बिहार के जाति सर्वे में पूछे गए ये सवाल और जिन प्रश्नों से असहज हुए कुछ लोग

बिहार में जातिगत जनगणना का काम अंतिम चरण में है
    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना

बिहार की राजधानी पटना के कंकड़बाग में रहने वाले बीके सिंह इस बात से नाराज़ हैं कि राज्य सरकार कास्ट सर्वे क्यों करा रही है.

वह अपनी नौकरी, आरक्षण और बाक़ी सभी शिकायतों को लेकर जाति सर्वे करने वाली टीम से ही भिड़ गए.

जैसे ही सरकारी टीम उनके घर पर पहुंची बीके सिंह ने घर का दरवाज़ा खोला और टीम पर ही बरस पड़े. बीके सिंह का आरोप है कि नीतीश कुमार ने किसी ऊंची जाति को नौकरी नहीं दी है.

बीके सिंह कहते हैं, “ये लोग पूछते हैं कि आर्थिक स्थिति क्या है? क्या ऊंची जातियों में ग़रीब लोग नहीं हैं? मेरे पास पटना में भी घर है और गांव में भी है. नीतीश कुमार ने जो किया है, अपनी जाति के लिए किया है.”

ज़मीनी स्तर पर लोगों के घर-घर जाकर आंकड़े जुटाने के काम को हमने क़रीब से देखा तो पाया कि सवर्ण जातियों के कई लोग ऐसी जनगणना नहीं चाहते हैं. कुछ परिवारों ने तो अपने बारे में कोई भी जानकारी तक टीम को नहीं दी. हालांकि ऐसे लोगों की तादात बहुत कम है.

हमने पाया कि आमतौर पर लोगों को अपनी जाति से जुड़ी जानकारी देने में कोई परेशानी नहीं हुई. इसके मुक़ाबले अपनी कमाई, संपत्ति और शिक्षा से जुड़ी जानकारी देने में लोग असहज थे.

बीबीसी ने जानने की कोशिश की है कि किन सवालों को लेकर लोग असहज हुए और किन सवालों का जवाब देने में उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई.

पटना के बीके सिंह जातिगत जनगणना करने वाली टीम को देखकर ही भड़क गए

विरोध के स्वर

कंकड़बाग में ही एक कोठी के सामने जब सर्वे टीम पहुँची तो उन्होंने सीधा उन सवालों को ही ग़लत बता दिया जो जातिगत सर्वे के लिए तैयार किए गए हैं.

इसी इलाक़े में एक परिवार ऐसा भी मिला जिसने अपनी कोई जानकारी सरकार से साझा नहीं की, न ही हमसे बात करने को राज़ी हुए. उन्होंने सीधा सरकार की मंशा और सर्वे को ही ग़लत ठहरा दिया.

संयोग से ये सवर्ण जातियों के परिवार के सदस्य थे. हालांकि कास्ट सर्वे करने वाली टीम का कहना था कि वो अपनी ड्यूटी कर रहे हैं और सवालों की जो सूची उन्हें दी गई है, वो बस उसी से जुड़ी जानकारी चाहते हैं.

दरअसल, इसी साल जनवरी में कास्ट सर्वे के पहले चरण में राज्य भर के मकानो की सूची तैयार की गई थी. इसमें मकान के मुखिया का नाम दर्ज किया गया था और साथ में मकान या भवन को एक नंबर दिया गया था.

इसमें क़रीब दो करोड़ 59 लाख़ परिवारों की सूची तैयार गई थी. कास्ट सर्वे का दूसरा चरण 15 अप्रैल से शुरू होकर 15 मई को ख़त्म होना था, लेकिन मई के पहले सप्ताह में पटना हाई कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी.

पटना हाई कोर्ट ने इसी महीने एक अगस्त को यह रोक हटाई है और इस पर काम फिर से आगे बढ़ा है.

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इसके दूसरे चरण के लिए सरकार की तरफ़ से हर मकान में रहने वालों से जुड़े 17 सवाल तैयार किए गए थे और इन्हीं सवालों के जवाब के आधार पर कास्ट सर्वे पूरा होना है.

राज्य भर में कास्ट सर्वे के लिए ज़मीनी स्तर पर आँकड़े जुटाने का काम पूरा हो गया है. कोई क़ानूनी रोक न हो तो माना जा रहा है कि इन आँकड़ों को संकलित कर इसी साल अगस्त के महीने में कास्ट सर्वे की रिपोर्ट तैयार हो सकती है.

हालांकि इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गई है. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार सात अगस्त को कहा है कि इससे जुड़ी सभी याचिकाओं की सुनवाई इसी महीने की 14 तारीख़ को होगी.

जातिगत जनगणना के लिए घर-घर जाकर जुटाई गई जानकारी

कास्ट सर्वे से उठते सवाल

बिहार में कास्ट सर्वे के आँकड़े जुटाने में जो प्रमुख सवाल लोगों से पूछे गए हैं, वो हैं...

  • परिवार के सदस्यों के नाम
  • हर सदस्य की उम्र, लिंग, धर्म और जाति
  • परिवार के किस सदस्य ने कहाँ तक शिक्षा हासिल की है
  • परिवार के लोग क्या करते हैं? मसलन व्यवसाय, नौकरी या पढ़ाई इत्यादि
  • किन-किन के नाम से शहर में कोई मकान या ज़मीन है
  • उनके पास खेती की ज़मीन है या नहीं
  • अगर ज़मीन या मकान है तो उसकी पूरी जानकारी
  • परिवार के सदस्यों के पास लैपलॉप या कंप्यूटर है या नहीं
  • परिवार के पास दो पहिया, तीन पहिया या चार पहिया वाहन है या नहीं
  • परिवार के हरेक सदस्य की सभी स्रोतों से मिलाकर कुल कितनी आमदनी है

दरअसल, इस तरह के सवालों के ज़रिए सरकार केवल जातिगत जानकारी जुटाना चाहती है.

सराकर का दावा है कि आर्थिक, शैक्षणिक और बाक़ी जानकारी मिलने से सरकार को कोई भी नीति बनाने में मदद मिलेगी.

सरकार की तरफ़ से दावा यह भी किया गया है कि राज्य की आबादी की पूरी जानकारी होने पर सरकारी योजनाओं का लाभ ज़रूरतमंदों तक पहुँचाने में मदद मिलेगी.

हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि प्रदेश की मौजूदा नीतीश और तेजस्वी की सरकार इन आँकड़ों का इस्तेमाल जाति आधारित लामबंदी के लिए करेगी. बिहार की चुनावी राजनीति में जातिगत पहचान अब भी काफ़ी मज़बूत है.

सरकार जिन सवालों को अपनी योजनाओं के लिए ज़रूरी मानती है, उनमें से कुछ सवाल लोगों को सहज दिखे.

कई बार लोगों से जानकारी जुटा पाना आसान नहीं दिखा

कुछ सवालों से असहज

हमने पाया कि किसी परिवार के पास कितनी संपत्ति है या उनकी आय कितनी है, इस तरह की जानकारी कुछ लोग देना ही नहीं चाह रहे थे.

इसके अलावा कई मौक़ों पर लोग अपनी शिक्षा से जुड़ी जानकारी भी साझा नहीं करना चाह रहे थे. पटना के ही नंद श्याम शर्मा की शिकायत यह है कि कास्ट सर्वे में इतने सारे सवाल क्यों है?

वो पटना में एक बड़े मकान में रहते हैं. सर्वे टीम के काफ़ी समझाने के बाद वो पहली मंज़ील से नीचे उतरे. उनके रोज़गार या व्यवाय के बारे में पूछा गया तो इस सवाल से काफ़ी असहज दिखे.

उनके पास घर के किराए से भी कुछ आमदनी होती है. हालाँकि यह दिख रहा था कि इससे जुड़े सवाल सुनकर वो सहज नहीं हैं और जवाब सुनने के बाद आंकड़े जुटाने आई टीम संतुष्ट हो पा रही है.

इसके अलावा शैक्षिणक योग्यता से जुड़े सवालों पर वो थोड़े असहज दिखे. उनको ऐसा महसूस हो रहा था कि जब जाति की जानकारी जुटाने के लिए सर्वे हो रहा है तो उनमें बाक़ी सवालों की क्या ज़रूरत है.

लोग आमतौर पर जाति के बारे में जानकारी देने में असहज नहीं दिखे

बड़े तबके का समर्थन

कास्ट सर्वे करने पहुँची टीम के साथ घूमते हुए हमने पाया कि ज़्यादातर लोग इससे ख़ुश हैं.

पटना की सुधा कुमारी के घर भी ऐसी ही एक टीम पहुंची है. दरअसल, यह टीम एक दिन पहले भी उनके घर आई थी, लेकिन घर से सभी लोग नौकरी या कामकाज़ के सिलसिले में बाहर थे, सो टीम के दोबारा आने पर वो काफ़ी ख़ुश हैं.

उन्होंने सरकारी कर्मियों को घर के अंदर बैठाकर हर सवाल का बारीकी से जवाब दिया है. दरअसल, उनके पति भी नौकरी करते हैं और सुधा कुमारी ख़ुद भी नौकरी में हैं, इसलिए उनकी आय भी छिपी नहीं है.

सुधा कहती हैं, “हमें किसी सवाल से कोई परेशानी नहीं है. जो सवाल पूछे जा रहे हैं, सब वाज़िब हैं और जाति के बारे में भी जानकारी देने में हमें कोई परेशानी नहीं है. हम जो हैं वो सभी जानते ही हैं. हमारे पड़ोसी भी और हमारे रिश्तेदार भी फिर बताने में क्या हर्ज़ है.”

जातिगत जनगणना के दूसरे चरण में कुल 17 सवाल पूछे गए
इमेज कैप्शन, जातिगत जनगणना के दूसरे चरण में कुल 17 सवाल पूछे गए.

पटना के ही प्रभात कुमार भी सरकार की इस मुहिम और सवालों का समर्थन करते हैं. उनका कहना है, “किसी सवाल से हमें कोई परेशानी नहीं हुई है. यह जानना बहुत ज़रूरी है कि देश में कौन सी जाति की आबादी कितनी है.”

उनका कहना है कि उनसे घर, परिवार, नौकरी या आमदनी के बारे में जो भी पूछा गया, उन्होंने सबका जवाब दिया है.

वहीं जातिगत जनगणना के काम में लगे एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अगर कोई स्वेच्छा से ही सही, अपनी और अपने परिवार की जानकारी नहीं देना चाहता है या तो इसमें नुक़सान उनका है.

उनका कहना है सरकार के पास किसी वर्ग या जाति के समुचित आंकड़े नहीं होंगे तो सरकार को उनके लिए योजना बनाने में परेशानी होगी.

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