अखिलेश यादव ने माताप्रसाद पांडे को विपक्ष का नेता बनाकर क्या योगी आदित्यनाथ को दिया है संदेश?

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- Author, सैय्यद मोज़िज़ इमाम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
समाजवादी पार्टी ने 81 वर्षीय माताप्रसाद पांडे को उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया है.
पांडे पहले विधानसभा के अध्यक्ष रह चुके हैं और सात बार इटवा (सिद्धार्थनगर) से विधायक भी रहे हैं.
वे पुराने समाजवादी और मुलायम सिंह यादव के साथी भी रहे हैं. इसके अलावा महबूब अली, कमाल अख़्तर और राकेश वर्मा को अलग-अलग ज़िम्मेदारी दी गई है.
नेता विपक्ष का पद पहले ख़ुद अखिलेश यादव के पास था, लेकिन लोकसभा चुनाव में सांसद निर्वाचित होने की वजह से उन्होंने ये पद छोड़ दिया है.

इसके बाद ये क़यास लगाए जा रहे थे कि ये पद घर में रहेगा या बाहर वाले को मिलेगा लेकिन इस बार अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल यादव की जगह बुज़ुर्ग माताप्रसाद पांडे को चुना है.
इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं. इसे ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है.
हालाँकि इस चुनाव पर मायावती ने अखिलेश यादव की आलोचना की है. वहीं सहयोगी कांग्रेस इसे समाजवादी पार्टी का अंदरूनी मसला बता रही है और इस फ़ैसले की तारीफ़ कर रही है.
कौन हैं माताप्रसाद पांडे

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माताप्रसाद पांडे प्रदेश के सिद्धार्थनगर ज़िले से आते हैं और सातवीं बार विधानसभा में पहुँचे हैं और इटावा से विधायक हैं.
वे पहली बार 1980 में लोकदल से विधायक चुने गए थे फिर कई बार विधायक रहे. साल 2002 से वो समाजवादी पार्टी से विधायक हैं सिवाय 2017 में, जब वो चुनाव हार गए थे.
मुलायम सिंह यादव जब मुख्यमंत्री थे, तब वो विधानसभा के स्पीकर थे और फिर अखिलेश यादव ने भी अपने कार्यकाल में उन्हें स्पीकर का पद दिया था.
कांग्रेस के पूर्व एमएलसी और गांधी परिवार के क़रीबी दीपक सिंह ने इस फ़ैसले की तारीफ़ की और कहा, “ये अच्छा फ़ैसला है और उनके अनुभव का लाभ विपक्ष को मिलता रहेगा. जनता के सरोकार के मुद्दे प्रभावी ढंग से उठाएँगे. जहाँ तक पीडीए का फ़ॉर्मूला है, इंडिया अलायंस हमेशा दबे हुए समाज के उत्थान के लिए काम करता रहेगा.”
मॉनसून सत्र के पहले दिन यूपी की विधानसभा में पांडे की अगुवाई में समाजवादी पार्टी के विधायकों ने बाढ़, क़ानून व्यवस्था, बिजली की क़िल्लत का मसला उठाया और वेल तक गए.
इससे पहले माताप्रसाद पांडे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मिले.
समाजवादी पार्टी के दो ब्राह्मण विधायक राज्यसभा चुनाव से पहले बग़ावत कर चुके हैं. इनमें ऊँचाहार से विधायक और पार्टी के मुख्य सचेतक रहे मनोज पांडे बीजेपी समर्थित उम्मीदवार के पक्ष में और अंबेडकर नगर से दूसरे विधायक राकेश पांडे ने भी राज्यसभा चुनाव में पाला बदल लिया था.
ब्राह्मण क्यों हैं महत्वपूर्ण?

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों की भूमिका काफ़ी प्रभावशाली रही है. इस कारण चुनाव में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है.
नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़- उत्तर प्रदेश में तक़रीबन 12 से 14 फ़ीसदी वोट ब्राह्मणों का है.
साथ ही ये क़रीब 115 विधानसभा सीटों पर प्रभावशाली संख्या में हैं. वहीं तक़रीबन 12 ज़िलों में ये 15 फ़ीसदी से ज़्यादा हैं.
उत्तर प्रदेश में अब तक 21 मुख्यमंत्री हुए हैं, जिनमें छह ब्राह्मण रहे हैं. तीन बार नरायण दत्त तिवारी कांग्रेस से मुख्यमंत्री रहे हैं.
हालाँकि उनके बाद कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बन पाया है. कल्याण सिंह, मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव पिछड़ी जाति से थे.
जबकि राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथ राजपूत हैं. राम प्रकाश गुप्ता वैश्य थे, वहीं मायावती दलित समाज से आती हैं.

अखिलेश यादव के इस फ़ैसले की मायावती ने आलोचना की है.
उन्होंने कहा, "सपा मुखिया ने लोकसभा चुनाव में ख़ासकर संविधान बचाने की आड़ में पीडीए को गुमराह करके उनका वोट ज़रूर ले लिया है लेकिन यूपी विधानसभा में प्रतिपक्ष नेता बनाने में इनकी उपेक्षा की गई है."
"ये भी सोचने की बात है, जबकि सपा में एक जाति विशेष को छोड़कर पीडीए के लिए कोई जगह नहीं है. ब्राह्मण समाज की तो क़तई नहीं क्योंकि सपा व भाजपा सरकारों में इनका उत्पीड़न व उपेक्षा हुई है वह आंसू से छिपा नहीं है, वास्तव में इनका विकास व उत्थान केवल बीएसपी सरकार में ही हुआ है. अत: ये लोग ज़रूर सावधान रहें.”
दरअसल मायावती को 2007 के विधानसभा चुनाव में इस समाज का वोट मिला था और कई दशक के बाद प्रदेश में बहुमत की सरकार बनी थी. जिसके बाद इस समाज ने बीजेपी की तरफ़ रुख़ कर किया है.

बीजेपी के प्रदेश के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं, "कहाँ है पीडीए फ़ॉर्मूला. शिवपाल सिंह यादव को इसलिए किनारे लगाया गया क्योंकि अखिलेश यादव नहीं चाहते कि उनको कोई चुनौती दे पाए इसलिए ऐसे व्यक्ति का चुनाव किया गया है जिनकी राजनीति ख़त्म हो गई है. जबकि शिवपाल सिंह के नेता विपक्ष रहने के बाद 2012 में समाजवादी पार्टी ने बहुमत की सरकार बनाई थी.”
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मोहम्मद आज़म खान बीजेपी और बीएसपी के इस सवाल को जायज़ नहीं मानते हैं.
वो कहते हैं, "माताप्रसाद पांडे का चयन एकदम सहीं है क्योंकि ये समाजवादी मूल्यों के पैरोकार करने वाले नेता हैं और बहुत ही अनुभवी हैं. समाजवादी पार्टी के विरोधी हर बात का मुद्दा बनाते. अगर किसी और को बनाते तो भी सवाल खड़ा करते. अगर दलित को बनाते तो पूछते पिछड़े को क्यों नहीं बनाया और अगर पिछड़े को बनाते तो पूछा जाता कि दलित को क्यों नहीं बनाया."
"जबकि समाजवादी पार्टी में जनेश्वर मिश्रा जैसे क़द्दावर नेता रहे हैं और पार्टी हमेशा समाजवाद की ही राजनीति करती रहेगी चाहे बीजेपी को अच्छा लगे या ना लगे.”
क्या अखिलेश भूल गए हैं पीडीए फ़ॉर्मूला?

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मायावती और बीजेपी की आलोचना के उलट समाजवादी पार्टी बेपरवाह है. पार्टी का कहना है कि पीडीए के फ़ॉर्मूले पर पार्टी चल रही है.
अगर माताप्रसाद पांडे विपक्ष के नेता हैं, तो पार्टी में इंद्रजीत सरोज और रामअचल राजभर जैसे नेता हैं. कमाल अख़्तर सचेतक, तो राकेश वर्मा उपमुख्य सचेतक हैं.
दैनिक भास्कर के वरिष्ठ पत्रकार विजय उपाध्याय का कहना है, "पीडीए का एजेंडा फ़ीका नहीं पड़ा है बल्कि समाजवादी पार्टी ने इस समाज को ये मैसेज दिया है कि जो लोग बीजेपी को नापसंद करते हैं वो कांग्रेस में ना जाएं बल्कि सपा में आ जाएँ."
"क्योंकि जिस तरह से ब्राह्मणों का अब बीजेपी से दूर होना शुरू हुआ है, उसका फ़ायदा कांग्रेस को ना मिले.1931 के जनगणना के हिसाब से ये समाज अल्पसंख्यक के बाद दूसरे नंबर पर है. जहाँ तक शिवपाल यादव को ना बनाने का प्रश्न है उसकी वजह ये है कि शिवपाल जब अखिलेश से अलग थे, तो योगी की कई बार तारीफ़ कर चुके हैं, हालाँकि उनकी हैसियत सदन में कम नहीं होगी.”
लखनऊ में यूपी की राजनीति के विशेषज्ञ माने जाने वाले शरत प्रधान का कहना है, "माताप्रसाद पांडे ओल्ड टाइमर हैं और वो समाजवादी पार्टी को गहराई से समझते भी हैं इसलिए उनको बनाने का मक़सद एक बैलेंस बनाना है और अपर कास्ट को ख़ासकर ब्राह्मण को एक मैसेज भी देना है कि समाजवादी पार्टी में उनके लिए जगह है. वहीं पीडीए में इसको लेकर बीजेपी एक भ्रम फैलाना चाह रही है, जबकि पीडीए का फ़ॉर्मूला अभी समाजवादी पार्टी के साथ है.”
क्या है पीडीए

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अखिलेश यादव ने लोकसभा चुनाव से पहले पीडीए यानि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का नारा दिया था.
हालांकि कई बार अखिलेश ने इस नारे की परिभाषा बदली है लेकिन फ़ोकस इन तीन समुदाय के लोगों पर रहा है.
इसका फ़ायदा समाजवादी पार्टी को लोकसभा चुनाव में मिला है.
इस साल हुए लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीती हैं. जानकार मानते हैं कि इस जीत में पीडीए फ़ॉर्मुले की खासी भूमिका रही है.
बीजेपी को लोकसभा चुनावों में नुक़सान हुआ है और सिर्फ 33 सीट जीत पाई.
चुनावों के नतीजे आने के बाद से ही राज्य में ओबीसी वोट के लिए बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच रस्साकशी चल रही है.
बीजेपी ने इसको फिर से पाने के लिए कवायद शुरू कर दी है. पार्टी ने 29 जुलाई को ओबीसी मोर्चा की बैठक बुलाई है.
पूर्वांचल में ठाकुर बनाम ब्राह्मण की पुरानी अदावत

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80-90 के दशक में पूर्वांचल में हरिशंकर तिवारी जैसे बाहुबली नेता का वर्चस्व था, वहीं ठाकुर वीरेंद्र प्रताप शाही इसकी काट के तौर पर थे.
लेकिन शाही की हत्या के बाद तिवारी का वर्चस्व क़ायम रहा.
बीच में जब वीर बहादुर सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तो उनके विरोधियों ने हरिशंकर तिवारी को राजनीति में आगे बढ़ाया.
बाद में अमरमणि त्रिपाठी ब्राह्मणों के नेता के तौर पर उभरे, लेकिन तिवारी की मौत और त्रिपाठी के जेल जाने के बाद इस इलाक़े में ब्राह्मण कमज़ोर हो गए.
योगी आदित्यनाथ के मठ से राजनीति में आने और मुख्यमंत्री बनने के बाद ठाकुरों का वर्चस्व राजनीति में बढ़ा है, हालाँकि बीजेपी के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी इसे नहीं मानते.
वे कहते हैं, "जहाँ तक ब्राह्मण बाहुल्य सीटों की बात है, देवरिया, कुशीनगर, गोरखपुर, डुमरियागंज और गोंडा जैसी सीटें बीजेपी के पक्ष में हैं और अब कोई ठाकुर बनाम ब्राह्मण की लड़ाई नहीं है. पीडीए का सिर्फ़ अलाप हो रहा है कि कभी वो अल्पसंख्यक हो जाता है तो कभी अगड़ा. इसलिए पार्टी में ही भ्रम है, सिद्धार्थ नगर की लोकसभा सीट बीजेपी ने जीती है जहाँ से पांडेजी भी आते हैं.”
इस सीट पर ठाकुर जगदंबिका पाल ने ब्राह्मण कुशल तिवारी को हराया, जो हरिशंकर तिवारी के पुत्र हैं और समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार थे.
यूपी में 2027 में विधानसभा का चुनाव है. उससे पहले समाजवादी पार्टी बीजेपी की अगड़ी जातियों के वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास कर रही है.
वहीं बीजेपी पीडीए के फ़ॉर्मूले के काट के लिए पिछड़ी जातियों का वोट फिर से वापस लाने के लिए लगातार कवायद कर रही है.
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