झारखंड विधानसभा में नमाज़ के लिए एक कमरे पर विवाद

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- Author, आनंद दत्त
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए रांची से
झारखंड सरकार ने अपने एक नए आदेश में झारखंड विधानसभा भवन में नमाज़ कक्ष बनाया है.
विधानसभा भवन के कमरा संख्या टीडब्ल्यू- 348 को नमाज़ कक्ष बनाया गया है. यहाँ मुस्लिम विधायक और अन्य मुस्लिम कर्मचारी नमाज़ पढ़ सकेंगे.
यह आदेश विधानसभा अध्यक्ष रविंद्रनाथ महतो की तरफ़ से विधानसभा सचिवालय ने जारी किया है.
इस आदेश के बाद विपक्षी पार्टी ख़ासतौर पर बीजेपी ने इसका ज़ोरदार विरोध किया है.
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि, विधानसभा लोकतंत्र का वह मंदिर है, जिसे किसी धर्म या पंथ की परिधि में समेट कर नहीं रखा जा सकता.
बाबूलाल मरांडी ने ट्विट कर कहा है, "झारखंड विधानसभा में किसी वर्ग विशेष के लिए नमाज़ कक्ष का आवंटन किया जाना न केवल एक ग़लत परंपरा की शुरुआत है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के भी विपरीत है. अगर इस आदेश को वापस नहीं लिया जाता है तो बीजेपी सदन से सड़क तक इसका विरोध करेगी."
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वहीं बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश ने भी इसका विरोध किया है.
उन्होंने कहा, "हेमंत सोरेन सरकार ने तुष्टीकरण की सारी सीमाएं पार कर दी हैं. लोकतंत्र के मंदिर सदन में एक धर्म विशेष के लिए स्थान आवंटित करना बहुसंख्यक समाज की आस्था को ठेस पहुंचाने वाला है. सरकार अपने निर्णय पर पुनः विचार करे और सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने का काम न करे."
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दूसरे धर्मावलंबियों की मांग पर भी विचार करेंगे?
अपने इस आदेश के संदर्भ में विधानसभा अध्यक्ष रविंद्रनाथ महतो ने कहा, "जिस तरह के प्रचार किया जा रहा है, वैसा नहीं है. पुराने विधानसभा भवन में भी मुस्लिम विधायकों और कर्मचारियों के लिए एक कमरा आवंटित किया गया था. ख़ासकर विधानसभा के मुस्लिम कर्मचारियों के लिए."
"रोजमर्रा के जीवन में वह नमाज़ अदा करते थे. यहाँ भी उन्होंने अपने लिए एक ख़ाली जगह की मांग की, जहाँ वह शांति से नमाज़ पढ़ सकें. ख़ासकर शुक्रवार के दिन. इसी बात को मद्देनजर रखते हुए उन्हें एक कमरा आवंटित किया गया है. इससे ज़्यादा कुछ नहीं है, इस पर विवाद खड़ा करने की आवश्यकता नहीं है."
क्या हिन्दुओं के लिए भी कोई ऐसी व्यवस्था करेंगे?
जवाब में रविंद्रनाथ महतो ने कहा कि, "देखिए मेरे लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के विधायक बराबर हैं. अगर विपक्ष इसकी मांग करता है और यह मेरे सामने प्रस्ताव लेकर आते हैं, तो हम इसको आनेवाले समय में देखेंगे. अभी इस पर चर्चा करने की कोई ज़रूरत नहीं है."

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तीन सितंबर से विधानसभा का मॉनसून सत्र चल रहा है. यह नौ सितंबर तक चलेगा. ऐसे में अब इस मुद्दे पर हंगामा हो सकता है.
वैसे इस मामले पर चार सितंबर को बेजीपी राज्य मुख्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया. यहाँ बीजेपी विधायक और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सीपी सिंह ने कहा कि, "इबादत करने का सबको अधिकार है, लेकिन ये सरकार तुष्टीकरण कर रही है. हमें विधानसभा परिसर में किसी के नमाज़ पढ़ने से कोई आपत्ति नहीं है. अगर किसी धर्म विशेष के लिए पूजास्थल निर्धारित किया जाता है तो हम भी बहुसंख्यक विधायक और कर्मचारियों के लिए मंदिर की मांग करते हैं."
जानकारी के मुताबिक़ झारखंड के पुराने विधासभा भवन के परिसर में दो मंदिर हैं.
इस पर सीपी सिंह ने कहा कि, "पुराने विधानसभा में नया मंदिर नहीं बना था. ये पहले से था. तो क्या उसे तोड़कर हटा दिया जाता? हम तो कहते हैं नए विधानसभा में हनुमान जी का मंदिर बना देना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता है तो आंदोलन तय है."
उन्होंने यह भी कहा, "बहुसंख्यक अपना बड़ा दिल दिखाते रहे और इधर मुस्लिम विधायक तालिबान का समर्थन करते रहे. ऐसा नहीं चलेगा."
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कांग्रेस विधायक और हाल ही में तालिबान का समर्थन कर चर्चा में आए डॉ इरफ़ान अंसारी ने कहा कि, "सभी राज्यों के विधानसभा में नमाज़ पढ़ने की व्यवस्था है. इसमें बीजेपी को हाय तौबा मचाने की जरूरत नहीं है. हमारे अध्यक्ष जी को लगा कि शुक्रवार के दिन कर्मचारी नमाज़ पढ़ने बाहर चले जाते हैं, इससे काम में बाधा आती है. इसलिए एक अलग कमरा उन्होंने अलॉट कर दिया. अगर किसी को पूजा करना है तो वह भी मांग ले. नहीं मिलेगा तब न."
"सड़क पर नमाज़ पढ़ें तो बीजेपी को मिर्ची लगती है, विधानसभा में पढ़ रहे हैं तो मिर्ची लगती है, अरे भाई तुम ले लो वो कमरा. बीजेपी हमारी भाईचारगी को तोड़ रही है, हम ऐसा होने नहीं देंगे. इस बगिया के सभी फूल बराबर हैं. हिन्दू-मुसलमान करके क्या हासिल कर लेंगे."
"इसका विरोध वही बीजेपी कर रही है, जिसने विधानसभा परिसर में बिरसा मुंडा के आगे अटल बिहारी वाजपेयी की तस्वीर लगा रखी है."
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देशभर के थानों में मंदिर पर सवाल नहीं तो विधानसभा में क्यों?
अगर सरकार दवाब में मंदिर बनाने की अनुमति देती है तो फिर चर्च बनाने की भी मांग दूसरे विधायक करेंगे?
वरिष्ठ पत्रकार सैयद शहरोज क़मर इस पर अलग राय रखते हैं. वह कहते हैं, पुराने विधानसभा परिसर में दो दो मंदिर थे. लगभग देश भर के पुलिस थानों में मंदिर हैं. सरकारी कार्यक्रमों का उद्घाटन भी हिन्दू विधि-विधान से होता है. वहाँ तो कोई आपत्ति नहीं होती है."
वो कहते हैं, "विधानसभा अध्यक्ष ने पत्र जारी कर बेकार का विवाद पैदा कर दिया है. ये केवल आपसी सहिष्णुता का मसला है. अगर कोई मुसलमान अपने हिन्दू दोस्त के घर गया है और उसके नमाज़ पढ़ने का वक़्त हो गया है. उस मुसलमान को इजाजत लेकर वहीं नमाज़ पढ़ लेना चाहिए."
वो ये भी कहते हैं कि, "कल कोई मंदिर के लिए जगह की मांग करेगा. ये तो प्रतियोगिता जैसी बात हो गई. आपके लिए है तो हमारे लिए क्यों नहीं."
उनके मुताबिक़, "अगर देश को हिन्दू राष्ट्र मानते हैं तो थानों में, विधानसभा में मंदिर बना दीजिए. अगर संवैधानिक तौर पर भारत अगर धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है तो सबके लिए बराबर जगह है."

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क्या बिहार विधानसभा में भी है ऐसा?
हालांकि झारखंड विधानसभा के पहले अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी इस आदेश में कुछ भी अजीब या ग़लत नहीं मानते हैं.
उन्होंने कहा, "बिहार विधानसभा में दशकों से ये परंपरा चली आ रही है. वहां भी कर्मचारियों और विधायकों ने कहा था कि हमें नमाज़ पढ़ने के लिए बाहर जाना पड़ता है. ऐसे में सत्र के समय निर्धारित समय पर लौटने में परेशानी होती है. वहाँ कई बार बीजेपी की सरकार आई, लेकिन उस परंपरा को बंद तो नहीं किया गया."
वो कहते हैं, "झारखंड में भी वही समस्या और मांग स्पीकर के सामने रखा गया होगा. उन्होंने एक अलग जगह दे दी. वहाँ मुस्लिमों का कोई सामान तो रखा नहीं है, उनका कोई कब्जा तो नहीं है. मैं स्पीकर से इस फैसले को केवल धार्मिक सहिष्णुता के तौर पर देखता हूँ. मानवता के तौर पर देखता हूँ."
"मैंने देखा है कि कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं. यह असहिष्णुता का प्रतीक है. अगर मेरे समय में भी इसकी मांग होती तो मैं भी देता. लेकिन पुराने विधानसभा में कोई खाली जगह थी ही नहीं. सब तो बाद में बनवाया गया."
लेकिन बीजेपी के आदिवासी नेता भी इस व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं.
बीजेपी के आदिवासी विधायक नीलकंठ सिंह मुंडा कहते हैं, "कल को हर धर्म के लोग इसकी मांग करेंगे. हम भी सरना आदिवासी हैं, हम भी कहेंगे कि हमारे लिए भी विधानसभा परिसर में सरना स्थल बनाया जाए. नमाज़ अदा करना था तो करने देना चाहिए था, इसके लिए अलग से आदेश निकालने की क्या ज़रूरत थी."
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