मोदी सरकार अपने ऊपर होने वाले हर हमले को ओबीसी, दलित से क्यों जोड़ देती है?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
संसद के मॉनसून सत्र की कार्यवाही के लिए लंबे अरसे बाद सभी सांसद एक जुट हुए.
लेकिन पहले ही दिन दोनों सदनों में जमकर हंगामा हुआ. सदन की शुरुआत से पहले इसका आभास सत्ता पक्ष को हो गया था. प्रधानमंत्री मोदी ने शुरुआत में ही कहा, "विपक्ष जम कर सवाल पूछे लेकिन सरकार को जवाब देने का मौका भी दे."
लेकिन जब सदन की कार्यवाही शुरू हुई तो नज़ारा अलग ही थी. सत्र के पहले दिन प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा में अपनी मंत्रिपरिषद के नए मंत्रियों का परिचय कराना चाहा मगर इसी दौरान विपक्ष के सदस्य हंगामा करने लगे.
इसके बाद प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि वो कुछ तबक़ों के लोगों को मंत्री बनते नहीं देखना चाहता.
मोदी ने कहा, "मैं सोच रहा था कि आज सदन में उत्साह का वातावरण होगा क्योंकि बहुत बड़ी संख्या में हमारी महिला सांसद, दलित भाई, आदिवासी, किसान परिवार से सांसदों को मंत्री परिषद में मौका मिला. उनका परिचय करने का आनंद होता."
"लेकिन शायद देश के दलित, महिला, ओबीसी, किसानों के बेटे मंत्री बनें, ये बात कुछ लोगों को रास नहीं आती है. इसलिए उनका परिचय तक नहीं होने देते."
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कांग्रेस के सांसद गौरव गोगोई ने इस पर ट्विटर पर लिखा, "प्रधानमंत्री खु़द ही अपने आप को कैबिनेट फेरबदल के लिए मुबारकबाद देना चाहते हैं, ये भूल कर कि कोरोना की दूसरी लहर में कितने लोगों की जान गई, महँगाई पर जनता त्राहि त्राहि कर रही है और किसान नए कृषि क़ानून पर प्रदर्शन कर रहे हैं."
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प्रधानमंत्री जब ये बात लोकसभा में कह रहे थे, तब विपक्ष के सांसद जम कर हंगामा कर रहे थे. उनका प्रदर्शन महँगाई और किसानों के मुद्दे पर था. ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी अपने नए मंत्रियों का परिचय नहीं करा सके.
राज्यसभा में कुछ ऐसा ही माहौल रहा.
लेकिन हाल के दिनों में ये लगातार दूसरा मौका था जब सरकार अपने हमलों के जवाब में दलित-ओबीसी कार्ड खेल रही थी. इससे पहले कैबिनेट के विस्तार के समय भी सरकार ने मंत्रियों के फेरबदल के बाद सरकार के नए चेहरे को ओबीसी और दलितों के साथ जोड़ा था.

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बीजेपी का दलित ओबीसी कार्ड
राजनीति के जानकार मान कर चल रहे हैं कि साल 2024 तक बीजेपी इस कार्ड का इस्तेमाल करती ही रहेगी. दरअसल इसके पीछे बीजेपी के चुनावी गणित है.
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के प्रोफ़ेसर और राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार कहते हैं, "भारत में 45 से 48 फ़ीसदी ओबीसी आबादी है."
"बीजेपी अपने वोट बेस को विस्तार देने के लिए एक बने बनाए प्लान पर चल रही है. उस प्लान को ग़ौर से देखें तो पता चलेगा कि अटल-आडवाणी युग में (1999-2004) बीजेपी के पास कुल 28 फ़ीसदी वोट शेयर हुआ करता था. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में ये वोट बेस 31 फ़ीसदी हुआ और 2019 के लोकसभा चुनाव में ये और बढ़ कर 37 फ़ीसदी पहुँच गया है."
संजय कुमार के मुताबिक़ प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में बीजेपी के विस्तार के इन्हीं आँकड़ों में ओबीसी-दलित कार्ड की राजनीति छिपी है.
वाजपेयी के कार्यकाल में बीजेपी 'अपर कास्ट' (यानी ब्राह्मण, राजपूत, बनिया) और 'अपर क्लास' (शहरी इलाके में रहने वालों) की पार्टी मानी जाती थी.
साल 2014 से 2019 के बीच जब बीजेपी 30 फ़ीसदी से ऊपर वोट प्रतिशत हासिल कर पाई उसमें 'अपर कास्ट' और 'अपर क्लास' की भागीदारी तो थी ही, साथ ही बीजेपी के साथ बड़ी संख्या में ओबीसी और दलित भी आए.
बीजेपी ने 2014 में ही इस प्लान को समझ लिया था. इसलिए तब से अब तक ये इस मिशन पर काम कर रहे हैं.

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संजय कुमार बीजेपी के मिशन विस्तार को आँकड़ों के जरिए समझाते हैं.
साल 2009 से पहले तक बीजेपी के पास दलित वोट 10-12 फ़ीसदी थे.
साल 2014 में बीजेपी के पास दलित वोट 24 फ़ीसदी हो गए. यानी दोगुने.
साल 2019 में बीजेपी के खाते में 34 फ़ीसद दलित वोट आए. यानी 2014 के मुक़ाबले 10 फ़ीसद से ज़्यादा.
उसी तरह से ओबीसी वोट की बात करें तो
साल 2009 से पहले तक बीजेपी के पास 20-22 फ़ीसदी ओबीसी वोटर थे.
साल 2014 में ओबीसी वोट 33-34 फ़ीसदी हो गए
साल 2019 में ये और बढ़कर 44 फ़ीसदी हो गए.
बीजेपी ने इस बात को ग़ौर से देखा कि उनका किस कैटेगरी का वोट बढ़ रहा है, उसी को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में वो जुट गए.
संजय कुमार कहते हैं कि बीजेपी सभी ओबीसी को अपना टारगेट मानने के बजाए केवल 'नॉन डोमिनेंट ओबीसी' को ही अपने पक्ष में करना चाहती है.
'नॉन डोमिनेंट ओबीसी/दलित' को समझाते हुए संजय कुमार कहते हैं, "जैसे उत्तर प्रदेश में बीजेपी यादवों को टारगेट नहीं करती, क्योंकि वो जानती है कि वो किसी पार्टी के पारंपरिक वोटर हैं. वैसे ही दलितों में जाटव को टारगेट नहीं करती, क्योंकि वो पहले से मायवती का वोट बैंक माना जाता है."
प्रोफ़ेसर संजय कहते हैं, "बीजेपी दो बातें जानती हैं -
पहला - अगर बहुमत से चुनाव जीतना है तो 35 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट शेयर चाहिए.
दूसरा - 35 फ़ीसदी वोट लाने के लिए दलित और ओबीसी को अपने साथ रखना जरूरी है."
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उत्तर प्रदेश को लेकर चिंतित है बीजेपी
ये तो हुई भारत भर में बीजेपी के 'मिशन विस्तार' की बात. लेकिन 2024 अभी दूर है, उससे पहले बीजेपी को 2022 के लिए मिशन उत्तर प्रदेश की तैयारी भी करनी है.
वरिष्ठ पत्रकार अदिति फडनीस कहती हैं, "जैसे महाभारत में अर्जुन को मछली की आँख दिख रही थी, वैसे ही बीजेपी को फिलहाल केवल उत्तर प्रदेश के आने वाले विधानसभा चुनाव दिख रहे हैं."
"पंचायत चुनाव के नतीजों से बीजेपी बहुत ज़्यादा खुश नहीं हैं. गोरखपुर से लेकर पूर्वांचल, बुंदेलखंड, बघेलखंड सब जगह की उन्हें अब चिंता सता रही है. कोरोना महामारी में खराब प्रबंधन की चिंता भी आरएसएस- बीजेपी को है. प्रदेश के ब्राह्मणों की नाराजगी किसी से छिपी नहीं है. अब मायावती उन्हें अपने साथ करने के प्रयास में पूरी तरह जुट भी गई हैं."
अदिति कहती हैं कि इसी वजह से कैबिनेट विस्तार में भी सबसे ज़्यादा मंत्री यूपी से ही बनाए गए.
इस बार के कैबिनेट में शामिल हुए मंत्री हैं महाराजगंज से सांसद और छह बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले पंकज चौधरी, अपना दल की अनुप्रिया पटेल, आगरा से सांसद एसपी बघेल, पांच बार सांसद रहे भानु प्रताप वर्मा, मोहनलालगंज सांसद कौशल किशोर, राज्यसभा सांसद बीएल वर्मा और लखीमपुर खीरी से सांसद अजय कुमार मिश्रा.
एक ब्राह्मण को छोड़कर बाकी छह का ताल्लुक ओबीसी और दलित समाज से है और वो गैर-यादव और गैर-जाटव हैं.
गैर यादव और गैर जाटव का मतलब है वो ओबीसी और दलित जो किसी पार्टी विशेष के वोटर नहीं हैं. जिसकी बात संजय कुमार कह रहे थे.
पंकज चौधरी और अनुप्रिया पटेल ओबीसी कुर्मी समाज से हैं. कौशल किशोर पासी समाज से हैं. जाटव के बाद उत्तर प्रदेश में पासी समाज का बड़ा वोट बैंक है. बीएल वर्मा लोध (पिछड़ी जाति) समाज से आते हैं और माना जाता है कि लोध समुदाय पर उनका अच्छा असर है. पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी लोध समाज से हैं. भानु प्रताप वर्मा दलित हैं.
अदिति कहती हैं, "प्रधानमंत्री मोदी जो आज विपक्ष पर आरोप लगा रहे हैं कि विपक्ष ओबीसी और दलित को मंत्री बनते नहीं देखना चाहता, वही आरोप कैबिनेट विस्तार से पहले उन पर भी लग रहा था.
अनुप्रिया पटेल का इस बार शामिल किया गया, जबकि 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा था. तब उन्हें मंत्री पद क्यों नहीं दिया गया था. अब उन्हें इसलिए शामिल किया गया क्योंकि उनको ओबीसी वोट चाहिए.
उत्तर प्रदेश की बात करें तो ओबीसी वोट 45 फ़ीसदी हैं, जिसमें यादव 10 फ़ीसदी के आसपास हैं. यानी बीजेपी के निशाने पर बाक़ी के 35 फ़ीसदी ओबीसी हैं.
उसी तरह से दलितों की बात करें तो 19-20 प्रतिशत दलित वोट हैं, जिसमें से 6-7 फ़ीसदी जाटव वोट हैं, जो पारंपरिक तौर पर मायावती के वोटर माने जाते हैं. यानी यहाँ बचे हुए 12-13 फ़ीसदी वोटों पर बीजेपी की नज़र है.

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पंजाब और गुजरात चुनाव
अदिति कहती हैं पंजाब और गुजरात की बीजेपी को फिलहाल ज़्यादा चिंता नहीं हैं. पंजाब में बीजेपी के पास खोने को कुछ ज़्यादा नहीं है, लेकिन वहाँ दलितों की बात करें तो कुल आबादी का 30 फ़ीसदी दलित हैं.
गुजरात के लिए बीजेपी को चिंता ज़्यादा नहीं है क्योंकि वहाँ विपक्ष बिखरा हुआ ज़्यादा है और वहाँ के समीकरण मोदी-शाह की जोड़ी संभाल सकती है. कुछ कोशिश इस बार के मंत्रिमंडल विस्तार में दिखी भी है.
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