पाकिस्तान: वो शख़्स जिसकी 'झूठी गवाही' पर ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को फांसी दी गई थी

जुल्फ़िकार अली भुट्टो

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"अगर मुझे माफ़ कर दिया जाए. तो मैं इस हत्या से जुड़े तथ्यों से पर्दा हटा सकूंगा."

ये बयान पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फिक़ार अली भुट्टो की फांसी के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले वादा माफ़ गवाह मसूद महमूद से जुड़ा है.

उन्हें देश के सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को जारी हुए ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो प्रेज़ीडेंशियल रिफ्रेंस केस के फ़ैसले में 'नैतिक पतन का शिकार और झूठा गवाह' घोषित किया गया.

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में कहा गया है कि 'एक निर्दोष व्यक्ति को बिना निष्पक्ष सुनवाई के फांसी दे दी गई' और 'ज़ुल्फ़िक़ार भुट्टो को फांसी देने के फ़ैसले से सीधे तौर पर जनरल ज़िया-उल-हक़ को फ़ायदा हुआ, अगर ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को रिहा कर दिया गया होता, तो वो ज़िया-उल-हक़ के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मामला' चला सकते थे.

हालांकि, इस फ़ैसले में तत्कालीन डायरेक्टर जनरल फ़ेडरल सिक्योरिटी फ़ोर्स (एफ़एसएफ़) मसूद महमूद के बयान और उनकी मुख्य भूमिका पर विस्तार से चर्चा की गई है.

ये जानने वाली बात है कि संघीय सुरक्षा बल यानी एफ़एसएफ़ एक अर्धसैनिक बल था जिसे ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो ने ही बनाया था.

एफ़एसएफ़ पर आरोप लगाया गया था कि भुट्टो के कथित आदेशों के तहत, एफ़एसएफ़ ने भुट्टो फांसी मामले में वादी और राजनेता अहमद रज़ा क़सूरी को मारने की साज़िश रची थी, लेकिन 11 नवंबर, 1975 को अहमद रज़ा क़सूरी की कार पर कथित हमले के परिणामस्वरूप, इसमें उनके पिता मुहम्मद अहमद ख़ान कसूरी मारे गए थे.

इस मामले में अन्य अभियुक्तों को भी नामित किया गया था, जिनमें एक ख़ास नाम एफ़एसएफ़ के डीजी मसूद महमूद थे.

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सैन्य तख़्तापलट के बाद मसूद महमूद को गिरफ़्तार कर लिया गया था. सबसे पहले, उन्हें एक अभियुक्त के रूप में नामित किया गया था.

7 सितंबर, 1977 को लाहौर के ज़िला मैजिस्ट्रेट को अभियुक्त मसूद महमूद की ओर से एक ख़त मिला और उसके एक हफ़्ते बाद उनका अदालत में दाखिल किया गया शपथ पत्र पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो की 1979 में दी गई फांसी की बुनियाद बन गया.

अपने बयान में, मसूद महमूद ने दावा किया कि ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने उन्हें अहमद रज़ा क़सूरी को मारने का आदेश दिया था और कहा था कि "मुझे क़सूरी की लाश चाहिए या उसके ज़ख़्म खाए जिस्म पर पट्टियाँ बंधी हों."

मसूद महमूद ने कहा कि अहमद रज़ा क़सूरी के पिता मुहम्मद अहमद ख़ान उनके अपने पिता के सबसे अच्छे दोस्त थे. हालाँकि, उन्होंने अपने पिता के सबसे अच्छे दोस्त के बेटे की हत्या का आदेश दिया.

मसूद महमूद को अचानक यह ख़याल क्यों आया, उनके अपने ही शब्दों में उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि "इस घिनौने अपराध के आदेश देने की वजह से उनके ज़मीर पर बोझ है."

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में कहा गया कि "जेल में रहने के बाद उनका कमज़ोर ज़मीर फिर से जाग गया था. इस अपराध को तीन साल पहले किया गया था, लेकिन उस दौरान उनका ज़मीर ख़ामोश रहा मगर गिरफ़्तार होते ही ये जाग गया. एक ऐसा ज़मीर जो पहले अपने लिए माफ़ी सुनिश्चित कर लेना चाहता था. एक ऐसा ज़मीर जिसके लिए किसी को क़त्ल करने के आदेश देना 'सिर्फ़' किसी और के 'आदेश का पालन' करवाने जैसा था."

इस ख़त के लिखे जाने के एक हफ़्ते बाद मसूद महमूद का अनुरोध मंज़ूर कर लिया गया और उसी दिन उनका बयान भी दर्ज कर लिया गया.

मसूद महमूद कौन थे, वह भुट्टो के बनाए गए अर्धसैनिक बल के प्रमुख कैसे बने और सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गवाही के बारे में क्या कहा है, आइए जानते हैं.

मसूद महमूद एफ़एसएफ़ के डीजी कैसे बने?

ज़ुल्फिकार अली भुट्टो

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मसूद महमूद की ओर से अदालत के सामने दिए गए बयान का ज़्यादातर हिस्सा ग़ैरज़रूरी था और उसके पहले चार पन्नों में उन्होंने केवल उन पदों का उल्लेख किया था जिन पर वो रहे थे और कैसे वो 21वें स्केल तक पहुंचे थे.

इस बयान में उन्होंने बताया कि भारतीय पुलिस में उनकी नियुक्ति युद्ध के लिए आरक्षित की गई सीट पर हुई क्योंकि उन्होंने कुछ समय के लिए रॉयल इंडियन एयर फोर्स में भी काम किया था. उन्होंने पाकिस्तान की स्थापना के बाद 18 सितंबर, 1948 को असिस्टेंट सुप्रिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस के तौर पर ज़िम्मेदारी संभाली.

इसके बाद उनके बयान में बताया गया है कि 12 अप्रैल, 1974 को प्रधानमंत्री भुट्टो ने उन्हें बुलाया और उनकी 'ईमानदारी, कड़ी मेहनत और अच्छे काम' के लिए उनकी प्रशंसा की.

इस पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने लिखा कि "सवाल यह उठता है कि क्या ईमानदारी और सत्यनिष्ठा ऐसे गुण हैं जो आप ऐसे व्यक्ति में तलाशेंगे जो आपके लिए कोई भी अपराध करने को तैयार हों."

मसूद महमूद ने बयान में कहा कि भुट्टो ने उन्हें एक घंटे तक मनाने की कोशिश की, जिसके बाद उन्होंने संघीय सुरक्षा बल (एफ़एसएफ़) के महानिदेशक पद के लिए उनका समर्थन किया और उस दौरान बल को प्रशिक्षित और संगठित करने का काम किया.

इसके बाद उन्होंने अपनी 'कमज़ोरी' के बारे में बताया कि उनके पूर्व सहयोगी सईद अहमद ख़ान, जो प्रधानमंत्री के मुख्य सुरक्षा अधिकारी रह चुके थे, और उनके सहायक अब्दुल माजिद बाजवा ने उनसे कहा था कि अगर उन्होंने भुट्टो के कहे अनुसार काम नहीं किया, तो "आपकी पत्नी और बच्चे तुम्हें फिर कभी नहीं देख पाएंगे."

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सईद अहमद ख़ान को मामले में गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया था और अब्दुल माजिद बाजवा की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी, इसलिए उनकी ओर से किए गए कथित दावे अफ़वाह से ज़्यादा कुछ नहीं थे.

कोर्ट ने कहा कि मसूद महमूद ने इसके बाद अपनी कायरता का कारण भी बताया और कहा कि भुट्टो ने मुझसे कहा था कि "तुम बिल्कुल भी नहीं चाहोगे कि वक़ार तुम्हारा पीछा करे?"

यहां वक़ार नाम के शख़्स की पहचान ज़ाहिर नहीं की गई और फ़ैसले के मुताबिक़ वक़ार को भी बतौर गवाह पेश नहीं किया गया.

ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो से जुड़ी अन्य कहानियां यहां पढ़ें:

कसूरी को मारने के आदेश के संबंध में मसूद महमूद के दावे

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इसी तरह एक और नाम जिसका मसूद महमूद ने बिना किसी सबूत के उल्लेख किया, वह एमआर वेल्च का था जो क्वेटा में एफ़एसएफ़ के डायरेक्टर थे और जिन्हें क्वेटा में (क़सूरी को) ठिकाने लगाने को कहा गया था.

मसूद महमूद का कहना था कि "(निदेशक एफ़एसएफ़) मियां मुहम्मद अब्बास को इससे पहले हक़ नवाज़ टवाना (पूर्व डीजी एफ़एसएफ़) के ज़रिए (भुट्टो ने) आदेश दिए थे कि वो अहमद रज़ा क़सूरी को ठिकाने लगाएं."

"भुट्टो ने बाद में मुझसे कहा कि मैं मियां अब्बास से कहूं कि वो या तो अहमद रज़ा क़सूरी की लाश, या उसका प्रताड़ित जिस्म लाएं, जिस पर हर तरफ़ पट्टियां बंधी हों."

अदालत ने फ़ैसले में लिखा कि मियां मुहम्मद अब्बास ने ट्रायल कोर्ट में अपना बयान वापस ले लिया था और पूर्व डीजी एफ़एसएफ़ हक़ नवाज़ टवाना को गवाह के तौर पर पेश ही नहीं किया गया.

मसूद महमूद ने यह भी कहा कि भुट्टो काफ़ी समय से क़सूरी को मारना चाहते थे और उन्होंने इस संबंध में मियां अब्बास को पहले ही आदेश दे दिए थे लेकिन उन्होंने उन आदेशों का पालन नहीं किया था.

हालाँकि, जब मसूद महमूद को आदेश दिया गया, तो अहमद रज़ा क़सूरी पर गोली चलाई गई तो उनकी जगह उनके पिता मुहम्मद अहमद ख़ान को लग गई.

सुप्रीम कोर्ट ने लिखा कि "मसूद महमूद ने खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया था जिसे ख़ुदा पर ईमान था और उन्हें मालूम था कि किसी की हत्या करने का आदेश जारी करना ख़ुदा के आदेश के ख़िलाफ़ था. लेकिन भुट्टो ने उन्हें ख़ास आदेश दिए थे और फिर उनके बयान के मुताबिक़ "मैं ख़ुदा के आदेश की अवहेलना करने और एक क़ीमती इंसानी जान लेने में अहम किरदार बन गया. (ख़ुदा मुझे माफ़ करे)."

फ़ैसले के मुताबिक़, "मसूद महमूद की ओर से ख़ुदा के आदेशों को नकारने का कारण यह बताया गया कि वह शादीशुदा थे." उन्होंने कहा कि, "अगर मैं कुंवारा होता तो मैं कभी भी उन आदेशों का पालन नहीं करता और छोड़कर चला जाता."

मसूद महमूद की प्रतिष्ठा पर कोर्ट ने क्या कहा?

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सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में मसूद महमूद की प्रतिष्ठा पर सवाल उठाए हैं.

अदालत के निर्णय के अनुसार, "उस वक़्त की अदालतों की ओर से मसूद महमूद की प्रतिष्ठा पर किसी क़िस्म का संदेह व्यक्त नहीं किया गया था."

"हालांकि, ऐसे कई कारक थे जो किसी भी बुद्धिमान इंसान को अलर्ट करने के लए काफ़ी थे और ये दिखाते थे कि वो एक ख़ुदगर्ज़, अपने आपको बचाने वाले, नैतिक पतन के शिकार और एक झूठे गवाह थे."

अदालत ने यह भी कहा कि मसूद महमूद ने बार-बार अपने ज़मीर के बारे में बात की है और कहा है कि "उनके ज़मीर ने उन्हें बहुत दोषी ठहराया" और "ये काम (हत्या) मेरे ज़मीर के ख़िलाफ़ था." लेकिन उनका ज़मीर तभी जागा जब उन्हें कुछ समय हिरासत में बिताना पड़ा और उनके जाग चुके ज़मीर ने सबसे पहले अपने लिए माफ़ी मांगी और ख़ुद को इस स्थिति से बाहर निकाला. यहां सुरक्षा और सुविधा एक बार फिर उनके ज़मीर पर हावी हो गया, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या वह सच कह रहे थे या सिर्फ़ अवसरवादी थे.

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अदालत ने मसूद महमूद के संबंध में चर्चा पूरी करते हुए कहा कि उन्होंने अपने बयान में अपने धर्म को नाटकीय ढंग से प्रस्तुत किया लेकिन इस्लाम की सबसे बुनियादी आदेशों को भूल गए, यानी कि एक व्यक्ति की हत्या करना और पूरी मानवता की हत्या करना है.

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, इस तरह के शख़्स को संघीय न्यायालय द्वारा 'नैतिक रूप से घटिया' घोषित किया है.

अदालत के फ़ैसले के मुताबिक़, अभियोजन पक्ष ने अपना पूरा मामला मसूद महमूद और मियां मुहम्मद अब्बास के बयानों के आधार पर बनाया था, लेकिन मियां मुहम्मद अब्बास ने अपना बयान वापस ले लिया और इसके विपरीत बयान दिया. तब तक हक़ नवाज़ टवाना और अब्दुल हमीद बाजवा की मौत हो चुकी थी. एमआर वेल्च और सईद अहमद ख़ान को वादा माफ़ गवाह बनाए बिना उन्हें अभियोग पक्ष की ओर से बतौर गवाह पेश किया गया था.

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