सरकार जो डेटा जारी करती है उस पर कितना भरोसा किया जा सकता है?

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
'हमें भगवान पर विश्वास है. बाकी सब डेटा लेकर आएं' - माना जाता है कि ये शब्द अमेरिका के जानेमाने स्टैटिस्टिशियन एडवर्ड्स डेमिंग ने कहे थे. मक़सद था ये रेखांकित करना कि बिज़नेस करते वक्त डेटा का सही माप और उसका विश्लेषण कितना महत्वपूर्ण है.
ऐसे में अगर डेटा पर ही सवाल खड़े किए जाएं तो? पिछले कुछ समय से भारत से आने वाले डेटा और डेटा इकट्ठा करने वाले संस्थानों पर कुछ हलकों की ओर से सवाल उठ रहे हैं. यह आरोप लग रहा है कि राजनीतिक दबाव के ज़रिए आंकड़ों में हेरफेर की जा रही है.
आकंड़ों के साथ हेरफेर के आरोप तो हैं ही, डेटा पर पहरा भी दिख रहा है. जनणना की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है जिससे अहम आंकड़ों का पता चल पाता.
जनवरी 2019 में जब नेशनल स्टैटिस्टिकल कमीशन (एनएससी) के पूर्व सदस्य और कार्यकारी प्रमुख पीसी मोहनन ने अपने पद से इस्तीफ़ा दिया तो ये ख़बर अख़बारों की सुर्खियां बनी. बाद में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि एनएससी को गंभीरता से नहीं लिया जाता. गुज़रे सालों में अर्थव्यवस्था की रफ़्तार के आकलन में कथित सरकारी दखलअंदाज़ी को भी उन्होंने इस्तीफ़े की वजह बताया.

साल 2014 में आर्थिक विकास दर के आकलन के लिए नए आधार वर्ष 2011-12 को अपनाया गया था. उसे बेस बनाते हुए पिछले सालों की अर्थव्यवस्था की रफ़्तार का हिसाब लगाया गया जिसे लेकर काफ़ी विवाद हुआ था.
इससे यूपीए के कार्यकाल की आर्थिक विकास दर कम हो गई और नरेंद्र मोदी के कार्यकाल की विकास दर बढ़ गई.
सरकार ने पीसी मोहनन के आरोपों को नकारा, लेकिन विवाद थमे नहीं.
साल 2006 में एनएससी की स्थापना का मक़सद था सभी आधिकारिक आंकड़ों पर निगरानी रखना.
इस्तीफ़े पर विवाद के बाद अख़बार बिज़नेस स्टैंडर्ड ने एक लीक्ड रिपोर्ट में नेशनल सैंपल सर्वे ऑफ़िस के पीरियोडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे के नतीजों को छापा था. सर्वे के मुताबिक़ साल 2017-18 में देश में बेरोज़गारी दर पिछले 45 सालों में सबसे ज़्यादा 6.1 प्रतिशत थी.
शुरुआत में लीक हुई रिपोर्ट को सरकार की ओर से ड्राफ्ट रिपोर्ट बताया गया, लेकिन बाद में मई 2019 में इसे रिलीज़ कर दिया गया. इसके बाद सरकार की मंशा पर एक बार सवाल उठने शुरू हुए.

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बीबीसी से बातचीत में पीसी मोहनन याद करते हैं, "इस रिपोर्ट को चुनाव के बाद सरकार के दोबारा सत्ता में आने के बाद रिलीज़ कर दिया गया. आख़िरी रिपोर्ट और लीक हुई रिपोर्ट एक थी. जिस हाल में रिपोर्ट का अनुमोदन किया गया, उसी हाल में रिपोर्ट को चार या पांच महीने की देरी के बाद रिलीज़ किया गया. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था."
केरल के एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले मोहनन अपने परिवार में पहले व्यक्ति थे जो 1979 में सरकारी क्लास-वन अफ़सर बने थे और बाद में 2017 में एनएससी के सदस्य बने.
2019 में उनके इस्तीफ़ से आरोपों और सवालों को हवा मिली कि क्या सरकारी आंकड़ों पर भरोसा किया जा सकता है, क्या उन पर सरकार के प्रभाव की परछाईं तो नहीं होती?
ऐसा ही एक अन्य उदाहरण है कोविड संक्रमण से जुड़ी मौतों के आंकड़ों का. भारत में कोविड महामारी के दौरान कितने लोगों की मौत हुई, इस पर लंबी बहस छिड़ी थी.
बीबीसी सहित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थाओं की रिपोर्टिंग और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट ने भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़ों पर सवाल खड़े किए.
इस विवाद पर पूर्व चीफ़ स्टैटिस्टिशियन प्रनब सेन कहते हैं कि प्रशासनिक डेटा में गड़बड़ियां आम हैं. वो कहते हैं, "जब कोई सरकारी कार्यक्रम किसी ख़ास मक़सद के लिए होता है, तब वही लोग डेटा रिकॉर्ड करते हैं जिन पर कार्यक्रम के प्रबंधन की ज़िम्मेदारी होती है. और वो इसमें छेड़छाड़ करते हैं ताकि ये दिखाया जा सके कि वो टारगेट पूरा कर रहे हैं. ऐसा हमेशा होता है."

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संस्थानों पर उठते सवाल

पीसी मोहनन कोविड और जीडीपी आंकड़ों के फ़र्क़ को समझाते हैं.
वो कहते हैं, "कोविड से जुड़े आंकड़े प्रशासनिक सेट-अप का नतीज़ा थे जिनकी अपनी सीमाएं थीं, लेकिन जब जीडीपी, सर्वे रिपोर्ट, बेरोज़गारी रिपोर्टों आदि की बात होती है, तब वो वैज्ञानिक सांख्यिकीय तरीकों पर आधारित होते हैं."
सरकार आंकड़ों में कथित छेड़छाड़ के आरोपों से इनकार करती रही है, मगर गंभीर आरोप रुकने का नाम नहीं लेते.
मार्च 2019 में दुनिया के 100 से ज़्यादा अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों ने एक खुले पत्र में कहा, "हाल के वक्त में भारतीय सांख्यिकी और उससे जुड़े संस्थानों पर प्रभाव डाला जा रहा है, और दरअसल उन्हें राजनीतिक वजहों से कंट्रोल किया जा रहा है. इस कारण ये मुश्किलों में घिर रहे हैं."
जुलाई 2019 में जापान की समाचार एजेंसी निक्केई एशिया में छपे एक लेख ने भारत की तुलना चीन के आंकड़ों से की थी और कहा था, "ज़्यादा से ज़्यादा विदेशी कंपनियों, जैसे गोल्डमैन सैक्स और नोमुरा होल्डिंग्स अपने क्लाइंट्स को भारत पर सलाह देने के लिए नए मॉडल अपना रहे हैं. जैसे जनवरी में नोमुरा ने भारत के ब्रिटेन की जगह विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था आसानी से बन जाने को लेकर सवाल उठाए."

हालांकि भाजपा से जुड़े आर्थिक मामलों के जानकार डॉक्टर सुव्रोकमल दत्ता मार्च 2019 के खुले पत्र में की गई अर्थशास्त्रियों की आलोचना को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, "मैं उनकी राजनीतिक विचारधारा पर सवाल करूंगा. 2014 में मोदी सरकार की शुरुआत से जिस तरह वो भारत सरकार से लगातार सवाल पूछ रहे हैं, ये उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न है. और हम सबको पता है कि वो वामपंथी विचारधारा से जुड़े संस्थानों या फिर जिनका झुकाव कम्युनिस्ट विचारधारा से है, उनसे जुड़े हैं."
अर्थव्यवस्था और जीडीपी पर उठते सवालों को दत्ता दरकिनार कर देते हैं और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आंकड़ों का हवाला देते हैं.
वो कहते हैं, "आप विश्व बैंक, एशियन डिवलपमेंट बैंक या फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के डेटा का क्या करेंगे? क्या ऐसा नहीं है कि उन्होंने कहा है कि कोविड के बाद भारत दुनिया की सबसे तेज़ अर्थव्यवस्था बनकर उभरेगा. क्या आप उसे भी झुठला सकते हैं?"
2021-22 के आर्थिक सर्वे में कहा गया कि आईएमएफ़ के मुताबिक़, साल 2021-22 और 2022-23 में भारत की आर्थिक विकास दर 9 प्रतिशत, और 2023-24 में 7.1 प्रतिशत रहेगी जिससे भारत इन तीन सालों में दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था होगा.
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संशोधित आंकड़ों पर सवाल

दरअसल भारत में आंकड़ों को लेकर विवाद की शुरुआत 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद हुई. 2015 में जीडीपी के आकलन के लिए एक नए तरीके को अपनाया गया जिसे अपनाने की प्रक्रिया की शुरुआत यूपीए-2 में हुई थी, तो इसे लेकर आलोचना शुरू हुई.
इस नए तरीके में जीडीपी के आकलन के लिए आधार वर्ष को 2004-05 से बदलकर 2011-12 कर दिया गया ताकि अर्थव्यस्था की वास्तविक और बेहतर तस्वीर पेश की जा सके.
आज़ादी के बाद बदलती अर्थव्यवस्था को बेहतर समझने के लिए कई बार आधार वर्ष में बदलाव किए जा चुके हैं.
पहले जहां विकास दर का आकलन उत्पादित सामान और सेवाओं के लिए कुल व्यय के बराबर था, इस नए सिस्टम में कंपनियों के कॉर्पोरेट मंत्रालय के साथ कंपनियों के रजिस्टर्ड डेटा का इस्तेमाल किया गया.
कई जानकारों की नज़र में जीडीपी के आकलन का नया तरीका बेहतर था क्योंकि इसमें खपत, कंपनियां का प्रदर्शन आदि आंकड़ों को शामिल किया गया.
इसी बीच जनवरी 2019 को सांख्यिकी मंत्रालय ने 2016-17 में विकास दर के अनुमान को 7.1 प्रतिशत से बढ़ाकर 8.2 प्रतिशत कर दिया. यह नोटबंदी का साल था.
साथ ही 2017-18 में जीएसटी के साल में विकास दर को 6.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.2 प्रतिशत कर दिया गया.
नए संशोधित आंकड़ों पर फिर सवाल उठे.
- पहला सवाल - नोटबंदी से जहां बड़े उद्योगों ने क्रेडिट कार्ड या इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसफ़र का रुख़ किया, नक़दी पर निर्भर छोटे बिज़नेस, उद्योगों को बहुत परेशानी हुई. इसके बावजूद अर्थव्यवस्था की रफ़्तार में तेज़ी कैसे आई?
- दूसरा सवाल - टैक्स सिस्टम को सरल और कारगर करने की मंशा से लागू जीएसटी के कार्यान्वयन के लिए जहां बड़ी कंपनियों, बिज़नेस ने प्रोफ़ेशनल्स की सेवाएं लीं, छोटे उद्योग और व्यवसाय परेशान हुए. फिर ऐसी उथल-पुथल के बीच अनुमानित विकास दर कैसे बढ़ गई?
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भारत के पूर्व प्रमुख आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने इसे आश्चर्यजनक बताया, जिस पर सरकार ने कहा कि जीडीपी के आंकड़े "स्वीकृत प्रणाली, तरीकों और उपलब्ध डेटा" पर आधारित हैं.
2019 में अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों ने अपने खुले पत्र में लिखा था, "देश और पूरी दुनिया में भारतीय सांख्यिकी संस्थानों का सम्मान दांव पर है. डेटा पैदा करने के लिए सांख्यिकी ईमानदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी के आधार पर आर्थिक नीति बनती है और लोकतांत्रिक चर्चा के लिए ये बेहद ज़रूरी है."
इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में शामिल अर्थशास्त्री पुलाप्रे बालकृष्णन अच्छी गुणवत्ता वाली जानकारी के महत्व पर ज़ोर डालते हैं. वो कहते है, "हमारे पास अभी तक कंज़्यूमर एक्सपेन्डिचर सर्वे नहीं है जिसका मतलब है कि हम प्रामाणिक रूप से या विश्वास के साथ देश में ग़रीबी पर और लोगों के लिविंग स्टैंडर्ड पर कुछ नहीं कह सकते."
कंज़्यूमर एक्सपेन्डिचर सर्वे आमतौर पर पांच साल में एक बार किया जाने वाला सर्वे है जिसे एनएसएसओ (नेशनल सैंपल सर्वे ऑफ़िस) करवाती है. परिवार में खपत या खर्च के बारे में जानकारी इकट्ठा करना इसका मक़सद होता है. इससे देश के आर्थिक और सामाजिक स्वरूप को समझने में मदद मिलती है.
पिछले ऐसे दो राष्ट्रीय सैंपल सर्वे 2011-12 और 2017-18 में हुए थे, लेकिन 2017-18 का सर्वे 'डेटा क्वालिटी इशुज़' का आधार बताते हुए जारी नहीं किया था. उस वक्त मीडिया में कहा गया कि 2017-18 के सर्वे को इसलिए रिलीज़ नहीं किया गया क्योंकि सर्वे में कथित तौर पर ये सामने आया था कि लोगों का ख़र्च कम हो रहा है.
सरकार ने अपने प्रेस रिलीज़ में इन रिपोर्टों का ज़िक्र तो किया, लेकिन डेटा रिलीज़ नहीं करने को लेकर बहुत जानकारी नहीं दी.
जुलाई 2022 के मध्य में जारी की गई एक सरकारी प्रेस रिलीज़ में जानकारी दी गई कि अगले सर्वे पर आने वाले एक साल तक काम चलेगा.
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डेटा पर भरोसा?

2019 में मोदी सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने एक पेपर में दावा किया कि साल 2012 और 2017 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था क़रीब 4.5 प्रतिशत की रफ़्तार से आगे बढ़ी थी न कि औसतन सात प्रतिशत की रफ़्तार से, जैसा कि सरकारी आंकड़ों में कहा गया था.
इस पेपर में उन्होंने लिखा, "साल 2015-17 के बीच में भारत की औसतन जीडीपी विकास दर 7.5 प्रतिशत थी, जबकि निवेश में औसतन सिर्फ़ 4.5 फीसदी का विकास हुआ. इस दौरान निर्यात में दो फ़ीसदी का विकास हुआ, जबकि क्रेडिट-जीडीपी अनुपात में दो फीसदी की गिरावट आई."
ज़्यादा क्रेडिट-जीडीपी अनुपात इशारा करता है कि अर्थव्यवस्था में बैंकों की भागीदारी बढ़ रही है, जबकि कम क्रेडिट-जीडीपी अनुपात का मतलब है कि बैंकों को बाज़ार को और कर्ज़ देने की ज़रूरत है.
अरविंद सुब्रमण्यम के आंकड़ों पर सरकार ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा, "मिनिस्ट्री का जारी किया गया जीडीपी का आकलन स्वीकार्य प्रणालियों, प्रक्रिया और उपलब्ध डेटा पर आधारित है और इसमें अर्थव्यवस्था के विभिन्न सेक्टरों में किए गए योगदान को निष्पक्षता से आंका गया है."
लेकिन फिर इन विवादों और आरोपों के बीच भारत के सरकारी डेटा पर कितना भरोसा किया जाए?
पूर्व चीफ़ स्टैटिस्टिशियन प्रनब सेन के मुताबिक़ सरकारी डेटा पर भरोसा तो किया जा सकता है, लेकिन जो सही सवाल है वो ये है कि उस डेटा का क्या जो ग़ायब है?
वो कहते हैं, "जो डेटा जारी किया जाता है वो भरोसे लायक होता है. सही सवाल है कि उस डेटा का क्या जो ग़ायब है. काफ़ी डेटा सप्रेशन होता है लेकिन स्टैटिस्टिकल सिस्टम ने ये पक्का कर लिया है कि जो डेटा रिलीज़ होता है वो बिना छेड़छाड़ वाला हो."
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