आरएसएस पर लिखी 64 पन्नों की पुस्तिका की क्यों हो रही है चर्चा

किताब की कवर

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बैंगलुरू से बीबीसी हिंदी के लिए

कन्नड़ के साहित्यकार देवानुर महादेव की आरएसएस पर लिखी गई संक्षिप्त किताब 'आरएसएस आला मट्टू अगाला' (आरएसएस की गहराई और चौड़ाई)' वायरल हो गई है. आरएसएस ने इस पर कुछ नहीं कहा है, मगर बीजेपी ने इस पुस्तिका को 'कचरा' बताया है.

इसकी प्रिंट कॉपी की इतनी मांग है कि इसकी कॉपियां उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं. साइबर जगत में अनाधिकृत पीडीएफ़ शेयर की जा रही हैं और हालात ये हैं कि जल्दबाज़ी में इसका हिंदी, तमिल, तेलुगु और अंग्रेज़ी में अनुवाद भी करवाया जा रहा है.

64 पन्नों की इस किताब को ऐसे नए फॉर्मेट में है कि इसे कोई भी प्रकाशित कर ले रहा है. कर्नाटक के कलबुर्गी ज़िले में महिला समूह और तालुका स्तर पर छात्रों के समूहों तक ने इसका प्रकाशन किया है.

आरएसएस के संस्थापक डॉक्टर केबी हेडगेवर और सबसे शक्तिशाली सरसंघचालक रहे एमएस गोलवलकर और वीएस सावरकर के लेखों से प्रभावित इस किताब में रूचि इतनी ज़्यादा है कि लेखक महादेवा ये दावा कर रहे हैं कि बीजेपी कार्यकर्ता और सदस्य इसे गुप्त रूप से बाँट रहे हैं.

मैसूर यूनिवर्सिटी में क़ानून की पढ़ाई कर रहे एक छात्र श्रम कुमार ने बीबीसी हिंदी से बात करते हुए कहा, "अधिकतर छात्रों ने इस किताब के बारे में सुना है. हमने इसकी दो हज़ार प्रतियां प्रकाशित की थीं और चार दिन के भीतर ही ये बिक गईं. अभी हमारे पास सौ कॉपी हैं और हमने और अधिक प्रिंट करने की अनुमति मांगी है. हमने मंड्या ज़िले में अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों के हॉस्टल में अच्छी संख्या में ये किताब बेची है. हम कुछ कॉपियां लेकर स्थानीय टी स्टाल पर जाते हैं और लोग 30 रुपये देकर इसे ख़रीद लेते हैं. "

सावरकर

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वहीं कर्नाटक के उत्तरी ज़िले कलबुर्गी में प्रभुता भारत संघर्ष समिति नाम के एक महिला संगठन ने इसकी एक हज़ार कॉपियों का प्रकाशन किया है. समिति से जुड़ी अश्विनी मगांकर कहती हैं, "कुछ दिन के भीतर ही हमारी सारी कॉपियाँ बिक गई हैं. हम अधिक कॉपियाँ प्रकाशित करने जा रहे हैं क्योंकि लोग यहां और बीदर में हमसे इसकी मांग कर रहे हैं."

महादेवा को अपनी लेखनी में कल्पना और रूपकों के लिए जाना जाता है. उन्होंने आरएसएस की तुलना एक ऐसे जादूगर से की है जिसने अपनी आत्मा को एक चिड़िया में छुपा रखा है जो सात समंदर पार एक गुफ़ा में रहती है. इस जादूगर को तब तक नहीं मारा जा सकता है जब तक उस चिड़िया को खोजकर ना मारा जाए. जैसा कि फ़िल्म हैरी पॉटर सीरीज़ में वॉल्डमोर्ट को मारने के लिए हॉरक्रक्सेज़ को मारना ज़रूरी है.

देवानुरू महादेवा

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महादेवा कहते हैं कि भगवत गीता को पढ़ाने पर ज़ोर देना देश में जाति व्यवस्था को बढ़ावा देना है जैसा कि मनुस्मृति में बताया गया है. वो कहते हैं कि ये संविधान को 'कॉपी पेस्ट' बताकर बदनाम करने के प्रयासों जैसा ही है.

वो दावा करते हैं कि इसकी वजह ये है कि संविधान आरएसएस के देश पर अपना भगवान थोपने की योजना के लिए एक दुःस्वप्न है. आरएसएस के भगवान में ब्राह्मण सिर हैं, क्षत्रिय भुजाएं हैं, वैश्य जांघ है और शूद्र चरण में हैं.

लेकिन वो अपने मनुस्मृति के तर्क को कैसे साबित करेंगे जबकि भारत में ओबीसी समुदाय के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं और आदिवासी समुदाय से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु हैं. इस सवाल के जवाब में महादेवा बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "हमें यहां एक तथ्य समझना होगा. बीजेपी एक ग़ैर-संवैधानिक राजनीतिक दल है जिसका नियंत्रण आरएसएस के हाथ में है. इसके देवता गर्भ गृह में विराजमान हैं जो नागपुर में है. बीजेपी का नेतृत्व नागपुर में देवता से मिले निर्देशानुसार ही चलता है जहां दाईं या बाईं तरफ फूल के गिरने को भगवान के ख़ास संदेश के तौर पर लिया जाता है."

आरएसएस का पथ संचालन

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वो कहते हैं, "यही वजह है कि बीजेपी नेताओं में आरएसएस को ख़ुश करने की होड़ लगी रहती है और वो इसके लिए एक दूसरे से प्रतिद्वंदिता भी करते हैं. इसलिए ही बीजेपी जैसी पार्टी मे, जिसका अपना कोई संविधान नहीं हैं, वो ऐसे किसी नेता को अपने दम पर मज़बूत नहीं होने देते हैं. ये मान लेते हैं कि प्रधानमंत्री ओबीसी हैं लेकिन क्या उन्होंने ओबीसी को कोई फ़ायदा पहुचाया है. अगर बहुत अधिक की उम्मीद ना भी करें तो क्या उन्होंने कोई छोटा फ़ायदा भी ओबीसी को दिया है? ओबीसी वर्ग के लोग आम तौर पर छोटे मोटे काम धंधों में लगे होते हैं. क्या उन्होंने उनके लिए रोज़गार के अवसर बनाने का कोई प्रयास किया है? मुझे तो ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता है. हां उन्होंने करोड़पतियों के लिए टैक्स ज़रूर कम किया है."

"उनके क़र्ज़ माफ़ किए जा रहे हैं. सार्वजनिक संपत्तियां उन्हें कम दाम पर बेची जा रही हैं. अमीर लोगों की दौलत में लाखों करोड़ का इज़ाफ़ा हो रहा है. सरकार कॉर्पोरेट सेक्टर को फ़ायदे पहुंचा रही है. प्रधानमंत्री उनकी दौलत की चौकीदारी कर रहे हैं. पहले, जब राजाओं, सरदारों और सामंतों का शासन था, तब सिर्फ़ वही शासक सत्ता में रह पाए जिन्होंने चतुर्वर्ण व्यवस्था का पालन किया. जिन्होंने इसकी रक्षा नहीं की वो बर्बाद हो गए. तो वास्तव में सत्ता कौन चला रहा था? क्या राजा सत्ता चला रहे थे. हमें इसे उसके पार देखना चाहिए जो सामने दिख रहा है."

हिंदू छात्र

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वो आगे कहते हैं, "आदिवासी ही मूल निवासी हैं. लेकिन इन लोगों ने मूल निवासियों का नाम ही हटा दिया है और उन्हें वनवासी बना दिया है (ये संघ परिवार के आदिवासी इलाक़ों में चलाए जा रहे वनवासी कल्याण आश्रम के संदर्भ में कहा गया है). और आज आदिवासी इन कट्टरवादी ताक़तों के हाथों में दूसरे धर्मों से लड़ने का हथियार बन गए हैं. क्या इससे कोई बदलाव आएगा? क्या ये सही विकास है? हमें इस नज़रिए से भी सोचना चाहिए."

इस पुस्तक में आरएसएस को मानने वालों की तीखी आलोचना की गई है.

आरएसएस समर्थक इस किताब को कचरा बता रहे हैं.

महादेवा जिन्हें उनके गांव के नाम पर देवानुरु भी कहा जाता है दावा करते हैं कि उन्होंने इस पुस्तिका में सीधे तौर पर आरएसएस विचार गोलवलकर और सावरकर के विचारों को शामिल किया है.

वो पूछते हैं, "अगर वो इसे कचरा बता रहे हैं तो क्या वो उन्हीं गोलवलकर और सावरकर को भी कचरा बता रहे हैं?"

कौन हैं देवानुरु महादेवा?

महादेवा

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महादेवा बंदन्या और विद्रोही साहित्य आंदोलन के अगुआ लेखक हैं जो सामाजिक और आर्थिक अन्याय पर लिखते रहे हैं.

उनके दूसरे उपन्यास 'ओडालाला' की एक लाख से अधिक प्रतियां बिकीं थीं और वो स्वयं ये मानते हैं कि अब वो किताबों की बिक्री का हिसाब नहीं रखते हैं.

लेकिन उनका तीसरा उपन्यास 'कुसुमाबल्ले' सबसे चर्चित हुआ और इसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी अवॉर्ड भी मिला.

महादेवा कहते हैं कि जब वो किताब को प्रिंट करा रहे थे तो उन्होंने सोचा था कि अगर इसकी एक हज़ार कॉपियां भी बिक गईं तो बहुत अच्छा होगा. लेकिन इसकी कॉपियां अब भी प्रकाशित होती हैं और अब तक एक लाख से अधिक कॉपियां बिक चुकी हैं.

ये पहली बार था जब पाठकों को अहसास हुआ कि रूपकों का इस्तेमाल उनका स्टाइल स्टेटमेंट नहीं है. असल में पूरी तरह से बोलचाल और संकर भाषा में अपनी बात रखने का यह उनका तरीका था.

अवॉर्ड ठुकराया

उन्होंने साल 2010 में नृपाथुंगा अवॉर्ड लेने से इनकार कर दिया था क्योंकि कन्नड़ भाषा को प्राइमरी स्कूल से लेकर कॉलेज तक की शिक्षा का माध्यम नहीं बनाया गया था.

2015 में उन्हें पदमश्री और केंद्रीय साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटा दिया था.

1990 के दशक में उन्हें लेखकों के वर्ग से राज्यसभा जाने का प्रस्ताव मिला था लेकिन उन्होंने स्वीकार नहीं किया था.

आपको क्यों लगता है कि लोग इतनी बड़ी संख्या में आपकी इस ताज़ा लघु पुस्तिका को पढ़ रहे हैं?

महादेवा कहते हैं, "मैं इस बारे में क्या कहूं? इस प्रश्न का मैं कैसे जवाब दूं?"

गीता की शिक्षा और संविधान

श्रीमद भगवद गीता

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महादेवा कहते हैं, "ये विश्वास करना सर्वनाशक है कि भगवान ने ही चतुर्वर्ण सामाजिक व्यवस्था की वर्ण व्यवस्था को बनाया है. लेकिन ये असली महाभारत का हिस्सा नहीं रहा होगा. ये भी कहा जाता है कि किसी और ने नहीं बल्कि स्वयं शंकराचार्य ने इसे महाभारत में शामिल किया था. मैं ये नहीं कह रहा हूं, ये स्वामी विवेकानंद के शब्द हैं. मुझे भी ऐसा लगता है कि सही ही होगा. उन्होंने भगवद गीता के संपूर्ण रूप को खारिज नहीं किया था. इसमें बहुत से बौद्ध विचार भी हैं. हमें ऐसा लगता है कि कोई बहुत बुद्धिमान व्यक्ति होगा जिसने भगवद गीता को रचा होगा. इस सबके साथ ही, ये एक त्रासदी ही है कि इस उनके इस काम में चतुर्वर्ण व्यवस्था को बरक़रार रखा गया है. ऐसा प्रतीत होता है कि इसमें महान बातें कहीं गई हैं, भले ही सामाजिक भेदभाव बरक़रार रखा गया हो. "

"आज के दौर में ये सवाल उठता है कि- क्या भगवद गीता को बढ़ावा देना संविधान पर चोट नहीं है क्योंकि ये हिंदू धर्म पर आधारित चतुर्वर्ण व्यवस्था को बढ़ावा देती है."

महादेव आगे कहते हैं, "ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों के लोग कुछ हद तक बीजेपी का समर्थन कर रहे हैं. लेकिन हमें ये भी देखना होगा कि इसमें से अधिकतर मीडिया प्रबंधन, इन समुदायों में निवेश और मंच से प्रबंधित है. ऐसे में उन्होंने ये भ्रम बना दिया है कि वो इन समुदायों के लिए बहुत कुछ कर रहे हैं. लेकिन मुझे लगता है कि वास्तविकता ऐसी नहीं है. अगर हम मौजूदा परिस्थिति में भारत में हुए सभी विकास कार्यों को देखें तो क्या कोई अलग दिखाई देता है? सिर्फ़ बेरोज़गारी का विकास ही दिखता है."

"ओबीसी, एस और एसटी समुदायों के युवा बेचैन हैं और बेरोज़गारी की मार झेल रहे हैं. लेकिन आरएसएस उनके (ओबीसी, एससी और एसटी) युवाओं के सामने ये दिखा रहा है कि उनकी इस ख़राब हालत के लिए इसलाम धर्म और ईसाई धर्म ज़िम्मेदार हैं."

वो कहते हैं, "एक बात और, अगर किसी को भारत की मानसिक स्थिति समझनी हैं, तो चतुर्वर्ण व्यवस्था को समान्य बनाने के लिए, धर्म के नाम पर, शास्त्र को शस्त्र बना दिया गया है."

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प्रख्यात चुनाव विश्लेषक और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसायटीज़ (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार ने कुछ दिन पहले ही एक ट्वीट में बीजेपी के बदलते वोट बैंक के बारे में कहा था, "लोकनीति सीएसडीएस के नतीजों के मुताबिक बीजेपी का समर्थक वर्ग बदल रहा है. 1996 में बीजेपी को मिलने वाले सभी मतों में 49 फ़ीसदी सवर्ण जातियों से थे, 33 फ़ीसदी ओबीसी थे, 11 प्रतिशत एससी थे और 7 प्रतिशत एसटी थे. 2019 में बीजेपी को मिले कुल वोटों में 30 प्रतिशत सवर्थ थे, 44 फ़ीसदी ओबीसी थे, 16 प्रतिशत एससी थे और 10 प्रतिशत एसटी थे."

महादेवा कहते हैं, "वर्तमान में जब हालात ऐसे हैं, तो फिर बेरोज़गारी से पीड़ित के लिए क्या खाना उपलब्ध है? नफरत अपने आप में भोजन है. आरएसएस और संघ परिवार उन्हें दूसरे धर्मों के प्रति नफ़रत परोसते हैं और दूसरे धर्मों के प्रति उकसाते हैं. हम ये देख सकते हैं कि गोलवलकर और सावरकर स्पष्ट रूप से नाज़ीवाद के समर्थक हैं. अब, बीजेपी की सत्ता के दौरान, ये सब व्यवस्थित तरीक़े से हो रहा है."

आम जीवन और अर्थव्यवस्था पर मनुस्मृति का प्रभाव

महादेवा कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने एक ही झटके में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया.

वो कहते हैं, "लेकिन ये दस प्रतिशत आरक्षण, जो किसी भी दूसरे वर्ग को उपलब्ध नहीं है, ईडब्ल्यूएस वर्ग को दिया गया है जो सामाजिक रूप से अग्रणी है और जिसका शिक्षा और रोज़गार में अधिक प्रतिनिधित्व है. इसके अलावा ईडब्ल्यूएस वर्ग के लोग आबादी का सिर्फ़ पांच प्रतिशत ही हैं. ये काम प्रधानमंत्री ने किया है."

"इस फ़ैसले की वजह से आरक्षण में जो न्याय निहित था वो बिखर गया है. यहां तक कि आरक्षण का चरित्र ही लूट लिया गया है. ये उसी सिद्धांत के तहत लगता है कि जो शीर्ष पर हैं उन्हें अधिक मिलना चाहिए. ऐसा ही है. ये सिद्धांत कहां से आया है? इसका स्रोत मनुधर्म शास्त्र है. इसकी गंध स्पष्ट है. "

ये लघु पुस्तिका क्यों लिखी?

महादेवा का कहना है कि वो हाल के समय के कई घटनाक्रमों से चिंचित थे. ज़ाहिर तौर पर इनमें सबसे पहला ईडब्ल्यूएस आरक्षण ही था. इसके बाद कर्नाटक सरकार के धर्म-परिवर्तन विरोधी क़ानून ने उन्हें प्रभावित किया. इसके कुछ दिन बाद ही पाठ्यपुस्तक विवाद शुरू हो गया. वो इस बात से परेशान थे कि बसावन्ना जैसे महान व्यक्तिक्त को तोड़ मरोड़कर पेश किया गया और इसे मुख्यमंत्री बसावराज बोम्मई ने 'मामूली भूल बताया जो यहां-वहां हो ही जाती है.'

महादेवा कहते हैं कि आरएसएस कर्नाटक प्रोटेक्शन ऑफ़ रिलीजियस फ्रीडम एक्ट (धार्मिक आज़ादी सुरक्षा क़ानून) के ज़रिए मनुस्मृति को लागू कर रही है. वो कहते हैं कि "ये क़ानून मानसिक रूप से बीमार, नाबालिगों, महिलाओं और दलितों को एक ही वर्ग में रखता है. क्या दलित और महिलाएं मानसिक बीमार हैं. इस सरकार ने महिलाओं और दलितों को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया है. ये मनुस्मृति जैसा ही है जिसमें अलग-अलग लोगों के लिए दर्जे और वर्ण के हिसाब से एक ही अपराध के लिए अलग-अलग सज़ाएँ हैं."

बीजेपी ने पुस्तिका को बताया कांग्रेस का लिखा 'कचरा'

हिंदू छात्र

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मैसूर से बीजेपी के लोकसभा सांसद प्रताप सिम्हा ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मैंने सोचा था कि उनमें अभी भी रचनात्मकता बाक़ी है जैसी उन्होंने कुसुमबाले में दर्शाई थी. उनकी ये लघु पुस्तिका राहुल गांधी के नीरस भाषण के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिखे गए व्हास्ट्सएप और फ़ेसबुक पोस्ट का संकलन लगती है. साथ ही, इस्लाम या ईसाई धर्म की तरह हिंदू धर्म ने दुनिया के किसी दूसरे देश पर क़ब्ज़ा नहीं किया है और लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर नहीं किया है. कम से कम उन्हें ये तो पता होना ही चाहिए था."

वहीं वरिष्ठ विश्लेषक विश्वेश्वर भट्ट मानते हैं कि ये खोखला लेखना है जो उनकी छवि को मज़बूत नहीं करता है.

वो कहते हैं, "उनसे गुणवत्तापूर्ण शोध वाली विद्वतापूर्ण पुस्तक की अपेक्षा की जाती थी. इस पुस्तिका में उनके इरादे उथले हैं, मैं इससे वास्तव में बहुत निराश हूं.''

बीबीसी ने इस पुस्तक पर आरएसएस की प्रतिक्रिया जाननी चाही लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बात करने वाले एक बीजेपी प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा कि "इस मामले पर आरएसएस की तरफ़ से कोई बात नहीं करेगा. हम इसे कचरा ही समझ रहे हैं."

किताब

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हालांकि महादेवा इस आलोचना को ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि "ये आरोप मुझसे संबंधित नहीं हैं. मैं आपको हैरान करने वाली बात बताता हूं. कांग्रेस के सदस्य इस किताब की प्रतियां बांट रहे हैं. जेडीएस के सदस्य भी ऐसा कर रहे हैं. यहां तक कि कई बीजेपी नेता भी गुप्त तरीके से इसे बांट रहे हैं. अगर आरएसएस भी इसे बांटे तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी. ये भारत के लिए सुनहरा दौर है. मैं ऐसा ही महसूस करता हूं.

इस आलोचना पर कि किताब में कचरा है, महादेवा कहते हैं, "मैंने गोलवलकर और सावरकर को उद्धृत किया है. कम से कम उन्हें ये तो कहना चाहिए था कि जो मैंने लिखा है वैसा गोलवलकर और सावरकर ने नहीं कहा था. उनको कहना चाहिए था कि हम उनके बयानों का समर्थन करते हैं. या उन्हें कम से कम ये कहना चाहिए था कि उन्होंने (गोलवलकर और सावरकर) ने पहले ऐसा कहा था लेकिन हम अब इसे नहीं मानते हैं. अगर वो इसे सीधे-सीधे कचरा कह रहे हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि वो गोलवलकर और सावरकर को भी यही कह रहे हैं."

महादेवा ये भी कहते हैं कि अधिकतर लोगों का विश्वास संविधान में हैं. वो कहते हैं, "मुझे संविधान की ज़रूरत है. और शायद आपको भी इसकी ज़रूरत है. और इस देश को संविधान की हम दोनों से ज़्यादा ज़रूरत है. जो लोग सतर्क हैं उन्हें नागरिक समाज को भी इस बारे में जागरुक करना चाहिए."

आरएसएस

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भारत के भविष्य को लेकर वो कहते हैं, "आज विचार की वैदिक धारा का वर्चस्व है. हमें विचारों की सहनशीलता की धारा को भी बनाए रखना है, स्थानीय और आदिवासी विचारों को भी ज़िंदा रखना है. उनमें शानदार मानवीय रिश्ते और मूल्य होते हैं. हम उन्हें आदिवासी कहके नज़रअंदाज़ करते हैं. उन्हें अगली पंक्ति में लाया जाना चाहिए."

"उदाहरण के तौर पर सिद्धी हैं. ऐतिहासिक या दूसरे कारणों की वजह से एक ही परिवार में हिंदू, मुसलमान और ईसाई होते हैं. इतिहास ने ऐसा आश्चर्यजनक प्रयोग किया है. इसलिए ही आज के दौर की ज़रूरत प्यार और सहिष्णुता हैं. हमें इन्हीं मूल्यों को बोना है और इन्हें बोते जाना है. हमें इसके बीज को सींचते जाना है. मैं ये कैसे कह सकता हूं कि मैं भारत के भविष्य को लेकर उम्मीद से हूं? हम सभी को मिलकर ये सोचना है कि हमें भारत के भविष्य के लिए क्या करना है."

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