड़ा और शहीद कर दिया. तब से मेरी ज़िन्दगी जहन्नुम बन गई है."

जवाहिरा इस समय अपने माता-पिता के घर पर रहती हैं.

वो कहती हैं कि तभी से ज़िन्दगी कांटों भरी रही है. बातें करते-करते जवाहिरा की आँखें नम हो जाती हैं और फिर जज़्बातों के आगे मजबूर हो जाती हैं.

रोते-रोते उन्होंने कहा, "फिर बेटे ने पढ़ाई अधूरी छोड़ दी. उसने कहा कि अब हमारे पास फ़ीस जमा करने के लिए पैसे नहीं हैं. फिर उसने ऑटो रिक्शा चलाना शुरू किया. फिर बेटी ने भी पढ़ाई छोड़ दी. वो फिर दिल की मरीज़ बन गई, वो पूछती रहती है कि मेरे डैडी कहां गए? अपने परिवार को पालने के लिए मैंने घर-घर जाकर मज़दूरी की."

जवाहिरा बानो

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'रात भर जागती रहती हूं'

जवाहिरा बानो उस दिन को याद करती हैं जब उनके पति की मौत हो गई थी, "मुझे मेरी एक पड़ोसन ने बताया कि तुम्हारे पति बशीर अहमद को सुरक्षाबलों ने घेर लिया है. मैं अस्पताल उन्हें देखने पहुंची. जब मैं वापस निकली तो पीछे से गोलियों की आवाज़ें सुनाई दी. इतने में मैं घर पहुंची तो दूसरे पड़ोसी ने किसी से कहा कि बशीर को मार दिया गया. फिर अगले दिन उनको पास के शहीद मज़ार में दफ़न किया गया."

जवाहिरा कहती हैं कि उस दिन से जब उनके पति मारे गए वो ठीक से सो नहीं पाई हैं. "मैं रात भर जगी रहती हूं. मुझे बच्चों की मुसीबतें याद आती हैं. वो ज़िंदा होते तो रूखी-सूखी खाकर जी लेते, वो बेटी को हज़ारों की रक़म देते थे.''

जवाहिरा कहती हैं कि न ही सरकार ने उनकी कोई मदद की है और न किसी और ने.

वह कहती हैं कि सरकार ने ये कहकर वापस लौटाया कि उनका पति चरमपंथी था. साल में एक बार या दो बार सरकार की तरफ से छह या चार सौ रुपये वज़ीफ़े के तौर पर मिलते हैं.

रूबी अपने बेटे के साथ

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रूबी के पति भी मारे गए

रूबी के घर भी दाखिल होते ही यहां ख़ामोशी है. वो अपने पति की मौत और उसके बाद सरकार की तरफ से मदद न मिलने से परेशान हैं.

रूबी जान का पति एजाज़ अहमद तौरे की वर्ष 2004 में चरमपंथियों के हमले में मौत हो गई थी.

एजाज़ सरकारी बंदूक बरदार के रूप में काम करते थे.

ये वर्ष 1995 की बात है जब कुछ सक्रिय चरमपंथियों ने आत्मसमर्पण कर सरकार के साथ मिलकर चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभियानों में काम करना शुरू किया था. ऐसे लोगों ने अपने संगठन का नाम 'इख़्वानुल मुसलिमीन' रखा था. कश्मीर के हर इलाके में इनका ज़ोर बढ़ गया था. अनंतनाग में इनका काफ़ी दबदबा था.

एजाज़ भी इसी दस्ते का हिस्सा बन गए थे. एक दिन अचानक घर कर बाहर चरमपंथियों ने उनको और उनके एक साथी को मार दिया.

वो कहती हैं, "ये 2004 की बात है, जब मेरे पति 'इख़्वान' के लिए काम करते थे. यहां घर के बाहर भीड़ के बीच कोई आ गया और उनको गोली मार दी. उनके शहीद होने के तेरह साल बाद भी सरकार ने मदद नहीं की. मेरे पति ने सरकार के लिए जान दी. मेरे घर में बड़ी मुश्किलात हैं. बेटे को पढ़ा रही हूं. बीते तेरह वर्ष से मैं सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही हूं लेकिन हर बार ख़ाली हाथ मुझे लौटाया जाता है. अधिकारी सिर्फ़ कहते हैं कि आप को इंसाफ़ मिलेगा लेकिन कब?"

रूबी के पति की तस्वीर

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मज़दूरी करके घर का ख़र्च चलाया

रूबी कहती हैं कि इख़्वान में रहने के कुछ साल बाद एजाज़ को पुलिस में एसपीओ (स्पेशल पुलिस अफसर) के तौर पर भर्ती किया गया था, जिन्हें पंद्रह सौ रुपए तनख़्वाह मिलती थी.

रूबी जानती थीं की एजाज़ इख़्वान में काम करते हैं. वह कहती हैं कि वो अपने पति से अक्सर कहती थीं कि वह इख़्वान में काम न करें.

उन्होंने कहा, "मैंने कई बार उनसे कहा कि आप 'इख़्वान' में काम नहीं करें, लेकिन वह कहते कि पुलिस में भर्ती होगी तो फिर 'इख़्वान' के साथ जुड़े नहीं रह गए लेकिन वह उसी दौरान शहीद हो गए."

रूबी कहती हैं कि आठ साल तक उन्होंने मज़दूरी की और घर का ख़र्च चलाया. रूबी के साथ दो बेटे और सास भी रहती हैं.

रूबी के दिल में किसी के लिए भी नफ़रत नहीं है. रूबी कहती हैं कि अब अगर उनका बेटा हथियारों के रास्ते पर चलेगा तो वह फिर उनका बेटा नहीं है.

सरकार ने चरमपंथ संबंधित मामलों में जान-माल के नुकसान के लिए मुआवज़े की एक नीति रखी है.

जवाहिरा और रूबी दोनों अपने पतियों को शहीद कहकर याद करती हैं.

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