ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को किस मामले में हुई थी फांसी और अब सुप्रीम कोर्ट ने क्या माना

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पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के ख़िलाफ़ चलाए गए मुक़दमे में हुई सुनवाई को संविधान के अनुरूप नहीं पाया है.
सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने कहा है कि पूर्व प्रधानमंत्री भुट्टो को निष्पक्ष ट्रायल नहीं दिया गया था. भुट्टो को साल 1979 की 4 अप्रैल को रावलपिंडी में फांसी दे दी गयी थी.
पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश काज़ी फ़ैज़ ईसा के नेतृत्व वाली पीठ ने ये टिप्पणी पूर्व राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी की ओर से दायर रिफ़रेंस पर की है.
ज़रदारी ने 2 अप्रैल, 2011 को पाकिस्तानी संविधान के आर्टिकल 189 के तहत पूर्व प्रधानमंत्री भुट्टो को दिए गए मृत्युदंड पर सुप्रीम कोर्ट की राय मांगी थी.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

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चीफ़ जस्टिस काज़ी फ़ैज़ ईसा के नेतृत्व वाली पीठ ने कहा है कि इस मामले में निष्पक्ष सुनवाई की शर्त पूरी नहीं की गयी है.
चीफ़ जस्टिस ईसा ने कहा, “लाहौर उच्च न्यायालय में हुई सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट की ओर से की गयी अपील पाकिस्तानी संविधान के आर्टिकल 4 और 9 के मुताबिक़ नहीं की गयी. इनके तहत निष्पक्ष सुनवाई और तय प्रक्रिया को मौलिक अधिकार के रूप में देखा गया है. संविधान के आर्टिकल 10ए के तहत भी इसे एक मूल अधिकार के रूप में जगह दी गयी है.”
इस बेंच ने इस मामले पर अपनी टिप्पणियां बीती 4 मार्च को रिज़र्व कर ली थीं. इस मामले में अब तक सात बार सुनवाई हुई है.
पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में इसे एक अदालती हत्या की संज्ञा दी जाती है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद पाकिस्तान के राजनेताओं की ओर से टिप्पणियां आ रही हैं.
पाकिस्तान के पूर्व पीएम शहबाज़ शरीफ़ ने इस टिप्पणी पर कहा है, “एक ऐतिहासिक ग़लती को ठीक करना संभव नहीं है. लेकिन उसे स्वीकार करके एक नया इतिहास बना है.”
भुट्टो को किस मामले में हुई थी फांसी

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ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को एक वक़्त में पाकिस्तान के सबसे ताक़तवर नेताओं में गिना जाता था.
पाकिस्तान के वाणिज्य मंत्रालय से लेकर विदेश मंत्रालय जैसी ज़िम्मेदारियां संभालने के बाद उन्होंने पाकिस्तान पीपल्स पार्टी का गठन किया.
इसके बाद 14 अगस्त, 1973 को वह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने. लेकिन इसके मात्र चार साल बाद 5 जुलाई, 1977 को जनरल ज़िया उल हक़ ने सैन्य तख़्तापलट कर दिया.
इसके बाद एक हत्या के मामले में साल 1979 की चार अप्रैल को उन्हें फांसी दे दी गई.
लेकिन भुट्टो को लगता था कि उन्हें कभी फांसी नहीं हो सकती तो फिर ये कौन सा मामला था जिसने उन्हें फांसी के फंदे तक पहुंचा दिया.
पाकिस्तान के पत्रकार शाहिद असलम का एक लेख साल 2021 में बीबीसी हिंदी के पन्ने पर प्रकाशित हुआ था, जिसे आप आगे पढ़ सकते हैं.
कब हुई थी ये हत्या

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आज से क़रीब 49 साल पहले 10 और 11 नवंबर 1974 की आधी रात लाहौर के शादमान कॉलोनी इलाक़े के एक घर के बाहर बनी पार्किंग से एक मार्क टू कार निकली.
गाड़ी में चार लोग थे जो शादमान कॉलोनी से मॉडल टाउन में स्थित अपने घर जा रहे थे. रात के क़रीब साढ़े बारह बज चुके थे और हर तरफ़ अंधेरा ही अंधेरा था.
युवा अहमद रज़ा कसूरी कार चला रहे थे जबकि उनकी बराबर वाली सीट पर उनके पिता नवाब मोहम्मद अहमद ख़ान कसूरी बैठे थे. पीछे की सीट पर अहमद ख़ान कसूरी की पत्नी और साली बैठी थीं.
गाड़ी जैसे ही शादमान कॉलोनी से कुछ दूरी पर स्थित शाह जमाल के गोल चक्कर पर पहुंची, तो उस पर हथियारबंद हमलावरों ने तीन तरफ़ से गोलियां बरसानी शुरू कर दीं.
अहमद रज़ा कसूरी सिर नीचे करके गाड़ी चलाते रहे, ताकि गाड़ी में सवार सभी लोगों को उस जगह से दूर ले जाये. लेकिन तभी फ़्रंट सीट पर बैठे मोहम्मद अहमद ख़ान कसूरी का सिर जवान बेटे के कंधे पर गिर पड़ा. बेटे का हाथ अचानक पिता के शरीर पर पड़ा और ख़ून से लाल हो गया.
गोलियाँ लगे अहमद ख़ान कसूरी को अस्पताल पहुंचाने, और उनके आपरेशन शुरू होने के कुछ ही देर में वहां तीन-चार सौ पुलिस अधिकारियों का क़ाफ़िला पहुंच गया था.
जब हुई भुट्टो के ख़िलाफ़ एफ़आईआर

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इछरा थाने के तत्कालीन एसएचओ अब्दुल हयी नियाज़ी ने एफ़आईआर लिखनी शुरू की. शुरुआती जानकारी दर्ज करने के बाद जब बात 'आपको किसी पर शक है' की आई तो अहमद रज़ा कसूरी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो का नाम लिया.
प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो का नाम सुनते ही एसएचओ के हाथ से पेंसिल नीचे गिर गई और उन्होंने चौंक कर कहा, कि आपको एफ़आईआर प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ दर्ज करानी है? जवाब मिला: जी हाँ.
अहमद रज़ा कसूरी बोले- 'क्योंकि वो (भुट्टो) मुझ पर पहले भी कई हमले करा चुके हैं. जब ज़िम्मेदार वही हैं तो फिर एफ़आईआर भी उन्हीं के नाम की कटेगी.'
रज़ा कसूरी ने उस रात घटी घटनाओं को याद करते हुए इस लेखक को दिए इंटरव्यू में बताया, कि 'कुछ देर के बाद मैंने दोबारा तहरीर लिखवानी चाही, तो वो (एसएचओ) बाहर चला गया. कुछ देर बाद एसएसपी और डीआईजी दोनों आये और कहने लगे कि आप अपने आस-पास देखें जिसने नवाब साहब पर हमला किया हो, आप सीधा प्रधानमंत्री का नाम ले रहे हैं.'
रज़ा कसूरी के एक मामा, जो सेना में ब्रिगेडियर थे, वह भी अस्पताल पहुंच चुके थे. पुलिस ने उन्हें भी रज़ा कसूरी को समझाने के लिए भेजा, लेकिन वो इस पर अड़े रहे कि भुट्टो ने ही उनके पिता पर हमला कराया है.
सुबह के लगभग तीन बज चुके थे इसी बीच डॉक्टर ने आकर बताया कि अहमद रज़ा ख़ान को बताया उनके पिता अब इस दुनिया में नहीं रहे.
वो बताते हैं कि 'मैं ये सुन कर गुस्से से फट पड़ा और आपे से बाहर हो गया. पास में ही एक डंडा पड़ा था, मैंने डंडा उठाया और एसएसपी को जो कि यूनिफॉर्म में थे उनकी पीठ पर तीन-चार मार दिए. इसके बाद दौड़कर डीआईजी को भी पीछे से एक लात मारी, वो भी गिरते हुए पुलिसकर्मियों के पीछे छिप गए.
रात को क़रीब तीन बज कर 20 मिनट पर अहमद रज़ा कसूरी ने अपने एक पड़ोसी की मदद से रिपोर्ट लिखी, जिसमें ख़ुद पर हुए पिछले हमलों का भी ज़िक्र किया और अपने पिता की हत्या का आरोप प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो पर लगाया.
भुट्टो के ख़िलाफ़ नामज़द एफ़आईआर

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आख़िरकार, उसी साल फ़रवरी में, ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को उनकी ही पार्टी के एक एमएनए के पिता की हत्या की साज़िश के आरोप में एक मुक़दमे में नामज़द कर दिया गया.
मोहम्मद अहमद ख़ान का पोस्टमॉर्टम डिप्टी सर्जन मेडिको लीगल लाहौर डॉक्टर साबिर अली ने किया.
अगली सुबह, यानी 11 नवंबर, को पुलिस ने घटनास्थल का दौरा किया और गोलियों के 24 ख़ाली कारतूस इकट्ठे किए, और गोल चक्कर के पास स्थित एक घर की दीवार पर भी गोलियों के निशान मिले. कार की जांच से यह भी पता चला कि कुछ गोलियां ड्राइवर की सीट के पिछले हिस्से में भी फंसी हुई थीं, जिनसे अहमद रज़ा ख़ान भी बाल बाल बचे थे.
हमले में इस्तेमाल किए गए हथियारों का पता लगाने के लिए गोलियों के खाली कारतूस तत्कालीन निदेशक फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी लाहौर नादिर हुसैन आबिदी को सौंप दिये गए, जिन्होंने उन्हें जांच के लिए रावलपिंडी में सेना के जनरल मुख्यालय भिजवा दिए.

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जनरल मुख्यालय ने जांच के बाद बताया कि वो कारतूस 7 एमएम के हैं जो चीन के बने हुए हैं, जिन्हें एलएमजी और एसएमजी राइफ़ल से भी चलाये जा सकते हैं. शुरुआती जांच की निगरानी डीएसपी अब्दुल अहद को सौंपी गई, लेकिन 1975 में उनकी मौत के बाद, इस जांच की ज़िम्मेदारी स्पेशल ब्रांच के मलिक मोहम्मद वारिस को सौंप दी गई.
इसके साथ-साथ, पंजाब सरकार ने इस घटना की जांच के लिए, लाहौर हाई कोर्ट के जज शफ़ी-उर-रहमान की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग का गठन किया. आयोग ने 26 फरवरी, 1975 को अपनी रिपोर्ट पंजाब सरकार को सौंपी, लेकिन उस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जा सका.
जांच अधिकारी मलिक मोहम्मद वारिस की सिफ़ारिश पर अक्टूबर 1975 में मामला दर्ज किया गया था, जिसमें कहा गया था कि आरोपी का पता नहीं लगाया जा सका.
5 जुलाई 1977 को जैसे ही ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की चुनी हुई सरकार का तख़्तापलट कर, देश में मार्शल लॉ लगाया गया. तब से इस केस पर विवादों की वो गर्द लगनी शुरू हुई जो आज तक छटने का नाम नहीं ले रही है. और वो विवाद आज भी देश के राजनीतिक, क़ानूनी और न्यायिक इतिहास का जिन्न की तरह पीछा करते दिखाई देते हैं.
मार्शल लॉ लागू होने के तुरंत बाद, संघीय सरकार ने ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की बनाई हुई पैरा मिल्ट्री फ़ोर्स यानी फ़ेडरल सिक्योरिटी फ़ोर्स से कथित राजनीतिक हत्या और अपहरण जैसे गंभीर मामलों की जांच एफ़आईए को सौंप दी.

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मार्च 1975 में तहरीक-ए-इस्तिक़लाल पार्टी के अध्यक्ष सेवानिवृत्त एयर मार्शल असगर ख़ान पर लाहौर रेलवे स्टेशन पर होने वाले बम हमले की जांच के दौरान, एफआईए के उप निदेशक अब्दुल ख़ालिक़ को शक हुआ कि नवाब मोहम्मद अहमद ख़ान की हत्या में फ़ेडरल सिक्योरिटी फ़ोर्स शामिल हो सकती है.
इसी शक के आधार पर 24 और 25 जुलाई 1977 को, यानी मार्शल लॉ के ठीक 20 दिन बाद, फ़ेडरल सिक्योरिटी फ़ोर्स के सब-इंस्पेक्टर अरशद इक़बाल और असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर राणा इफ़्तिख़ार अहमद से इस मामले के बारे में पूछताछ की गई और दोनों को इस केस में गिरफ़्तार कर लिया गया.
26 जुलाई 1977 को दोनों अधिकारियों ने मजिस्ट्रेट ज़ुल्फ़िकार अली तूर के सामने अपना अपराध क़बूल कर लिया, जिसके बाद डायरेक्टर ऑपरेशंस और इंटेलिजेंस मियां मोहम्मद अब्बास और इंस्पेक्टर ग़ुलाम मुस्तफ़ा को भी गिरफ़्तार कर लिया गया और उन्होंने भी सब-मजिस्ट्रेट के सामने अपना जुर्म क़बूल कर लिया. आरोपियों में इंस्पेक्टर ग़ुलाम हुसैन भी शामिल हो गए, लेकिन बाद में वादा सरकारी गवाह बन गए.
मसूद महमूद, जिन्हें मार्शल लॉ के लागू होने के तुरंत बाद, गिरफ़्तार किया गया था, वो भी क़ैद के दो महीने बाद भुट्टो के ख़िलाफ़ वादा माफ़ गवाह बन गए, जिसके बाद ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को भी इस मामले में 3 सितंबर को गिरफ़्तार कर लिया गया.
भुट्टो की गिरफ़्तारी के 10 दिन बाद, जस्टिस केएमए समदानी ने भुट्टो को ज़मानत पर रिहा कर दिया, जिसके नतीजे में कथित तौर पर जस्टिस समदानी को तुरंत पद से हटा दिया गया और तीन दिन बाद, भुट्टो को दोबारा उसी मामले में मार्शल लॉ के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया.

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इसी दौरान, हाई कोर्ट में नए जजों की नियुक्ति की गई और मौलवी मुश्ताक़ हुसैन को लाहौर हाई कोर्ट का चीफ़ जस्टिस बना दिया गया, जो जनरल ज़िया-उल-हक़ के गृहनगर जालंधर से थे.
साल 1965 में जब ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो विदेश मंत्री थे, तो मौलवी मुश्ताक़ उनके विदेश सचिव थे.
मामले का अधूरा चालान 11 सितंबर 1977 को मजिस्ट्रेट की अदालत में जमा किया गया और 13 सितंबर को स्पेशल पब्लिक प्रोसिक्यूटर के अनुरोध पर केस सुनवाई के लिए लाहौर हाई कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया.
मुक़दमे के दौरान, मियां मोहम्मद अब्बास अपने इक़बालिया बयान से यह कहते हुए पलट गए कि उनका पहला बयान मजिस्ट्रेट के सामने दबाव में लिया गया था.
उन्होंने बयान दिया कि उन्हें ऐसी किसी साज़िश के बारे में नहीं पता और न ही मैंने वादा माफ़ गवाह ग़ुलाम हुसैन या फ़ेडरल सिक्योरिटी फ़ोर्स के किसी भी अधिकारी को इस काम के लिए कोई हथियार मुहैय्या कराने के निर्देश दिए थे.
ग़ुलाम मुस्तफ़ा, अरशद इक़बाल और राणा इफ़्तिख़ार अहमद अपने क़बूलनामे पर क़ायम रहे कि उन्होंने उस रात अपने सीनियर्स ग़ुलाम हुसैन और मियां मोहम्मद अब्बास के इशारे पर हमला किया था, जिसमें अहमद रज़ा ख़ान के पिता की मौत हो गई थी.
2 मार्च 1978 को मुक़दमा पूरा हुआ और 18 मार्च को केस का फ़ैसला सुनाया गया, जिसमें हाई कोर्ट के पांच जजों ने फ़ैसला सुनाया कि सबूतों से ये बात तय होता है कि ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने फ़ेडरल सिक्योरिटी फ़ोर्स के डायरेक्टर मसूद महमूद के साथ मिलकर अहमद रज़ा कसूरी की हत्या की साज़िश की थी और फ़ेडरल सिक्योरिटी फ़ोर्स के हमले में ही उनके पिता मोहम्मद अहमद ख़ान कसूरी की मौत हुई थी.

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ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को इस केस में मौत की सज़ा सुनाई गई.
आरोपियों ने हाईकोर्ट के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां नौ जज थे. एक जज जुलाई 1978 में रिटायर हो गए और एक जज को बीमारी के कारण छुट्टी पर भेज दिया गया. अन्य सात जजों ने फरवरी 1979 को इस अपील पर फ़ैसला सुनाया. सात में से चार जजों ने लाहौर उच्च न्यायालय के फ़ैसले को बरक़रार रखा, जबकि तीन ने ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को आरोपों से बरी कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट से अपील ख़ारिज होने के बाद 4 अप्रैल, 1979 को ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को फांसी दे दी गई.
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