नेपाल अपने हवाई क्षेत्र के विस्तार पर भारत से चाहता है ये मदद

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    • Author, फणींद्र दहाल
    • पदनाम, बीबीसी नेपाली सेवा

नेपाल के नागरिक उड्डयन प्राधिकरण के महानिदेशक रहे त्रिरत्न मनंधर साल 2011 में नेपाली पीएम बाबूराम भट्टाराई की ओर से बुलाई गई कैबिनेट बैठक में शामिल हुए थे.

इस बैठक को भट्टाराई के भारत दौरे से ठीक पहले बुलाया गया था. इस मौके पर मनंधर ने कहा था कि नेपाल सिर्फ़ लैंड-लॉक्ड (चारों ओर से भूमि से घिरा) देश ही नहीं, बल्कि स्काई लॉक्ड (आसमान से घिरा) देश भी है.

लगभग 13 साल बाद इस पल को याद करते मनंधर ने बीबीसी से कहा, “ज़्यादातर मंत्री इस बात से अवगत नहीं हैं कि नेपाल में आने वाले ज़्यादातर विमान सिर्फ एक रास्ते से ही अंदर आ सकते हैं. मैंने जो कहा उससे हर कोई आश्चर्यचकित था.”

उस वक़्त भट्टाराई ने भारत सरकार से आग्रह किया कि नेपाल में एयर ट्रैफ़िक बढ़ने की वजह से जनकपुर, भैरहवा और नेपालगंज की ओर से भी विमानों को प्रवेश करने दिया जाए. इस आग्रह का जवाब देते हुए भारत सरकार ने कहा कि दोनों देशों के नागरिक उड्डयन प्राधिकरणों के बीच बैठक करके कोई फ़ैसला किया जाना चाहिए.

तत्कालीन महानिदेशक मनंधर के मुताबिक़, चर्चा के दौरान ये मुद्दा आया भी. उन्होंने कहा, “पर्यटन मंत्रालय की ओर से इस दिशा में कदम उठाने के लिए प्रस्ताव आया.

इस पर हमने भारतीय पक्ष को पत्र लिखा लेकिन हमें किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं मिली.

भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर जब गुरुवार को नेपाल-भारत संयुक्त आयोग की बैठक में हिस्सा लेने के लिए नेपाल आए लेकिन अतिरिक्त वायु मार्ग के मुद्दे पर ज़्यादा चर्चा नहीं हुई.

लेकिन 2011 में भट्टाराई के भारत दौरे के बाद से अब तक नेपाल ने चीनी कर्ज की बदौलत पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट बना लिया है.

इसके साथ ही एशियन डिवेलपमेंट बैंक की ओर से मिले लोन की मदद से चीनी कॉन्ट्रेक्टर के सहयोग से भैरहवा में भी एक अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट बना लिया है.

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भारत में नेपाली पीएम भट्टाराई और भारतीय पीएम मनमोहन सिंह के बीच मुलाक़ात के 12 साल बाद भी नेपाली प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड ने पीएम मोदी से मुलाक़ात करके ज़्यादा एयर रूट्स देने का आग्रह किया है.

मोदी उन भारतीय प्रधानमंत्रियों में हैं जिन्होंने बारबार नेपाल का दौरा किया है. मोदी ने साल 2014 में नेपाल दौरा किया जो बहुत अर्थपूर्ण था.

क्योंकि उससे 23 साल पहले से कोई भारतीय पीएम नेपाल नहीं पहुंचा था.

नेपाली प्रधानमंत्री सुशील कोइरला ने इस मौके पर भी कहा था कि नेपाल को अतिरिक्त वायु मार्ग उपलब्ध कराए जाने चाहिए ताकि पोखरा, भेरहवा और लखनऊ के बीच विमानों का आवागमन हो सके.

दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने इस मुद्दे पर अगले छह महीने के अंदर बैठक करने का निर्देश दिया था.

नेपाल के मौजूदा प्रधानमंत्री प्रचंड ने आपने दौरे के दौरान द्विपक्षीय उड़ानों के लिए ज़्यादा एयर रूट्स उपलब्ध कराने पर भारत के सकारात्मक रुख का स्वागत किया है.

उन्होंने कहा कि पीएम मोदी के साथ एक बात पर सहमति बनी है कि पश्चिमी नेपाल के महेंद्रनगर से एटीआर विमानों को नेपाल में प्रवेश की अनुमति मिलेगी.

इसके साथ ही प्रधानमंत्री प्रचंड ने दिल्ली पहुंचकर कहा कि भारत भैरहवा स्थित गौतम बुद्ध इंटरनेशनल एयरपोर्ट के मुद्दे को सुलझाने के प्रति संकल्पित है क्योंकि यह एयरपोर्ट सीमा के पास स्थित है.

किस रास्ते से घुसते हैं विमान

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हालांकि, नेपाली एविएशन अधिकारियों का कहना है कि जयशंकर की नेपाल यात्रा से उड्डयन क्षेत्र से जुड़े मुद्दों में उल्लेखनीय प्रगति और नतीजे आने की ज़्यादा संभावनाएं नहीं हैं.

नेपाली सिविल एविएशन अथॉरिटी के उप-प्रबंधक ज्ञानेंद्र भूल बीबीसी से कहते हैं, “'हमें एक समझौता करना था. कहा गया था कि दोनों देशों की संयुक्त तकनीकी टीम की बैठक होगी और भैरहवा में इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम के संबंध में दोनों देशों की ओर से की गयी अनुशंसा के आधार पर निर्णय लिया जायेगा. लेकिन दुर्भाग्य से तकनीकी टीम की बैठक अब तक नहीं हो सकी, इसलिए कोई प्रगति नहीं हुई है.''

हालाँकि, ज़्यादातर अंतरराष्ट्रीय उड़ानें नेपाल में सिमरा से प्रवेश करती हैं. वहीं, भूटान से आने वाले विमान मेची और ल्हासा से आने वाले विमान तुमलिंगतार से नेपाल में आते हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि सिमरा के रास्ते ज़्यादातर अंतरराष्ट्रीय उड़ाने नेपाल पहुंचती हैं. इस वजह से ये मार्ग काफ़ी व्यस्त हो जाता है.

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भूल बताते हैं कि सिमरा वाले मार्ग के व्यस्त होने के साथ-साथ भैरहवा और पोखरा एयरपोर्ट को अपना ऑपरेशन चलाने के लिए नए एंट्री रूट्स की ज़रूरत है.

उन्होंने कहा, ''काठमांडू आने वाला जहाज जब सिमरा होकर आता था तो कोई दिक्कत नहीं होती थी. लेकिन पोखरा और भैरहवा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे जाने वाली उड़ानों को सिमरा से होकर जाना पड़ता है, इसलिए दूरी लंबी है. जब ऐसा होता है, तो लागत और टिकट दोनों महंगे हो जाते हैं. इसलिए हम यह मुद्दा उठा रहे हैं कि हमें लुंबिनी और महेंद्रनगर से भी प्रवेश की अनुमति देनी चाहिए.”

इस समय विमान भैरहवा और महेंद्रनगर से उड़ान भरकर बाहर जा सकते हैं लेकिन दिल्ली या मध्य-पूर्वी गंतव्यों से आने वाले विमानों को सिमरा से होते हुए आना होता है जिसकी वजह से उन्हें 305 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है.

इससे पहले कुछ नेपाली अधिकारियों ने बताया था कि भारत सरकार का मानना था कि भैरहवा वाला रूट देने के लिए सैन्य तंत्र की सहमति भी ज़रूरी है क्योंकि ये हवाई क्षेत्र गोरखपुर स्थित आर्मी बैरक्स के ठीक ऊपर से गुज़रेगा.

प्रधानमंत्री प्रचंड के दौरे के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारतीय विदेश सचिव ने इस मत को रखा कि कुछ एंट्री पॉइंट्स भारतीय वायुसेना के वायु क्षेत्र में होंगे, इसलिए इसे भी ध्यान में रखने की ज़रूरत है.

एविएशन क्षेत्र में चीन का बढ़ता दखल

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भारत नेपाल को अपना क़रीबी पड़ोसी बताता आया है. मोदी सरकार ने कहा है कि काठमांडु उसकी ‘पहले पड़ोस’ वाली विदेश नीति की एक प्राथमिकता है.

पूर्व महानिदेशक जनरल मनंधर कहते हैं, “भारत चीन को सुनना भी नहीं चाहता. ये भी एक कारण हो सकता है.”

वह ये भी मानते हैं कि नेपाली नेतृत्व इस मुद्दे को भारत के सामने गंभीरता से नहीं रख पाया है.

नेपाल का पोखरा एयरपोर्ट चीन के एक्सिम बैंक की ओर से दिए गए 28 अरब रुपये के कर्ज से बनाया गया था.

एक तरफ़ अब इस कर्ज का ब्याज चुकाने का वक़्त आ रहा है तो दूसरी तरफ़ इस एयरपोर्ट से अब तक मात्र चीन से एक दो इंटरनेशनल फ़्लाइट उतरी है.

इसी तरह भैरहवा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण पर 10 अरब 23 करोड़ रुपये से अधिक ख़र्च किये गये हैं. लेकिन वहां से भी नियमित अंतरराष्ट्रीय उड़ानें भी नहीं हैं.

इन दोनों हवाईअड्डों पर भारत से या भारत के लिए उड़ानें शुरू नहीं हुई हैं. लेकिन हाल के वर्षों में चीन ने कहा है कि उसने नेपाल के साथ एभिएशन क्षेत्र में सहकार्य बढ़ाने की नीति अपनाई है.

भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के नेपाल दौरे से ठीक एक हफ़्ते पहले हिमालय एयरलाइंस ने काठमांडू से ल्हासा के लिए नियमित उड़ानें शुरू कर दी हैं.

ऐसा कहा जाता है कि यह एयरलाइन पहली गैर-चीनी एयरलाइन है जिसे ल्हासा के लिए नियमित रूप से उड़ान भरने की अनुमति दी गई है.

रिपोर्ट के मुताबिक़, हिमालय एयरलाइन भारत में भी उतरने की अनुमति मांग रही है. लेकिन अब तक भारत की ओर से इस पर सकारात्मक जवाब नहीं दिखा है.

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