भेड़ियों के ख़ौफ़ में जी रहे उत्तर प्रदेश के ये गाँव, क्यों बढ़ रहे इंसानों पर हमले- ग्राउंड रिपोर्ट

भेड़िये के आतंक से खौफ में लोग
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    • Author, सैय्यद मोज़िज़ इमाम
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले में एक इलाक़े के लोग भेड़ियों के आतंक से ख़ौफ़ में हैं.

ये इलाक़ा भारत-नेपाल सीमा से सटे तराई अंचल का है, जहाँ भेड़ियों का झुंड ख़ासतौर से बच्चों को निशाना बना रहा है.

भेड़ियों के हमलों से बड़े भी सुरक्षित नहीं हैं. इस इलाक़े में जुलाई महीने से अब तक भेड़िए छह बच्चों को अपना शिकार बना चुके हैं और 26 लोग उनके हमले में घायल हुए हैं.

वन विभाग भेड़ियों के झुंड को पकड़ने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहा है, लेकिन अभी तक तीन भेड़िए ही पकड़े जा सके हैं.

वन विभाग की नौ टीमें इस अभियान में जुटी हुई हैं और भेड़ियों की मौज़ूदगी वाले इलाक़े में चार पिंजरे और छह कैमरे लगाए गए हैं.

वन विभाग भेड़ियों की तलाश के लिए थर्मल ड्रोन का भी इस्तेमाल कर रहा है.

भेड़ियों को पकड़ने के इन प्रयासों के साथ ही वन विभाग लोगों को सावधान रहने की भी सलाह दे रहा है.

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बहराइच के डिविजनल फ़ॉरेस्ट ऑफ़िसर यानी डीएफ़ओ अजीत प्रताप सिंह का कहना है, "हम गाँव वालों से कह रहे हैं कि बच्चों को बाहर न सुलाएँ. इस इलाक़े में ज़्यादातर घरों में दरवाज़े ना होने से भेड़िए घर में घुस जाते हैं."

उन्होंने कहा, "जहाँ तक भेड़ियों की बात है, ये इंसान पर हमला नहीं करते. लेकिन ऐसा लग रहा है कि किन्हीं हालात में उन्होंने ग़लतफ़हमी में इंसानों पर हमला किया और उसके बाद उन्हें इसकी आदत पड़ गई है."

इस मामले पर बीबीसी ने उत्तर प्रदेश के वन मंत्री अरुण कुमार सक्सेना से बात की.

उन्होंने कहा, "हम नहीं चाहते हैं कि किसी वन्यजीव या इंसान की जान जाए, हमने अब तक तीन भेड़ियों को पकड़ा भी है."

इस साल प्रदेश भर में रेस्क्यू किए गए वन्यजीव प्राणियों को लेकर मंत्री ने कहा, “जनवरी 2024 से 23 अगस्त 2024 तक 27 तेंदुए और तीन बाघ भी रेस्क्यू किए गए हैं."

30 गाँव प्रभावित, स्थानीय लोग नाराज़

बहराइच
इमेज कैप्शन, बहराइच के पुरवे में भेड़ियों ने रात में सोते हुए आठ साल के उत्कर्ष को उठा ले जाने की कोशिश की
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बहराइच ज़िले की महसी तहसील के क़रीब 100 वर्ग किलोमीटर के 25 से 30 गाँव भेड़ियों के ख़ौफ़ से प्रभावित हैं. यह क्षेत्र भारत-नेपाल सीमा से सटा हुआ है.

डीएफ़ओ अजीत प्रताप सिंह ने बीबीसी को बताया, "पहली बार भेड़िए इंसानों के बच्चों को ग़लती से निशाना बनाते हैं."

उन्होंने कहा, "मौसम की वजह से भेड़ियों की मांद में पानी भर जाता है तो वे आबादी की तरफ़ बढ़ते हैं और ग़लती से इंसान को निशाना बनाते हैं, फिर उन्हें इसकी आदत पड़ जाती है."

इससे पहले इस इलाक़े में तेंदुए का डर भी रहा है, जो कई बार इंसानों पर हमला कर देता है.

बीबीसी की टीम ने बहराइच ज़िले के कई गाँवों का दौरा किया, जिसमें मैकूपुरवा के इलाक़ा भी शामिल है.

यहाँ के एक पुरवे में भेड़ियों ने रात के वक़्त सोते हुए आठ साल के उत्कर्ष को उठा ले जाने की कोशिश की. हालांकि, उसकी माँ वक़्त रहते जाग गई और उसने भेड़िये के चंगुल में फँसे उत्कर्ष को पकड़ लिया.

तब तक शोर सुनकर गाँव वाले भी इकट्ठा हो गए और उत्कर्ष की जान बच गई.

मैकूपुरवा के प्रधान अनूप सिंह ने बीबीसी को बताया, "17 अप्रैल को इस तरह की पहली घटना घटी थी. उससे पहले मार्च में भी हमला हुआ था, तब से गाँव में लगातार गश्त की जा रही है.

उन्होंने बताया, "वन विभाग की टीम रात में पहरे पर रहती है. हम लोग रात जागकर काटते हैं, लेकिन फिर सुनने में आता है कि किसी और गाँव में भेड़ियों के हमले की घटना हो गई."

हालांकि, इस इलाक़े में हर साल घाघरा नदी की वजह से बाढ़ आती है. जिसकी वजह से भेड़ियों की मांद में पानी भर जाता है, लेकिन यह एक बड़े अरसे के बाद हुआ है कि भेड़ियों ने इंसानों पर हमला करना शुरू किया है.

कुछ साल पहले भी भेड़ियों ने इंसानों को अपना शिकार बनाया था.

डीएफ़ओ ने बताया, "तकरीबन 20 साल पहले भेड़ियों ने इंसानों पर हमला किया था. गोंडा, बहराइच और बलरामपुर, इन तीन ज़िलों में भेड़ियों के हमलों से तकरीबन 32 बच्चों की जान चली गई थी. इसके बाद से इस तरह भेड़िए के हमले नहीं हुए हैं."

उन्होंने बताया, "महसी में पाँच या छह भेड़ियों का एक समूह है, जो इंसानों पर हमला कर रहा है."

पिछली बार की तरह इस बार भी वैसे ही हालात हैं, जिसको लेकर स्थानीय लोगों में इससे ग़ुस्सा बढ़ रहा है.

डीएफ़ओ का कहना है, "इन हालात में कभी-कभी जब भेड़िये उनकी पकड़ में आ जाते हैं, तब कई बार होता है कि स्थानीय निवासी जानवर को विभाग से छीनकर मारने की कोशिश करते हैं."

ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस में वन्य जीवन अधिनियम के तहत मामला भी दर्ज किया जाता है. बहराइच में वन विभाग की टीम पर हमला करने के आरोप में तीन लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है.

ख़ुद को बचाने की जद्दोजहद

भेड़ियों के हमलों से बचने के लिए ग्रामीण पहरेदारी कर रहे हैं. हालांकि, यह उनके लिए आसान नहीं है. रात में बिजली नहीं होने और अंधेरा होने की वजह से चुनौती और भी बढ़ जाती है.

मैकूपुरवा गाँव के रामलाल का कहना है, "बिजली की समस्या की वजह से भेड़िए अंधेरे का फ़ायदा उठाते हैं. हम लोग ज़िलाधिकारी तक बात पहुँचा चुके हैं लेकिन रात में बिजली नहीं आती है. अगर रात में बिजली रहे तो कुछ आसान हो जाए."

भेड़ियों के हमलों की पिछली घटना का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया, "रात में भी गाँव में जानवर आया था. चौकसी के कारण कोई घटना नहीं हो पाई है, लेकिन 17 अगस्त की रात में हिंदूपुरवा गाँव से चार साल की संध्या को भेड़िया उठा ले गया."

घटना के बारे में संध्या की मां सुनीता ने बताया, "जैसे ही लाइट गई है, वैसे ही दो मिनट के भीतर भेड़िए ने हमला किया और जब तक हम लोग कुछ समझ पाते, वो उसे लेकर भाग चुका था."

मैकूपुरवा गाँव की तरह ही आसपास के गाँवों में भी भेड़ियों ने इंसानी बच्चों पर हमले किए. 21अगस्त को भटोली गाँव के पास भेड़िए ने एक बच्ची का शिकार किया.

हिंदूपुरवा गाँव के पास नसीरपुर गाँव में चार साल की सबा पर भी हमला हुआ था, लेकिन उसके पिता ने बच्ची को पकड़े रखा तो वह बच गई. लेकिन उसके सिर पर काफ़ी चोट आई है और पट्टी बंधी हुई है.

भेड़िए के हमले को लेकर सबा के पिता शकील ने बताया, "मैं जानवर के पीछे दौड़ा, लेकिन सिर्फ़ पीछे से देख पाया. जब घर लौटे तो उनकी बेटी के सिर से बहुत ख़ून बह रहा था क्योंकि जानवर ने सिर की तरफ़ से पकड़ रखा था."

वन विभाग के अफ़सर गाँव वालों को चौकसी बरतने के लिए जागरूक भी कर रहे हैं. इसके लिए सार्वजनिक एलान भी कराया जा रहा है ताकि लोग सतर्क रहें.

साथ ही गाँव वालों को पटाखे भी दिए गए हैं कि वे ख़तरे को देखते ही इसका उपयोग करें, जिसकी आवाज़ से जानवर भाग जाते हैं.

रात में जानवरों से होने वाले ख़तरों को लेकर वन विभाग के अफसर अजीत प्रताप सिंह का कहना है, "इलाक़े में बहुत ज़्यादा ग़रीबी है. लोगों के पास पक्के मकान नहीं हैं और वो बाहर सोते हैं. इसलिए ख़तरा बना हुआ है."

वन विभाग लगातार भेड़ियों को पकड़ने में जुटा है. अभी तक तीन भेड़ियों को पकड़ा जा चुका है.

क्या कहना है डीएफ़ओ का

डीएफ़ओ अजीत प्रताप सिंह
इमेज कैप्शन, डीएफ़ओ के मुताबिक़ इस झुंड में एक वयस्क भेड़िया लंगड़ा है, तो हो सकता है कि वो ज़्यादा खूंखार हो. इसलिए उसको पकड़ने की कोशिश की जा रही है

डीएफ़ओ अजीत प्रताप सिंह ने बताया, "हम जल्द ही बाक़ी जानवरों को पकड़ लेंगे. जो तीन जानवर पकड़े गए हैं, उसमें एक की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई है. बाक़ी दोनों को लखनऊ के चिड़ियाघर में भेजा गया है, जिनमें एक नर और मादा है."

उन्होंने बताया, "इस झुंड में एक वयस्क भेड़िया लंगड़ा है, तो हो सकता है कि वो ज़्यादा खूंखार हो. इसलिए उसको पकड़ने की कोशिश की जा रही है."

घास काटकर लौट रहे गाँववालों से भेड़ियों की मौजूदगी के बारे में बीबीसी ने बातचीत की.

इस दौरान एक गाँव वाले ने बताया, "उन्हें तीन भेड़िए दिखे हैं, जिसमें एक लंगड़ा कर चल रहा है और दो अभी अवयस्क लग रहे हैं."

इलाके की देखरेख़ के लिए सरकार ने वन विभाग को 20 लाख रुपए दिए हैं.

डीएफ़ओ के मुताबिक़, भेड़ियों के हमलों में मारे गए लोगों के आश्रितों को सरकार पांच लाख रुपए की आर्थिक सहायता दे रही है, जिनमें चार लाख रुपए प्रशासन की तरफ़ से और एक लाख रुपए वन विभाग की तरफ़ से दिया जा रहा है.

इससे पहले 2020 में भी बहराइच से सटे इलाक़ों में भेड़ियों ने इंसानों पर हमले किए थे.

उस समय की मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, लखीमपुर खीरी ज़िले के धौरहरा में भड़िए के हमले में 21 लोग ज़ख़्मी हो गए थे.

ये सभी हमले दुधवा टाइगर रिजर्व के बफ़र ज़ोन में हुए थे, जिसमें तकरीबन 8 गाँव के लोगों को निशाना बनाया गया था.

ड्रोन पर निर्भरता

ड्रोन से निगरानी
इमेज कैप्शन, इलाके में पानी भरे रहने और गन्ने की फसल बढ़ने के कारण भेड़ियों की तलाश में ड्रोन से काफ़ी मदद मिल रही है

वन विभाग के डीएफओ की निगरानी में बहराइच के रेंज अफ़सर और उनकी टीम ड्रोन के ज़रिए इलाके़े के कछार और गन्ने के खेतों में सुबह से रात तक भेड़ियों को लोकेट करने की कोशिश करती है, जिसमें गाँव-गाँव जाकर किसानों और घास काटने वालों से भी पूछताछ की जाती है.

उनसे ये सुराग पाने की कोशिश रहती है कि क्या उन्हें कोई जानवर तो दिखाई नहीं दिया है.

किसानों से मिली जानकारी के हिसाब से भेड़ियों की मौज़ूदगी के संदेह वाले इलाक़े की घेराबंदी कर उन्हें पकड़ने का प्रयास किया जाता है. साथ ही जानवर को कोई चोट ना लगे इसका ध्यान भी रखा जाता है.

बहराइच के रेंज अफ़सर मोहम्मद साकिब ने बीबीसी को बताया, "इलाक़े में पानी भरा है. गन्ने की फसल भी बढ़ गई है, जिससे भेड़ियों की खोजबीन में परेशानी हो रही है."

"इसके अतिरिक्त ड्रोन भी ओवरहीट हो जाता है तो काम करना बंद कर देता है. तब हम स्थानीय लोगों से मदद लेकर भेड़ियों की घेराबंदी करते हैं. फिर जाल लगाते हैं और पिंजरा भी तैयार रखते हैं ताकि भेड़िया पिंजरे में आ जाए. ये सावधानी भी बरतनी पड़ती है कि कहीं जानवर को चोट ना लग जाए."

उत्तर प्रदेश के वन मंत्री अरुण कुमार सक्सेना ने मानव-वन्यजीव संघर्षों को रोकने के लिए भविष्य में चलाए जाने वाले अभियानों और कार्यक्रमों को लेकर बीबीसी से बात की.

उन्होंने बताया, "उच्च स्तर पर मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए वन विभाग फेंसिंग का भी काम शुरू करने वाला है. इंसानों की जान हानि रोकने के लिए संवेदनशील गांवों की सूची तैयार कर असुरक्षित क्षेत्रों में गूगल मैपिंग के माध्यम से वन्यजीव प्रभावित क्षेत्रों का विश्लेषण कर सुनियोजित तरीक़े से कार्रवाई की जा रही है."

उन्होंने कहा, "समय-समय पर सक्षम स्तर से अनुमति प्राप्त करके पिंजरा लगाकर, उसमें बेंट बंधवाकर संघर्षी वन्यजीव को पकड़ने का प्रयास किया जा रहा है."

इंसानों पर हमले की क्या है असली वजह ?

प्रोफेसर अमिता कनौजिया
इमेज कैप्शन, प्रोफेसर अमिता कनौजिया कहती हैं कि क्लाइमेट चेंज का सीधा असर तो नहीं, लेकिन जैसे बाढ़ आने के कारण हो सकता है भेड़िए आसान भोजन की तलाश में बच्चों को उठा रहे हैं.

इंसानों और भेड़ियों के बीच संघर्ष दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में देखने को मिले हैं. इसको लेकर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है.

अमेरिका के ऊपरी प्रायद्वीप में भी इंसानों और भेड़ियों के बीच संघर्ष देखा गया है.

मिशिगन स्थित डिपार्टमेंट ऑफ़ नेचुरल रिसोर्सेस के वन्यजीव जीवविज्ञानी ब्रायन रॉएल का मानना है कि ऐसे संघर्ष बहुत कम होते हैं.

साप्ताहिक पत्रिका नॉर्देन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में ब्रायन रॉएल कहते हैं, "भेड़िए और अवारा कुत्ते यानी फेरल डॉग्स के बीच टकराव देखा गया है, लेकिन इंसानों पर हमले के मामले बहुत ही कम हैं."

रॉएल भेड़ियों के विशेषज्ञ माने जाते हैं.

वे भेड़िए और पालतू जानवरों के बीच टकराव को लेकर कहते हैं, "ऐसे हमले बहुत कम हैं, ख़ासकर ऊपरी प्रायद्वीप का परिदृश्य काफ़ी बड़ा है और यहाँ कितने सारे पालतू जानवर हैं. ऐसी घटनाएं भेड़ियों के इलाकाई आधिपत्य के कारण होती हैं."

वाइल्ड लाइफ़ एसओएस के मुताबिक़, प्राकृतिक बदलाव की वजह से मौसम और ऋतु पर असर हो रहा है, जिसकी वजह से वन्य जीवों पर भी इसका प्रभाव ब्रीडिंग सीज़न और माइग्रेशन पर देखने को मिल रहा है. इसलिए जंगली जानवरों के साथ मुठभेड़ बढ़ रही है.

इंसानों और जानवरों के बीच टकराव पर बीबीसी ने लखनऊ यूनिवर्सिटी के वाइल्ड लाइफ़ साइंस की समन्वयक प्रोफ़ेसर अमिता कनौजिया से बात की.

उन्होंने कहा, "ये कोई नई बात नहीं है. पहले तो भेड़िए झुंड में रहते हैं और इनका सोशल स्ट्रक्चर बहुत मज़बूत होता है, जिसमें दो से दस जानवर तक रह सकते हैं. ये ब्रीडिंग सीज़न यानी अक्तूबर से पहले सुरक्षित जगह की तलाश करते हैं, फिर अपने बच्चों को वयस्क होने तक पालते हैं और उनको शिकार करना भी सिखाते हैं."

इंसानों पर हमला करने को लेकर प्रोफ़ेसर कनौजिया कहती हैं, "ये इंसान की आबादी की तरफ़ फेरल यानी अवारा कुत्तों की तलाश में रहते हैं और ग़लती से इंसान पर हमला करते हैं. फिर वही आदत बन जाती है."

जब उनसे पूछा गया कि क्या ये क्लाइमेट चेंज की वजह से है, तो प्रोफ़ेसर अमिता कनौजिया ने बताया, "क्लाइमेट चेंज एक धीमी प्रक्रिया है. इसका सीधा असर तो नहीं, लेकिन जैसे बाढ़ आना, ये कारण हो सकता है कि भेड़िए आसान भोजन की तलाश में बच्चों को उठा रहे हैं."

भेड़ियों को लेकर क्यों है विवाद?

भेड़िया
इमेज कैप्शन, एक भेड़िया प्रतिदिन 10-12 घंटे इलाक़े में दौड़ता है, और हर एक झुंड का क्षेत्र बहुत बड़ा होता है

भेड़ियों के इर्द-गिर्द विवाद का एक कारण इसकी आबादी का आकार है.

मिशिगन प्राकृतिक संसाधन विभाग (डीएनआर) ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि अमेरिका के ऊपरी प्रायद्वीप में 631 भेड़िए हैं.

इन आँकड़ों को लेकर डीएनआर में 22 वर्षों से कार्यरत अनुभवी वन्यजीव जीवविज्ञानी क्रिस्टी सितार कहती हैं, "वन्यजीव शिकारी भेड़ियों की जितनी तस्वीरें इकट्ठा करते हैं, उसका मतलब है कि ऊपरी प्रायद्वीप में डीएनआर के अनुमान से ज़्यादा भेड़िए हैं.

हालांकि, यह धारणा ज़रूरी नहीं है कि सच हो.

वन्यजीव जीवविज्ञानी ब्रायन रोएल कहते हैं, "भेड़िये झुंड में वापस आने से पहले कई दिनों तक अलग-अलग जगहों पर घूमते रहते हैं. भेड़िए प्रकृति के सबसे बेहतरीन लंबी दूरी के जॉगर हैं."

वे कहते हैं, "एक भेड़िया प्रतिदिन 10-12 घंटे इलाक़े में दौड़ता है, और हर एक झुंड का क्षेत्र बहुत बड़ा होता है."

साथ ही भेड़ियों की तस्वीरें कहाँ खींची जा रही हैं, इसका भी मामला है.

रॉयल कहते हैं, "भेड़िए पगडंडियों, सड़कों और दो-पथों पर चलते हैं, क्योंकि वहाँ से गुज़रना आसान होता है, लेकिन ये वही जगहें हैं जहां शिकारी ट्रेल कैमरे लगाते हैं, जिससे भेड़ियों की तस्वीरें लेने की संभावना अधिक होती है. बजाय इसके कि कैमरे घने जंगल और घनी झाड़ियों के बीच लगाए जाएं."

इन सब के बीच एक ही भेड़िये के झुंड की तस्वीर बार-बार लेने से भी संख्या को लेकर विवाद होता है.

रॉएल कहते हैं, "एक ही इलाक़े में रहने वाले कुछ ज़मीन मालिक भेड़ियों की 40 तस्वीरें खींचते हैं. वे संभवतः चार से पांच भेड़ियों के एक ही झुंड को देखते हैं, ना कि 40 अलग-अलग भेड़ियों को."

भेड़ियों पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की राय

दुनिया भर में भेड़ियों के हमलों में एक महत्वपूर्ण बात निकल कर आई है. इन हमलों के पीछे रेबीज बड़ा कारण है.

नॉर्वेजियन प्रकृति अनुसंधान संस्थान की एनआईएनए रिपोर्ट की हवाले से इंटरनेशनल वुल्फ़ सेंटर ने लिखा, "वर्ष 2002 से 2020 तक पूरी दुनिया में भेड़ियों के 489 हमले हुए हैं, जिसमें 78 फ़ीसदी यानी 380 रेबीज़ की वजह से हुए थे."

इसके अलावा 67 हमले शिकार के लिए किए गए थे. जबकि 42 हमले सुरक्षा या उकसावे की वजह से भेड़ियों ने किया था.

इंटरनेशनल वुल्फ़ सेंटर के मुताबिक़, तकरीबन 400 से लेकर 1100 भेड़िए हिमालय की तलहटी में रह रहे हैं. वहीं 4000 से लेकर 6000 भेड़िए उपमहाद्वीप में रह रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में 1996-97 के दौरान भेड़ियों के हमलों पर सैन फ्रांसिस्को स्थित लाइव जर्नल ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है.

इस रिपोर्ट में कहा गया है, "एक सितंबर 1996 तक उत्तर प्रदेश में भेड़ियों के हमलों में 33 बच्चे मारे गए थे. वहीं 20 बच्चे गंभीर रूप से घायल हो गए थे."

इस दौरान 10 भेड़िए भी मारे गए थे.

रिपोर्ट के मुताबिक, 1996-97 के दौरान भेड़ियों ने 74 लोगों को अपना निशाना बनाया था, इनमें से ज़्यादातर 10 साल से कम उम्र के बच्चे थे.

इस रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि 1878 में भेड़ियों के हमलों से सबसे ज़्यादा नुक़सान हुआ था, जब एक साल में 624 लोग भेड़िए का शिकार हुए थे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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