बीजेपी जाति आधारित जनगणना के मुद्दे से कैसे निपटेगी

नरेंद्र मोदी और जेपी नड्डा

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    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से

बिहार में 2 अक्टूबर को जाति आधारित गणना के आंकड़े जारी होने के बाद कई राज्यों में जाति जनगणना की बात शुरू हो गई है. इनमें राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्य शामिल हैं.

इसके अलावा कर्नाटक में भी पहले हो चुकी गणना के आंकड़े जल्द ही जारी किए जा सकते हैं.

ख़ास बात यह है कि इन सभी राज्यों में बीजेपी विरोधी दलों की सरकारे हैं. यही नहीं सोमवार को कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस ने फ़ैसला किया है कि कांग्रेस शासित राज्य जनगणना कराएंगे.

इससे पहले विपक्षी दलों का गठबंधन ‘इंडिया’ देशभर में जाति आधारित गणना की मांग कर चुका है और इसे बीजेपी के ख़िलाफ़ एक बड़े हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने में लगा है.

जाति आधारित गणना नौकरी और शिक्षण संस्थानों जैसी जगहों में 'संख्या के आधार पर हिस्सेदारी' की बात करता है. तर्क यह दिया जाता है कि इससे ज़रूरतमंदों के लिए योजना बनाने में मदद मिलेगी.

हाल ही में संसद के विशेष सत्र में लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए महिला आरक्षण विधेयक पारित कराया गया है.

ज़ाहिर है बीजेपी की नज़र में भी, बिना आरक्षण महिलाओं को राजनीति में आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिला है.

बीजेपी की मुश्किल

नरेंद्र मोदी

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लेकिन पिछड़ी जातियों को आगे बढ़ाने के लिए जाति आधारित जनगणना और उसी के मुताबिक़ आरक्षण की व्यवस्था पर बीजेपी का मत अलग दिखता है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जाति आधारित गणना पर सवाल उठा चुके हैं. मोदी ‘जाति’ की जगह ग़रीबी और अमीरी की बात कर रहे हैं.

बिहार में जाति आधारित गणना के बाद बीजेपी के कई नेताओं ने इसका सीधा विरोध करने की जगह यह भी आरोप लगाया है कि इस गणना में कई दोष हैं, और इसमें कई जातियों की संख्या सही नहीं बताई गई है.

दरअसल बीजेपी को जाति आधारित गणना में अपने परंपरागत हिन्दू वोटों के बिखरने का ख़तरा दिखता है. इसलिए वो खुलकर इसका न तो समर्थन कर पा रही है और न ही विरोध.

सीएसडीएस के प्रोफ़ेसर संजय कुमार कहते हैं, “बीजेपी क्या, कोई भी पार्टी इसका खुला विरोध नहीं कर सकती, यह ख़तरे से खाली नहीं है. बीजेपी को ओबीसी समुदाय से बड़ा वोट मिलता है, देशभर में इनकी आबादी 52% के आसपास होगी. इसका विरोध करने से ओबीसी समुदाय के ऐसे वोटर भी नाराज़ हो सकते हैं जो जातिगत सर्वे को लेकर तटस्थ हैं.”

यानी देश की मौजूदा राजनीति फ़िलहाल साल 1990 के दशक के शुरुआती दिनों की तरह नज़र आ रही है. यह मंडल बनाम कमंडल का दौर था.

इस दौरान राजनीतिक तौर पर उठा पटक के अलावा देश के कई इलाकों में आंदोलन हुए और सामाजिक तौर पर भी काफ़ी उथल-पुथल हुआ.

जनगणना

आरएसएस का स्टैंड बदला

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, “सबसे बड़ी बात यह है कि आरएसएस को लगता है कि ‘जाति’ तोड़ने का काम करती है. देश और समाज के लिए धर्म और आस्था महत्वपूर्ण होती है न कि जाति."

"साल 2015 में मोहन भागवत ने आरक्षण विरोधी बात भी की थी, लेकिन उसके बाद संघ भी इसका बहुत ज़्यादा विरोध नहीं कर रहा है क्योंकि उसको पता है कि इसका एक राजनीतिक मक़सद है.”

उनके मुताबिक़, “बीजेपी के सामने एक मुश्किल यह भी है कि वह सरकारी पक्ष है. उसके हाँ कहने का मतलब है कि देशभर में साल 2025 की जनगणना जाति के आधार पर करानी होगी और आरक्षण लागू करना होगा."

"फिर सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पर 50% की जो सीमा तय की है उसे हटाना होगा. इससे तमाम राज्यों में अलग-अलग हालात पैदा होंगे.”

बीजेपी फ़िलहाल भले ही इस मुद्दे पर सावधानी बरत रही हो, लेकिन जाति को लेकर उसकी रणनीति हमेशा एक जैसी नहीं दिखती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ख़ुद को पिछड़ी जाति का बताने से परहेज़ नहीं किया है.

जाति जनगणना और बीजेपी का रुख़

बिहार ऑल पार्टी मीटिंग

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वहीं जब पिछले साल बिहार सरकार ने राज्य में जातिगत सर्वे कराने का फ़ैसला किया था तब बीजेपी भी राज्य सरकार में नीतीश कुमार की साझेदार थी और उसने इसका समर्थन किया था.

राजनीति मामलों के जानकार और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, “ऐसा नहीं है कि बीजेपी जाति की बात नहीं करती है. वो प्रधानमंत्री की भी जाति बताने की कोशिश करती है. जाति की राजनीति के लिए बीजेपी ने पसमांदा मुसलमानों के मुद्दे को उठाने की भी बहुत कोशिश की."

पसमांदा मुसलमानों में जुलाहे, धुनिया, घासी, क़साई, तेली और धोबी वग़ैरह आते हैं. इन्हें भारत में कथित तौर पर निचली जातियों में गिना जाता है.

साल 2022 में हैदराबाद और जनवरी 2023 में दिल्ली में हुई बीजेपी की दो कार्यकारणियों में नरेंद्र मोदी ने ख़ास तौर पर पसमांदा मुसलमानों का ज़िक्र किया था.

पुष्पेंद्र कुमार के मुताबिक़, "बीजेपी में यह बहुत बड़ा विरोधाभास है कि हिन्दुओं के बीच वो धर्म के आधार पर घुसना चाहती है और मुसलमानों के बीच जाति के आधार पर."

बीजेपी का आरोप

सुशील मोदी

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बिहार में जातिगत गणना के आंकड़े सामने आने के बाद बीजेपी लगतार आरोप लगा रही है कि यह दोषपूर्ण और राजनीति से प्रेरित आँकड़े हैं.

बीजेपी का आरोप है कि बिहार में जानबूझकर कई जातियों की आबादी कम और कुछ की ज़्यादा बताई गई है.

बिहार बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और सांसद संजय जायसवाल आरोप लगाते हैं, “सरकार ब्लॉक के स्तर पर जातिगत आँकड़े क्यों नहीं जारी कर रही है. इससे दो मिनट में सब पता लग जाएगा. क्या हमलोग (बनिया) 2.3% ही हैं. कौन सा गांव है जहां बनिया नहीं मिलेगा. नालंदा को छोड़कर कुर्मी कहां हैं, लेकिन उनकी आबादी 2.87% बताई गई है.”

उनका दावा है कि बिहार सरकार जिस जातिगत गणना को मास्टर स्ट्रोक बता रही है, वो सबसे बड़ा ब्लैक होल साबित होगा.

दो जातियों को छोड़कर बाक़ी सब इसका विरोध कर रहे हैं; कुशवाहा, अति पिछड़ा, तेली समाज, धानुक, बनिया जैसी कई जातियाँ इसका विरोध कर रही हैं.

हालांकि जेडीयू इस तरह के आरोपों से इनकार करती रही है और जातिगत जनगणना को साल 2024 के चुनावों के लिए राष्ट्रीय मुद्दा बता रही है.

जाति जनगणना

काट खोजने की कोशिश में बीजेपी

विपक्ष के तेवर देख कर अब इस मुद्दे पर बीजेपी ने भी विरोधी दलों को घेरना शुरू कर दिया है. ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ के नारे पर बीजेपी पूछ रही है कि बिहार में मुसलमानों की आबादी क़रीब 17% है तो मुसलमानों को कितनी हिस्सेदारी दी है.

सीएसडीएस के संजय कुमार कहते हैं, “प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले दिनों कहा था कि अगर संख्या की बात करते हैं, तो सबसे ज़्यादा संख्या ग़रीबों की है. यानी ‘कास्ट’ का मुक़ाबला करने के लिए बीजेपी ‘क्लास यानी’ आर्थिक आधार का सहारा लेगी.

संजय कुमार के मुताबिक, “बाद में अगले साल जनवरी के महीने में राम मंदिर का निर्माण हो जाएगा तो उसके इर्द- गिर्द राजनीति शुरू हो जाएगी. और जब यह शुरू हो जाएगा तो हमने पहले भी देखा है कि जाति के मुक़ाबले धार्मिक पहचान ज़्यादा बड़ी है और यह जाति की पहचान को काट देगा.”

यानी मंडल-कमंडल की राजनीति के दौर में जिस तरह बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन को लेकर रथ यात्रा पर निकले थे. उसी राम मंदिर का निर्माण इस बार बीजेपी की रणनीति का एक अहम हिस्सा बन सकता है.

दूसरी तरफ पुष्पेंद्र कुमार मानते हैं कि बीजेपी हिन्दू गोलबंदी और राष्ट्रवाद के अलावा पाकिस्तान, चीन से ख़तरा और देश के अंदर कथित तौर पर अर्बन नक्सल जैसे मुद्दे को भी अपनी रणनीति का हिस्सा बना सकती है.

बीजेपी की बात करें तो फ़िलहाल उसके नेता ग़रीबों के लिए बनाई गई नीतियों और योजनाओं के दम पर ग़रीबों, पिछड़ों के समर्थन का दावा करती दिखती है. इसमें जनधन खाते, ग़रीबों के लिए मकान, इलाज के लिए आयुष्मान कार्ड और गैस कनेक्शन जैसी योजनाएँ शामिल हैं.

इसके अलावा हाल ही में केंद्र सरकार ने विश्वकर्मा योजना की भी घोषणा की है. इस योजना से बढ़ई, सोनार, मूर्तिकार, चर्मकार, नाई, बुनकर, दर्ज़ी, धोबी, लोहार वगैरह कई पेशे से जुड़े लोगों को लाभ मिलने का दावा किया जा रहा है.

एनडीए गठबंधन

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बिहार बीजेपी के नेता और विधायक नंद किशोर यादव कहते हैं, “बिहार में अलग-अलग जातियों के लोगों की आर्थिक स्थिति अभी नहीं बताई क्योंकि इन्हें केवल राजनीति करनी है. ये लोग समाज को बांटकर राजनीति करने वाले लोग हैं. बीजेपी के वोट बैंक को इससे कोई ख़तरा नहीं होगा. हमने उनके लिए काम किया है. साल 2014 से ही बीजेपी के वोट इन वर्गों में लगातार बढ़ रहे हैं.”

इलाहाबाद के गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के प्रोफ़ेसर और समजाशास्त्री बद्री नारायण मानते हैं कि जाति आधारित जनगणना और इसपर हो रही राजनीति बिहार तक ही सीमित नहीं रहेगी.

वो भी इस बात से बहुत हद तक सहमत दिखते हैं कि बीजेपी के पास केंद्र सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों का एक बड़ा वर्ग है.

रशीद किदवई

बद्री नारायण कहते हैं, “बीजेपी अब ब्राह्मणों और बनियों की पार्टी नहीं रही. बीजेपी ने बड़ी संख्या में ओबीसी समुदाय के सांसदों को केंद्र में मंत्री बनाया है. यही नहीं देश का नेतृत्व कर रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ख़ुद ओबीसी समुदाय से आते हैं.”

यानी बीजेपी ओबीसी समुदाय में अपने जनाधार और ग़रीबों के लिए केंद्र सरकार की योजनाओं को विपक्ष के मुक़ाबले में पेश कर सकती है.

हालांकि पुष्पेंद्र कुमार के मुताबिक़, ग़रीबों के लिए चलने वाली योजना से फ़ायदा होता तो कांग्रेस ने भी ऐसी बहुत सी योजना चलाई थीं. मनरेगा और नेशलन फ़ूड सिक्योरिटी एक्ट धरे रह गए और कांग्रेस साल 2014 में चुनाव हार गई. हर सरकार में ऐसी योजना बनती है लेकिन इससे चुनावों में बहुत लाभ नहीं मिलता है.

विपक्ष का घेरा और बीजेपी का असमंजस

इंडिया गठबंधन

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विपक्षी दलों ने जाति आधारित गणना की मांग ऐसे वक़्त में उठाई है जब भारत में हर दस साल में होने वाली आम जनगणना भी नहीं हो पाई है. यह काम साल 2021 में हो जाना था.

भारत में साल 1881 से हर दस साल में जनगणना कराई जाती रही है. केंद्र सरकार पर यह आरोप भी लग रहा है कि भारत में जनगणना काम विश्व युद्ध के दौरान भी नहीं रुका, लेकिन मौजूदा सरकार इसमें असफल रही है.

बिहार में हुई इस गणना से जो आँकड़े सामने आए हैं उसके मुताबिक़ राज्य में अनारक्षित यानी सवर्ण जातियां क़रीब 15.52% हैं.

ख़ास बात यह है कि अनारक्षित वर्ग में मुसलमानों की ऊंची जातियाँ भी शामिल हैं. राज्य में हिन्दू सवर्ण जातियों की आबादी महज़ 10% के क़रीब है.

बीजेपी को सवर्ण जातियों के समर्थन वाली सबसे बड़ी बार्टी माना जाता है. हालाँकि पिछले कुछ चुनावों में पिछड़ी जातियों से भी बीजेपी को खूब समर्थन मिला है.

ऐसे में बीजेपी अगर जाति आधारित गणना का समर्थन करती है तो इससे उसके सवर्ण वोटर नाराज़ हो सकते हैं.

अगर बीजेपी इसका विरोध करती है तो इससे उसे ओबीसी समुदाय की नाराज़गी झेलनी पड़ेगी, जो भारत में सबसे बड़ा वर्ग है. बीजेपी की इसी मुश्किल का का फ़ायदा विपक्ष उठाने की कोशिश में लगा है और जातियों की बात पर लगातार उसपर दबाव बढ़ा रहा है.

रशीद किदवई कहते हैं, “मुझे लगता है कि नरेंद्र मोदी इसे लेकर बहुत सावधान हैं, वो ऐसा कुछ नहीं करना चाह रहे हैं जिससे कोई नज़ीर बन जाए, क्योंकि इससे देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आ जाएगा. पानी जब सिर से उपर आ जाएगा तब बीजेपी और नरेंद्र मोदी कोई कदम उठाएंगे.”

उनका मानना है कि पुरानी कांग्रेस वगैरह की सरकार होती तो उनको तरीका आता था, वो कह देते कि हम जातिगत जनगणना कराएंगे और फिर उसको ठंडे बस्ते में डाल देते या कोई आयोग बना देते. इससे मामला पांच-दस साल तक आगे खिंच जाता.

रशीद किदवई के मुताबिक़, अति पिछड़ी जातियों का समर्थन पाने के लिए बीजेपी को केवल एक बात कहनी है कि अगर वो 2024 में लौट कर आए तो जाति आधारित जनगणना करेंगे.

लेकिन इससे बीजेपी के सवर्ण जाति के वोटर नाराज़ होंगे और आरएसएस भी ऐसा नहीं चाहेगा. इसलिए लगता है बीजेपी फ़िलहाल ‘वेट एंड वॉच’ वाली रणनीति पर कायम रहेगी.

पांच राज्यों के चुनावों में कितना असर

राम मंदिर अयोध्या

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हालांकि पुष्पेंद्र कुमार मानते हैं कि चुनाव के समय मज़बूत नेतृत्व और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे जनता को ज़्यादा अपील करते हैं.

बीजेपी साल 2014 में इन्हीं मुद्दों को उठाकर सरकार में आई थी और कांग्रेस को भी ऐसा एक मुद्दा ढूंढना होगा.

उनका कहना है, “कांग्रेस को इसके लिए कर्नाटक एक रास्ता दिखाता है. कांग्रेस ने वहां ‘40% की सरकार’ की बात कर एक नेरेटिव सेट कर दिया. फिर बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी ने खूब कोशिश की लेकिन वो कांग्रेस के नैरेटिव को नहीं बदल सके.”

भारत के बारे में जानकार एक बात को ख़ास ज़ोर देते हैं कि यहां जिस समुदाय के लिए आरक्षण या बाक़ी योजनाएँ बनाकर ज़रूरतमंदों तक लाभ पहुंचाने का दावा किया जाता है, उनकी आबादी तक की जानकारी सरकार के पास नहीं होती है.

इनमें अनुसूचित जनजाति और दलितों के अलावा बाक़ी जातियों की आबादी की आख़िरी गिनती साल 1931 की जनगणना में की गई थी. ऐसे में विपक्षी दल ‘जाति आधारित गणना’ एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने में लगे हैं.

भारत में फ़िलहाल आने वाले दिनों में पाँच मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.

उन चुनावों में जाति आधारित गणना के मुद्दे का क्या असर होता है, उसी पर बीजेपी और विपक्षी दलों की आगे की रणनीति भी देखने को मिल सकती है.

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