नज़रिया: मोदी के लिए नेताजी की विरासत हासिल करना क्यों मुश्किल

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- Author, सौरभ बाजपेयी
- पदनाम, सहायक प्रवक्ता, दिल्ली विश्वविद्यालय
क्या श्यामाप्रसाद मुख़र्जी और विनायक दामोदर सावरकर को नायक मानने वाले लोग नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की विरासत के वारिस हो सकते हैं? यह सवाल सिर्फ़ किसी ख़ास विचारधारा के विरोध के लिए नहीं है. यह इतिहास के एक स्वर्णिम अध्याय के राजनीतिक उपयोग की कोशिश का अर्थ समझने की कुंजी है.
21 अक्टूबर को मोदीजी ने आज़ाद हिन्द फ़ौज की आरज़ी हुकूमत की 75वीं वर्षगांठ बड़े धूमधाम से मनाई. यह बात अलग है कि इस 'आरज़ी हुकूमत' को उन्होंने 'अखण्ड भारत' की सरकार कहा और बड़ी चालाकी से उसे आरएसएस के अखण्ड भारत के नारे के साथ जोड़ दिया. यह वो नारा है जिसके माध्यम से न सिर्फ़ समूचे राष्ट्रीय आंदोलन को ख़ारिज किया जाता है बल्कि इसी की आड़ में गाँधीजी की हत्या का तर्क भी खोजा जाता है.
यह पहली बार था जब इस मौक़े को लाल किले के प्राचीर पर तिरंगा फहराकर एक उत्सव की तरह मनाया गया. इसके पहले की सरकारों ने ऐसा नहीं किया, यह उनकी अपनी विफलता है. मोदीजी को इस पहल का श्रेय ज़रूर दिया जाना चाहिए, लेकिन उसके पहले इतिहास के कुछ पन्ने पलटना लाज़मी है.
यह सब जानते हैं कि सावरकर-गोलवलकर-श्यामाप्रसाद मुख़र्जी मोदीजी के लिए इतिहास के महानायक हैं. यह भी सबको पता है कि यह सभी नेताजी सुभाषचंद्र बोस के वरिष्ठ या कनिष्ठ समकालीन थे. इसलिए यह सवाल तो बनता है कि जब नेताजी भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे थे, तब आपके ऐतिहासिक महानायक कहाँ थे? दरअसल, इस पूरे आयोजन के पीछे वही पुरानी मंशा है: आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा न लेने के बदनुमा दाग़ को मिटाने के लिए क्यों न उस महासंघर्ष के महानायक ही चुरा लिए जाएँ.
सबसे पहले यह याद दिलाना ज़रूरी है कि मोदीजी स्वाधीनता संघर्ष के दिनों के जिन संगठनों को अपना मानते हैं वो दोनों ही आज़ादी की लड़ाई से दूर रहे. क्योंकि आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाले सभी संगठन अनिवार्य रूप से धर्मनिरपेक्ष थे और साझा राष्ट्रवाद में यक़ीन रखते थे. लेकिन हिन्दू महासभा, आरएसएस और मुस्लिम लीग जैसे संगठन मूलतः साम्प्रदायिक थे और इसीलिए वो अंग्रेज़ों से लड़ने के बजाय एक-दूसरे समुदायों के प्रति भविष्य की संभावित लड़ाइयों की तैयारी में लगे रहना ज़्यादा बेहतर समझते थे.
दूसरी बात नेताजी ने कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ मिलकर अंग्रेज़ों की "फूट डालो-राज करो" की जिन साम्प्रदायिक साज़िशों का ताउम्र मुक़ाबला किया, मोदीजी के ये अपने संगठन उसी राजनीति का मोहरा बनकर काम करते रहे. नेताजी साफ़ कहते थे: "अंग्रेज़ इन संगठनों (मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा) को बढ़ावा देते हैं क्योंकि यह संगठन अपनी नीतियों में ब्रिटिश राज के पक्षधर हैं और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विरुद्ध हैं..."

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मुस्लिमों पर नेताजी की राय
इसके अलावा भाजपा-आरएसएस की राजनीति पूरी तरह हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण पर टिकी हुई है. इन संगठनों का मानना है कि मुसलमान भारत से अधिक पाकिस्तान के प्रति वफ़ादार हैं, लेकिन मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना की साम्प्रदायिक चालबाज़ियों के बावजूद नेताजी की राय तो इसके बिल्कुल उलट थी.
1944 में टोक्यो विश्वविद्यालय में एक भाषण देते हुए नेताजी विश्व समुदाय को आगाह करते हुए कहते हैं, "मुस्लिम लीग और उसके नेता मिस्टर जिन्ना सिर्फ़ मुट्ठी भर मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करते हैं. बहुसंख्यक मुस्लिम राष्ट्रवादी हैं और वो स्वाधीनता संघर्ष का उतना ही समर्थन करते हैं जितना कोई अन्य करता है."
सबसे बड़ी बात कि इन दोनों ही संगठनों ने भारत छोड़ो आंदोलन और आज़ाद हिन्द फ़ौज का न सिर्फ़ विरोध किया था, बल्कि इन आंदोलनों को कुचलने में ब्रिटिश राज की अप्रत्यक्ष रूप से मदद भी की थी. मदद इस तरह कि जिस समय नेताजी भारत को आज़ाद कराने के लिए संघर्षरत थे, सावरकर घूम-घूमकर हिन्दुओं से ब्रिटिश सेना में भर्ती होने की अपील कर रहे थे.
इसके लिए उन्होंने हिन्दू महासभा की ओर से मिलिटराइज़ेशन बोर्ड बनाये थे जिनका उद्देश्य लाखों की तादात में हिन्दुओं को ब्रिटिश सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित करना था. सावरकर को लगता था कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ होने वाली असली लड़ाई के लिए हिन्दुओं को ब्रिटिश सेना के विस्तार के अभियान में मदद करनी चाहिए.

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1941 में हिन्दू महासभा के 23वें अधिवेशन को संबोधित करते हुए सावरकर ने अपनी नीति स्पष्ट की थी. उन्होंने कहा था कि हिंदुत्व (हिन्दूडम) को बेहिचक भारतीय सरकार के युद्ध प्रयासों को मदद देनी चाहिए और हिन्दुओं को बड़ी तादात में थलसेना, नौसेना और वायुसेना में भर्ती होना चाहिए. उनका कहना था कि बिना एक मिनट गंवाए हिन्दुओं को भारत के उत्तरपूर्व की ओर से आ रहे जापानी ख़तरे से निपटने की ब्रिटिश तैयारी में मदद करनी चाहिए.
ध्यान रहे कि यह वो ही समय था जब नेताजी भारत को सैन्य बल की ताक़त से आज़ाद कराने की अपनी योजना के तहत जापान के साथ बातचीत कर रहे थे, सावरकर जापान के विरुद्ध ब्रिटिश राज की मदद कर रहे थे. उनका कहना था, "केवल नैतिक आधार पर ही नहीं बल्कि व्यावहारिक राजनीति के चलते भी हम इस बात के लिए बाध्य हैं कि हिन्दू महासभा संगठन की ओर से हम मौजूदा हालात में अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ किसी तरह के सैन्य विद्रोह में हिस्सा न लें."
द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान या ब्रिटेन की मदद करना अपना-अपना राजनीतिक दृष्टिकोण हो सकता है. लेकिन, सावरकर निश्चित रूप से हिन्दू हितों की रक्षा की दृष्टि से भविष्य की योजना बना रहे थे जहां निकट भविष्य में मुसलमानों के ख़िलाफ़ निर्णायक युद्ध शुरू किया जाना था. इसीलिए उनका मानना था कि "न एक भाई, न एक पाई" का नारा देने वाले गांधीजी की अहिंसा की नीति हिन्दुओं को बुज़दिल बनाती है. इसके बजाय हिन्दुओं को ज़्यादा से ज़्यादा हिंसक और युद्धक बनाया जाना ज़रूरी है.

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आरएसएस की भूमिका
इस दौरान आरएसएस अपने "रोज़मर्रा के कामों" में लगा रहा और उसने इन दोनों ही आंदोलनों के प्रति पूरी तरह उपेक्षा का भाव रखा. उसके रोज़मर्रा के कामों में शामिल था शाखा लगाना, ड्रिल करना और अपने स्वयंसेवकों को स्वाधीनता संघर्ष से दूर रहने की सीख देना. लेकिन, इन रोज़मर्रा के कामों के अलावा आरएसएस ने सावरकर को अपने मंच मुहैया कराए जहां वो हिन्दू नवयुवकों को सेना में भर्ती होने की हिदायत देते रहे.
इन दोनों संगठनों के उलट कांग्रेस पहले तो भारत छोड़ो आंदोलन के चलते प्रतिबंधित कर दी गयी. उसके बाद जैसे ही बड़े राष्ट्रीय नेताओं की जेल से रिहाई हुई, आईएनए के क़ैदियों का मुद्दा सामने आ गया. कांग्रेस के सभी नेता तुरंत आज़ाद हिन्द फ़ौज के तक़रीबन बीस हज़ार बंदी सिपाहियों को रिहा कराने के लिए दिन-रात काम में लग गए. आज के गांधी-नेहरू परिवार के बहाने वो जिस नेहरू और कांग्रेस को बदनाम करते रहते हैं, नेताजी के सिपाही उसकी अपनी लड़ाई का हिस्सा थे. भारतीय जनता के लिए नेताजी की सेना के यह सिपाही नायक थे जिनके लिए देश भर में भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था.

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आईएनए और कांग्रेस
नेहरू के नेतृत्व में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने अपने बम्बई सत्र में एक प्रस्ताव के माध्यम से आईएनए के युद्धबंदियों की रिहाई को अपनी प्राथमिकता बनाया. इन बंदियों की रिहाई के लिए एक डिफेंस कमेटी का गठन किया गया था. इस कमेटी में जवाहरलाल नेहरू और आसफ़ अली जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेताओं के अलावा भूलाभाई देसाई, तेजबहादुर सप्रू, कैलाशनाथ काटजू, बख्शी सर टेकचंद, रायबहादुर बद्रीदास, कुँवर सर दिलीप सिंह, डॉक्टर पी के सेन, मोहम्मद शफ़ी दाउदी, इंदर देव दुआ, शिवकुमार शास्त्री, रणबीरचन्द्र सोनी, राजिंदर नारायण, सुलतान यार ख़ान, नारायण एन्दली और जे के खन्ना शामिल थे.
इसके अलावा कांग्रेस की पहल पर आईएनए रिलीफ़ एंड इन्क्वायरी कमेटी का गठन किया गया जिसने युद्धबंदियों के लिए आर्थिक मदद जुटाने का प्रयास किया था. इस काम के लिए कांग्रेस ने केन्द्रीय आईएनए फ़ण्ड कमेटी, बम्बई के मेयर के फ़ण्ड, ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी और प्रदेश कांग्रेस कमेटियों और सुभाष बाबू के बड़े भाई शरतचंद्र बोस को अधिकृत किया था. 1946 के चुनावों के दौरान तो कांग्रेस ने आईएनए युद्धबंदियों की रिहाई को अपने प्रचार का मुख्य मुद्दा बनाया और कई बार यह फ़र्क़ करना मुश्किल हो जाता था कि यह कांग्रेस के चुनाव प्रचार की मीटिंग है या आईएनए के क़ैदियों की रिहाई के लिए सभा.
कांग्रेस के नेताओं ने पूरे देश में घूम-घूमकर युद्धबंदियों के समर्थन का माहौल बनाया था और यह कांग्रेस का ही प्रयास था कि पूरे देश में आईएनए का मुद्दा एक भावनात्मक मुद्दा बन गया. इन युद्धबंदियों में आईएनए के तीन जनरल- सहगल, ढिल्लों, शाहनवाज़- तो आज़ादी की लड़ाई की साम्प्रदायिक एकता के प्रतीक बन गए थे. "लालक़िले से आई आवाज़, सहगल-ढिल्लों-शाहनवाज़" और "चालीस करोड़ की आवाज़, सहगल-ढिल्लों-शाहनवाज़" जैसे नारे उन दिनों की फ़िज़ाओं में तैर रहे थे. हालांकि, उस समय सभी राजनीतिक संगठनों ने कांग्रेस की पहल पर चलायी जा रही मुहिम का साथ दिया जिसमें आरएसएस और हिन्दू महासभा भी शामिल थे.

आईएनए रिलीफ़ कमेटी की ओर से एक विशाल सभा कलकत्ता के देशप्रिय पार्क में आयोजित की गयी जिसे शरत बोस के अलावा नेहरू और सरदार पटेल ने भी संबोधित किया. नेहरू के मुताबिक़ इस सभा में तक़रीबन पांच लाख लोग शामिल थे. आईएनए के सिपाहियों के कांग्रेस के नेताओं के साथ कई महत्वपूर्ण पल कुलवंत राय नामक फ़ोटोजर्नलिस्ट ने अपने कैमरे में क़ैद किये हैं.
इनमें आज़ाद हिन्द फ़ौज के इन सिपाहियों के गांधीजी के साथ हंसते हुए फ़ोटो, गांधीजी के लिए वायलिन पर "क़दम-क़दम बढ़ाये जा, ख़ुशी के गीत गाये जा" की धुन बजाते आज़ाद हिन्द फ़ौज के कैप्टन रामसिंह, गांधीजी की बात को पूरे ध्यान से सुनते आज़ाद हिन्द फ़ौज के सिपाहियों की तस्वीरें बहुत रोचक हैं.
इस तरह, न तो विचारधारात्मक रूप से और न ही राजनीतिक रूप से मोदी नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की परंपरा में आते हैं. अगर वो वाक़ई आज़ादी की लड़ाई से जुड़े नायकों को याद करना चाहते हैं और उनकी स्मृति में भव्य आयोजनों की मंशा रखते हैं तो उन्हें आज़ादी की लड़ाई के इतिहास को भी नए सिरे से पढ़ना चाहिए. लेकिन, उनकी समस्या यह है कि वो नहीं चाहते कि लोग इतिहास पढ़ें, बल्कि वो चाहते हैं कि लोग असली इतिहास भूल जाएं और जो वो बताना चाहते हैं उसे ही असली इतिहास समझ बैठें.
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(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के सहायक प्रवक्ता हैं और आज़ादी की लड़ाई को समर्पित संगठन राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट के संयोजक हैं.)
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है.)
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