भारत, पाकिस्तान में लू की क्या वजह है?

ग्लोबल वॉर्मिंग, लू

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    • Author, नवीन सिंह खड़का
    • पदनाम, पर्यावरण संवाददाता, बीबीसी

भारत और पाकिस्तान में वैज्ञानिकों का कहना है कि इलाक़े में लू की वजहों में गर्मी सिर्फ़ एक वजह थी, इसके अन्य कारणों का अभी पता लगाया जाना है.

उनका कहना है कि हवा का कम दबाव, भारी उमस और असामान्य रूप से हवा न चलने से गर्मी बर्दाश्त के बाहर हो गई. हालांकि अभी यह पता नहीं है कि साल के इस समय ऐसी स्थितियां क्यों पैदा हुईं.

पाकिस्तान के मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार कराची में पिछले हफ़्ते गर्मी का पूर्वानुमान 43 डिग्री सेल्सियस तक था.

पाकिस्तान गर्मी

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उनका कहना है कि अनुमान तो सटीक थे लेकिन अन्य वजहों से यह गर्मी बर्दाश्त के बाहर हो गई.

'असामान्य बात'

लू लगने से पाकिस्तान में तीन दशक में सबसे ज़्यादा 1,000 लोगों की मौत हो गई है.

भारत में गर्मी से मौत का आधिकारिक आंकड़ा 2,000 से ज़्यादा है लेकिन ख़बरों के मुताबिक 3,000 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई.

पाकिस्तान के राष्ट्रीय मौसम पूर्वानुमान केंद्र के निदेशक मोहम्मद हनीफ़ कहते हैं, "कराची में ऐसा लग रहा था कि तापमान 49 डिग्री सेल्सियस है. इसी को हम हीट इंडेक्स कहते हैं."

पाकिस्तान गर्मी

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वो बताते हैं, "हीट इंडेक्स वास्तविक तापमान से ज़्यादा इसलिए था क्योंकि हवा का दबाव बहुत कम था और उस इलाक़े में उमस बहुत ज़्यादा थी."

उनके मुताबिक, "पाकिस्तान के इस इलाक़े में जून के महीने में कम दबाव बनना बहुत असामान्य है. कम दबाव ने समुद्र से आने वाली बयार को पूरी तरह रोक दिया और गर्मी बर्दाश्त से बाहर हो गई."

'वैज्ञानिक वजहें सीमित'

भारतीय वैज्ञानिक भी असामान्य मौसमी परिस्थितियां महसूस कर रहे हैं.

भारतीय मौसम विभाग के महानिदेशक एलएस राठौड़ कहते हैं, "तटीय क्षेत्र देर शाम को समुद्र की बयार के ज़रिए इंसान के शरीर पर पड़ने वाले गर्मी के असर को कुछ हल्का कर देते हैं "

भारत गर्मी

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वो कहते हैं, "इस साल यह नहीं हुआ और हमने जो झेली वो असल में बेहद लंबी महाद्वीपीय गर्मी थी."

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी (आईआईटीएम) में जलवायु परिवर्तन के प्रमुख आर कृष्णन का कहना है कि इसकी वैज्ञानिक वजहें बहुत सीमित हैं.

वो कहते हैं, "कई दिन तक जारी लगातार गर्मी का संबंध वायुमंडलीय चक्र के बदलावों से है."

उनके मुताबिक, "हमें नहीं पता कि इन चक्रीय पैटर्न की वजह क्या है जो किसी किस्म की अवरोही चाल पैदा कर रहे हैं और गर्म माहौल को बनाए रख रहे हैं."

कराची की लू

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पाकिस्तान के राष्ट्रीय मौसम पूर्वानुमान केंद्र के निदेशक हनीफ़ ने कराची की परिस्थतियों को विस्तार से बताया.

उन्होंने कहा, "वोरटेक्स (कम दबाव का) क्षेत्र, जो उत्तरी अरब सागर में बना था वो पहले ऊपरी वातावरण में दिखा. कुछ दिन बाद यह ज़मीन की ओर आया और एक कम दबाव के क्षेत्र में बदल गया."

वो आगे बताते हैं, "हवा के इस कम दबाव और भारी उमस ने कराची की गर्मी को असहनीय बनाया और लोगों को लगा कि तापमान 49 डिग्री सेल्सियस है जबकि असल में वह 43 डिग्री सेल्सियस था."

उनके मुताबिक, "जबकि दक्षिणी पाकिस्तान में तापमान 47 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया लेकिन लोगों को लगा कि यह 41 डिग्री सेल्सियस है क्योंकि वहां हवा का उच्च दाब और कम उमस थी. इसलिए वहां कोई नहीं मरा."

''बहुत कुछ समझना है

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वो कहते हैं, "कराची में जो हुआ वह पिछले कुछ सालों से दक्षिण एशिया की कई जगहों में बढ़ता जा रहा है लेकिन हमें पता नहीं कि इसकी वजह क्या है और इस इलाके में इसे समझने के लिए कोई कदम भी नहीं उठाया गया है."

आईआईटीएम के जलवायु विज्ञानी कृष्णन भी इससे सहमत हैं कि अभी बहुत कुछ समझना बाकी है.

उन्होंने कहा, "हमें यह समझने की ज़रूरत है कि इस ख़ास समय में यह असामान्य चक्र क्यों पैदा हुए."

"यकीनन लोगों ने यह तो दर्ज किया है कि तापमान में कितनी वृद्धि हुई है लेकिन इस गर्मी के गति विज्ञान को समझने के लिए बहुत सारा मूलभूत काम ही किए जाने की ज़रूरत है."

सख़्त मौसम

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इलाके के वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन ने ठीक उसी तरह लू को बढ़ाया है जैसे कि इसने अन्य मौसमी मुश्किलों जैसे कि बाढ़, सूखा, जंगलों में आग आदि को बढ़ाया है.

जलवायु विज्ञान पर संयुक्त राष्ट्र की संस्था आईपीसीसी ने बहुत पहले ही चेतावनी दे दी थी कि दक्षिण एशिया में लू बहुत ज़्यादा तेज़ हो जाएगी.

आईपीसीसी की पांचवीं आकलन रिपोर्ट में कहा गया है, "ग्लोबल वॉर्मिंग शुरू हो गई है. अधिकांश दक्षिण एशिया में इसका असर दिखने लगेगा."

रिपोर्ट में 'दृढ़ विश्वास' शीर्षक के साथ लिखे गए बयान में कहा गया है, "तापमान पहले से भी ज़्यादा रहा है. 20वीं सदी के मध्य से एशिया के बड़े हिस्से में लू बढ़ी है."

भारत गर्मी

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वैज्ञानिकों का कहना है कि ये जानकारी होने के बावजूद लू को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी गई है.

विश्व मौसम विज्ञान संगठन में एशिया के लिए विशेष सलाहकार और जलवायु वैज्ञानिक क़मर ज़मां चौधरी कहते हैं, "और ऐसा इसलिए क्योंकि यह धीरे-धीरे बढ़ने वाला परिदृश्य है. चक्रवात या बाढ़ की तरह तेजी से होने वाली घटना नहीं."

वो कहते हैं, "तो जब आपके सामने कोई ऐसी चीज़ होती है जो धीरे-धीरे विकसित होती है तो इसकी ओर तुंरत और गंभीरता के साथ ध्यान नहीं दिया जाता. हमारे इलाके में लू के साथ भी यही हुआ है."

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