सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद नेपाल की पहली समलैंगिक शादी क्यों नहीं हो पाई?

माया और सुरेंद्र 2015 से ही साथ रहे हैं.

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    • Author, सृजना श्रेष्ठ और रमा पराजुली
    • पदनाम, बीबीसी नेपाली

माया गुरुंग और सुरेंद्र पांडे नेपाल के समलैंगिक समुदाय में इतिहास रचने वाले थे.

माया एक ट्रांसजेंडर महिला हैं लेकिन आधिकारिक दस्तावेज़ोंं में उन्होंने अपना जेंडर नहीं बदलवाया था. उनके साथी सुरेंद्र एक गे व्यक्ति हैं.

नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश में सरकार को निर्देश दिया कि जबतक नया क़ानून नहीं बनता वो समलैंगिक विवाह को पंजीकृत करे.

इसके बाद देश में क़ानूनी रूप से ये पहला समलैंगिक विवाह होने होने वाला था.

साल 2017 में इस जोड़े ने मंदिर में शादी की लेकिन वो इस रिश्ते को क़ानूनी रूप देना चाहते थे.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को प्रगतिशील खेमे में ऐतिहासिक माना गया जोकि इस हिमालयी देश में समलैंगिक जोड़ों के लिए राहत बनेगा.

लेकिन इस जोड़े का सपना पूरा नहीं हो पाया.

13 जुलाई को नेपाल की राजधानी काठमांडू की ज़िला अदालत ने इस विवाह को रजिस्टर करने से इनकार कर दिया और तर्क दिया कि अंतरिम आदेश को मानने के ले निचली अदालतें बाध्य नहीं हैं क्योंकि इसमें सरकार को निर्देश दिया गया है.

गुरुंग ने बीबीसी को बताया, “हमने कई सपने सजा रखे थे, लेकिन अब वे बिखर चुके हैं. इससे ऐसा लगा जैसे हम इस देश के नागरिक ही नहीं हैं.”

इस जोड़े ने पाटन शहर में हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन वहां सुनवाई पांच बार स्थगित हो चुकी है.

लैंगिक अल्पसंख्यकों की सामाजिक स्वीकार्यता और उन्हें क़ानूनी सुरक्षा में सुधार को लेकर नेपाल ने दशकों से जितनी प्रगति की थी उसे काठमांडू ज़िला अदालत के इनकार से तगड़ा झटका लगा है.

इस जोड़े ने छह साल पहले शादी की थी लेकिन अभी ये पंजीकृत नहीं हो सकी है.

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नेपाल में एलजीबीटीक्यू अधिकार ग्रुप ब्लू डायमंड सोसाइटी चलाने वाली पिंकी गुरुंग का कहना है कि विवाह के समान अधिकार को पाने के लिए अभी उन्हें "लंबी लड़ाई" लड़नी होगी.

उनके मुताबिक, “कोर्ट, ख़ासकर सुप्रीम कोर्ट ही एकमात्र संस्था है जिसने हमारा कई बार पक्ष लिया.”

ब्लू डायमंड सोसाइटी के संस्थापक और देश के पहले गे एमपी सुनील बाबू पंत ने इस "धीमी प्रक्रिया" को पूरे लैंगिक और जेंडर अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति नाइंसाफ़ी करार दिया है.

उनके अनुसार, “हमने परीक्षण के तौर पर माया और सुरेंद्र के केस को आगे बढ़ाया. एक बार उनकी शादी रजिस्टर हो जाती है तो ऐसा चाहने वाले अन्य जोड़े भी अपने विवाह को क़ानूनी रूप दे पाएंगे.”

निचली अदालत जाने से पहले इस जोड़े ने सभी ज़रूरी दस्तावेज़ जमा किए ताकि उनकी शादी को क़ानूनी रूप से रजिस्टर्ड कराया जा सके.

अदालत जाने से पहले उन्हें पहले राजधानी से 150 किलोमीटर दूर पांडे के गांव नवलपरासी जाकर स्थानीय प्रशासन से सिफ़ारिशी पत्र लेना पड़ा था.

मौसम खराब होने के कारण चार पांच घंटे की दूरी 12 घंटे में तय करनी पड़ी.

काठमांडू लौटने के बाद इस जोड़े को पास के वार्ड ऑफ़िस के एक और पत्र लाने को कहा गया.

उसके बाद अधिकारियों ने उनसे आवास प्रमाणपत्र लाने को कहा, जिस पर मकान मालिक और दो अन्य पड़ोसियों के हस्ताक्षर होने थे.

अदालत ने गुरुंग को उनकी पहली शादी से जुड़े दस्तावेजों को भी जमा कराने के लिए कहा. उनकी पहली शादी एक महिला से हुई थी, 2013 में दोनों अलग हो गे.

गुरूंग कहती हैं, “मुझे बहुत कुछ झेलना पड़ा.”

उन्होंने बताया कि वो बहुत कम उम्र में ही जान गई थीं कि वो अपने लिंग से खुद की पहचान नहीं करतीं लेकिन उन्हें डर था कि इससे उनके परिवार को शर्मिंदगी झेलनी पड़ेगी क्योंकि उनके पिता गांव के मुखिया थे.

जब वो 13 साल की थीं वो काठमांडू आ गईं जहां वो खुलकर एक ट्रांसजेंडर महिला के रूप में जीने लगीं.

ये जोड़ा अभी काठमांडू में रहता है.
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लेकिन दो साल बाद उनके परिवार ने उनकी एक महिला के साथ जबरदस्ती शादी करा दी. उनके दो बच्चे हुए. वो कहती हैं कि इस विवाह के कारण उन्हें डिप्रेशन से होकर गुजरना पड़ा. वो अब अपने बच्चों से संपर्क में नहीं हैं. साल 2013 में उन्होंने तलाक़ के लिए आवेदन किया.

उसी साल नेपाल ने, छह साल पहले एक ऐतिहासिक अदालती आदेश के मामले में नागरिकता सर्टिफ़िकेट में थर्ड जेंडर को जगह देने का आदेश जारी किया.

साल 2015 में माया नवलपारासी में गुरुंग सुरेंद्र पांडे से मिलीं. वहीं पास में उनकी बहन का एक रेस्तरां था.

सुरेंद्र पांडे हमेशा से पुरुषों के प्रति आकर्षित होते थे लेकिन जब वो माया से मिले वो उन्हें मोहब्बत हो गई.

अब वो कहते हैं कि वो नहीं जानते कि वो अपने लैंगिक रुझान को क्या नाम दें.

इस रिश्ते ने उन्हें अपनी बड़ी बहन के सामने खड़े होने का साहस दिया, जिन्होंने उन्हें छह साल की उम्र से पाला और बड़ा किया था. उनके माता पिता टायफ़ाइड बीमारी में पहले ही चल बसे थे.

वो कहते हैं, “शुरू में मेरी बहन ने इस रिश्ते को स्वीकार नहीं किया, वो मेरे और मेरे भविष्य के बारे में बहुत चिंतित और बेचैन थी लेकिन धीरे धीरे उसने इस तथ्य को मान लिया कि मैं कुछ अलग हूं.”

सांकेतिक तस्वीर

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सुरेंद्र माया गुरुंग के साथ काठमांडू गए और आखिरकार उन्होंन अपने परिवारों से सहमति हासिल कर ली.

मिलते जुलते रहने के दो साल बाद उन्होंने 2017 में काठमांडू के एक मंदिर में शादी कर ली.

विवाह समारोह में परिवार और दोस्तों के घेरे के दर्जनों लोग शामिल हुए.

तबसे वे दोनों साथ रह रहे हैं और अपने पालतू कुत्ते सुरु के साथ.

सुरेंद्र के अनुसार, “हम अपने घर को साथ साथ साफ़ करते हैं, साथ खाना बनाते हैं. मैं माया की चिकन बनाने की रेसिपी को बहुत पसंद करता हूं.”

वो कहते हैं कि वो अपनी शादी के पंजीकृत होने को लेकर आशान्वित हैं और ज़रूरत पडी तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे.

अपनी शादी रजिस्टर्ड होने के बाद वो सबसे पहला अपना एक ज्वाइंट बैंक अकाउंट खुलवाना चाहते हैं और उस ज़मीन पर साझा मालिकाना चाहते हैं जिसे उन्होंने खरीदा था.

लेकिन उनका सबसे बड़ा सपना है, आर्थिक रूप से स्थिर होते ही एक बच्चे को गोद लेना.

बाकी जोड़ों की तरह उनमें भी बहस होती है लेकिन वो जल्द ही एक दूसरे की बात समझ जाते हैं.

सुरेंद्र पांडे कहते हैं, “हम लड़ाई झगड़ा नहीं झेल सकते. हमें एक रहने की ज़रूरत है क्योंकि ज़िंदगी लंबी है.”

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