भारतीय प्रधानमंत्रियों की सुरक्षा में जब-जब हुई चूक

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
भारत में सुरक्षा में चूक की वजह से महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या हुई.
कोई भी सुरक्षा व्यवस्था तभी तक पूरी तरह चुस्त लगती है, जब तक हमलावर उसमें सेंध न लगा दें.
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप पर चली गोलियाँ इसी सिलसिले की एक ताज़ा कड़ी है.
ट्रंप पर हुए हमले के बाद अमेरिका में सुरक्षा में हुई चूक की गहन जाँच तो चल ही रही है, साथ ही दुनिया में भर में वीआईपी सुरक्षा में लगी एजेंसियों ने भी अपनी व्यवस्था का रिव्यू करना शुरू किया है.
भारत में प्रधानमंत्री की सुरक्षा को दुनिया की सबसे मज़बूत सुरक्षा व्यवस्थाओं में माना जाता है, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सुरक्षा कवच को मज़बूत बनाने की ज़रूरत महसूस हुई और उसे लगातार अपग्रेड किया जाता रहा है.
भारत में ऐतिहासिक तौर पर कई ऐसी ग़लतियाँ हुईं जब प्रधानमंत्री पद पर आसीन व्यक्ति की जान को ख़तरा पैदा हुआ और सुरक्षा एजेंसियों को शर्मिंदगी उठानी पड़ी. आइए ऐसी ही कुछ घटनाओं पर नज़र डालते हैं.

भुवनेश्वर में इंदिरा गांधी पर हमला

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1967 के आम चुनाव के दौरान जैसे ही इंदिरा गाँधी ने भुवनेश्वर में चुनाव सभा को संबोधित करना शुरू किया भीड़ में मौजूद कुछ लोगों ने मंच पर पत्थर फेंकने शुरू कर दिए.
एक पत्थर सुरक्षाकर्मी के माथे पर लगा और दूसरा एक पत्रकार के पैर पर. ये देखते ही दो सुरक्षाकर्मी इंदिरा गांधी के अगल-बगल खड़े हो गए.
सुरक्षा अधिकारियों ने उनसे अनुरोध किया कि वो अपना भाषण तुरंत समाप्त करें लेकिन उन्होंने उनकी बात नहीं मानी. इस बीच रह-रह कर मंच पर पत्थर फेंके जाते रहे. थोड़ी देर बाद इंदिरा अपना भाषण समाप्त कर मंच पर रखी कुर्सी पर बैठ गईं.
जैसे ही उन्होंने अपना भाषण समाप्त किया स्थानीय कांग्रेस उम्मीदवार ने बोलना शुरू कर दिया और मंच पर पत्थरों की बौछार फिर से शुरू हो गई.
कैथरीन फ़्रैंक इंदिरा गांधी की जीवनी में लिखती हैं, "ये देख इंदिरा गांधी कूद कर उठीं और फिर से माइक पर पहुंच कर चिल्लाने लगीं, ‘ये क्या बदतमीज़ी है? क्या इसी तरह आप देश को बनाएंगे?' तभी एक साथ कई पत्थर फेंके गए और एक पत्थर सीधा इंदिरा गांधी के चेहरे पर आ कर लगा. उनकी नाक से ख़ून निकलने लगा. पत्थर ने उनकी नाक की हड्डी तोड़ दी थी."
लेकिन इंदिरा गाँधी ने अपना चुनाव प्रचार नहीं रोका. अगले कई दिनों तक अपनी नाक पर प्लास्टर चढ़ाए वो चुनावी रैलियों को संबोधित करती रहीं. अपने पर हँसते हुए उन्होंने कहा, मैं बिल्कुल बैटमैन की तरह लग रही हूँ. ये प्रधानमंत्री सुरक्षा में बहुत बड़ी चूक थी.
ब्लू बुक के नियमों का उल्लंघन करते हुए लोगों को मंच के इतने नज़दीक आने दिया गया था, जहाँ से उनके पत्थर मंच तक पहुंच सकते थे. ज़ाहिर है, यह सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक सबक़ था.
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राजघाट में राजीव गांधी पर हमला

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1984 में किस तरह इंदिरा गांधी के ख़ुद के सुरक्षाकर्मियों ने उनकी हत्या की उस पर काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है. उस घटना को अभी दो साल भी नहीं हुए थे कि राजीव गांधी को जान से मारने की कोशिश हुई.
दो अक्तूबर, 1986 को सुबह 6 बज कर 55 मिनट पर जब राजीव गांधी राजघाट समाधि की तरफ़ बढ़ रहे थे तभी एक तेज़ आवाज़ सुनाई दी.
प्रधानमंत्री के साथ चल रहे सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत उनके चारों तरफ़ घेरा बना दिया. चलाई गई गोली राजीव गांधी के पीछे फूलों की क्यारी के पार गई. उन फूलों की क्यारियों को पिछले कई दिनों से पानी दिया जा रहा था. इसके पीछे मंशा ये थी कि अगर वहाँ किसी विस्फोटक गाड़ा हो तो वो चल न सके.
आनन-फानन में सारे सुरक्षाकर्मी पूरे राजघाट में फैल गए और हर झाड़ी और पेड़ की जाँच की जाने लगी. जब वहाँ उन्हें कुछ भी नहीं मिला तो उन्होंने सड़क के आसपास की इमारतों को देखना शुरू किया लेकिन उन्होंने बेलों से लदे एक पेड़ की जाँच नहीं की जहाँ राजीव गांधी पर गोली चलाने वाला शख़्स करमवीर सिंह छिपा हुआ था.
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तीन गोलियां चलीं
जब क़रीब आठ बजे राजीव गांधी महात्मा गांधी की समाधि पर फूल चढ़ाकर वापस अपनी कार की तरफ़ बढ़ने लगे तो दूसरी गोली की आवाज़ सुनाई दी.
उस समय राजीव गांधी और राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह साथ-साथ अपनी कारों की तरफ़ बढ़ रहे थे.
इंदरजीत बधवार और तानिया मिढा इंडिया टुडे के 31 अक्तूबर, 1986 के अंक में लिखते हैं, "जैसे ही गोली चली, ज़ैल सिंह ने राजीव गाँधी से कहा, ‘ये कहाँ से हमला हो रहा है?’ राजीव गांधी ने भी मज़ाकिया लहजे में जवाब दिया, ‘जब मैं आया था तब भी उन्होंने मेरा इसी तरह स्वागत किया था. अब लगता है वो गोली चला कर मुझे विदा कर रहे हैं.’
राजीव ने ज़ैल सिंह को उनकी बुलेटप्रूफ़ मर्सीडीज़ में बैठाया लेकिन जैसे ही वो सोनिया के साथ अपनी एंबेसडर कार में बैठने को हुए तीसरी गोली की आवाज़ सुनाई दी.
गोली राजीव गांधी के पीछे खड़े कांग्रेस विधायक ब्रिजेंदर सिंह मोवाई और बयाना के पूर्व ज़िला जज राम चरण लाल को लगी. राजीव ने चिल्ला कर सोनिया को कार के अंदर घुसने को कहा और सुरक्षाकर्मियों ने राजीव के चारों तरफ़ घेरा बना लिया.
इस बीच सुरक्षाकर्मियों ने घने पत्तों से ढँके पेड़ से धुआँ उठता देख लिया था. उन्होंने अपनी 9 एमएम की जर्मन माउज़र पिस्टल से उसकी तरफ़ फ़ायर किया. तभी अचानक हरे रंग का कपड़ा पहने एक युवा व्यक्ति अपने हाथ ऊपर उठाए हुए झाड़ी के बाहर आता दिखाई दिया. वहाँ मौजूद गृह मंत्री बूटा सिंह और दिल्ली के लेफ़्टिनेट गवर्नर एचएल कपूर ने सुरक्षाकर्मियों को उस शख़्स पर गोली चलाने का आदेश दिया.
लेकिन दिल्ली के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त गौतम कौल ने चिल्ला कर कहा ‘गोली मत चलाइए.’
बाद में जाँच में पता चला कि करमवीर सिंह लंबे समय से वहाँ झाड़ियों में छिपकर रह रहा था. उसके पास से एक बड़ी प्लास्टिक शीट, रुमाल में बँधे हुए भुने चने, पानी से भरा हुआ जैरीकैन, टेरामाइसिन और दर्दनिवारक गोलियां बरामद हुईं.
एक दिन पहले हुई गहन तलाशी के दौरान कुत्तों ने भौंक कर उस झाड़ी की तरफ़ इशारा किया था लेकिन वहाँ मौजूद मधुमक्खी के छत्ते की वजह से सुरक्षाकर्मी आगे नहीं गए थे.
ये सुरक्षा चूक इसलिए भी बड़ी थी क्योंकि ख़ुफ़िया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो ने कुछ दिन पहले ही रिपोर्ट दे दी थी कि राजीव गांधी पर राजघाट पर हमला हो सकता है.
बाद में दिल्ली पुलिस ने सफ़ाई दी कि बड़े आयोजनों से पहले इस तरह की रिपोर्टें अक्सर आती हैं, इसलिए इन्हें एक रूटीन वॉर्निंग की तरह समझा गया. इस कोताही के लिए दिल्ली के सहायक पुलिस आयुक्त गौतम कौल को निलंबित कर दिया गया जो राजीव गांधी के मौसेरे भाई भी थे.
एक बार फिर प्रधानमंत्री की सुरक्षा में सेंध
एक साल बाद एक बार फिर प्रधानमंत्री की सुरक्षा में सेंध लगी, जब अक्तूबर 1987 में रूस के प्रधानमंत्री निकोलाई रिज़कोव भारत के दौरे पर आए. पालम हवाई अड्डे पर दोनों प्रधानमंत्रियों ने तय किया कि वो एक ही कार में बैठ कर राष्ट्रपति भवन जाएंगे.
हवाई अड्डे पर उन्हें लेने कई मंत्री, तीनों सेनाओं के अध्यक्ष और कई उच्चाधिकारी आए हुए थे.
विदेश मंत्री नटवर सिंह ने दिल्ली के पुलिस कमिश्नर वेद मारवाह की कार में लिफ़्ट लेने का फ़ैसला किया ताकि वो दोनों प्रधानमंत्रियों से पहले साउथ ब्कॉक पहुँच सकें.
इसका एक कारण ये भी था कि पुलिस कमिश्नर की कार को कोई रोकेगा नहीं और वो आगे बढ़ती चली जाएगी.
नटवर सिंह अपनी आत्मकथा ‘वन लाइफ़ इज़ नॉट एनफ़’ में लिखते हैं, "हम साउथ एवेन्यू पहुँच गए और फिर राष्ट्रपति भवन के दक्षिण की तरफ़ मुड़े. फिर हमने वहाँ से साउथ ब्लॉक जाने वाली सड़क का रुख़ किया. हम देखते क्या हैं कि सामने से दोनों प्रधानमंत्रियों की कारों का काफ़िला चला आ रहा है.''
''वेद मारवाह ने तुरंत ड्राइवर से कार रिवर्स करने के लिए कहा ताकि वो उनके रास्ते से हट जाए. हमारे ठीक पीछे भजन लाल की कार थी इसलिए हमें दोनों कारें रिवर्स करने में आधा मिनट लग गया. सिर्फ़ एक या दो सेकेंड से हमारा वीआईपी कारों से आमना-सामना होने से बचा."
पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने लिखा है, "इसी बीच रूसी प्रधानमंत्री के साथ चल रहे सुरक्षाकर्मियों ने हमारी तरफ़ अपनी बंदूकें तान दी थीं. जब राजीव गांधी को ये पता चला तो उन्होंने गृह मंत्री बूटा सिंह से पुलिस कमिश्नर वेद मारवाह को सस्पेंड करने के लिए कहा. अगले दिन जब प्रधानमंत्री मुझसे मिले तो उन्होंने मुझे खूब खरी-खोटी सुनाई.''
''मैंने सफ़ाई देने की कोशिश की लेकिन राजीव पर उसका कोई असर नहीं हुआ. उन्होंने कहा कि सुरक्षा नियम तोड़ने पर साथ चल रहे रूसी अंगरक्षक आप पर गोली भी चला सकते थे. मुझे बड़ी शर्मिंदगी हुई कि मेरी वजह से वेद को सस्पेंड होना पड़ा. भला ये हुआ कि कुछ दिनों बाद प्रधानमंत्री को सारी बात समझ में आ गई और वेद मारवाह का सस्पेंशन वापस ले लिया गया."
राजीव गांधी पर श्रीलंका में राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में भी हमला हुआ था, जब वे प्रधानमंत्री के तौर पर कोलंबो के दौरे पर थे.
30 जुलाई 1987 को उन पर एक श्रीलंकाई नौसैनिक विजिता रोहाना ने परेड के औपचारिक निरीक्षण के दौरान बंदूक से पीछे से हमला किया.
राजीव गांधी के सिर पर वार करने की कोशिश की गई थी लेकिन उन्होंने अपने पीछे होने वाली हरकत को भांप लिया इसलिए उन्हें ज़्यादा चोट नहीं आई.
इस हमले के बाद श्रीलंका की सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को काफ़ी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था.
नरेंद्र मोदी के काफ़िले में सुरक्षा चूक

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वर्ष 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काफ़िले को पंजाब में एक फ़्लाई ओवर पर किसानों के प्रदर्शन के कारण लगे जाम के कारण 15-20 मिनट तक रुके रहना पड़ा था जो उनकी सुरक्षा के लिए एक ख़तरा था.
जब भी प्रधानमंत्री किसी जगह की यात्रा करते हैं तो उनके लिए एक वैकल्पिक रूट भी बनाया जाता है.
पहले तय हुआ था कि प्रधानमंत्री भटिंडा हवाईअड्डे पर उतरने के बाद राष्ट्रीय शहीद स्मरक हेलिकॉप्टर से जाएंगे लेकिन ख़राब मौसम के कारण उन्हें सड़क मार्ग से जाना पड़ा.
पंजाब के पुलिस महानिदेशक से हरी झंडी मिलने के बाद उन्हें सड़क मार्ग से ले जाया जा रहा था जिसमें उन्हें दो घंटे लग गए.
प्रधानमंत्री सुरक्षा की ज़िम्मेदारी है एसपीजी पर

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प्रधानमंत्री की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप यानी एसपीजी की है जो उन्हें और देश के बाहर भी सुरक्षा प्रदान करता है.
शुरू में प्रधानमंत्री निवास पर रहने वाले उनके निकटतम संबंधी भी हमेशा सुरक्षा के घेरे में रहते थे लेकिन 2019 में ये नियम बदल दिया गया.
नए नियमों के अनुसार, एसपीजी सुरक्षा अब सिर्फ़ प्रधानमंत्री को ही मिलती है.
एसपीजी की स्थापना वर्ष 1988 में हुई थी. इसका मुख्यालय दिल्ली के द्वारका इलाक़े में है.
इसके सुरक्षाकर्मियों का चयन सीमा सुरक्षा बल, सीआरपीएफ़, सीआईएसएफ़, आरपीएफ़ और भारत तिब्बत सीमा पुलिस के जवानों में से किया जाता है.
ये इन एजेंसियों के सर्वश्रेष्ठ जवान होते हैं. प्रधानमंत्री के साथ वाले घेरे में चलने वाले एसपीजी के लोग काले रंग का सूट पहने होते हैं. उनकी आँखों में धूप का काला चश्मा लगा होता है.
इसका उद्देश्य होता है आसपास की जगहों पर नज़र रखना ताकि लोगों को पता न चल सके कि वो किधर देख रहे हैं.
वो फिसल-रोधी सोल वाले ख़ास जूते पहनते हैं. उनके दस्ताने भी अलग होते हैं जिनकी वजह से हथियार उनके हाथों से फिसल नहीं सकते.
दूसरे घेरे में जो एसपीजी कमांडो होते हैं उनके पास बेल्जियम से आयात की हुई साढ़े तीन किलो वज़न की राइफ़लें होती हैं जो 500 मीटर तक मार कर सकती हैं.
हर कमांडो सवा दो किलो वज़न की बुलेट प्रूफ़ जैकेट पहनता है. उनके घुटनों और कोहनियों पर पैड लगे होते हैं.
ब्लू बुक के नियमों का पालन

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कमांडो के प्रशिक्षण के दौरान उन्हें मार्शल आर्ट सिखाई जाती है ताकि वो बिना हथियार के भी हमलावर का मुकाबला कर सकें. इनको क्लोज़ प्रोटेक्शन टीम कहा जाता है. उनके पास पिस्टल होती है जो आम लोगों को दिखाई नहीं देती.
मोबाइल फ़ोनों से इमप्रोवाइज़्ड एक्सप्लोसिव डिवाइज़ में विस्पोट के ख़तरे को देखते हुए प्रधानमंत्री के काफ़िले में जैमर्स का इस्तेमाल शुरू किया गया. हमलावरों को भ्रमित करने के लिए प्रधानमंत्री के काफ़िले में उनके वाहन जैसे दो और वाहन चलते हैं.
राज्यों में प्रधानमंत्री के दौरे से पहले एसपीजी ब्लू बुक में लिखे नियमों का सख़्ती से पालन करती है.
ब्लू बुक के अनुसार प्रधानमंत्री की यात्रा से तीन दिन पहले एसपीजी उस यात्रा से जुड़े सभी लोगों और संस्थाओं के साथ एक एडवांस बैठक करती है जिसमें उस राज्य के इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी, पुलिस उच्चाधिकारी और ज़िला मजिस्ट्रेट शामिल रहते हैं.
इस बैठक में उस यात्रा से जुड़े छोटे से छोटे विवरण पर चर्चा होती है. आपात स्थिति में हर हालात से निपटने के लिए हर स्तर पर एक वैकल्पिक योजना बनाई जाती है.
प्रधानमंत्री के काफ़िले की कारों का क्रम भी पहले से तय रहता है. सबसे आगे पायलट कार, उसके मोबाइल सिग्नल जैमर, उसके बाद डिकॉय कार, फिर प्रधानमंत्री की कार, मर्सिडीज़ एंबुलेंस और दूसरी कारें चलती हैं. एक स्पेयर कार भी साथ चलती है जिसका इस्तेमाल प्रधानमंत्री की कार खराब हो जाने की स्थिति में किया जा सकता है.
विदेश यात्रा में एयरइंडिया-1 का इस्तेमाल
प्रधानमंत्री हमेशा एयर इंडिया-1 से विदेश यात्रा पर जाते हैं. ये एक 747-400 बोइंग जहाज़ होता है.
हवाई अड्डे पर प्रधानमंत्री के आने से पहले भारतीय वायुसेना के दो और विमानों को तैयार स्थिति में रखा जाता है.
अगर आख़िरी समय में विमान में कोई ख़राबी आ जाए तो इन विमानों का इस्तेमाल किया जा सकता है.
प्रधानमंत्री के विमान के उड़ान भरने से पहले सारे इलाक़े को कुछ समय के लिए ‘नो फ़्लाइंग ज़ोन’ बना दिया जाता है.
गहन प्रशिक्षण

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संगठन में लिए जाने से पहले इन कमांडो की तीन स्तर की पृष्ठभूमि जाँच की जाती है.
यहाँ तक कि इनके परिवार वालों, दूर के रिश्तेदारों और दोस्तों की भी जाँच की जाती है.
पहले तीन महीनों तक एनएसजी के कमांडो को हथियारों और बिना हथियारों के लड़ाई और निशानेबाज़ी की ट्रेनिंग दी जाती है.
फिर इनको हर तरह के विस्फोटकों और विस्फोटक उपकरणों की जानकारी के साथ-साथ उन्हें निष्क्रिय करने के गुर भी सिखाए जाते हैं.
इसके अलावा इन्हें योग, ध्यान और मानसिक व्यायाम का प्रशिक्षण भी दिया जाता है.
एक पूर्व एनएसजी अधिकारी के अनुसार ये कमांडो चलते हुए वाहन से बिल्कुल सटीक निशाना लगा सकते हैं. उनको भीड़ में खड़े किसी एक व्यक्ति को बिना दूसरों को नुकसान पहुंचाए निशाना बनाने की ट्रेनिंग भी दी जाती है.
ये बहुत अच्छे तैराक भी होते हैं और आधुनिकतम संचार उपकरणों को चलाना जानते हैं. पहले तीन महीनों के प्रशिक्षण से सफलतापूर्वक गुज़रने के बाद उन्हें अगले तीन महीनों तक और गहन प्रशिक्षण दिया जाता है.
उनको रियल लाइफ़ सिचुएशन के लिए भी तैयार किया जाता है. उन्हें हमला होने और मेडिकल इमरजेंसी से निपटने की भी ट्रेनिंग दी जाती है.
अगर कोई शख़्स एसपीजी घेरे के बहुत नज़दीक पहुँचने की कोशिश करता है, उसे कोहनी से धक्का देकर पीछे धकेलने का प्रशिक्षण भी इन्हें दिया जाता है.
कई बार देखा गया है कि इस धक्के का असर पीड़ित व्यक्ति पर कई हफ़्तों तक रहता है.
इनको अमेरिकी सीक्रेट सर्विस के दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रशिक्षण दिया जाता है. अब इसमें इसराइल के ट्रेनिंग मैनुअल ‘क्राव मागा’ को भी शामिल कर लिया गया है.
इसमें कमांडो से मुक्केबाज़ी, कुश्ती, जूडो और कराटे सभी में निपुण होने की अपेक्षा की जाती है.
हर कमांडो का एक वार्षिक टेस्ट होता है. अगर वो उसमें फ़ेल हो जाते है तो उन्हें बिना देरी किए उनके पेंरेंट काडर में वापस भेज दिया जाता है.

















