नेपाल-चीन में हुए 12 समझौते, प्रचंड ने चीन में भारत के सवाल पर दिया यह जवाब

नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड और चीन के प्रीमियर ली चियांग

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नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड चीन के सात दिवसीय दौरे पर हैं.

चीनी प्रीमियर ली चियांग के निमंत्रण पर प्रचंड 23 सितंबर को बीजिंग पहुँचे और 30 सितंबर तक यह दौरा चलेगा.

नेपाल के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रचंड का यह पहला चीन दौरा है. इससे पहले प्रचंड इसी साल 31 मई से तीन जून तक भारत के दौरे पर आए थे.

2008 में नेपाल में राजशाही ख़त्म होने के बाद प्रचंड पहली बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे और उन्होंने पहला विदेशी दौरा चीन का ही किया था.

प्रचंड से पहले राजशाही व्यवस्था में जो भी प्रधानमंत्री बनता था, वह पारंपरिक रूप से पहला विदेशी दौरा भारत का करता था. लेकिन प्रचंड ने यह परंपरा तोड़ दी थी.

प्रचंड चीन के क्रांतिकारी नेता माओत्से तुंग को प्रेरणा स्रोत भी मानते हैं.

नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड का चीन दौरा

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चीन-नेपाल में क्या समझौते हुए?

प्रधानमंत्री के तौर पर चीन के तीसरे दौरे पर प्रचंड ने रविवार को नेपाल-चाइना बिज़नेस समिट में कहा, ''जब भी मैं चीन आता हूँ तो यहाँ के बदलाव मुझे चकित कर देते हैं. मुझे चीन हर बार बदला हुआ दिखता है. ये बदलाव इन्फ़्रास्ट्रक्चर से लेकर मानव संसाधन विकास, ग़रीबी उन्मूलन, शिक्षा और मेडिकल सर्विस के साथ विज्ञान और तकनीक में साफ़ दिखता है. यह अभूतपूर्व है कि चीन ने कमाल की तरक़्क़ी की है.''

प्रचंड के इस दौरे में नेपाल ने 25 सितंबर को चीन के साथ 12 क़रार पर हस्ताक्षर किए हैं. इन 12 समझौतों में साथ एमओयू अलग-अलग क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने को लेकर हैं.

बीजिंग में दोनों देश कृषि, व्यापार, बुनियादी ढांचे, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, डिज़िटल अर्थव्यवस्था से लेकर कुछ संस्थागत सुधारों पर एक दूसरे का सहयोग करने के लिए सहमत हुए हैं.

नेपाल और चीन के बीच सड़क संपर्क को बेहतर करने से जुड़े समझौतों पर भी हस्ताक्षर किए गए हैं.

नेपाल की ओर से जारी बयान के मुताबिक़, दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों की व्यापक समीक्षा की और दोनों देशों के बीच मौजूदा संबंधों पर संतोष व्यक्त किया.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, चीन की ओर से दबाव था कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नए सिद्धांतों वैश्विक सुरक्षा पहल (जीएसआई) और वैश्विक सभ्यता पहल (जीसीआई) को नेपाल स्वागत करे. लेकिन प्रंचड इससे बचते दिखे.

प्रचंड

दोनों देशों के बीच जिस तरह के समझौते हुए, वो कुछ यूं हैं:

  • नेपाल के प्लानिंग कमीशन और चीन के नेशनल डिवेलपमेंट एंड रिफॉर्म कमीशन के बीच सहयोग पर समझौता
  • डिजिटल इकॉनमी के सहयोग को मज़बूत करने पर समझौता
  • ग्रीन एंड लो कार्बन डिवेलपमेंट पर समझौता
  • कृषि, मछलीपालन से जुड़ा समझौता
  • चीन और नेपाल के व्यापार एवं भुगतान समझौते को बेहतर करने के लिए जॉइंट टेक्निकल वर्किंग ग्रुप पर समझौता
  • हिल्सा सिमकोट रोड प्रोजेक्ट और नेपाल-चीन पावर ग्रिड इंटरकनेक्शन प्रोजेक्ट पर समझौता
 नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड का चीन दौरा

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चीन जाने से पहले प्रंचड ने क्या कहा था?

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चीन के हांगज़ो के लिए निकलने से पहले प्रचंड ने दैनिक कांतिपुर को दिए इंटरव्यू में किसी सुरक्षा संबंधित समूह में शामिल होने की संभावनाओं से इनकार किया था.

प्रचंड ने कहा था, ''चीन जीएसआई, जीसीआई और वैश्विक विकास पहल यानी जीडीआई को शुरू कर रहा है. इसमें जीडीआई में शामिल होने में कोई हिचक नहीं है.''

वो कहते हैं, ''हम सुरक्षा संबंधी मुद्दों में नहीं पड़ सकते. हमारी नीति ये रही है कि हम किसी की तरफ़ नहीं झुकेंगे. हमारी विदेश नीति गुटनिरपेक्ष है. अगर हम अमेरिका वाले सुरक्षा से जुड़े कार्यक्रमों में नहीं हैं तो हम किसी दूसरे कार्यक्रम का हिस्सा भी नहीं हो सकते.''

ली चियांग और प्रचंड की मुलाक़ात के बाद जो बयान जारी हुआ, उससे जीएसआई, जीडीआई और जीसीआई जैसे मुद्दे ग़ायब थे.

कांठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक़- दोनों देशों के समझौते में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी बीआरआई का ज़िक्र नहीं दिखा जबकि यात्रा से पहले माना जा रहा था कि ये अहम समझौते हैं.

चीन की तरफ़ से अभी कोई बयान जारी नहीं हुआ है. जिस बयान के ज़रिए समझौते के बारे में पता चला है वो नेपाल ने जारी किया है.

ली चियांग ने प्रचंड को भरोसा दिलाया था कि चीन नेपाल की संप्रभुता, विकास और राष्ट्रीय स्वतंत्रता की रक्षा में सहयोग करता रहेगा.

चीनी प्रीमियर ने कहा, ''सड़क, रेलवे, एविएशन, टेलिकम्युनिकेशन, बिजली और मल्टी डाइमेंशन कनेक्टिविटी नेटवर्क को बेहतर करने में नेपाल की मदद के लिए चीन तैयार है.''

दोनों देशों के बीच इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े समझौते पहले भी हुए हैं.

पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट चीन की कंपनी सीएएमसीई की मदद से बनाया गया गया था. ये प्रोजेक्ट जुलाई 2017 में शुरू हुआ था. चीन ने नेपाल को इस प्रोजेक्ट के लिए लोन दिया था. विकास से जुड़े कामों के लिए ये एक नया मॉडल बनकर उभरा.

नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड

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भारत -चीन के संबंधों से नेपाल कैसे निपटेगा?

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का मुखपत्र माने जाने वाले ग्लोबल टाइम्स को प्रचंड ने इंटरव्यू दिया.

इस इंटरव्यू में प्रचंड से भारत-चीन संबंधों के बारे में भी पूछा गया.

प्रचंड से पूछा गया कि भारत-चीन संबंधों को देखते हुए कई लोग ये चिंता जता चुके हैं कि नेपाल इसे कैसे लेगा?

प्रचंड इस पर जवाब देते हैं, ''नेपाल के भारत और चीन से संबंध गुटनिरपेक्ष विदेश नीति, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और अच्छे पड़ोसी के सिद्धांतों पर चलते हैं. नेपाल दोनों देशों से ही स्वतंत्र तरीक़े से रिश्ते रखता है. एक देश से हमारा रिश्ता दूसरे देश को प्रभावित नहीं करेगा. ना ही हम एक को दूसरे के ख़िलाफ़ रखना चाहते हैं. दोनों देश क़रीबी दोस्त और विकास के मामले में अहम सहयोगी हैं. हम दोनों देशों से द्विपक्षीय आधार पर रिश्ते को जारी रखेंगे. अगर किसी देश के साथ कोई मतभेद सामने आते हैं तो हम मैत्रीपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता के ज़रिए उसे सुलझा लेंगे.''

1962 के भारत-चीन युद्ध के समय नेपाल ने ख़ुद को तटस्थ रखा था. नेपाल ने किसी का पक्ष लेने से इनकार कर दिया था.

प्रचंड बोले, ''नेपाल के दोनों देशों के संबंध स्पष्ट और नियमित हैं. हम दोनों देशों से अच्छे दोस्ताना भरे रिश्ते चाहते हैं और साथ ही इन दोनों पड़ोसी देशों के बीच हम मैत्रीपूर्ण और सहयोगपूर्ण रिश्ते देखना चाहते हैं. इन दोनों देशों के रिश्ते नेपाल की भी मदद करेंगे. मैं निजी तौर पर दोनों देशों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्ते बेहतर करने और करीबियां बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हूं. नेपाल भारत और चीन दोनों के हितों का सम्मान करता है. हम ऐसे विकास मॉडल पर ज़ोर देते हैं, जिससे तीनों देशों का फ़ायदा हो.''

नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग

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चीन-नेपाल रेल प्रोजेक्ट पर प्रचंड क्या बोले?

ग्लोबल टाइम्स ने प्रचंड से पूछा कि क्या आप अपने कार्यकाल में चीन-नेपाल रेलवे प्रोजेक्ट को शुरू करेंगे?

जवाब में प्रचंड ने कहा, ''चीन नेपाल रेल प्रोजेक्ट से नेपालियों को काफ़ी उम्मीदें हैं. नेपाल के लोग इस रेल प्रोजेक्ट के जल्द से जल्द शुरू होने को लेकर उत्सुक हैं. एक बार ये प्रोजेक्ट पूरा हो जाए तो इससे थोक परिवहन के बेहतर विकल्प सामने होंगे और इससे नेपाल के व्यापार का विस्तार होगा.''

प्रचंड बोले- इस प्रोजेक्ट से जुड़ी सबसे अहम चिंता ये है कि हम इसे कितनी जल्दी चालू कर सकेंगे. आप जानते हैं कि इस प्रोजेक्ट के लिए अच्छे ख़ासे संसाधन लगेंगे. नेपाल अकेला ये भार नहीं उठा पाएगा. ऐसे हालात में हमें बाहर से फंडिंग पर निर्भर रहना होगा.

इस फंडिंग पर प्रचंड कहते हैं, ''हमारी चिंता ये भी है कि इस कर्ज की शर्तें नेपाली अर्थव्यवस्था को संभाल सकने वाली हों. इस बारे में अध्ययन किया जा रहा है, रिपोर्ट जल्द उपलब्ध होगी. मैं उम्मीद करता हूं कि मेरे कार्यकाल के दौरान ये शुरू हो पाए. नेपाल और चीन रेल प्रोजेक्ट अहम परियोजना है, जिसका नेपाली इंतज़ार कर रहे हैं. मेरे कार्यकाल में इस परियोजना का शुरू होना अहम नहीं है, अहम ये है कि चीन और नेपाल के सपने रेलवे के ज़रिए जुड़ सकें.''

नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड का चीन दौरा

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जानकारों ने क्या कहा?

नेपाल और चीन के बीच हुए समझौतों के बारे में नेपाल की ओर से जारी बयान के ज़रिए पता चला है. अधिकारियों का कहना है कि दोनों देशों की ओर से साझा बयान पर अभी चर्चा की जा रही है.

काठमांडू पोस्ट से बात करते हुए चीन में नेपाल के राजदूत रह चुके महेंद्र बहादुर पांडे ने कहा- मुझे इसमें औपचारिता से ज़्यादा कुछ नहीं दिखता.

वो कहते हैं, ''ये दिखाता है कि हम कितने खोखले हैं और हमें कोई अंदाज़ा नहीं है कि चीन जैसी महाशक्ति के साथ कैसे व्यवहार किया जाए. मुझे न कोई प्लान दिखता है और न ही कोई रणनीति कि हम चीन के सामने ख़ुद को कैसे पेश करें.''

पांडे कहते हैं, ''आज जो समझौते हुए वो औपचारिकता के अलावा और कुछ नहीं हैं. हमने इस दौरे की तैयारी नहीं की. वो कौन से क्षेत्र हैं, जिनमें हम चीन के साथ सहयोग कर सकते हैं. अतीत में हुए समझौतों का क्या हुआ?''

नेशनल इंटेलिजेंस विभाग के पूर्व प्रमुख गणेश अधिकारी ने काठमांडू पोस्ट से कहा, ''जियो-पॉलिटिक्ल हितों को साधने के मामले में नेपाल मुश्किल वक़्त से गुज़र रहा है. संविधान को मानते हुए गुटनिरपेक्ष विदेश नीति को लागू करने में नेपाल संघर्ष कर रहा है.''

अधिकारी बोले, ''दुनिया की बदलती व्यवस्था में नेपाल के पास एक मज़बूत विदेश नीति होनी चाहिए. न सिर्फ़ कागजों में बल्कि असल में भी.''

वो कहते हैं- अगर हमने राजनयिक क्षमताओं को मज़बूत नहीं किया तो कोई हम पर भरोसा नहीं करेगा. हमारे नेताओं को ये समझना होगा कि हम सबको ख़ुश नहीं रख सकते. ये असमंजस की स्थिति नेपाल की विदेश नीति में भी झलकती है और ये चीन दौरे में साफ दिखी है.''

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