उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ बीजेपी के ओबीसी नेताओं की कश्मकश

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- Author, सैय्यद मोज़िज़ इमाम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही उत्तर प्रदेश में राजनीतिक गहमागहमी लगातार बढ़ रही है. बीजेपी अपने दम पर सरकार बनाने के लिए बहुमत हासिल करने में नाकाम रही और इसमें सबसे बड़ी भूमिका रही उत्तर प्रदेश की.
एक समय उत्तर प्रदेश में अपना वर्चस्व स्थापित करने वाली पार्टी बीजेपी इस लोकसभा चुनाव में दूसरे नंबर पर खिसक गई. समाजवादी पार्टी ने बीजेपी से ज़्यादा सीटें हासिल की. इसी के साथ बीजेपी में समीक्षा और चिंतन का दौर शुरू हुआ और कहीं न कहीं निशाने पर आ गए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ.
लोकसभा चुनाव के नतीजे ने ओबीसी वोट को लेकर बीजेपी की चिंता बढ़ा दी है. ओबीसी और दलित मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी से खिसक गया है.
इन सबके बीच उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य भी काफ़ी सक्रिय हो गए हैं. माना जा रहा है कि बीजेपी के अंदर ओबीसी नेता काफ़ी चिंतित हैं.

लामबंद हो रहे नेता

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हाल ही में यूपी के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की एक चिट्ठी वायरल हो रही है, जिसमें मौर्य ने कार्मिक विभाग से जानकारी माँगी है कि संविदा और आउटसोर्सिंग के ज़रिए भर्ती किए जा रहे कर्मचारियों में किस तरह आरक्षण दिया जा रहा है.
ये विभाग मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पास है और माना जा रहा है कि मौर्य ने आरक्षण के ज़रिए मुख्यमंत्री पर निशाना साधा है.
हालाँकि केशव प्रसाद मौर्य के सवाल के बाद यूपी के सूचना विभाग ने आँकड़े जारी किए हैं.
इसमें बताया गया है कि 512 आउटसोर्स्ड कर्मचारी विभाग में लिए गए है, जिसमें 75 फ़ीसदी यानी 340 ओबीसी वर्ग के हैं. मौर्य के ऑफ़िस में विरोधी ख़ेमे के नेताओं का जमावड़ा लग रहा है.
मिलने वालों में विधायक, मंत्री, सांसद और पूर्व सांसद हैं. बीजेपी के सहयोगी ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद भी मौर्य से मिले हैं, इसके अलावा दारा सिंह चौहान ने भी मौर्य से मुलाक़ात की है.
इसके जवाब में योगी आदित्यनाथ अपने ख़ेमे के ओबीसी नेताओं से मुलाक़ात कर रहे हैं.
बुधवार को सीएम योगी ने नरेंद्र कश्यप से मुलाक़ात की जो पिछड़ा वर्ग मंत्री हैं. इसके अलावा वे राज्य मंत्री रामकेश निषाद और रानीगंज के विधायक राकेश कुमार वर्मा से भी मिले हैं.
चुनाव के नतीजों के बाद बीजेपी के ओबीसी नेताओं में बेचैनी है. वजह स्पष्ट है कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी से ग़ैर यादव ओबीसी छिटक गया है.
योगी विरोधी ओबीसी नेता लामबंद हो रहे हैं और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य खुलकर बैटिंग कर रहे हैं. उनके निशाने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं, क्योंकि ओबीसी नेता हार के लिए योगी को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं और अपनी साख बचाने की क़वायद में लगे हैं.

बीजेपी के कुर्मी, मौर्य, राजभर और पासी समाज के नेता परेशान दिखाई दे रहे हैं. बीजेपी से इस चुनाव में ये वर्ग ख़ासा दूर हुआ है जिसका नतीजों पर असर पड़ा है. ये वर्ग साल 2014 से बीजेपी के साथ था और साल 2022 तक एकजुट तरीक़े से बीजेपी के जीत में अहम भूमिका निभाता रहा.
लेकिन अब ये वर्ग दूर हो रहा है. बीजेपी और इन नेताओं के सामने चुनौती है कि कैसे इस वर्ग को वापस लाया जाए.
बीजेपी ने ओबीसी विभाग की बैठक बुलाकर नेताओं से कहा है कि वो अपने समाज को फिर से पार्टी के साथ जोड़ें. लेकिन ये रास्ता इतना आसान नहीं है.
बीजेपी की मुश्किल पर वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया कहते हैं "ओबीसी का मतलब ग्रुप ऑफ़ कास्ट है. बीजेपी ने इनको अपनी राजनीति के हिसाब से जोड़ा था, लेकिन कोई एजेंडा नहीं बनाया बल्कि इनमें से कुछ को प्रतिनिधि बनाया, जबकि प्रतिनिधि और प्रतिनिधित्व में फ़र्क है क्योंकि जो समाज के मुद्दे थे वो हाशिए पर चले गए. इसकी वजह बीजेपी की विचारधारा है जो आड़े आ रही थी. इसलिए बीजेपी ने अलग-अलग जातियों को अपने हिसाब से जोड़ा था ना कि एकमुश्त योजना बनाकर ओबीसी को अपने साथ लेकर आए थे."
लेकिन दूसरी ओर मुख्यमंत्री से बुधवार को मिलने वाले पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री और बीजेपी के ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष नरेंद्र कश्यप ने बीबीसी से कहा, "ओबीसी बीजेपी के पक्ष में लामबंद हो रहा है. इसके लिए ज़मीनी काम शुरू हो गया है."
उन्होंने कहा, "29 जुलाई को बीजेपी के ओबीसी विभाग की बैठक बुलाई गई है, जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दोनों उप मुख्यमंत्री हिस्सा लेंगे. संगठन की पूरी क़वायद है कि साल 2024 के चुनाव में जो कमी रह गई है, उसको पूरा किया जाए. ये सतत प्रक्रिया है जो साल 2027 के चुनाव तक चलेगी. इसके लिए हम अपने लोगों के बीच जाकर संवाद स्थापित करेंगे."
कश्यप ने मौर्य की आरक्षण वाली चिट्ठी का जवाब देते हुए कहा, "अभी संविदा और आउटसोर्सिंग पर आरक्षण लागू नहीं है. ऐसे में सिर्फ़ सरकारी नौकरी में ही ये लागू हो सकता है, हालांकि अगर ऐसा होता है तो पिछड़ी जातियों के लिए अच्छा रहेगा."

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ओबीसी वोट और बीजेपी

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ओबीसी मतदाताओं ने दो लोकसभा चुनाव और दो विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत में अहम योगदान दिया है.
लेकिन साल 2024 आते-आते ख़तरे की घंटी बज गई है. अब यह ग़ैर यादव ओबीसी दूसरी तरफ़ देख रहा है.इसकी वजह से बीजेपी के ओबीसी नेता भी बेचैन हैं.
सीएसडीएस लोकनीति के सर्वे में बताया गया है कि बीजेपी को ऊँची जातियों का वोट 79 फ़ीसदी मिला. वहीं इंडिया गठबंधन को सिर्फ़ 16 फ़ीसदी वोट मिले.
लेकिन इंडिया गठबंधन ने ओबीसी वोट में बढ़त बनाई. ओबीसी वोटर्स ने संविधान,आरक्षण और बेरोज़गारी के मुद्दे पर वोट किया है.
सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक़ इस चुनाव में बीजेपी को कोरी-कुर्मी का 61 फ़ीसदी वोट मिला लेकिन ये पिछली बार से 19 फ़ीसदी कम है.
वही ग़ैर यादव ओबीसी का 59 फ़ीसदी वोट मिला है जो पिछली बार से 13 फ़ीसदी कम है .ग़ैर जाटव दलित वोट बीजेपी को 29 फ़ीसदी मिला है जो पिछली बार से 19 फ़ीसदी कम है.
साल 2019 के चुनाव में बीजेपी ने 62 लोकसभा सीट अकेले ही जीती थी, लेकिन साल 2024 में सिर्फ़ 33 सीट जीत पाई है.
इस पर पिछड़ा वर्ग मंत्री नरेंद्र कश्यप का कहना है कि पार्टी अपने नेताओं को फिर से प्रशिक्षित करके इस वर्ग को जोड़ने की कोशिश करेगी. कश्यप किसी भी तरह के अंदरूनी कलह से इनकार कर रहे हैं.
सोमवार को योगी आदित्यनाथ की मीटिंग में बीजेपी के सहयोगी ओमप्रकाश राजभर नहीं गए. वे केशव प्रसाद मौर्य से लखनऊ में मिले.
जल्द ही उत्तर प्रदेश में 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने जा रहा है. जिनमें अयोध्या की मिल्कीपुर सीट और आंबेडकर नगर की कटेहरी सीट भी है, जहाँ से लालजी वर्मा सांसद चुने गए हैं वही मिल्कीपुर से विधायक रहे अवधेश प्रसाद फ़ैज़ाबाद सीट से सांसद चुने गए हैं.
यही नहीं, समाजवादी पार्टी के पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक (पीडीए) कार्ड से सुल्तानपुर, मछली शहर, आज़मगढ़, कौशांबी और प्रयागराज में भी बीजेपी को हार का मुंह देखना पड़ा.
गाज़ीपुर बलिया भी पार्टी के हाथ से चली गई बस्ती और श्रावस्ती में भी पिछड़ी जाति के नेता समाजवादी पार्टी से सांसद चुने गए.

मौर्य की महत्वाकांक्षा

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केशव प्रसाद मौर्य की अपनी महत्वाकांक्षा है. साल 2017 में वो प्रदेश के अध्यक्ष थे. उनकी अगुवाई में चुनाव लड़ा गया था, लेकिन बाज़ी योगी आदित्यनाथ के हाथ लगी.
लेकिन पाँच साल में मौर्य का जलवा कम नहीं रहा. वे पीडब्ल्यूडी जैसे विभाग के मंत्री थे, लेकिन साल 2022 के चुनाव में सिराथू से चुनाव हार गए. उनको पार्टी ने उपमुख्यमंत्री तो बनाया लेकिन मंत्रालय बदल दिया तभी से मौर्य नाराज़ है.
जितिन प्रसाद के केंद्र में मंत्री बन जाने की वजह से पीडब्ल्यूडी विभाग ख़ाली हो गया है, लेकिन अभी तक ये मौर्य को नहीं मिल पाया है. मौर्य के संगठन वाले बयान को इस चश्मे से भी देखा जा रहा है कि वो मुख्यमंत्री को दबाव में लेना चाहते है.
राजनीतिक जानकार रतन मणिलाल का कहना है, "बीजेपी ने साल 2014 के चुनाव से सभी जातियों को आकर्षित किया है, लेकिन वो हिंदुत्व के आवरण से बाहर नहीं आ पाई है. ये जातियाँ चाहती हैं कि उनको हिंदू वोट बैंक की जगह अपनी जाति के साथ जाना जाए."
उन्होने आगे कहा, "केशव मौर्य आरक्षण की बात करके जाति का महत्व जताना चाहते है. जातिगत आधार पर पहचान मिले और नेतृत्व का मौक़ा मिले ये सभी चाहते हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल सकती है. हाँ, आगे कुछ मिल सकता है."
केशव प्रसाद मौर्य संगठन के ही नेता हैं. वह धीरे-धीरे संगठन के ज़रिए आगे बढ़े हैं. वहीं योगी आदित्यनाथ महंत अवैद्य नाथ की विरासत को संभाल रहे हैं. वह उनकी जगह सीधे सांसद चुने गए और लगातार पाँच बार सांसद भी रहे.

'ओबीसी नेताओं पास नहीं है जनाधार'

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता उदयवीर सिंह ने कहा, "भारतीय जनता पार्टी ने ओबीसी के मास लीडर्स को ख़त्म किया है और संगठन के ज़रिए आए नेताओं को ज़्यादा तवज्जो दी है. कल्याण सिंह और उमा भारती जैसे नेताओं को पार्टी ने किनारे लगाया, जिसके बाद से बीजेपी के पास जनाधार वाले कोई ओबीसी नेता नहीं हैं."
उन्होंने कहा, "बीजेपी के सभी नेता हिंदुत्व की विचारधारा की वजह से पार्टी में किसी तरह रह रहे हैं और सिर्फ मुखौटे के तौर पर काम कर रहे हैं. जनाधारविहीन होने की वजह से वो सभी पार्टी पर निर्भर हैं. इसलिए उनके साथ कोई नहीं आ रहा है, नहीं तो अखिलेश यादव का खुला ऑफर उनके पास था. वो चाहते तो फ़ायदा उठा सकते थे."
बीजेपी के नेताओं में मनमुटाव ज़रूर केशव प्रसाद मौर्य के बयान से शुरू हुआ है, लेकिन यह मामला काफ़ी गंभीर है इसलिए बीजेपी के नेताओं ने इसको दबाने की कोशिश भी की है.
पार्टी ने कई राउंड में नेताओं से बातचीत की है. ख़ासकर प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी और केशव प्रसाद मौर्य की केंद्रीय नेतृत्व से बात हुई है और जहाँ सभी को साथ काम करने की नसीहत दी गई है.
हालांकि कांग्रेस के प्रवक्ता अनिल यादव ने कहा, "अब बीजेपी, ओबीसी नेताओं से जवाब मांग रही हैं. उनका कहना है की साल 2024 के चुनाव में ओबीसी वोट न मिलने की वजह से बीजेपी को भारी नुक़सान हुआ है. पार्टी के ओबीसी नेता अपने समुदाय का वोट बीजेपी को नहीं दिला पा रहे हैं. यह वोट अब इंडिया गठबंधन के पास जा रहा है."
उन्होंने कहा, "साल 2014, 2017, 2019 और साल 2022 के चुनाव में बीजेपी पिछड़ों की वज़ह से चुनाव जीती, लेकिन जब सामाजिक न्याय की बात आई तो पार्टी मुकर गई. अब पिछड़ा वर्ग बीजेपी से जवाब मांग रहा है, इसलिए बीजेपी और उनके ओबीसी नेता घबराए हुए हैं."
लोकसभा चुनाव में क्या हुआ

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लोकसभा चुनाव के नतीजे पर गौर करें तो विपक्ष ने ज़्यादा ओबीसी प्रत्याशी खड़े किए जिसके नुक़सान बीजेपी को हुआ है.
उत्तर प्रदेश में इंडिया गठबंधन के 43 एमपी विपक्षी चुने गए हैं. उनमें करीब 21 ओबीसी, 9 दलित, पाँच मुस्लिम और आठ ऊँची जाति से हैं.
वहीं एनडीए के 36 सांसदों में सबसे ज़्यादा 15 सासंद ऊँची जातियों के चुने गए हैं. ओबीसी के 13 और दलित समाज के आठ सांसद चुने गए हैं.
अब देखना ये है कि ओबीसी नेताओं और मतदाताओं को लेकर बीजेपी में खींचतान कहाँ जाकर रुकती है.
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