अनुप्रिया पटेल: अमित शाह से मिलने और मिर्ज़ापुर से दिल्ली तक का सफ़र

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
गृह मंत्री अमित शाह से गुरुवार को मुलाक़ात के बाद सीएम योगी आदित्यनाथ की तस्वीर के साथ-साथ एक और तस्वीर काफ़ी शेयर हुई थी.
ये तस्वीर थी गृह मंत्री अमित शाह और अपना दल की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल के मुलाक़ात की जिसे खुद अमित शाह ने ट्वीट किया था.
अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में अपना दल की पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक ख़ास क्षेत्र में अहम भूमिका मानी जा रही है.
अमित शाह के साथ अनुप्रिया पटेल की मुलाक़ात को भी आने वाले चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है.

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अनुप्रिया पटेल 2014 में उस समय भी ख़ूब चर्चा में आई थीं जब सिर्फ़ दो सांसद होने के बावजूद उन्हें केंद्र में मंत्री पद दिया गया था.
2014 के लोकसभा चुनाव में अपना दल ने बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. अनुप्रिया पटेल ने मिर्ज़ापुर से चुनाव जीता था.
लोकसभा चुनाव में एनडीए ने बहुमत हासिल किया और अनुप्रिया पटेल केंद्र में मंत्री बनाई गईं. उन्हें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री का प्रभार सौंपा गया. हालांकि, वो साल 2019 तक ही इस पद पर बनी रहीं.
अनुप्रिया पटेल के मंत्री बनने से ही इस बात का अंदाज़ा लगाया जाने लगा की बीजेपी की नज़र लोकसभा के साथ-साथ 2017 में आने वाले यूपी चुनावों पर भी है, जहां अनुप्रिया पटेल मददगार साबित हो सकती हैं.
लेकिन, यूपी में ओबीसी में भी सिर्फ़ कुर्मियों की राजनीति करने वाले अपना दल की प्रमुख अनुप्रिया पटेल राज्य से केंद्र तक कैसे पहुंचीं? एनडीए में उनका कद कैसे बढ़ गया? एक क्षेत्रीय नेता के लिए ये सफ़र किन-किन गलियारों से होकर गुज़रा?

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राजनीति में कदम
अनुप्रिया पटेल के पिता सोनेलाल पटेल ने 1955 में ‘अपना दल’ का गठन किया था.
सोनेलाल पटेल अपने समय के जानेमाने नेता थे. उन्हें बहुजन समाज पार्टी के संस्थापकों में से एक भी माना जाता है. लेकिन, आगे चलकर बसपा प्रमुख मायावती से मतभेद के कारण उन्होंने बीएसपी से खुद को अलग कर लिया.
इसके बाद उन्होंने ‘अपना दल’ पार्टी का गठन किया जो अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व करती थी.
पिता के रहते अनुप्रिय पटेल पार्टी में सक्रिय नहीं रहीं. उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की. लेकिन, सोनेलाल पटेल की 2009 में एक हादसे में मौत के बाद उन्होंने पार्टी में कदम रखा और राष्ट्रीय महासचिव बन गईं.
उनकी तीन और बहनें भी हैं. चारों बहनें तब भी चर्चा में आई थीं जब उन्होंने सोनेलाल पटेल की अर्थी को कंधा दिया था.

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पिता की मौत के बाद अनुप्रिया पटेल की माँ कृष्णा पटेल के हाथों में पार्टी की कमान आ गई. अनुप्रिया पटेल अपनी माँ को सहयोग करती रहीं.
अनुप्रिया पटेल क़रीब 28 साल की उम्र में राजनीति में आई थीं. उनका परिवार से तनाव हुआ, पार्टी में दो फाड़ भी हुए लेकिन उन्होंने कभी अपने पांव वापस नहीं खींचे.
2012 में हुए विधानसभा चुनाव में अनुप्रिया वाराणसी के नज़दीक रोहनिया विधानसभा से चुनाव जीती थीं.
2014 में पार्टी ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया और अनुप्रिया पटेल मिर्ज़ापुर से सांसद बन गईं.

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अनुप्रिया के सांसद बनने से रोहनिया विधानसभा की खाली सीट पर उपचुनाव हुए जिसमें अनुप्रिया चाहती थीं कि उनके पति आशीष सिंह पार्टी के उम्मीदवार बनें.
लेकिन, उनकी माँ की अध्यक्षता वाली पार्टी की गवर्निंग बॉडी ने इससे इनकार कर दिया और उनकी माँ ख़ुद रोहनिया से चुनाव लड़ीं.
बताया जाता है कि पार्टी में बढ़ते उनके प्रभाव को रोकने के लिए ऐसा किया गया. उनकी माँ और छोटी बहन पल्लवी पटेल उनके बढ़ते कद से ख़ासे सहज नहीं थे.
नतीजतन कृष्णा सिंह पटेल को रोहनिया से चुनाव लड़ते हुए अनुप्रिया पटेल का पूरी तरह सहयोग नहीं मिल पाया. इसके चलते चुनाव के नतीजों ने परिवार में और तनाव पैदा कर दिए.

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अलग पार्टी की नींव
अनुप्रिया और कृष्णा पटेल पार्टी पर अध्यक्ष पद का दावा करने लगीं. मोदी मंत्रिमंडल में अनुप्रिया के शामिल होने पर भी कृष्णा पटेल ने नाराज़गी जाहिर की.
वैसे तो कहा जाता है कि माँ कभी बेटी से नाराज़ नहीं हो सकती लेकिन राजनीति एक अलग पहलू है.
जब कृष्णा सिंह पटेल चुनाव हार गईं तो अगले कुछ महीनों में साल 2015 में अनुप्रिया पटेल और उनके छह सहयोगियों को पार्टी से निकाल दिया गया.

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दोनों बहनों का टकराव भी खुलकर सामने आता रहता है. पल्लवी पटेल कई बार मंच से अनुप्रिया पटेल पर निशाना साधती रही हैं.
हालांकि, पार्टी से निकाले जाने तक अनुप्रिया पटेल की अपनी अलग पहचान बन चुकी थी और वो केंद्र में मंत्री भी थीं.
उन्होंने 2016 में अपनी अलग पार्टी ‘अपना दल (सोनेलाल)’ बना दी. हालांकि, वो तुरंत पार्टी की अध्यक्ष नहीं बन सकीं. ये पदभार उन्होंने साल 2018 में संभाला.
अनुप्रिया पटेल और उनकी माँ पार्टी पर अधिकार को लेकर हाई कोर्ट भी पहुंच गए जहां मामला विचाराधीन है. इस विवाद के चलते कृष्णा सिंह ने भी अब ‘अपना दल (कमेरावेदी)’ नाम से एक नई पार्टी बना ली.

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केंद्र तक पहुंच
अनुप्रिया पटेल के राजनीतिक करियर में एक अहम पड़ाव तब आया जब उन्होंने राज्य की राजनीति से केंद्र में कदम रखा.
तब अनुप्रिया पटेल की एक पढ़ी-लिखी और युवा नेता की छवि भी उभरकर सामने आई.
2016 में 36 साल की उम्र में जब वो मंत्री बनीं तो वो मोदी सरकार में शामिल सबसे युवा मंत्री थीं.
अनुप्रिया पटेल ने लेडी श्रीराम कॉलेज से ग्रेजुएशन, एमिटी यूनिवर्सिटी से साइकोलॉजी में मास्टर डिग्री की है. साथ ही छत्रपति साहू जी महाराज यूनिवर्सिटी कानपुर से एमबीए किया है.
शैक्षणिक क्षेत्र में इस स्तर तक पढ़ने के बावजूद भी उन्होंने राजनीति में आने का फ़ैसला क्यों लिया. ये सवाल उनसे अक्सर पूछा जाता है.
अपने राजनीति में आने को लेकर वे कहती हैं, “मेरे पिता एक बड़े नेता थे और घर में सिर्फ़ राजनीति की बातें होनी थीं लेकिन इसके बावजूद मेरी राजनीति में कभी दिलचस्पी नहीं रही. लेकिन पिता की अचानक मौत के बाद मैं राजनीति में आई और पार्टी को संभाला. मेरे पिता से जुड़े लोग चाहते थे कि मैं ऐसा करूं.”
लेकिन, राज्य की राजनीति से केंद्र में कदम रखना उनके राजनीतिक करियर में एक बड़ा पड़ाव था.
उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों में यादवों के बाद सबसे ज़्यादा संख्या कुर्मियों की है. ये यूपी की आबादी का नौ प्रतिशत हैं. ये वर्ग यूपी की क़रीब 100 सीटों पर प्रभाव रखता है.
अनुप्रिया पटेल अपनी पार्टी की एकमात्र सांसद हैं इसके बावजूद केंद्र में मिले मंत्री पद के पीछे इसे ही सबसे बड़ा कारण माना जाता है.
वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, “यूपी में कुर्मी बिरादरी काफ़ी बड़ी है. पूर्वांचल में महराजगंज से लेकर लखीमपुरखीरी तक इनका प्रभाव है. यादवों के बाद उत्तर प्रदेश मे कुर्मी दूसरे नंबर पर आते है. शहरी इलाक़ों में प्रभावशाली हैं, उनकी शैक्षणिक संस्थाएं भी हैं. बीजेपी ने यूपी में जो व्यूहरचना की है उसमें पार्टी छोटी-छोटी जातियों के और छोटे-छोटे सामाजिक समीकरण बनाती है. इसलिए उन्हें केंद्र में महत्व दिया जा रहा है.”

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अमित शाह से उनकी मुलाक़ात को लेकर रामदत्त त्रिपाठी का कहना है, “अनुप्रिया पटेल न तो खुद मंत्री हैं और न ही यूपी सरकार में उनकी पार्टी से कैबिनेट में किसी को जगह मिली है. ऐसे में बीजेपी उनकी नाराज़गी भी दूर करना चाहती है.”
“बीजेपी चाहती है कि अनुप्रिया पटले की पार्टी उसके साथ ही गठबंधन में रहे. किसी और का दामना न थाम ले. यूपी के चुनावी गठबंधन के सिलसिले में उनकी ये बातचीत महत्वपूर्ण होगी. वहीं, केंद्रीय स्तर पर या राज्य स्तर पर मंत्रिमंडल में अगर कोई विस्तार होता है तो अपना दल के प्रतिनिधि उसमें शामिल हो सकते हैं.”
हालांकि, बीजेपी में शामिल होने को लेकर अनुप्रिया पटेल को आलोचना का सामना भी करना पड़ा था. उन्हें अवसरवादी नेता भी कहा गया.
इस पर अपना दल (सोनेलाल) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजेश पटेल कहते हैं कि अनुप्रिया पटेल हमेशा अति पिछड़ा वर्ग की समस्याओं और मुद्दों को उठाती रही हैं और आगे भी वो ऐसा ही करेंगी. राज्य से केंद्र में कदम रखने के साथ ही उन्होंने ओबीसी के मसलों को भी वहां तक पहुंचाया है.

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ओबीसी समुदाय के लिए अलग मंत्रालय की मांग
अनुप्रिया पटेल ओबीसी समुदाय के लिए मुख्य तौर पर दो मांगें रखती रही हैं. वो संघ लोक सेवा आयोग की तर्ज पर देश में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा आयोग का गठन करने की मांग करती हैं जिसमें ओबीसी और एससी-एसटी का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा.
उनकी दूसरी मांग रही है कि जिस तरह एससी, एसटी और आदिवासी मामलों के लिए एक अलग मंत्रालय है उसी तरह ओबीसी के लिए भी होना चाहिए.
उन्होंने कहा था, “मुझे लगता है कि अगर किसी समुदाय का विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया में प्रतिनिधित्व नहीं है तो ये पता भी नहीं चलता कि उस समुदाय का कोई अस्तित्व भी है.”
अनुप्रिया पटेल एक तेज़ तर्रार नेता की भी पहचान रखती हैं. उन्हें संसद में, डिबेट में और इंटरव्यू में खुले तौर पर अपनी बात रखते देखा जा सकता है. वो ख़ुद को 'संघर्ष के बल पर पहचान बनाने वालीं नेता' भी कहती हैं.

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हालांकि, रामदत्त त्रिपाठी इससे सहमति नहीं रखते. वे कहते हैं, “अनुप्रिया पटेल एक क्षेत्रीय नेता हैं. उनके पास भी अपने पिता की एक विरासत है. वो राजनीति में संघर्ष करके नहीं आई हैं. हां, उन्होंने अपने परिवार में ही संघर्ष ज़रूर किया है. किसी भी दूसरे जातीय संगठन की तरह इनका भी एक सीमित वोट बैंक है. वे एक युवा, डायनामिक और पढ़ी-लिखी नेता हैं इसलिए पार्टी के ज़्यादा लोगों का उन्हें समर्थन मिला.”
हालांकि, अब यूपी चुनाव के नज़दीक आते-आते बीजेपी के लिए अनुप्रिया पटेल का महत्व ज़रूर बढ़ गया है. उनके वोट बैंक की बीजेपी को यूपी की जीत में ख़ास भूमिका नज़र आती है जिसमें अनुप्रिया पटेल के लिए भी मौके छुपे हो सकते हैं.
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