चीन से चुनौती: भारत कैसे कर रहा है अपनी सरहदों को मज़बूत

भारत चीन सरहद विवाद

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इमेज कैप्शन, अरुणाचल प्रदेश के सियांग में सौ मीटर लंबे 'क्लास-70' ब्रिज का उद्घाटन करते रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह
    • Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले दिनों भारत-चीन सीमा से सटे अरुणाचल प्रदेश के सियांग में सौ मीटर लंबे 'क्लास-70' ब्रिज का उद्घाटन किया. रक्षा मंत्रालय के एक बयान के अनुसार राजनाथ सिंह ने 'क्लास-70' ब्रिज को भारत की सुरक्षा तैयारी बढ़ाने की प्रक्रिया का हिस्सा बताया.

सियांग ज़िले के आलोंग-यिंगकियोंग रोड पर बना पुल 70 टन तक का वज़न बर्दाश्त कर सकता है. यानी इसके ज़रिए सेना की टुकड़ियों, भारी तोपों जैसे टी-90, ज़मीन से हवा में मार करने वाली मिसाइलों और लड़ाई के दूसरे सामान को सीमा क्षेत्रों में तेज़ी से पहुंचाया जा सकेगा.

भारतीय सेना के नॉर्दर्न कमांड के पूर्व कमांडिंग इन चीफ़ लेफ़्टिनेंट जनरल दीपेंद्र सिंह हूडा कहते हैं, "लक्ष्य ये होता है कि सैनिक टुकड़ियों को जल्द से जल्द मूव किया जा सके."

पिछले महीने दोनों देशों के जवानों के बीच अरुणाचल के ही तवांग क्षेत्र में झड़प हुई थीं जिसमें कई सैनिक घायल हुए थे.

संसद में भारतीय रक्षा मंत्री के एक बयान के अनुसार, 'चीनी टुकड़ियां भारतीय इलाक़े में घुसकर यथास्थिति को बदलने की कोशिश कर रही थीं, जिसे भारतीय सेना ने रोक दिया था.'

चीन, भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का हिस्सा बताता रहा है.

रक्षा मंत्री ने सियोम ब्रिज के साथ ही भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा से लेकर पश्चिम तक में स्थित सात सीमावर्ती राज्यों में 27 दूसरे प्रोजेक्ट्स (रोड, ब्रिज और अन्य) का भी उद्घाटन किया.

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चीन-भारत सीमा

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक़, बीते दो साल के भीतर सीमावर्ती इलाक़ों में पांच हज़ार करोड़ रुपयों से अधिक की लागत से दौ सौ से ज़्यादा प्रोजेक्ट्स तैयार हुए हैं.

भारत की सीमा (ज़मीनी) 15,106 किलोमीटर से भी लंबी है. जिन छह देशों की सीमाओं से उसकी सरहद लगती है उनमें पाकिस्तान, चीन से उसके कूटनीतिक संबंध अच्छे नहीं हैं. नेपाल के साथ भी सीमा विवाद का सिलसिला चल निकला है.

म्यांमार और बांग्लादेश से उसकी दिक़्क़तें दूसरी हैं जैसे 'उग्रवादियों' की आवाजाही, मानव और दूसरे तरह की तस्करी. दोनों देश चीन से क़रीब भी हो रहे हैं. भूटान की तरफ़ से भी चीन, भारत को घेरने की कोशिश में है.

इस सिलसिले में भारत ने सालों पहले से पश्चिमी और पूर्वी सीमाओं (पंजाब, राजस्थान) और उत्तर (जम्मू-कश्मीर) की तरफ़ फ़ेंसिंग करनी शुरू कर दी थी जिसको लेकर गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले साल दिल्ली में कहा भी था कि 'साल 2022 तक 7500 किलोमीटर लंबी सीमा में जहां-जहां फ़ेंसिंग का काम छूटा हुआ है उसे पूरा कर लिया जाएगा.

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भारतीय गृह मंत्री शाह का कहना था कि ये छूटे हुए 'तीन प्रतिशत हिस्से आंतकवादियों की घुसपैठ' और दूसरे तरह के सीमा अपराध जैसे हथियारों की तस्करी और नशीली दवाओं के व्यापार के लिए 'बहुत बड़े गैप' हैं.

लेखक और रक्षा मामलों के विशेषज्ञ मनोज जोशी कहते हैं कि फ़ेंसिंग का काम पूरा हो गया है.

लेफ़्टिनेंट जनरल दीपेंद्र हूडा और मनोज जोशी दोनों का कहना है कि सुरक्षा को सुदृढ़ करने की योजना में भारत का फ़ोकस इस समय चीन से सटी उत्तर-पूर्वी और उत्तरी सीमा की तरफ़ अधिक है.

हालांकि पिछले कुछ सालों में ख़ास तौर पर 2013 से भारत को लेकर चीन का रुख़ बेहद आक्रामक रहा है. 2013 में डेपसांग, 2014 चुमर, 2017 डोकलाम, 2020 में गलवान और फिर पिछले साल 2022 में तवांग में चीन का ये रुख़ साफ़ नज़र आया.

मंगलवार को शुरू हुई परियोजनाओं में सिक्किम के कलेप-गइगोंग सड़क पर बनाया गया 80 मीटर लंबा 'थंगू ब्रिज' भी है.

रिपोर्टों के अनुसार, इसके खुलने से क्षेत्र में हर मौसम में आवाजाही बनी रहेगी.

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2017 में डोकलाम में बनी थी तनाव की स्थिति

साल 2017 का डोकलाम भारत-चीन तनाव इसी इलाक़े के पास हुआ था.

चीन और भूटान के बीच का विवादित डोकलाम एक ऐसे त्रिकोण पर है जहां उत्तर में चीन के क़ब्ज़े वाली तिब्बत की चुंबा घाटी है, पूर्व में भूटान है और पश्चिम में भारत का सिक्किम राज्य पड़ता है.

चीन इस क्षेत्र में सड़क बनाने की कोशिश कर रहा था जिसके नतीजे में दोनों मुल्कों के बीच दो माह तक भारी तनाव बना रहा था, जिसे बाद में राजनयिक स्तर पर सुलझाया गया. ये दोनों देश 1962 में एक बड़ी जंग लड़ चुके हैं.

इस क्षेत्र पर चीन का दबदबा होने को लेकर भारत में चिंता है क्योंकि इसका असर भारत के उस इलाक़े पर भी पड़ेगा जिसे 'चिकेन-नेक' के नाम से जाना जाता है और जो कई भारतीय उत्तर-पूर्वी राज्यों को एक-दूसरे से जोड़ता है.

हालांकि भारत के ख़िलाफ़ चीन की आक्रमकता में 2000 के दूसरे दशक से तेज़ी देखी गई है, लेकिन भारतीय राजनयिकों और सुरक्षा विशेषज्ञों के ज़हन में सुमदोरोंग चू ताज़ा है जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को 1987 में चीन की यात्रा करनी पड़ी थी.

राजीव गांधी से मुलाकात के दौरान चीनी नेता देंग शियाओपिंग ने कहा था, ''भारत और चीन का रिश्ता 1950 के दशक में बहुत अच्छा था, लेकिन फिर उसमें खटास आ गई.''

फिर भारत-चीन 1962 जंग की तरफ़ इशारा करते हुए देंग ने कहा था, "अब पुरानी बुरी बातों को भूलने का और भविष्य की ओर देखने का समय है."

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इंडिया-चाइना बॉर्डर रोड्स

दोनों देशों के बीच सीमा को लेकर कई संधियां भी हैं, लेकिन जानकारों का मानना है कि चीन लगातार इनकी अनदेखी करता रहता है.

सुरक्षा मामलों पर काम करने वाली जानी मानी संस्था हडसन का कहना है कि 2011 से लेकर साल 2018 के दौरान चीन की ओर से भारत में घुसपैठ की तादाद हर साल कम से कम 200 से 460 के बीच रही है. साल 2019 में तो ये संख्या 663 पर पहुंच गई थी.

इसी संदर्भ में 1990 से जारी चिंताओं में भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में चीन की बढ़ती निर्माण गतिविधियां भी शामिल थीं.

भारत ने सरहदों पर यातायात और संचार माध्यम को बेहतर बनाने के लिए चीन पर एक स्टडी ग्रुप का गठन किया जिसने 73 सड़कों की पहचान की जिन्हें इन इलाक़ों में बनाना था. इसे ही इंडिया-चाइना बॉर्डर रोड्स के नाम से जाना जाता है.

हालांकि इनमें से कुछ बन पाईं, लेकिन कई में बहुत देरी हुई. मनोज जोशी बताते हैं कि इस काम में तेज़ी 2005 से 2009 के बीच रही.

भारत के सीमावर्ती इलाक़ों में निर्माण का काम कई वजहों से प्रभावित रहा. सेना के सूत्रों के अनुसार, ज़मीन अधिग्रहण, मौसम और भौगोलिक स्थिति इसकी वजह रही, लेकिन डोकलाम तनाव के बाद इस काम में फिर से तेज़ी लाई गई है.

अटल टनल

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चीन से सटे सीमावर्ती इलाकों में भारत के निर्माण कार्य

हाल में तैयार परियोजनाओं में जम्मू-कश्मीर का 55 मीटर लंबा बस्ती ब्रिज और उत्तराखंड से लगने वाली तिब्बत सीमा पर 24 किलोमीटर लंबी भैरों घाटी-नेलॉन्ग मार्ग भी है.

नौ किलोमीटर से भी लंबे अटल टनल और निर्माणाधीन ज़ोजिला सुरंग मार्ग को भी सीमा क्षेत्र की सुरक्षा को मज़बूत करने का क़दम बताया जाता है. इस समय दो दर्जन से अधिक सुरंग मार्गों पर काम जारी है.

लेफ़्टिनेंट जनरल हूडा कहते हैं कि भारत के कई सीमावर्ती क्षेत्र ऐसे हैं जहां साल के चार से पांच महीने पहुंचना मुश्किल हो जाता है, इसलिए सुरक्षा के लिहाज़ से भी इस तरह की सुरंग वाली सड़कें काफ़ी फ़ायदेमंद साबित होंगी.

मनोज जोशी बताते हैं कि पिछले पांच से दस साल के दौरान सीमावर्ती इलाकों में सड़क, पुल और दूसरे निर्माण कार्यों में काफ़ी पैसा लगाया गया है.

रक्षा मामलों के जानकारों के मुताबिक़, भारत ने साल 2020 के बाद चीन से बढ़े तनाव के मद्देनज़र सीमा पर 60 हज़ार से भी ज़्यादा सैनिकों की नियुक्ति की है. इनके लिए रिहाइश के इंतज़ाम में भी एजेंसियां जुटी हैं.

मिज़ोरम

रेलवे परियोजनाओं का क्या है हाल?

मनोज जोशी का कहना है कि इन्फ़्रास्ट्रक्चर बिल्डिंग के मामले में चीन, भारत से बहुत आगे निकल गया है.

भारतीय सुरक्षा योजनाकारों में इस बात को लेकर भी चिंता है कि एक तरफ़ तो चीन ने तिब्बत के ल्हासा तक रेलवे लाइन बिछा ली है, वहीं भारत के हिमालयी क्षेत्रों में रेलवे लाइनों की जो दस परियोजनाओं को तैयार करने की बात हुई थी, उसका कहीं अता-पता नहीं.

दूसरी तरफ़ म्यांमार से सटे सीमा क्षेत्र मिज़ोरम की अपनी चिंताएं हैं.

मिज़ोरम के एक सांसद के. वानलालवेना का कहना था, 'चीन की मदद से पश्चिम म्यांमार के चिन राज्य तक सड़क बिछ गई है, लेकिन हमारी ओर का काम सालों से लटका है, जबकि इस सिलसिले में हम पांच बार सरकार के मंत्रियों तक से मिलकर बातचीत कर चुके हैं.'

म्यांमार में जब सेना ने आंग सान सू ची की सरकार को हटा दिया, उसके बाद कम-से-कम 25 से 30 हज़ार शरणार्थी भारत के कई उत्तर-पूर्वी राज्यों में पहुंचे.

भारत और म्यांमार के बीच फ़्री मूवमेंट एंग्रीमेंट है जो कि दोनों ओर के कुछ इलाक़ों में एक ही जाति के लोगों के रहने और दूसरे कारणों से अस्तित्व में आया था.

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