#विजयदशमी: हिंदुत्व किसी की बपौती नहीं, इसमें सब शामिल हैं-मोहन भागवत

संघ प्रमुख मोहन भागवत

इमेज स्रोत, RSS/Facebook

इमेज कैप्शन, संघ प्रमुख मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना दिवस और विजयदशमी के मौके पर रविवार को सरसंघचालक मोहन भागवत ने स्वयंसेवकों को संबोधित किया.

मोहन भागवत ने इस संबोधन में अनुच्छेद 370, राम मंदिर, नागरिकता क़ानून और चीन के साथ गतिरोध और कोरोना जैसे कई मुद्दों पर पर बात की.

उन्होंने विपक्ष पर राजनीतिक महत्वकांक्षा के लिए 'देश विरोधी व्यवहार' करने का आरोप लगाया.

संघ की ओर से शस्त्रपूजा और विजयदशमी का यह कार्यक्रम इस बार नागपुर में डॉक्टर हेडगेवार स्मृति मंदिर परिसर में किया गया.

इससे पहले इसका आयोजन खुले मैदान में किया जाता था. कोरोना वायरस संक्रमण को देखते हुए इस कार्यक्रम में सीमित संख्या में लोग मौजूद थे.

सीएए

इमेज स्रोत, Getty Images

'सांप्रदायिक आँच मन में ही रह गई'

मोहन भागवत ने अपने संबोधन की शुरुआत ही उन मुद्दों को लेकर की जो कोरोना वायरस महामारी के शुरू होने से पहले चर्चा में थे.

उन्होंने कहा, ''मार्च में लॉकडाउन शुरू होने के बाद बहुत सारे देश-विदेश के विषय चर्चा में थे. लेकिन वो सारे दब गए और उनकी चर्चा का स्थान इस महामारी ने ले लिया. विजयदशमी के पहले ही अनुच्थेद 370 प्रभावहीन हो गया, संसंद में पूरी प्रक्रिया हुई.''

''विजयदशमी के बाद नौ नवंबर को सुप्रीम कोर्ट का असंदिग्ध निर्णय रामजन्म भूमि को लेकर आया और एक इतिहास बना. एकमत से निर्णय था और सारे देश ने संयम के साथ स्वीकर किया.''

''इसके बाद नगारिकता संशोधन बिल आया जिसे लेकर हंगामा किया गया था. नागरिकता संशोधन क़ानून संसद में विधिवत रूप से पास हुआ था. ये भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करने वाले पड़ोसी देशों के हमारे भाइयों और बहनों को नागरिकता देने की प्रक्रिया है.''

''यह संशोधन किसी विशेष धार्मिक समुदाय का विरोध नहीं करता. लेकिन, क़ानून का विरोध करने वालों ने ऐसा वातावरण बनाया कि इस देश में मुसलमानों की संख्या ना बड़े इसलिए ये क़ानून बनाया गया है.''

''उन्होंने विरोध शुरु किया, प्रदर्शन होने लगे और इससे देश के वातावरण में तनाव आ गया. अब उसका क्या उपाय करना है, इस पर सोच-विचार से पहले ये सबकुछ कोरोना के कारण दब गया. मनों में जो सांप्रदायिक आंच थी कोरोना के कारण अंदर ही रह गई. उसका उपाय होने के पहले ही कोरोना की परिस्थिति आ गई.''

मोहन भागवत ने ये भी कहा कि भारत ने कोरोना वायरस महामारी से लड़ने में अन्य देशों के मुक़ाबले बेहतर प्रदर्शन किया है. इसके लिए उन्होंने सरकार की सजगता की तारीफ़ की.

उन्होंने कहा कि भारत में इस महामारी की विनाशकता का प्रभाव बाकी देशों से कम दिखाई दे रहा है, इसके कुछ कारण हैं. कोरोना कैसे फैलेने वाला है और इसे कैसे रोका जाए इस पर पहले ही विचार करके प्रशासन ने लोगों को सूचित किया.

इससे बचाव के उपाय किए गए. माध्यमों ने इस परिस्थिति का ज़रूरत से ज़्यादा वर्णन किया तो लोगों में डर बढ़ गया और फायदा ये हुआ कि लोग ज़्यादा सावधान हो गए.

राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पीएम नरेंद्र मोदी

इमेज स्रोत, Getty Images

'मित्रता को कमज़ोरी ना समझे चीन'

मोहन भागवत के संबोधन में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत और चीन के बीच कायम गतिरोध भी शामिल था. उन्होंने चीन को लेकर भारत सरकार के रुख की तारीफ़ की और भारत को कमज़ोर ना समझने की चेतावनी भी दी.

उन्होंने कहा, ''चीन ने अपने सामरिक बल के अभिमान में हमारी सीमाओं का अतिक्रमण किया, वो पूरी दुनिया के साथ ऐसा कर रहा है. भारत ने इस बार जो प्रतिक्रया दी उससे चीन सहम गया. भारत तन कर खड़ा हो गया. सामरिक और आर्थिक दृष्टि से इतना असर तो पड़ा कि चीन ठिठक गया.''

''अब चीन भी इसका जवाब देने की कोशिश करेगा. इसलिए हमें सामारिक और राजनयिक संबंध बेहतर करते रहने पड़ेंगे. पड़ोसी देशों बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, ये सिर्फ़ पड़ोसी नहीं बल्कि हज़ारों सालों से हमसे जुड़ें हैं और समान प्रकृति वाले हैं. हमने इन्हें पास लाना चाहिए.''

भागवत ने चेतावनी देते हुए कहा कि हमारी मित्रता की प्रवृत्ति को दुर्बलता ना समझें. जो सोचते कि भारत को झुका सकते हैं, उनकी गलतफहमी दूर हो गई होगी.

चीन पर बात करते हुए ही मोहन भागवत ने भारत विरोधी गतिविधयों का आरोप लगाते हुए विपक्ष पर निशाना साधा. उन्होंने बाहरी सुरक्षा के साथ-साथ आंतरिक सुरक्षा की भी बात की.

मोहन भागवत ने कहा कि जो सत्ता में बाहर रहते हुए सत्ता मिलने के बारे में सोचना प्रजातंत्र में होता है. उसके लिए चालें चलते हैं, ऐसा चलता है. लेकिन, उसमें भी विवेक होना चाहिए. लेकिन, अगर हमारे व्यवहार के कारण समाज में कटुता पैदा होती तो ये राजनीति नहीं है. भारत को कमजोर, जर्जर समाज बनाने के लिए काम करने वाली शक्तियां विदेशों और देश दोनों जगह हैं.

उन्होंने कहा, ''कई लोग संविधान के विरुद्ध क़ानून को ताक में रखकर विरोध करते हैं. भारत तेरे टुकड़ें हों ऐसा कहते हैं. बाबा साहेब ने जिसे अराजकता का व्याकरण कहा है, ये लोग ऐसी बातें सिखाते हैं. उनसे बचना समाज को सीखना पड़ेगा. ये लोग भ्रम फैलाते हैं.''

धर्म

इमेज स्रोत, ARIF ALI

'हिंदुत्व किसी की बपौती नहीं'

मोहन भागवत ने अपने भाषण में 'हिंदुत्व' शब्द पर काफ़ी लंबी चर्चा की और विरोधियों पर इसे लेकर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया.

उन्होंने कहा, ''हिन्दुत्व ऐसा शब्द है, जिसके अर्थ को पूजा से जोड़कर संकुचित किया गया है. यह शब्द अपने देश की पहचान को, आध्यात्म आधारित उसकी परंपरा के सनातन सातत्य और समस्त मूल्य सम्पदा के साथ अभिव्यक्ति देने वाला शब्द है.''

''हिन्दू किसी पंथ या संप्रदाय का नाम नहीं है. किसी एक प्रांत का अपना उपजाया हुआ शब्द नहीं है, किसी एक जाति की बपौती नहीं है, किसी एक भाषा का पुरस्कार करने वाला शब्द नहीं है.''

मोहन भागवत ने कहा, ''जब हम कहते हैं कि हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र है तो इसके पीछे राजनीतिक संकल्पना नहीं है. ऐसा नहीं है कि हिंदुओं के अलावा यहां कोई नहीं रहेगा बल्कि इस शब्द में सभी शामिल हैं.''

''हिंदू शब्द की भावना की परिधि में आने व रहने के लिए किसी को अपनी पूजा, प्रान्त, भाषा आदि कोई भी विशेषता छोड़नी नहीं पड़ती. केवल अपना ही वर्चस्व स्थापित करने की इच्छा छोड़नी पड़ती है. स्वयं के मन से अलगाववादी भावना को समाप्त करना पड़ता है.''

संघ प्रमुख ने कहा, ''हमारी छोटी-छोटी पहचान भी हैं, हमारी विविधता है, कुछ पहले से थे और कुछ बाहर से आए जो यहीं शामिल हो गए. हिंदू विचार में ऐसी विविधताओं का स्वीकार और सम्मान हैं. लेकिन इस विविधता को कई लोग अलगाव कहते हैं.''

मोहन भागवत ने अप्रत्यक्ष तौर पर कृषि बिल का समर्थन भी किया. उन्होंने कहा कि ऐसी नीति चाहिए कि किसान अपने माल का भंडारण, प्रसंस्करण खुद कर सके, सारे मध्यस्थों और दलालों के चंगुल से बचकर अपनी मर्जी से अपना उत्पादन बेच सके, यही स्वदेशी कृषि नीति कहलाती है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)