तालिबान-संघ की तुलना पर भड़की शिवसेना, जावेद अख़्तर से 'सामना'

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तालिबान और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना करने वाला बयान अब भी बॉलीवुड के मशहूर गीतकार जावेद अख़्तर का पीछा नहीं छोड़ रहा है.
अब महाराष्ट्र की सत्ताधारी पार्टी शिवसेना ने अपने मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में आरएसस का समर्थन किया है.
सामना में 'संघ को लेकर मतभेद होगा फिर भी...' शीर्षक से छपे संपादकीय में आरएसएस का बचाव करने और जावेद अख़्तर के विचारों को ग़लत ठहराते हुए कई तर्क दिए गए हैं.
शिवसेना ने लिखा है कि भारत हर तरीके से सहिष्णु है इसलिए उसकी तालिबान से तुलना करना उचित नहीं है.
सामना में प्रकाशित संपादकीय में पूछा गया है कि 'हिंदू राष्ट्र' की संकल्पना का समर्थन करनेवाले तालिबानी मानसिकता वाले हैं, ऐसा कैसे कहा जा सकता है?

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सामना में लिखी गई बातों का सार कुछ इस तरह है:
संपादकीय के अनुसार तालिबान अफ़गानिस्तान में सिर्फ़ शरीयत की सत्ता स्थापित करना चाहता है जबकि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिश में जुड़े संगठनों की अवधारणा सौम्य है.
इन संगठनों की कोशिश है कि धर्म के नाम पर पाकिस्तान और हिंदुस्तान, इन दो देशों के बनने के बाद हिंदुस्तान में हिंदुओं को दबाया न जाए. हिंदुत्व का मतलब एक संस्कृति है और ये संगठन इस पर हमला करने वालों को रोकने का अधिकार माँग रहे हैं.
संपादकीय में कहा गया है कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद कश्मीर की साँसें वापस आ गई हैं.
अब इन साँसों को फिर से रोकने की माँग करने वाले लोग तालिबानी हैं. कश्मीरी पंडितों की घर वापसी ज़रूरी है, इसे लेकर किसी भी तरह का मतभेद नहीं होना चाहिए.
लेख के मुताबिक़ भारत में हिंदुत्व को लेकर किसी भी तरह का उन्माद स्वीकार्य नहीं है.
बीते दौर में 'बीफ प्रकरण को लेकर जो धार्मिक उन्माद भड़का और इस पूरे प्रकरण के कारण जो लोग भीड़ की हिंसा का शिकार बने, उसका समर्थन न तो शिवसेना ने किया और न ही आरएसएस ने.
पाकिस्तान और चीन जैसे देशों ने तालिबान के शासन का समर्थन किया है क्योंकि इन दोनों देशों में मानवाधिकार, लोकतंत्र, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का कोई मोल नहीं बचा है. हिंदुस्तान की मानसिकता वैसी नहीं दिख रही है.
हम (भारत के लोग) हर तरह से ज़बरदस्त सहिष्णु हैं. 'लोकतंत्र के बुरक़े' की आड़ में कुछ लोग तानाशाही लाने का प्रयास कर रहे होंगे फिर भी उनकी सीमा है.
संघ या शिवसेना की विचारधारा तालिबान वाली होती तो इस देश में तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ क़ानून नहीं बना होता और लाखों मुसलमान महिलाओं को आज़ादी की किरण नहीं दिखती.
हिंदुस्तान में में बहुसंख्यक हिंदू होने के बावजूद यह देश आज भी धर्म निरपेक्षता का झंडा लहराता हुआ खड़ा है.
बहुसंख्यक हिंदुओं को लगातार दबाया न जाए, यही उनकी एक वाजिब अपेक्षा है.

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जावेद अख़्तर की तारीफ़
सामना के इस संपादकीय में संघ और तालिबान की तुलना करने वाले जावेद अख़्तर विचारों से कड़ी आपत्ति तो जताई गई है लेकिन लेख का सुर कहीं हमलावर नही दिखता है.
संपादकीय में जावेद अख़्तर पर कोई व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की गई है, सिर्फ़ उनके विचारों के ख़िलाफ़ कुछ तर्क दिए गए हैं.
इतना ही नहीं, लेख में जावेद अख़्तर की तारीफ़ भी की गई है.
संपादकीय के अनुसार, जावेद अख़्तर को उनके मुखर विचारों के लिए जाना जाता है. लेख में कहा गया है कि अख़्तर ने इस देश की धर्मांधता, मुसलमान समाज के 'चरमपंथी विचार' और राष्ट्र की मुख्य धारा से कटे रहने की उसकी पर सख़्त प्रहार किए हैं.
लेख में कहा गया है कि देश में जब-जब धर्मांध और राष्ट्रद्रोही विकृतियां उफान पर आर्इं, उन सभी मौकों पर जावेद अख़्तर ने धर्मांध लोगों के मुखौटे उतारे हैं.
अख़्तर ने कट्टरपंथियों की परवाह किए बग़ैर 'वंदे मातरम' गाया है लेकिन तालिबान और संघ और तालिबान की तुलना शिवसेना को स्वीकार्य नहीं है.

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भारत में तालिबान मानसिकता कभी स्वीकार्य नहीं: संजय राऊत
शिवसेना के वरिष्ठ नेता संजय राऊत ने सोमवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान भी जावेद अख़्तर के विचारों से असहमति जताई.
उन्होंने कहा, "भारत के किसी भी संगठन की तुलना तालिबान से करना निंदनीय है. भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहाँ तालिबान जैसी मानसिकता कभी स्वीकार नहीं की जाएगी."
राऊत ने कहा, "भारत के लोग ऐसी मानसिकता के ख़िलाफ़ संघर्ष करते हैं और उसका जवाब देते हैं. यहाँ की विपक्षी पार्टियों ने आपातकाल तक देखा है."

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जावेद अख़्तर ने क्या कहा था?
जावेद अख़्तर ने एनडीटीवी पर एक बहस के दौरान स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की तालिबान से तुलना की थी.
उन्होंने कहा था, "जिस तरह तालिबान एक इस्लामी राष्ट्र चाहता है, ऐसे लोग भी हैं जो हिंदू राष्ट्र चाहते हैं. ये सभी लोग एक जैसी विचारधारा के ही हैं भले ही ये मुसलमान हों, ईसाई हों, यहूदी हों या हिंदू हों.'
जावेद अख़्तर ने कहा था कि ज़ाहिर तौर पर तालिबान बर्बर है और उसके कृत्य निंदनीय हैं लेकिन जो लोग आरएसएस, बजरंग दल और बीएचपी जैसे संगठनों का समर्थन करते हैं, वो सब एक जैसे ही हैं.
बहस के दौरान जावेद अख़्तर ने ये भी कहा था कि उन्हें भारतीय लोगों की समझ पर पूरा भरोसा है. उन्होंने कहा था कि भारत में रहने वाले अधिकतर लोग सहिष्णु हैं, इसका सम्मान होना चाहिए.
जावेद अख़्तर ने कहा था कि भारत कभी भी तालिबानी राष्ट्र नहीं बनेगा.
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माफ़ी की माँग
जावेद अख़्तर के इन बयानों पर बीजेपी नेताओं और दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े कई लोगों ने कड़ी आपत्ति ज़ाहिर की थी.
बीजेपी नेता राम कदम ने ट्वीट कर कहा था कि संघ और विश्व हिंदू परिषद के करोड़ों कार्यकर्ताओं से जब तक हाथ जोड़कर जावेद अख़्तर माफ़ी नहीं मांगते तब तक उनकी और उनके परिवार की कोई भी फ़िल्म इस महाभारती की भूमि पर नहीं चलेगी.
ख़ुद को बीजेपी महाराष्ट्र यूनिट के क़ानूनी सलाहकार बताने वाले आशुतोष दुबे ने मुंबई पुलिस को जावेद अख़्तर के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई थी.
दुबे ने ट्विटर पर बताया था कि उन्होंने आरएसएस की तुलना तालिबान से करने पर जावेद अख़्तर के ख़िलाफ़ संबंधित पुलिस थाने में शिकायत दी है.
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कॉपी- सिंधुवासिनी
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