भारत में जनगणना में हो रही देरी चिंता की बात क्यों है?

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- Author, शारण्या हृषिकेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ये साल 1881 की बात है. भारत में पहली बार जनगणना हुई थी. सैकड़ों लोगों ने घर-घर जाकर क़रीब 25 करोड़ लोगों से उनके बारे में कई सवाल पूछे. इनमें कई सवाल बहुत पेचादा भी थे. यह ब्रितानी भारत की पहली जनगणना थी.
अगले 130 सालों के सफ़र में भारत में काफ़ी कुछ हुआ, इसी दौरान भारत 1947 में आज़ाद भी हुआ. आज़ाद भारत ने पाकिस्तान और चीन के साथ युद्ध का सामना भी किया. सामाजिक और आर्थिक संकट भी समय-समय पर आते गए, लेकिन इस दौरान भारत में जनगणना का सिलसिला हर दस साल में एक बार जारी रहा.
हज़ारों लोग पर्यवेक्षक के तौर पर जनगणना के दूसरे मानकों के अलावा लोगों की नौकरी, उनकी आर्थिक स्थिति, उनके पलायन और सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी पहचान को चिह्नित करने देश भर में घर-घर जाते रहे.
यह एक महत्वाकांक्षी अभ्यास है जिसके ज़रिए प्रशासकों, नीति निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और जनसंख्याविदों को ढेर सारे आंकड़े मिलते हैं.
यह आंकड़े उन लोगों के लिए भी उपयोगी हैं जो यह जानना चाहते हैं कि दुनिया भर में दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश भारत किस दिशा में आगे बढ़ रहा है. दरअसल इन आंकड़ों की बदौलत ही सरकार राज्य को बजट आवंटित करती है.
स्कूल बनाने से लेकर निर्वाचन क्षेत्र की सीमा को निर्धारित करने में इन आंकड़ों की भूमिका अहम होती है.
लेकिन पहली बार ऐसा है कि हर दशक में होने वाली जगणना में देरी हो रही है, जो जनगणना 2021 में होने वाली थी, वह अभी तक नहीं हुई है और कब होगी, इसको लेकर भी स्पष्टता नहीं है.
विशेषज्ञों का कहना है कि जनगणना में देरी के परिणामों को लेकर वे चिंतित हैं, क्योंकि इससे लोगों को कल्याणकारी योजनाओं से बाहर करने और बजट का अनुचित आवंटन जैसी विसंगतियों के उत्पन्न होने का ख़तरा है.

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केवल लोगों की गिनती नहीं जनगणना
ग़रीबी और असमानता पर लंबे समय से काम करने वाले विकास अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर केपी कन्नन कहते हैं, "जनगणना केवल किसी देश में लोगों की संख्या की गिनती नहीं है. यह निम्न स्तर पर निर्णय लेने के लिए ज़रूरी बहुमूल्य आंकड़े उपलब्ध कराती है."
भारत की जनगणना, जनगणना अधिनियम-1948 के प्रावधानों के तहत कराई जाती है. इसके प्रावधानों में जनगणना कराने और उसे जारी करने को लेकर समयावधि के मुद्दे पर कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है.
2020 में भारत जनगणना के पहले चरण (जिसमें आवास संबंधी आंकड़े एकत्र किए जाते हैं) की तैयारी कर रहा था कि तभी कोरोना महामारी आ गयी. जनगणना को स्थगित कर दिया गया क्योंकि देश में लॉकडाउन लग गया था और प्रशासन को दूसरी चुनौतियों का भी सामना करना था.
तब से लगभग तीन साल बाद, अधिकांश भारतीयों को कोविड वैक्सीन लग चुकी है, कई राज्यों में विधानसभा चुनाव भी हुए हैं और जन जीवन लगभग सामान्य हो चुका है.
लेकिन दिसंबर में, भारत के नरेंद्र मोदी की सरकार ने संसद को बताया कि "कोविड-19 महामारी के प्रकोप के कारण, जनगणना 2021 और संबंधित क्षेत्र की गतिविधियों को अगले आदेश तक के लिए स्थगित कर दिया गया है."
इसके कुछ सप्ताह बाद, भारत के रजिस्ट्रार जनरल ने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर सीमाओं की यथास्थिति बनाए रखने की समय सीमा इस वर्ष 30 जून तक बढ़ा दी गई है. (जनगणना के दौरान राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ज़िलों, क़स्बों और गांवों की सीमाओं में कोई बदलाव नहीं कर सकते हैं). इस आदेश के बाद जनगणना कम से कम सितंबर, 2023 तक नहीं हो पाएगी.
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क्या है विशेषज्ञों की आशंका
विश्लेषकों को इस बात की आशंका भी है कि 2024 के अंत से पहले जनगणना संभव नहीं है क्योंकि साल के पहले हिस्से में देश भर में आम चुनाव होंगे.
दिल्ली स्थित आंबेडकर विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाली अर्थशास्त्री दीपा सिन्हा कहती हैं, "इस देरी का एक तात्कालिक परिणाम सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर दिख रहा है. इस योजना के तहत सरकार ग़रीबों को खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति कराती है."
ज्यां द्रेज़, रीतिका खेड़ा और मेघना मुंगीकर के शोध अध्ययन का हवाला देते हुए प्रोफ़ेसर दीपा सिन्हा कहती हैं, ''सरकार अभी भी 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़, यह तय कर रही है कि इस योजना से लाभ लेने वाले कौन होंगे. ऐसे में अनुमान है कि क़रीब 10 करोड़ लोग इस योजना के दायरे से बाहर हो जाएंगे."
इन तीनों ने अपने शोध अध्ययन में राज्यों द्वारा जारी जन्म, मृत्यु दर और गृह मंत्रालय के जनसंख्या के आकलन का इस्तेमाल किया है
प्रोफ़ेसर सिन्हा कहती हैं, "बड़े राज्यों, ख़ासकर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में कहीं अधिक लोग कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रह गए होंगे."
वैसे कोरोना महामारी के चलते हुई देरी से पहले भी, 2021 की जनगणना एक विवादास्पद क़वायद बन चुकी थी.

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एनपीआर का मामला
सरकार ने कहा था कि वह जनगणना के साथ-साथ राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को अपडेट करने के लिए जनसंख्या सर्वेक्षण भी करेगी. लेकिन आलोचकों ने आरोप लगाया था कि एनपीआर एक ऐसी सूची होगी जिससे "संदिग्ध नागरिकों" को यह साबित करने के लिए कहा जाएगा कि वे भारतीय हैं.
यह आलोचना 2019 में पारित विवादास्पद नागरिकता क़ानून की पृष्ठभूमि में की जा रही थी. इस क़ानून के विरोधियों का कहना है कि यह क़ानून देश के 20 करोड़ से ज़्यादा मुसलमान नागरिकों को निशाना बनाने के लिए लाया गया है. इस क़ानून के ख़िलाफ़ देशभर में महीनों विरोध प्रदर्शन देखने को मिले थे.
कई विपक्षी और क्षेत्रीय नेताओं ने माँग की थी कि केंद्र सरकार इस जनगणना में जातिगत जनगणना भी करे. विश्लेषकों का मानना है कि इससे हिंदू वोटों में दरार आ सकती है और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को नुक़सान हो सकता है और कई जातिगत समूहों से आरक्षण की मांग बढ़ सकती है.
कल्याणकारी योजनाओं पर प्रत्यक्ष प्रभाव के अलावा, जनगणना कई दूसरे आंकड़े भी प्रदान करती है जिससे अन्य महत्वपूर्ण अध्ययन - जैसे कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (सर्वेक्षणों की एक श्रृंखला जो नागरिकों के आर्थिक जीवन के सभी पहलूओं की जानकारी एकत्र करती है) और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (स्वास्थ्य और सामाजिक संकेतकों का एक व्यापक घरेलू सर्वेक्षण) अपने सैंपल जमा करते हैं.

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क्या-क्या हैं अनिश्चितताएं
हालांकि राज्य और कुछ मंत्रालय अपने स्वयं के सर्वेक्षण करके इस डेटा अंतर को कम कर सकते हैं - उदाहरण के लिए, बिहार की मौजूदा सरकार जातिगत जनगणना करा रही है, जिससे दूसरे मानकों की जानकारी भी मिलेगी.
लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक़ यह केवल कामचलाऊ उपाय है.
प्रोफ़ेसर कन्नन कहते हैं, "जनगणना जैसे विश्वसनीय राष्ट्रीय सर्वेक्षण का कोई विकल्प नहीं है, यह देश में सभी लोगों की गणना करता है." वह यह भी कहते हैं कि राज्य या देश की आबादी कभी स्थिर नहीं होती है.
मौजूदा केंद्र सरकार के जारी आंकड़ों की गुणवत्ता और कई दूसरे सर्वेक्षणों को जारी करने में देरी पर भी सवाल उठ रहे हैं, ऐसे में जनगणना को लेकर भी अनिश्चितता नज़र आती है.
उदाहरण के लिए, 2019 में मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया था कि बीते चार दशकों में पहली बार उपभोक्ता ख़र्च में गिरावट देखने को मिल रही है, इसके बाद सरकार ने कहा कि वह गुणवत्ता नहीं होने के चलते 2017-18 के एक अहम सर्वे के आंकड़े जारी नहीं कर रही है.

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नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री एंगस डेएटन सहित 200 से अधिक अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों और पत्रकारों ने एक बयान जारी कर सरकार से आंकड़े जारी करने का अनुरोध किया था. उन्होंने सरकार के सामने और कई दूसरे महत्वपूर्ण मुद्दों को भी उठाया था.
बयान में कहा गया था, "देश के लिए यह मूलभूत महत्व की बात है कि सांख्यिकीय संस्थानों को राजनीतिक हस्तक्षेप से स्वतंत्र रखा जाए और सभी आंकड़ों को स्वतंत्र रूप से जारी करने की अनुमति दी जाए."
पिछले साल अगस्त में, एक संसदीय समीति ने देश के सभी आर्थिक उद्यमों की गणना करने वाली भारत की सातवीं आर्थिक जनगणना जारी करने में हो रही देरी पर सरकार से सवाल किया था. प्रोफ़ेसर सिन्हा कहती हैं, "देश में आंकड़ों को लेकर एक समस्या है."
वहीं प्रोफ़ेसर कन्नन बताते हैं कि अतीत में, भारत ने अन्य विकासशील देशों को जनगणना कराने में मदद की थी, जो कि राष्ट्रीय गौरव का विषय था.
लेकिन वो आगे कहते हैं, "आंकड़ों को लेकर प्रतिबद्धता में कमी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा धूमिल हो सकती है."
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