हाथरस हादसा: अस्पतालों ने कहा, 'सच ये है कि हम तैयार नहीं थे'- बीबीसी पड़ताल

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- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, हाथरस, उत्तर प्रदेश से
तारीख़- दो जुलाई 2024. जगह- यूपी का हाथरस. नारायण साकार हरि उर्फ़ भोले बाबा यानी सूरज पाल जाटव के सत्संग के बाद मची भगदड़ में 120 से ज़्यादा लोगों की जान गई.
आयोजकों ने प्रशासन से अनुमति ली थी मगर सत्संग में 80 हज़ार से ज़्यादा लोग पहुँचे.
सत्संग के आयोजकों पर शर्तों को ना मानने और श्रद्धालुओं की मदद ना करने का आरोप है. इस आरोप को आयोजक ख़ारिज करते हैं.
हाथरस हादसे में 120 से ज़्यादा लोगों की मौत की एक बड़ी वजह घायलों को सही समय पर इलाज नहीं मिल पाना रहा.
आख़िर घायलों को वक़्त पर इलाज क्यों नहीं मिल पाया? क्या आस-पास के अस्पताल इतनी बड़ी संख्या में लोगों का इलाज करने की स्थिति में थे?
क्या ज़िला अस्पताल को इस आयोजन की पहले से जानकारी थी और आपातकालीन संकट के दौरान क्या कुछ और हो सकता था, इन्हीं सवालों को जानने की कोशिश बीबीसी ने इस पड़ताल में की है.

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तय संख्या से ज़्यादा लोग सत्संग में हुए शामिल
हाथरस में हुए इस सत्संग का आयोजन राष्ट्रीय राजमार्ग 34 (पहले का नाम जीटी रोड हाईवे ) के नज़दीक किया गया था. इसके लिए प्रशासन से अनुमति ली गई थी.
पुलिस की दर्ज एफ़आईआर के मुताबिक़, आयोजकों का कहना था कि इस सत्संग में 80 हज़ार लोग शिरकत कर सकते हैं. उन्होंने प्रशासन से मदद भी मांगी थी.
पुलिस की एफ़आईआर में कहा गया है कि सत्संग में इससे तीन गुना अधिक लोग शामिल हुए.
आयोजकों पर आरोप है कि अनुमति की शर्तों का पालन नहीं किया गया और जब मामला गंभीर होने लगा तो श्रद्धालुओं की मदद नहीं की गई.
हालांकि आयोजकों का कहना है कि वे पुलिस की इस बात से सहमत नहीं हैं.
जिस जगह पर सत्संग का आयोजन किया गया, वहां से नज़दीकी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा केंद्र छह किलोमीटर दूर है. ये है सिकंद्राराऊ में मौजूद सरकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र यानी सीएचसी.
30 बेड का ये अस्पताल मुख्य सड़क से थोड़ी दूरी पर है. स्वास्थ्य केंद्र के परिसर में कुछ कर्मचारियों के क्वार्टर भी हैं. दो जुलाई के हादसे के बाद घायलों को सबसे पहले यहीं मदद मिली.

सिकंद्राराऊ अस्पताल को नहीं थी आयोजन की जानकारी
हादसे में घायल हुए लोगों को दो जुलाई की दोपहर दो बजे के बाद सबसे पहले यहीं लाया गया था. उस दिन अस्पताल के परिसर में बड़ी तादाद में मृतकों और घायलों को देखा जा सकता था.
शुक्रवार को हमारी मुलाक़ात अलीगढ़ मंडल के स्वास्थ्य विभाग के अपर निदेशक डॉक्टर मोहन झा से हुई, वो हाथरस समेत चार ज़िलों में सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मसले देखते हैं.
उन्होंने बताया, "सिकंद्राराऊ अस्पताल में सबसे पहले तीन बच्चों के शवों को लाया गया. डॉक्टरों ने जानकारी के लिए पुलिस को फ़ोन किया, फ़ोन पर पुलिस ने उन्हें घटना के बारे में बताया और उन्हें पता चला कि असल में मामला क्या है. हमारे कर्मचारी साथ आए और हमने सभी डॉक्टरों, नर्सों और छुट्टी पर गए लोगों को तुरंत वापस बुलाया."
बीबीसी ने अस्पताल में कुछ वक़्त बिताया और यहां मौजूद लोगों से बात की.
अस्पताल के कर्मचारियों ने हमें बताया कि दो जुलाई को उन्हें जो अनुभव हुआ, उसने उन्हें भीतर तक हिला कर रख दिया.
एक कर्मचारी ने कहा, "सोचिए लगातार बड़ी संख्या में मृत और बेहोश लोगों के बीच से गुज़रते हुए ये देखना कि किसकी सांस अभी भी चल रही है और तुरंत उसके लिए इलाज की व्यवस्था करना."
अस्पताल के कर्मचारियों की स्थिति देखकर आसपास के निजी अस्पताल से डॉक्टर भी मदद के लिए आगे आए.
हाथरस हादसे पर बीबीसी की ख़ास रिपोर्ट्स


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हाथरस ज़िला अस्पताल का हाल
इस सरकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में हमने जिस किसी से भी बात की, उन्होंने बताया कि उन्हें इतनी बड़ी संख्या में लोगों के जमावड़े के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.
उन्होंने बताया कि अगर पहले से इसकी ख़बर होती तो बेहतर तैयारी होती.
एक कर्मचारी ने कहा, "हमने जो सबसे बेहतर हो सकता था, किया. लेकिन सच ये है कि हम लोग तैयार नहीं थे. यहां तक कि ये अस्पताल भी इतनी बड़ी संख्या में मरीज़ों को संभालने में सक्षम नहीं हैं."
मंगलवार दोपहर तक अधिकारियों को ये अंदाज़ा हो गया कि अकेले सीएचसी इतनी बड़ी संख्या में मरीज़ों का इलाज कर पाने में असमर्थ है.
अधिकारी लगातार नज़दीकी सरकारी अस्पतालों को फ़ोन करने लगे. उन्होंने अस्पतालों से कहा कि वो मृतकों और घायलों के लिए तैयार रहें.
इससे पहले हाथरस ज़िला अस्पताल समेत किसी भी अस्पताल को ये जानकारी नहीं दी गई थी कि हाथरस में एक सत्संग का आयोजन हो रहा है जिसमें हज़ारों लोगों के आने की उम्मीद है.
हाथरस ज़िला अस्पताल के मेडिकल सूपरिटेंडेंट डॉक्टर सूर्य प्रकाश कहते हैं, "न तो हमारी किसी टीम को तैनात किया गया था और न ही हमें पहले से कोई जानकारी दी गई थी. घटना होने के बाद हमें इसके बारे में जानकारी मिली."
पुलिस की रिपोर्ट के बावजूद, ज़मीनी स्तर पर आयोजकों का दावा है कि उन्हें ज़रूरी मेडिकल मदद उपलब्ध थी.
ख़ुद को धर्मगुरु कहने वाले सूरजपाल जाटव के वकील एपी सिंह का कहना है, "हमने लोगों का इलाज किया और जो लोग गंभीर रूप से घायल थे, उन्हें अस्पताल भेजा गया. मुझे सही आंकड़ा तो नहीं पता, लेकिन मैं कह सकता हूं कि वहां हमारे साथ डॉक्टर और नर्सें थीं."

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अगर ये सत्संग ना होकर राजनीतिक रैली होती?
क्या होता अगर ये आयोजन एक सत्संग न होकर एक राजनीतिक रैली या फिर किसी वीआईपी का दौरा होता?
हमने पूछा कि क्या उस स्थिति में इन अस्पतालों को इसकी जानकारी होती और उन्होंने पहले से तैयारी की होती?
प्रोफ़ेसर वसीम रिज़वी अलीगढ़ के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक हैं. इस सवाल के उत्तर में वो हामी भरते हैं.
वो कहते हैं, "ऐसा कोई कार्यक्रम होता है तो हमें तो क्या, आस-पास के ज़िलों में भी पहले से ख़बर दी जाती है, लेकिन इस आयोजन के बारे में हमें पहले से ख़बर नहीं दी गई थी."
उन्होंने कहा कि दो जुलाई को अधिकारियों ने उनसे देर से संपर्क किया.
उन्होंने बताया, "हमें बताया गया कि 15 शव यहां शवगृह में रखने के लिए भेजे जा रहे हैं, हमें इसके लिए तैयारी करने को कहा गया."


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आख़िर किसे थी जानकारी?
तो फिर इतनी बड़ी संख्या में लोगों के इस जमावड़े के बारे में जानकारी किसे थी?
डॉक्टर मोहन झा कहते हैं कि भगदड़ होने तक उन्हें भी इस घटना के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.
वो कहते हैं, "केवल हाथरस के चीफ़ मेडिकल अफ़सर (सीएमओ) को इसकी जानकारी थी कि उन्हें दो जुलाई को होने वाले आयोजन के लिए एक एंबुलेंस भेजनी है और उन्होंने ये काम कर दिया था."
उन्होंने तुरंत सफाई देते हुए कहा, "लेकिन भगदड़ की स्थिति की आशंका में इस टीम को तैनात नहीं किया गया था. अगर सत्संग में कोई घायल हो जाए या बीमार हो जाए तो उसका इलाज करने के लिए वहां टीम को रखा गया था."
उन्होंने कहा, "अगर भविष्य में कहीं इस तरह का आयोजन हो जहां भीड़ जमा हो रही है तो हम ये सुनिश्चित करेंगे कि विभाग और आसपास की स्वास्थ्य सेवाओं को पहले से इसकी जानकारी दी जाए."

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इलाक़े के दूसरे अस्पतालों को पहले से ख़बर क्यों नहीं की गई?
इस सवाल का उत्तर जानने के लिए जब हमने हाथरस के सीएमओ डॉक्टर मंजीत सिंह से मुलाक़ात की तो वो सवाल से बचते नज़र आए और वहां से चले गए.
हाल ही में उत्तर प्रदेश प्रशासन ने कहा है कि उसने स्टैन्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोटोकॉल यानी मानक नीति निर्देश (एसओपी) बनाने के लिए काम शुरू कर दिया है जिसके तहत इस तरह की बड़ी सभाओं को रेगुलेट किया जाएगा.
इस डिवीज़न में चार ज़िले आते हैं, जिनमें मौजूद सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में 2,500 से अधिक बेड हैं.
लेकिन जब ख़ासकर ग्रामीण इलाक़ों की बात आती है तो राज्य की आबादी की तुलना में प्रदेश में मौजूद सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं (जैसे सीएचसी और अन्य स्वास्थ्य केंद्र) की कमी 45 प्रतिशत से अधिक है.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के रूरल हेल्थ स्टेटिस्टिक्स 2021-22 के ताज़ा आंकड़े यही तस्वीर पेश करते हैं.
डॉक्टर मोहन झा कहते हैं, "हम डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे हैं. हमारे कुछ स्वास्थ्य केंद्रों में केवल दो ही डॉक्टर मौजूद हैं. हम लकी हैं कि सिकंद्राराऊ में हमारे पास 5-6 डॉक्टर हैं. सरकार डॉक्टरों के ख़ाली पड़े पदों को भरने की कोशिश कर रही है."

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घायलों की आपबीती
हाथरस हादसे के घायलों का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं में कमी का हर्जाना उन्हें भरना पड़ रहा है. सत्संग में मची भगदड़ में घायल हुई शिखा कुमारी का इलाज हाथरस ज़िला अस्पताल में चल रहा है.
भगदड़ के दौरान वो बेहोश हो गई थीं.
वो कहती हैं, "मैं सिकंद्राराऊ अस्पताल में पड़ी हुई थी, मुझे यहां कोई कर्मचारी देख ही नहीं रहा था. मैंने बड़ी मुश्किल से अपने भाई को फ़ोन किया."
शिखा के भाई सुनील अस्पताल की व्यवस्था से काफ़ी नाराज़ हैं.
वो कहते हैं, "हम चिल्लाते हैं तभी डॉक्टर आते हैं, जब तक हम ना चिल्लाएं डॉक्टर यहां आते ही नहीं. जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यहां आने वाले थे तो उन्होंने सभी तैयारियां कर ली थीं. उनके जाने के बाद फिर से पावर कट शुरू हो गए."
उन्होंने कहा, "रात में अक्सर डॉक्टर प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड्स को हमारा ब्लड प्रेशर जाँचने के लिए कहते हैं. हम जल्दी यहां से चले जाएंगे."

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परिजनों के सवाल
सुनील कहते हैं, "अगर हम चाहते हैं कि शिखा ठीक हो जाए तो हमें क़र्ज़ लेकर उसे निजी अस्पताल में भर्ती कराना होगा, और कहां जाएंगे?"
हादसे के दिन यानी दो जुलाई को घटनास्थल और सरकारी अस्पतालों के बीच की दूरी ट्रैफ़िक जाम की वजह से और भी लंबी हो गई.
अलीगढ़ के 300 बेड वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय कम्बाइन्ड हॉस्पिटल में हर तरह की आपात स्थिति से निबटने के लिए व्यवस्था है.
यहां के चीफ़ मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉक्टर एमके माथुर कहते हैं, "हमें पता चला कि ट्रैफिक के कारण मरीज़ आम दिनों की तुलना में देर से हमारे पास आ रहे हैं."
हालांकि भगदड़ की जगह और इस अस्पताल के बीच हमें कई निजी अस्पताल और नर्सिंग होम्स भी दिखे. लेकिन हमें पता चला कि हादसे के दिन घायलों को इन निजी अस्पतालों की जगह सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों तक ले जाया गया, जहां सुविधाएं पहले से सीमित थीं- जैसे सिकंद्राराऊ अस्पताल.
एक एंबुलेंस ड्राइवर ने नाम ज़ाहिर ना करने की शर्त पर बताया, "जब तक मरीज़ खुद निजी अस्पताल में ले जाने को नहीं कहता हम खुद से उन्हें निजी अस्पताल लेकर नहीं जाते. हम अधिकतर मरीज़ को सरकारी अस्पताल ही पहुंचाते हैं."

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बड़ा सवाल, अस्पतालों की स्थिति
हमने डॉक्टर मोहन झा से पूछा कि अगर सवाल मरीज़ की जान बचाने का है तो उसे सबसे नज़दीकी अस्पताल क्यों नहीं पहुंचाया जाना चाहिए, ख़ासकर तब जब वो निजी अस्पताल मरीज़ का इलाज करने में सक्षम है?
डॉक्टर मोहन झा कहते हैं, "आप सही कहते हैं. इस मामले में हम मरीज़ को निजी अस्पताल लेकर नहीं गए, जो कि हादसे की जगह से नज़दीक मौजूद हो सकते थे. लेकिन आने वाले वक्त में ऐसी स्थिति में मरीज़ को नज़दीकी अस्पताल पहुंचाया जाना चाहिए, चाहे वो सरकारी हो या निजी."
उन्होंने कहा कि इस हादसे से बहुत कुछ सीखने को मिला है जिसे आने वाले वक्त में लागू किया जाएगा.
शाम हो रही थी और सूर्यास्त होने वाला था.
भगदड़ वाली जगह के क़रीब से गुज़रने वाले नेशनल हाईवे 34 पर हम क़रीब 30 किलोमीटर आगे जशरथपुर पहुंचे. यहां पर सरकारी ट्रॉमा सेंटर है.
ये अस्पताल सिकंद्राराऊ में मौजूद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के जैसा ही है, हालांकि उससे काफी छोटा है.
हम ट्रॉमा सेंटर के भीतर पहुंचे. वहां कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था, बल्कि केवल नर्सिंग स्टाफ़ के दो सदस्य मौजूद थे.
मैंने उनसे सवाल किया, "अगर अभी कुछ बड़ा हो जाए जिसके लिए डॉक्टर की ज़रूरत हो, तो क्या होगा."
एक लंबी चुप्पी के बाद उनमें से एक ने कहा, "हम फ़ोन करेंगे और डॉक्टर अपने घर से यहां आ जाएंगे. हां, इसमें थोड़ा वक्त लगेगा."
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