बाबा साहेब आंबेडकरः विश्व हिंदू परिषद मध्य प्रदेश में उनके जन्मस्थल पर क्यों है सक्रिय

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- Author, नीतू सिंह
- पदनाम, आंबेडकर नगर (महू, इंदौर) से, बीबीसी हिंदी के लिए
डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की जन्मस्थली महू (इंदौर, मध्यप्रदेश) में कोरोना काल के दो साल बाद आंबेडकर की 131वीं जयंती मनाई जा रही है.
बीते एक महीने से आंबेडकर की जन्मस्थली ख़ासा चर्चा में है. आसपास के लोग कई तरह के क़यास लगा रहे हैं. इसकी मुख्य वजह पिछले महीने 13 मार्च, 2022 को इंदौर शहर से निकली एक संविधान यात्रा बताई जा रही है.
आंबेडकर स्मारक स्थली के ठीक सामने कुछ छोटे-छोटे बोर्ड लगे हैं, जिस पर 13 मार्च को निकली संविधान यात्रा का ज़िक्र है.
ये संविधान सम्मान यात्रा आरएसएस के ही सहयोगी संगठन विश्व हिंदू परिषद ने स्वराज के 75वें अमृत महोत्सव को मनाते हुए इंदौर से महू (बाबा साहब की जन्मस्थली) तक 30 किलोमीटर मोटर साइकिल से निकाली थी.
इसमें एक खुली जीप पर संविधान की दो मूल प्रतियाँ अंग्रेज़ी और हिंदी में रखी हुई थीं. जीप को चारों तरफ़ से भगवा झंडों से सजाया गया था.
इसमें कुछ लोग बैठे हुए थे, जो संविधान की प्रति पर फूल माला चढ़ा रहे थे. जीप के पीछे क़रीब 4,000 लोग मोटर साइकिल से भगवा झंडा लिए 'जय संविधान, जय श्रीराम' का नारा लगा रहे थे.
संविधान के सम्मान में निकाली गई इस पूरी यात्रा के दौरान बीच में कहीं केवल एक जगह तिरंगा दिखाई दे रहा था. जबकि इसके उलट 'एंग्री हनुमान' और भगवान राम की फोटो छपे भगवा झंडों की पूरी यात्रा में भरमार थी.
अगर संविधान की रखी प्रति वाली खुली जीप हटा दी जाए तो ये पूरी यात्रा आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद की दूसरी रैलियों जैसी ही थी.

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लोग खुलकर बोलने को तैयार नहीं
इस यात्रा को लेकर स्थानीय लोगों में काफ़ी सुगबुगाहट है, लेकिन कोई इस विषय पर खुलकर बोलने को तैयार नहीं है.
आंबेडकर स्मारक स्थल से जुड़े एक क़रीबी व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "ऐसे संगठनों का काम है बाबा साहब की विचारधारा को नष्ट करना. ये लोग तो चाहते ही हैं कि हम ख़त्म हो जाएँ. लेकिन इन भगवा झंडों से हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. बस ऐसे में हमारे समाज के ज़िम्मेदार लोगों को अलर्ट रहने की ज़रूरत है. जब से यह स्मारक स्थली बनी है, तब से मैं यहाँ से जुड़ा हूँ, लेकिन इससे पहले इस तरह की यात्रा कभी नहीं निकाली गई."
विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित की गई यात्रा के पोस्टर इंदौर और महू के बीच कई जगहों पर अभी भी लगे हुए हैं. जिन पर रैली का आयोजन करने वाले का नाम और विश्व हिंदू परिषद का लोगो लगा है.
ऐसा ही एक पोस्टर है, जिसमें एक तरफ़ बाबा साहब की फ़ोटो लगाई गई है और दूसरी तरफ़ एक रेखा चित्र उकेरा गया है, जिसके नीचे मोटे-मोटे अक्षरों में संविधान के भाग 13 के प्रारंभ में राजा भागीरथ द्वारा गंगा को धरती पर लाने के प्रसंग का उदाहरण दिया गया है.
विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता अनिल वर्मा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "हमें ऐसी जानकारी हुई है कि बाबा साहब स्मारक स्थली पर संविधान की मूल प्रति नहीं है. आंबेडकर की जन्मस्थली पर संविधान की मूल प्रति हो, जिसे 14 अप्रैल को देशभर से आने वाले लाखों लोग देख सकें. ये ध्यान में रखते हुए एक महीने पहले संविधान यात्रा निकालकर संविधान की मूल प्रतियाँ इंग्लिश और हिंदी में हम एक जूलूस के साथ लेकर यहाँ आए थे."
अनिल वर्मा आगे कहते हैं, "इस यात्रा को निकालने की हमने परमिशन माँगी थी. एक महीने की तैयारी के बाद क़रीब 4,000 लोग मोटर साइकिल से इंदौर से महू 30 किलोमीटर आए थे. हमने स्मारक की कमेटी को संविधान की मूल प्रतियाँ सौपीं थीं."
'जय श्री राम' के नारे और भगवा झंडे को लेकर जब बीबीसी ने उनसे बात की तो अनिल वर्मा ने कहा, "ये तो हमारे संगठन की पहचान है. संविधान के भाग 13 के प्रारंभ में राजा भागीरथ द्वारा गंगा को धरती पर लाने का प्रसंग है."

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'कभी किसी ने स्मारक में अपना झंडा नहीं लगाया लेकिन...'
स्थानीय लोगों के अनुसार, बाबा साहब की जन्मस्थली में स्मारक निर्माण के लिए आंदोलन 1970 से चल रहा है. इसे हर दल और हर वर्ग के लोगों का समर्थन मिला, लेकिन कभी किसी ने इसमें अपना झंडा लगाने की कोशिश नहीं की.
ख़ुद भाजपा ने भी ऐसा नहीं किया जबकि स्मारक के निर्माण के शिलान्यास का पहला पत्थर मध्य प्रदेश में पहली भाजपा सरकार के मुखिया सुंदरलाल पटवा के नाम का लगा हुआ है.
ऐसे में ये पहली बार है, जब भाजपा से जुड़े किसी भी संगठन ने बाबा साहब और उनकी विधारधारा पर अपना रंग चढ़ाने की कोशिश की है.
डॉ भीमराव आंबेडकर जन्मभूमि स्मारक समिति के पूर्व कार्यालय सचिव मोहन राव वाकोड़े इस यात्रा को लेकर कहते हैं, "मैं बहुत दु:खी हूँ और निराश भी. अब तक के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब इस तरह की कोई यात्रा आंबेडकर स्मारक स्थली के सामने निकाली गयी हो. बीते दो सालों में हुई कुछ घटनाएं इस बात की सुबूत हैं कि डॉ आंबेडकर साहब के विचारधारा को नष्ट करने की कोशिश की जा रही है."
मोहन राव आगे कहते हैं, "इस भव्य स्मारक को निर्मित करने में जिन लोगों का अहम योगदान रहा, उन्हें निकालकर बाहर कर दिया गया है. जिसमें से मैं भी एक हूँ. आज से ठीक एक साल पहले इसी अप्रैल महीने में मुझे भी यहाँ से निकालकर बाहर कर दिया गया."

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महू में पैदा हुए थे बाबा साहेब
मध्यप्रदेश के इंदौर ज़िला मुख्यालय से क़रीब 25 किलोमीटर दूर महू वो जगह है जहाँ 14 अप्रैल, 1891 को सूबेदार रामजी सकपाल के यहाँ बाबा साहब भीमराव आंबेडकर का जन्म हुआ था.
बाबा साहब क़रीब ढाई साल ही यहाँ रहे, क्योंकि 1893 में इनके पिता रिटायर होकर अपने पैतृक गाँव दाकोली, अम्बाबड़े महाराष्ट्र चले गये थे.
इनकी जन्मस्थली को मध्य प्रदेश सरकार ने एक भव्य स्मारक बनाया, जिसे 'भीम जन्मभूमि' नाम दिया गया है. इस स्मारक का उद्घाटन बाबा साहब के जन्म की 100वीं सालगिरह के दिन 14 अप्रैल, 1991 को मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने किया था.
आंबेडकर स्मारक आंदोलन के शुरुआती दौर से जुड़े और बाद में अलग हो चुके एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "वर्ष 1991 में जो हुआ, वो आरएसएस के प्लान का ही हिस्सा था. जन्मस्थली पर स्मारक बने ये प्रस्ताव ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की मध्य प्रदेश की एक बैठक में दिया गया था. बाबा साहब के प्रति श्रद्धा और स्मारक बनने की चाह में हम समझ ही नहीं पाए कि इस स्मारक को बनाने के पीछे का उद्देश्य क्या है?"
उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, "संघ और भाजपा के पास राष्ट्रीय चेहरों की कमी है. यह बात हर कोई जानता है. ऐसे में अगर उन्हें बाबा साहेब सरीखा कोई चेहरा मिलता है, तो फिर उनका काम आसान हो जाएगा. गांधी और नेहरू परिवार का विरोध करने वाले संघ के लिए बाबा साहेब से बड़ा चेहरा शायद ही कोई हो. इसके लिए अगर थोड़ी सी मेहनत करनी पड़े तो भी कोई बुरा नहीं है. तो 13 मार्च की जो यात्रा हुई, उसमें बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए."

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आंबेडकर नहीं थे संघ की विचारधारा के समर्थक
आंबेडकर ने कभी भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा का समर्थन नहीं किया. वे हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को भी देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए एक बड़ा ख़तरा मानते थे. ऐसे में आंबेडकर के नाम के साथ इन हिंदूवादी संगठनों का यह मिलन अपने-आप में ऐतिहासिक है.
डॉ बाबा साहेब जन्मभूमि स्मारक समिति के उपाध्यक्ष राजेंद्र बाघमारे ने विश्व हिन्दू परिषद द्वारा दी गयी संविधान की मूल प्रतियों को आंबेडकर प्रतिमा के सामने ग्रहण किया था.
राजेंद्र बाघमारे कहते हैं, "ये जगह सबके लिए है, इसलिए हम यहाँ आने के लिए किसी को मना नहीं कर सकते, लेकिन परिसर के अंदर हम किसी भी तरह के कोई भी धार्मिक नारे या झंडे नहीं लगाते. कोई राजनैतिक कार्यक्रम अंदर नहीं होने देते. परिसर के अंदर केवल मेमोरियल सोसायटी के ही कार्यक्रम होते हैं."
केवल इसी रैली से ये न समझा जाए कि आंबेडकर जन्मस्थली का भगवाकरण किया जा रहा है, बल्कि स्मारक स्थल की जो प्रबंध कार्यकारिणी समिति है, उसमें भी एक साल में काफ़ी फेरबदल हुए हैं.
समिति से जुड़े शुरुआती दौर के सदस्य और कार्यालय सचिव रह चुके मोहन राव वाकोड़े को एक साल पहले इस समिति से हटा दिया गया. दो और सदस्यों उत्तम प्रधान और शांताराम वाघ को निकाल दिया गया.
हटाए गए सदस्य और समिति के मौजूदा सदस्य एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं. इन्हें सुनकर भी ऐसा लग रहा है कि बीते वर्षों में कुछ तो ऐसा बदलाव हो रहा है, जिसमें आपसी तालमेल में कमी आ रही है.
पुराने सदस्यों को हटाने और 12 नए सदस्यों को एक साल पहले जोड़ने को लेकर मोहन राव वाकोड़े ने कोर्ट में केस भी किया है. वर्तमान में समिति से 31 लोग जुड़े हैं.

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आंबेडकर जन्मस्थली में क्या हो रहा बदलाव
बाबा साहेब आंबेडकर मेमोरियल सोसाइटी के सचिव राजेश वानखेड़े कहते हैं, "मैं बीजेपी से ज़रूर ताल्लुक़ रखता हूँ, लेकिन मैं बाबा साहेब के विचारों को मानता हूँ. हमने जिन 12 नए लोगों को सदस्य बनाया, उनका पुराने लोगों ने विरोध किया. दूसरी वजह उनको हटाने की यह भी रही कि वो समिति से बिना सलाह लिए बहुत सारे काम करते थे, जो उन्हें समिति की सहमति के बिना नहीं करना चाहिए. मोहन वाकोड़े यहाँ के कभी सचिव नहीं रहे फिर भी वो हमेशा दावा करते हैं और लिखते भी हैं कि वो इसके सचिव रहे हैं. हम उन पर मानहानि का केस करने वाले हैं."
मोहन राव वाकोड़े इस समिति के वही व्यक्ति हैं, जिन्होंने अपने कार्यकाल में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह, राहुल गांधी समेत कई बड़े नेताओं के स्मारक स्थल आगमन पर अगुवाई की है.
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वाकोड़े कहते हैं, "जब वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां आए थे, तब उन्होंने महू (जन्मस्थली स्मारक) समेत बाबा साहब से जुड़े प्रतीकों को राष्ट्रीय स्मारक बनाने की घोषणा की थी. उसके बाद से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ लगातार कोशिश कर रहा है कि कैसे बाबा साहब को उसकी विचारधारा के रंग में ढाला जाए."
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा बाबा साहेब को अपनाने के लिए पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं. इसके लिए वे कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों को बाबा साहेब का सम्मान न करने का दोषी भी लगातार ठहराते रहते हैं.
हालांकि ये पहला मौक़ा है, जब आरएसएस से जुड़े किसी संगठन द्वारा इस तरह का सार्वजनिक प्रदर्शन किया गया हो, जिसमें 'जय संविधान और जय श्रीराम' के नारे एक साथ लगे हों.
समिति से जुड़े मौजूदा एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा, "हम लोग बाबा साहबे के ख़ून के लोग हैं. हम 'जय श्री राम' के नारे कैसे स्वीकार कर लेंगे? यहाँ जो भी आएगा हम उसका सम्मान करेंगे. सभी धर्मों का सम्मान करेंगे लेकिन बाबा साहब के स्मारक स्थल को राजनैतिक अखाड़ा नहीं बनने देंगे."
वो आगे कहते हैं, "केंद्र और राज्य में भाजपा का शासन है. उनकी तो कोशिश है ही कि बाबा साहब के विचारों को ख़त्म किया जाए, ये बात तो पूरी दुनिया जानती है. हम अपने स्तर से विरोध करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं."
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