नेपाल में बोधिचित्त वृक्षों की चिंता: 'सोने की खान' कहे जाने वाले पेड़ों की सुरक्षा के लिए कंटीले तारों से लेकर सीसीटीवी तक

नेपाल

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    • Author, संजय ढकाल
    • पदनाम, संवाददाता (बीबीसी न्यूज़ नेपाली)

नेपाल में इन दिनों एक समुदाय के लोग बोधिचित्त पेड़ काटे जाने की घटनाओं से खु़द को डरा हुआ महसूस कर रहे हैं.

पेड़ों के काटे जाने की घटनाओं से इस समुदाय के लोगों में भय और पीड़ा जैसी स्थिति पैदा हो गई है.

बोधिचित्त (या बोधि) के पेड़ नेपाल के कई लोगों के लिए कमाई का बड़ा साधन भी हैं. इन पेड़ों से होने वाली कमाई की वजह से लोगों को कड़े मेहनती काम करने से भी छुटकारा मिला है.

नेपाल के कावरेपालनचोक ज़िले में उगने वाले बोधिचित्त पेड़ों का बौद्ध धर्म में भी बड़ा प्रतीकात्मक महत्व है. यहां तक कि कई बौद्ध लोगों के लिए इन पेड़ों की कीमत सोने से भी ज़्यादा है.

लेकिन दो महीने पहले काभ्रे के रोशी ग्रामीण नगरपालिका से बोद्धिचित्त का एक पेड़ चोरी होने की घटना सामने आई थी. इसके बाद से ही इलाके के लोगों में इस बात का डर है कि वे अपनी कमाई के सबसे बड़े साधन को खो देंगे.

लोगों के लिए 'सोने की खान' है बोधिचित्त का पेड़

एक अज्ञात शख्स ने काट दिया था दिलबहादुर तमांग के घर के बाहर लगा हुआ बोधीचित्त वृक्ष
इमेज कैप्शन, एक अज्ञात शख्स ने काट दिया था दिलबहादुर तमांग के घर के बाहर लगा हुआ बोधीचित्त वृक्ष

नेपाल के रहने वाले दिल बहादुर तमांग की आँखों में आँसू आ जाते हैं जब वे उस बोधिचित्त वृक्ष को याद करते हैं जिसके साथ वे बड़े हुए थे.

दिल बहादुर दुखी मन से कहते हैं, "अगर उन्हें कोई परेशानी होती तो वे मुझसे निपट सकते थे! उन्हें उस पेड़ को क्यों काटना पड़ा?"

42 वर्षीय दिल बहादुर रोशी ग्रामीण नगरपालिका के नागबेली नाम की जगह पर पैदा हुए थे. दिल बहादुर का जीवन संघर्षों से भरा रहा है.

दिल बहादुर अपने तीन बच्चों, भाई-बहनों और माता-पिता के साथ एक संयुक्त परिवार में रहते हैं.

परिवार का भरण-पोषण करने के लिए उनको काफ़ी मेहनत भी करनी पड़ती है. यहां तक कि भरी गर्मियों में दिल बहादुर क़तर में मज़दूर के तौर पर भी काम कर चुके हैं.

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हालांकि दिल बहादुर की किस्मत तब बदल गई जब बोधिचित्त पेड़ों की क़ीमतें बढ़नी शुरू हुईं.

लेकिन हमेशा से ही इन पेड़ों का महत्व इतना नहीं था. क़रीब 15 साल पहले से ही इन पेड़ों की कीमतें बढ़नी शुरू हुई थीं.

बोधिचित्त पेड़ों के बीज़ का इस्तेमाल बौद्ध प्रार्थना की माला बनाने में होता है.

नेपाल के कावरेपालनचोक ज़िले में उगने वाले पेड़ों की कीमत और गुणवत्ता सबसे अच्छी मानी जाती है.

लेकिन बीते अप्रैल के महीने में अज्ञात हथियारबंद लोगों ने दिल बहादुर के घर के सामने लगे बोधिचित्त पेड़ को काट दिया.

विशेषज्ञों का कहना है कि बोधिचित्त के बीजों की कीमतों में उछाल के पीछे चीनी व्यापारियों की बढ़ती दिलचस्पी है.

स्थानीय किसानों का कहना है कि चीनी व्यापारी पिछले कुछ सालों से उनके गाँवों में आकर उन्हें ऑफ़र दे रहे हैं.

बोधीचित्त वृक्ष का एक बीज
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हालांकि दिल बहादुर ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन वह अपने छोटे भाई शेर बहादुर तमांग और अपने परिवार के बाक़ी सदस्यों की मदद से अपने बोधिचित्त के पेड़ से लाखों रुपये कमाने में कामयाब रहे हैं.

शेर बहादुर तमांग कहते हैं कि पिछले पाँच सालों से वे उसी पेड़ से बोधिचित्त के बीज बेच रहे हैं, जिससे उन्हें हर साल 90 लाख रुपये की कमाई होती है.

शेर बहादुर कहते हैं, "हमारे परिवार में लगभग 20-22 लोग हैं. पेड़ से होने वाली कमाई से ही पूरा घर चलता था. अगर उस पेड़ को काटा नहीं गया होता तो हम उससे कई सालों तक पैसा कमा सकते थे."

शेर बहादुर से बोधिचित्त के बीच खरीदने वाले व्यापारी समीप त्रिपाठी कहते हैं कि उन्होंने अगले पांच से सात सालों तक उस पेड़ से बीज खरीदने पर सहमति जताई थी.

वे हर साल इस पेड़ के बीजों के लिए 90 लाख रुपये चुकाते, फिर उसे प्रोसेस करके चीनी व्यापारियों को करीब 3 करोड़ रुपयों में बेच देते.

बोधीचित्त वृक्ष के बीज से बनी एक कलाकृति
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समीप का कहना है कि तमांग परिवार का पेड़ कावर के सबसे क़ीमती पेड़ों में से एक था.

लेकिन 11 अप्रैल की एक घटना ने तमांग परिवार की उम्मीदों को चकनाचूर कर दिया.

तमांग परिवार को फिर से आर्थिक संकट छाने का डर सता रहा है.

पेड़ काटे जाने की रात को याद करते हुए दिल बहादुर कहते हैं, "10-15 हथियारबंद लोगों के समूह ने उनके परिवार पर हमला किया. उन्होंने गोलीबारी की और बम भी फेंके."

बोधिचित्त पेड़ों की सुरक्षा के लिए तमांग परिवार ने पहले सी सीसीटीवी लगवा दिया था और पेड़ के चारों ओर कांटेदार तार से लगी लोहे की बाड़ लगा दी थी. पेड़ तक केवल एक बंद लोहे के दरवाजे़ को पार करके ही पहुंचा जा सकता था."

बोधीचित्त वृक्ष
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शेर बहादुर ने बीबीसी को घटना की सीसीटीवी फुटेज भी दी है. इस फुटेज में लोगों को बंदूकें थामे देखा जा सकता है.

दिल बहादुर ने बताया कि गोलीबारी बचने के लिए उनका परिवार घर में छिपा हुआ था.

उसी वक़्त हथियारबंद लोगों ने लोहे का दरवाजा तोड़ दिया और पेड़ को काट दिया. शेर बहादुर ने कहा कि हमें अभी भी नहीं पता कि उन्होंने ऐसा क्यों किया.

हालांकि उपद्रवी जिस तरीके से पेड़ को काट कर ले गए वे उसे दोबारा से लगा भी नहीं सकते. लेकिन उन्होंने तमांग परिवार के कमाई के साधन को भले ही पूरी तरह से बर्बाद कर दिया.

बीबीसी ने इस घटना के संबंध में कुछ ग्रामीणों से भी बात की. ग्रामीणों का अनुमान है कि इस चोरी की घटना के पीछे व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता हो सकती है.

वहीं, कुछ ग्रामीणों का यह भी कहना है कि उपद्रवी शायद शेर बहादुर से उस पेड़ के बीजों को खरीदना चाहते थे, पर उसने मना कर दिया. फिलहाल पुलिस इस पूरी घटना की जांच कर रही है.

पेड़ों से जुड़े अपराध

तेमल गाँव में बोधिचित्त वृक्ष की रक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था

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नेपाल में बोधिचित्त के पेड़, टेमल नगर पालिका और रोशी ग्रामीण नगर पालिका में पाए जाते हैं. इलाके के अधिकारियों के मुताबिक़, यहां पर पेड़ों के उत्पादों से जुड़ी बिक्री को लेकर कई तरह के विवाद हैं.

रोशी नगर पालिका के उपाध्यक्ष मीम बहादुर वैबा ने कहा, "हमारे ग्रामीण नगर पालिका की न्यायिक समिति में लगभग एक तिहाई विवाद इसी बोधिचित्त को लेकर हैं."

तमांग के घर में हुई घटना से आस-पास के गाँवों में दहशत फैल गई है. तमांग परिवार के घर से कुछ ही दूरी पर रहने वाले नारायण हुमागाई का परिवार भी घटना से डरा हुआ है.

नारायण हुमागाई कहते हैं, "यह दिल बहादुर तमांग ही थे जिन्होंने मेरे घर में यह पौधा लगाया था. जो कुछ हुआ,उससे हम बहुत डरे हुए हैं."

घटना के बाद, नारायण ने अपने पेड़ की सुरक्षा के लिए अपने घर के चारों ओर आठ सीसीटीवी कैमरे लगवाये और लोहे की बाड़ भी खड़ी कर दी है.

उन्होंने कहा, "पड़ोस में पेड़ों को कटते देखकर हमें डर लगता है कि हमारे साथ भी ऐसा ही होगा. लोग ईर्ष्यालु हैं."

हालांकि स्थानीय अधिकारियों ने कीमती पेड़ों की सुरक्षा के लिए पुलिस गश्त की भी व्यवस्था की है.

टेमल नगरपालिका के उपाध्यक्ष दलमन थोकर ने कहा कि उस विशेष गांव में सप्ताह में दो से तीन दिन नियमित पुलिस गश्त होती है.

ग्रामीणों ने यह भी कहा कि व्यापारियों ने पहले ही बीजों को सुरक्षित रूप से ले जाने के लिए हेलीकॉप्टर मंगवा लिए थे.

कावरे जिला पुलिस कार्यालय के प्रवक्ता पुलिस उपाधीक्षक राजकुमार श्रेष्ठ ने कहा कि ज़रूरत पड़ने पर पुलिस की तैनाती की जाएगी, ख़ासकर फसल के मौसम में.

लेकिन किसानों को चिंता है कि ऐसी व्यवस्था भी उन लोगों के लिए काम नहीं आएगी जो हथियारों के साथ उन्हें लूटने आते हैं.

(सृजना श्रेष्ठ की रिपोर्टिंग के साथ)

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