गोहत्या, काफ़िर, जिहाद पर मुसलमान रुख़ करें साफ़, बोले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत- प्रेस रिव्यू

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में पांच मुस्लिम बुद्धिजीवियों से बंद कमरे में मुलाक़ात की. इस बैठक में मोहन भागवत ने गोकशी बंद करने से लेकर हिंदुओं के बारे में काफ़िर और जिहाद जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाया.
अंग्रेज़ी दैनिक द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस ने इससे जुड़ी ख़बर को अपने पहले पन्ने पर जगह दी है.
ख़बरों के मुताबिक पिछले महीने हुई इस बैठक में मोहन भागवत ने देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी, दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति ज़मीरुद्दीन शाह, नेशनल लोक दल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शाहिद सिद्दिक़ी और कारोबारी सईद शेरवानी के साथ चर्चा की.
द हिंदू ने आरएसएस के एक सूत्र के हवाले से बताया है कि इस बातचीत में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच भाईचारे को बढ़ावा देने और सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ाने के तरीक़े तलाशे गए.
सूत्र ने अख़बार को बताया, ''भागवत जी ने उन लोगों से सबसे पहले गोहत्या पर अपना रुख़ स्पष्ट करने के लिए कहा. इस पर इन लोगों ने कहा कि वे इसके खि़लाफ़ हैं. उन्हें बताया गया कि एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद ख़ान ने सभी समुदायों की भावनाओं का ख़्याल रखते हुए विश्वविद्यालय परिसर में बीफ़ पर प्रतिबंध लगा दिया था.''

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इंडियन एक्सप्रेस को एसवाई क़ुरैशी ने बताया है कि उन्होंने इस मसले पर कहा कि हमें भी इससे सरोकार है और अगर कोई गोहत्या में शामिल है तो उसे क़ानून के तहत सज़ा मिलनी चाहिए.
सूत्र ने बताया कि आरएसएस प्रमुख ने इसके बाद मिलने गए लोगों से हिंदुओं के लिए 'काफ़िर' शब्द के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाया, तो उन्हें बताया गया कि अरबी में इस शब्द का मतलब उस शख़्स से है, जो ख़ारिज करता हो (गॉड के अस्तित्व को).
एसवाई क़ुरैशी के अनुसार, ये ऐसा मुद्दा नहीं है, जिसे सुलझाया ही न जा सके. उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, ''हमने उनसे कहा कि हमें भी दुख होता है, जब भारत के किसी मुसलमान को पाकिस्तानी या जेहादी कहा जाता है.''
सूत्र के अनुसार, मुस्लिमों के इस प्रतिनिधिमंडल में शामिल एक शख़्स ने मोहन भागवत से कहा, ''हिन्दू 'काफिर' कैसे हो सकते हैं? उन्हें भी ईश्वर में विश्वास होता है.''
रिपोर्ट के अनुसार 'जिहाद' शब्द के बारे में मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने मोहन भागवत को बताया कि वे कभी भी इस शब्द का इस्तेमाल नहीं करते. अख़बार हिंदू लिखता है कि मुस्लिम प्रतिनिधियों ने आरएसएस प्रमुख से कहा कि समझाया कि देश को बांटने के इरादे से 'असामाजिक तत्व' इसकी ग़लत व्याख्या कर रहे हैं. मुस्लिम बुद्विजीवियों ने बताया कि असल में इस शब्द का मतलब 'ख़ुद को सुधारने के लिए अपने भीतर किया जाने वाला प्रयास' है.
इंडियन एक्सप्रेस को एसवाई क़ुरैशी ने बताया कि प्रतिनिधिमंडल ने आबादी और बहुविवाह की प्रथा को लेकर मुसलमानों को बदनाम करने के लिए चलाए जा रहे प्रोपेगेंडा पर सवाल उठाया है. उनके अनुसार, इससे मुसलमानों की स्टीरियो टाइप छवि को मजबूत किया जा रहा है.

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प्रतिनिधिमंडल में शामिल सदस्य
वहीं 'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, मोहन भागवत से मुलाक़ात करने वाले इस प्रतिनिधिमंडल में देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी, दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति ज़मीरुद्दीन शाह, नेशनल लोक दल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शाहिद सिद्दिक़ी और कारोबारी सईद शेरवानी शमिल थे.
अख़बार के अनुसार, यह बैठक दिल्ली के झंडेवालान इलाक़े में आरएसएस के अस्थायी कार्यालय उदासीन आश्रम में हुई. अख़बार ने यह भी बताया कि पहले यह बैठक केवल 30 मिनट के लिए तय थी, लेकिन यह 75 मिनट तक चली.
इस बैठक में हिंदुओं और मुसलमानों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर आगे भी बातचीत जारी रखने का फ़ैसला हुआ और इसके लिए दोनों पक्षों के समय-समय पर मिलते रहने का निर्णय हुआ.
इंडियन एक्सप्रेस से हुई बातचीत में एसवाई क़ुरैशी और सिद्दीक़ी ने बताया कि यह बातचीत बेहद सौहार्दपूर्ण माहौल में हुई.
उन्होंने बताया कि इस बैठक के बाद, मोहन भागवत ने नियमित रूप से मुस्लिम समुदाय के संपर्क में रहने के लिए संघ के 4 वरिष्ठ पदाधिकारियों को नियुक्त किया है.
अख़बार के अनुसार, इन पदाधिकारियों में सह कार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल, आरएसएस के मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्शक इंद्रेश कुमार और आरएसएस के संपर्क प्रमुख रामलाल के संपर्क में रहने की सलाह दी है.
उन्होंने यह भी बताया कि वे अपनी ओर से मुस्लिम बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, लेखकों और पेशेवरों से संपर्क कर रहे हैं ताकि आरएसएस के साथ यह संवाद आगे भी जारी रह सके.
वहीं इंडियन एक्सप्रेस को प्रतिनिधिमंडल के एक अन्य सदस्य शाहिद सिद्दिक़ी ने बताया कि उन्होंने आरएसएस से मिलने की मांग तब उठाई थी, जब पैगंबर मोहम्मद पर बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नुपूर शर्मा का बयान सामने आया था. नुपूर शर्मा को बाद में इस बयान के लिए बीजेपी से निलंबित कर दिया गया था और इस बयान को लेकर देश में कई जगहों पर हिंसा हुई थी.
उन्होंने बताया, ''हमें लगा कि इस घटना के कारण मुस्लिम समुदाय के भीतर भी एक ज़हरीला माहौल बना दिया गया. हालांकि जब तक हमें मोहन भागवत से मिलने का समय मिला, तब तक नुपूर शर्मा के मामले को एक महीना बीत चुका था. इसलिए हमने दोनों समुदायों के बीच सांप्रदायिक कटुता के मसलों पर चर्चा की.''

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हिजाब मसले पर सुप्रीम कोर्ट का तर्क-इससे बढ़ सकती है विविधता
कर्नाटक में हिजाब पहनकर शिक्षण संस्थानों में आने पर लगी रोक की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि हिजाब विविधता को बढ़ावा दे सकता है और बच्चों को सांस्कृतिक तौर पर संवेदनशील बना सकता है.
अंग्रेज़ी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स ने इस ख़बर को प्रमुखता से जगह दी है.
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने कहा, ''ड्रेस कोड को एकरूप बनाना कर्नाटक सरकार का प्रमुख तर्क हो सकता है, लेकिन इस तथ्य को नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि क्लास में विविधता की इजाज़त देने से बच्चों को सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील बनाया जा सकता है.''
पीठ के अनुसार, ''कोई भी कह सकता है कि यह विविधता को बढ़ावा देने का अवसर हो सकता है. हमारे यहां सभी संस्कृति और धर्म के छात्र हैं. हमें देश की विविधता को देखना और उसके प्रति सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील होना चाहिए.''
अख़बार के अनुसार, एक शिक्षक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता आर वेंकटरमणि ने अदालत को तर्क दिया कि वे इस तरह के सभी भटकावों से मुक्त स्कूल चाहते हैं. इस पर अदालत ने कहा कि यह सब नज़रिए पर निर्भर करता है.
अदालत ने कहा, ''जब वे स्कूल से बाहर निकलेंगे तो विद्यार्थियों को आप कैसे तैयार करेंगे. जब वे दुनिया का सामना करेंगे, तो उन्हें देश की विशाल विविधता जैसे संस्कृति, पोशाक और व्यंजनों की विविधता का सामना करना पड़ेगा. हिजाब उन्हें इसके लिए तैयार करने का मौक़ा दे सकता है. यह कुछ मूल्यों को विकसित करने का एक अवसर हो सकता है.''
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