पाकिस्तान के सबसे गर्म शहर में एक दिन: 'इतनी गर्मी कि बच्चे बेहोश हो जाते हैं...'

- Author, रियाज़ सोहेल
- पदनाम, बीबीसी उर्दू
"दिन बहुत गर्म और शुष्क होता है. हम कमज़ोर हो जाते हैं इसलिए कुछ काम नहीं कर पाते."
ये तकलीफ़ हक़ नवाज़ की है जो पाकिस्तान के सबसे गर्म शहर जैकोबाबाद में चिलचिलाती धूप से बचने के लिए अन्य भट्ठा मजदूरों के साथ सूरज की पहली किरण से भी पहले ईंटें बनाना शुरू कर देते हैं.
जैसे-जैसे सूरज चढ़ता है, ये मज़दूर वक़्त और धूप से प्रतिस्पर्धा करते हैं. जैसे-जैसे घड़ी की सुइयां आगे बढ़ती हैं, इन मजदूरों के लिए कड़ी मेहनत करना मुश्किल होता जाता है.
पाकिस्तान के उत्तरी सिंध के जैकोबाबाद शहर में आठ से अधिक ईंट भट्ठे हैं, जहां 500 के क़रीब मज़दूर काम करते हैं.
जैकोबाबाद पाकिस्तान के सबसे गर्म शहरों में से एक है. यहां गर्मियों में तापमान 52 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है.
चाहे ईंट भट्ठा मज़दूर हो या खेतों में काम करने वाला किसान इतनी भीषण गर्मी और तेज़ धूप में काम करना लगभग नामुमकिन हो जाता है.
पाकिस्तान आर्थिक सर्वेक्षण 2024 के अनुसार, देश में गर्मी वैश्विक तापमान से अधिक बढ़ने की संभावना है. इसके मुताबिक़, 2060 तक कम से कम 1.4 से 3.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होगी.
बीबीसी ने पाकिस्तान के सबसे गर्म शहर का दौरा ये जानने के लिए किया कि वहां लोगों की दिनचर्या क्या रहती है? हमने ये जानने की कोशिश कि जैकोबाबाद के आम लोग तपती धूप और गर्मी से निपटने के लिए क्या करते हैं और किन कठिनाइयों का सामना करते हैं.


गर्मी के कारण आधा दिन बीता
जब हमने हक़ नवाज़ से इस गर्मी के कारण उनके काम पर पड़ने वाले असर के बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि शहर के करीब आठ ईंट भट्टों पर काम करने वाले सभी मजदूरों पर इस मौसम की दोहरी मार पड़ी है.
एक ओर जहां काम के दौरान गर्मी और प्यास के कारण वे थक जाते हैं और उनमें और काम करने की क्षमता नहीं रह जाती, वहीं दूसरी ओर गर्मी से बचने के लिए उनकी दिहाड़ी आधी रह जाती है. और इसका असर आमदमी पर भी पड़ता है.
नवाज़ कहते हैं कि भट्ठा मजदूर यहां सुबह चार बजे से सुबह आठ से नौ बजे तक काम करते हैं.
इस दौरान एक मजदूर 500 से 600 ईंटें बनाता है और उसे पांच सौ रुपये तक मिलते हैं. सर्दियों में एक मजदूर 900 से 1000 ईंटें बनाता है और उसकी कमाई क़रीब दोगुनी हो जाती है.
हक़ नवाज़ मिट्टी के ढेर से मिट्टी निकालकर सांचे में डालते हैं और उसे ईंटों के आकार में ढाल देते हैं. वह यह काम बहुत ही कुशलता और तेज़ी से कर रहे हैं.
हक़ नवाज़ ने बताया कि गर्मी से बचने के लिए तड़के ही अपना काम शुरू कर देते हैं क्योंकि दोपहर में बहुत गर्मी होती है और उस दौरान ये काम करना नामुमकिन है.
नवाज़ सुबह चार बजे भट्ठे पर आते हैं सुबह नौ बजे तक काम करते हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया, "कच्ची ईंटों को एक ढेर पर रखा जाता है जहां नीचे जलती आग उन्हें पकाती है. यहां सुबह-सुबह भी गर्मी महसूस होती है और मजदूर इसी चूल्हे पर खड़े होकर काम करते हैं."
हक़ नवाज़ सर्दी के मौसम को बेहतर मानते हैं क्योंकि तब उन्हें काम करने में आसानी तो होती ही है, पैसे भी ठीक ठाक कमा लेते हैं. उससे उलट गर्मियों में तकलीफ़ अलग होती है और काम करने के उपलब्ध वक़्त भी आधा हो जाता है.
इसका सीधा असर उनकी आमदनी और उसके बाद उनके जीवन यापन पर पड़ता है.

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बच्चों को बार-बार नहलाया जाता है...
जैकोबाबाद में भट्ठा मज़दूरी के अलावा ज्यादातर लोगों के रोज़गार का जरिया खेती से जुड़ा है. यहाँ गेहूँ और चावल की खेती की जाती है.
जैकोबाबाद के क़स्बे गोथ अरिकाप की महिलाएं खेतों में काम करने के बाद सुबह जल्दी घर लौट आती हैं क्योंकि उनका बाकी समय अपने बच्चों को गर्मी से बचाने में व्यतीत होता है.
सर्दियों के दौरान खेतों से लौटने के बाद ये महिलाएं अपने घरों में सिलाई-कढ़ाई का काम करती हैं लेकिन गर्मियों में उनका ध्यान अपने बच्चों की सेहत और गर्मी से हिफ़ाज़त पर होता है.
गर्मी की तीव्रता के कारण उनकी दिनचर्या में भी बदलाव आ गया है.
मिट्टी के घर के बरामदे में बैठी जन्नत खातून ने बताया कि वे लोग खेतों से दस बजे तक लौट आते हैं. कई बार गर्मी अधिक होने के कारण इससे पहले भी लौट आते हैं.
घर पहुँचते ही उन्हें भीषण गर्मी से परेशान छोटे बच्चों को सुलाने की कोशिश करनी होती है.
जन्नत ख़ातून बताती हैं कि गर्मी के कारण बच्चे सो नहीं पाते इसलिए उन्हें बार-बार नहलाया जाता है या फिर गीले कपड़े पहनाए जाते हैं.
बच्चों के अलावा बड़े लोग भी हैंडपंप के नीचे नहाते हैं ताकि गर्मी से निजात पा सकें.
जैकोबाबाद शहर और इसके उपनगरों में अक्सर लोड शेडिंग और बिजली कटौती का सामना करना पड़ता है और यहां तक कि इस गर्मी के मौसम में भी आमतौर पर 24 घंटों में से 10 घंटे लोड शेडिंग होती है.

यहां के अमीर लोगों ने तो सौर ऊर्जा का विकल्प खोज लिया है, लेकिन ग़रीबों ने गर्मियों के दौरान लोड शेडिंग की समस्या से बचने के लिए पारंपरिक और स्वदेशी तरीकों को अपनाया है.
निहाल खान लशारी नामक गांव में हमने गधे से चलने वाला एक पंखा और एक आटा चक्की देखी. इसे एक लकड़ी के सहारे ज़मीन में गाड़ दिया जाता है और इसमें दो छड़ियों को रस्सियों की तरह बांध दिया जाता है और उन पर एक चादर डाल दी जाती है और जब यह गधा गोल-गोल घूमता है तो ये चादरें उड़ने लगती हैं. इलाके में बिजली आने से पहले इन झिल्लियों का इस्तेमाल किया जाता था .
सेवानिवृत्त शिक्षक शफी मोहम्मद लशारी ने कहा कि दोपहर में वे हाथ का पंखा चलाते हैं जबकि शाम को वे पंखा चलाते हैं, गधे को तीन किलो चावल या अनाज खिलाते हैं और रात भर पंखा चलाते हैं ताकि उन्हें आराम की नींद मिल सके.
उनका कहना है, "पहले दोपहर 12-1 बजे तक हम काम कर लेते थे लेकिन अब तो सूरज सुबह सात बजे ही तपने लगता है. तापमान बढ़ने के कारण हम गर्मी सहन नहीं कर पाते हैं और हमारा कोई काम नहीं हो पाता है. पूरा दिन हैंडपंप के पानी में नहाते गुजरता है."
इसी गांव में लोगों ने आटा पीसने के लिए गधे से चलने वाली चक्की भी बना रखी है. जिसे गधे द्वारा घुमाया जाता है और उसमें अनाज डाला जाता है, जो मुख्य रूप से चावल का आटा होता है.
यहां के एक स्थानीय व्यक्ति मोहम्मद मुस्तफा ने कहा कि बिजली की अनुपलब्धता का उनके पास यही एकमात्र समाधान है.

'बर्फ का इस्तेमाल न करें तो बच्चे हो जाते हैं बेहोश'
लू और भीषण गर्मी के कारण जैकोबाबाद में शर्बत और बर्फ़ का कारोबार बढ़ गया है. शहर में कई जगहों पर लोगों को ठंडा पानी उपलब्ध कराने के लिए सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थाओं ने हैंडपंप लगाए हैं.
मोहम्मद दानिश आम दिनों में तीन से चार सौ बर्फ़ की सिल्लियां बेचते हैं और गर्मियों में उनकी बिक्री बहुत बढ़ जाती है.
उनका कहना है कि जैकोबाबाद में बिजली आपूर्ति में कमी के कारण बर्फ़ नहीं जमती इसलिए वे आसपास के शहरों से बर्फ मंगवाते हैं. इस वजह से रास्ते में बर्फ़ पिघल कर टूट जाती है.
वे कहते हैं कि शहर का लगभग हर आदमी 50 से 300 रुपये तक की बर्फ़ खरीदता है.
बर्फ़ लेने पहुंचे मुहम्मद इस्माइल ने बताया कि इतनी गर्मी में इसके बिना गुजारा नहीं. वे सुबह-शाम डेढ़ सौ रुपये की बर्फ़ लेते हैं और कहते हैं कि ये सिलसिला अगस्त तक जारी रहेगा.
अब्दुल रज्जाक ने बीबीसी को बताया कि बिजली नहीं होने के कारण एसी और रेफ्रिजरेटर काम नहीं कर रहे हैं इसलिए वे बाहर से बर्फ़ मंगाते हैं. उन्होंने बताया कि कई बच्चे गर्मी के कारण बेहोश तक हो जाते हैं.
ब्रिटिश सेना के जनरल जॉन जैकब ने 18वीं सदी की शुरुआत में इस रेगिस्तानी इलाक़े में शहर बसाया था. उन्हीं के नाम पर शहर का नाम पड़ा- जैकोबाबाद. जनरल जैकब ने यहां नहरें भी खुदवाईं थीं.
गधा गाड़ियों और रिक्शों के जरिए घरों तक ग्राउंड वाटर की सप्लाई की जाती है जिसकी गुणवत्ता संदिग्ध रहती है.

शाम ढलने के बाद खरीदारी का रुझान
इन इलाकों में सूरज ढलने के बाद महिलाएं घरों से बाहर नहीं निकलती थीं लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण अब महिलाएं शाम से लेकर रात तक खरीदारी करती हैं.
हम लोग दोपहर तीन बजे के आसपास जैकोबाबाद के प्रमुख बाज़ार में पहुँचे.
ईद नजदीक होने के बावजूद यहां कर्फ्यू जैसा माहौल दिखा. बाज़ार लगभग सुनसान थे और हमें वहाँ कोई खरीदार नहीं मिला.
सौंदर्य प्रसाधन की दुकान के मालिक मोहसिन अली ने कहा कि महिलाएं मगरिब (शाम) की नमाज के बाद आती हैं और दुकानदार सुबह से दोपहर तक खाली बैठी रहते हैं.
मोहसिन कहते हैं कि जब शहर का तापमान इतना अधिक नहीं था तो लोग शाम के बजाय सुबह जल्दी खरीदारी करने आते थे. लेकिन अब बाज़ार में ज़्यादातर दुकानें दोपहर 12 बजे के बाद ही खुलती हैं और रात 12 बजे तक भी खुली रहती हैं.

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एक और दुकानदार जयेश तुलसी का कहना है कि जब गर्मी कम होती है तो वह पूरे दिन खरीदारों का इंतज़ार करते हैं फिर भी लोग अपने घरों तक ही सीमित रहते हैं.
जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर काम करने वाले एनजीओ टैंटिम कम्युनिटी डेवलपमेंट फाउंडेशन के कार्यकर्ता जॉन ओधानो कहते हैं, "जैकोबाबाद शहर और उसके आसपास न के बराबर पेड़ हैं. ये भी लोगों ने बचाए हैं. बाकी सारे पेड़ सूख गए हैं."
उनके मुताबिक लोग जलवायु परिवर्तन और आने वाले दिनों में इसके प्रभावों के प्रति जागरूक नहीं हैं.
सूर्यास्त के बाद, शहर की सड़कों और चायखानों में लोगों की भीड़ उमड़ने लगी है. कहीं लुडो तो कहीं ताश के महफ़िल लगनी शुरू हो गई हैं.
लगभग रोज़ाना शाम को बैलों की दौड़ होती है. इसे देखने और इसपर दांव लगाने के लिए सैकड़ों लोग आकर्षित होते हैं.

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