टाइटैनिक डूबने से 25 साल पहले बंगाल में हुई थी समुद्री दुर्घटना, डूब गए थे 750 तीर्थ यात्री

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- Author, अमिताभ भट्टसाली
- पदनाम, बीबीसी बांग्ला न्यूज़ बांग्ला, कोलकाता
आज से 137 साल पहले 25 मई, 1887 को सर जॉन लारेंस नामक जहाज कोलकाता से पुरी जाते समय एक भयावह हादसे का शिकार होकर सागर द्वीप इलाके में भागीरथी के मुहाने के पास डूब गया था.
जहाज कंपनी के आंकड़ों के मुताबिक उस पर करीब 750 यात्री सवार थे. उस समय अख़बारों में छपा था कि जहाज पर सवार एक भी व्यक्ति जीवित नहीं बचा है.
हालांकि इस रिपोर्ट के लिए इतिहास के पन्ने पलटने के दौरान बीबीसी बांग्ला को ऐसे कुछ लोगों के नाम और उनके बारे में पता चला जो इस हादसे से जीवित बच कर लौटे थे या संयोगवश उस पर सवार ही नहीं हो सके थे.
उस हादसे के करीब 25 साल बाद टाइटैनिक नामक जहाज डूबा था. उसके साथ इस हादसे की कोई तुलना नहीं होने के बावजूद उस दौर में सर जॉन लारेंस जहाज का डूबना अपनी तरह का सबसे बड़ा हादसा था.
रबींद्रनाथ टैगोर ने उस दौरान लिखी अपनी कविता 'सिंधु तरंग' को उस जहाज के डूबे यात्रियों को ही समर्पित किया था.
ओडिशा के शोधकर्ता और लेखक अनिल धीर कहते हैं, "यह पूर्वी गोलार्ध में उस समय का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण हादसा जरूर था. लेकिन ओडिशा के उस तटवर्ती इलाके में कुल 130 जहाज डूबे थे. यह जानकारी मुझे ब्रिटिश नौवाहन विभाग से मिली है. अमेरिका से दुनिया के विभिन्न इलाकों में जाने वाले जहाजों के रवाना होने का समय, उनकी यात्रा का रूट तय करने और नक्शा बनाने की जिम्मेदारी इसी विभाग पर थी."
यात्री पुरी मंदिर में दर्शन के लिए जा रहे थे

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उस समय तक हावड़ा से दक्षिण भारत की ओर रेल संपर्क पूरी तरह तैयार नहीं हो सका था. हावड़ा स्टेशन से ओडिशा के कटक तक ट्रेन चलने की शुरुआत सर जॉन लारेंस के डूबने के करीब 12-13 साल बाद 1899-1900 में शुरू हुई.
इस समय कटक से ही एक रेलवे लाइन पुरी की ओर जाती थी.
इससे पहले पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर जाने वाले बंगाल के तीर्थयात्रियों को बैलगाड़ी से या फिर पैदल जाना पड़ता था. इन यात्रियों को ध्यान में रख कर ही कई जहाज कंपनियों ने स्टीमर सेवा शुरू की थी.
स्टीमर सेवा शुरू होने के बाद बंगाल के बहुत से लोग महिलाओं और बच्चों को नदी और समुद्र के रास्ते भेज देते थे और पुरुष थल मार्ग से बैलगाड़ी से जाते थे.
अनिल धीर कहते हैं, "इनमें से ज्यादातर स्टीमर काफी पुराने थे और लगभग नष्ट होने की स्थिति में पहुंच गए थे. लंबे समय तक दूसरे रूट पर चलने के बाद उनको यहां छोटे-छोटे रूट पर चलाने के लिए भेज दिया जाता था."
सर जॉन लारेंस स्टीमर भी ऐसा ही था. कोलकाता के गंगा घाट से चलने वाले स्टीमर ओडिशा के चांदबाली तक जाते थे.
स्वामी विवेकानंद के भाई महेंद्रनाथ दत्त ने अपनी पुस्तक 'अजातशत्रु श्रीमत स्वामी ब्राह्मानंद' में इस यात्रा के रूट का जिक्र किया है.
उस पुस्तक का जो इंटरनेट संस्करण उपलब्ध है वह आखिरी बार 1939-40 में छपा था. उस पुस्तक के 64वें पेज पर महेंद्र दत्त ने लिखा है, "उस दौर में पुरी जाने वालो को चांदबाली तक जहाज से पहुंच कर वहां से बैलगाड़ी में यात्रा करनी पड़ती थी."
उस साल 25 मई को जब सर जॉन लारेंस ने कलकत्ता (अब कोलकाता) के दुर्गा प्रसाद छोटेलाल घाट से अपनी यात्रा शुरू की थी, उसके कुछ दिनों बाद ही आषाढ़ के महीने में जगन्नाथ मंदिर की रथयात्रा आयोजित होने वाली थी. इसी वजह से जहाज में भारी भीड़ थी.
अंग्रेजी अख़बारों में नियमित रूप से विज्ञापन छपता था. इंग्लिशमैन अख़बार के विज्ञापन में इस बात की भी सूचना रहती थी कि कलकत्ता से सीधे लंदन, भूमध्यसागर होकर यूरोप, कलकत्ता से डिब्रूगढ़ या बंबई से लीवरपुल कौन सा जहाज कब जाएगा.
उस अख़बार में 'सर जॉन लारेंस' के संचालन से संबंधित विज्ञापन में यह भी जोड़ दिया जाता था कि चांदबाली से एक अन्य स्टीमर यात्रियों को कटक तक ले जाएगा.
तूफ़ान का पूर्वानुमान

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'सर जॉन लारेंस' की समय सारिणी के साथ 'इंग्लिशमैन' अख़बार में 25 मई के कई दिनों पहले से ही नियमित रूप से विज्ञापन छप रहे थे.
इसके साथ ही यह पूर्वानुमान भी छप रहा था कि सागरद्वीप की ओर से शायद एक बड़ा तूफ़ान आ सकता है जिससे समुद्र काफी अशांत हो जाएगा.
'इंग्लिशमैन' अख़बार के 23 मई के संस्करण में मौसम से संबंधित खबर में सबसे पहले इस तूफ़ान के बारे में पूर्वानुमान छपा था.
विभिन्न मौसम विज्ञान केंद्रों की ओर से 22 मई को कलकत्ता भेजी गई सूचनाओं से पता चलता है कि डायमंड आइलैंड और सागर आइलैंड, दोनों जगह समुद्र काफी अशांत हो गया है.
लेकिन डायमंड हार्बर से इस बारे में कोई रिपोर्ट कोलकाता नहीं पहुंची कि 25 मई को सर जॉन लारेंस समेत जो दूसरे जहाज समुद्र की ओर रवाना हुए थे उससे ठीक पहले और बाद के कुछ दिनों के दौरान नदी या समुद्र की स्थिति कैसी रहेगी.
उस चक्रवाती तूफ़ान और 'सर जॉन लारेंस' समेत कई जहाजों को हुए नुकसान और बहुत से यात्रियों की मौत के बारे में कलकत्ता के पोर्ट ऑफिसर ने बंगाल सरकार के वित्त सचिव को दो जून को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी.
उस रिपोर्ट में कहा गया था कि उस समुद्री रूट के बारे में डायमंड हार्बर स्थित मौसम विज्ञान केंद्र की ओर से भेजी गई जानकारी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. लेकिन तूफ़ान के पहले 24 से 27 मई तक वहां से ऐसी कोई जानकारी ही नहीं आई थी.
दुर्घटना के बाद उस समय के अख़बारों में छपा था कि अंडमान के पोर्ट ब्लेयर से कलकत्ता के बीच अगर टेलीग्राफ़ सेवा शुरू हो गई होती तो समुद्री तूफ़ान का सटीक पूर्वानुमान मिल गया होता.
लापता जहाज

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उस समय अख़बारों में हर जहाज की आखिरी लोकेशन छापी जाती थी. 'इंग्लिशमैन' अख़बार के 26 मई के संस्करण में छपी खबर के मुताबिक़, पिछली रात सर जॉन लारेंस जहाज कलकत्ता से रवाना होकर सागरद्वीप के पास नदी के पश्चिमी चैनल में था.
उसके अगले दिन से जहाज की कोई और सूचना नहीं मिल सकी. लेकिन दूसरी ओर, अख़बारों में 'सर जॉन लारेंस 'की अगली यात्राओं के बारे में नियमित रूप से विज्ञापन छप रहे थे.
27 मई को उस जहाज के एजेंटों ने चांदबाली से कलकत्ता भेजे तार में कहा था कि 'सर जॉन लारेंस' वहां नहीं पहुंचा है. तब तक ब्रिटिश सरकार को पता चल गया था कि चक्रवाती तूफ़ान ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है.
इसी वजह से राहत और बचाव कार्य के लिए कलकत्ता से सरकारी स्टीमर 'रेसाल्यूट' और किराए के स्टीमर 'मद्रास' को रवाना किया गया.
उसके एक दिन बाद सबको इस बात का अंदेशा हो गया था कि 750 यात्रियों को लेकर रवाना होने वाला सर जॉन लारेंस शायद समुद्र में समाधि ले चुका है.
दूसरी ओर, कलकत्ता की ओर आने वाले 'नेपल' नामक एक जहाज के चालक ने 27 मई को कलकत्ता बंदरगाह पर एक तार भेजा था. उस जहाज ने सागरद्वीप के पास छोटे-बड़े कई जहाजों और स्टीमर के अवशेष देखे थे.
'नेपल' ने समुद्र की ओर सफर करने वाले गोडवा नामक एक जहाज को खींच कर ले जाने वाली रिट्रीवर के एक खलासी को भी जीवित बचाया था.
अब्दुल लतीफ़ नामक उस खलासी ने ही एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी के तौर पर सरकारी समिति के सामने उस दिन आने वाले विध्वंसकारी तूफ़ान का ब्योरा दिया था. हालांकि, लतीफ़ की आंखों देखी उससे पहले ही 'इंग्लिशमैन' अख़बार में छप चुकी थी.
लतीफ़ ने उसमें बताया था कि उन्होंने एक डूब चुके जहाज के मस्तूल के सहारे अशांत समुद्र में करीब 17 घंटे बिताए थे. इस दौरान वो करीब दो घंटे के लिए बेहोश भी हो गए थे. उसके बाद 'नेपल' जहाज उनको बचा कर कलकत्ता ले आया था.
यात्रियों की कोई सूची नहीं थी

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उस जहाज के डूबने की घटना ने इतना व्यापक असर डाला था कि अंग्रेजी और बांग्ला अख़बारों में इस बारे में नियमित तौर पर खबरें छप रही थीं.
चक्रवाती तूफ़ान में फंस कर डूबने वाले जहाजों में ज्यादातर भारतीय थे. लेकिन उनमें कुछ ब्रिटिश नागरिक भी थे.
अख़बारों में छपी खबरों के मुताबिक़, मरने वालों में कई जहाजों के दक्ष कप्तान भी शामिल थे. कई जहाजों और कारोबारियों को भारी नुकसान होने के कारण ब्रिटिश सरकार भी कुछ हिल गई थी.
कलकत्ता के शेरिफ ने असहाय भारतीय परिवारों की आर्थिक सहायता की मुहिम शुरू की थी. उसे वॉयसराय का समर्थन भी हासिल था.
सरकार ने जहाजों के डूबने की घटनाओं पर एक जांच समिति का भी गठन किया था. दूसरी ओर, अख़बार 'सर जॉन लारेंस' पर सवार किसी जीवित यात्री की तलाश में जुटे थे.
'रईस और रैयत' नामक एक भारतीय पत्रिका को हुगली के जनाई में कुछ जीवित यात्रियों का सुराग मिला था. लेकिन 'इंग्लिशमैन' अख़बार ने अपनी जांच में पाया कि वह सूचना सही नहीं है.
उस अंग्रेजी अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि जहाज कंपनी के पास सर जॉन लारेंस में सवार यात्रियों की कोई विस्तृत सूची ही नहीं थी.
रिपोर्ट में कहा गया था कि भविष्य में पूर्ण यात्री सूची के बिना कोई जहाज इस तरह बंदरगाह से यात्रा नहीं शुरू कर सके, इसका ध्यान रखना होगा.
जीवित यात्रियों के बारे में सूचना

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उस दौर के सरकारी दस्तावेजों और अख़बारों में उस हादसे में किसी भी यात्री के जीवित नहीं बचने की बात होने के बावजूद बाद में स्वामी विवेकानंद के भाई महेंद्र नाथ दत्त ने लिखा था कि सर जॉन लारेंस जहाज के दो यात्री जीवित लौटे थे.
स्वामी विवेकानंद के बचपन के मित्र और बाद में रामकृष्ण मठ और मिशन के पहले संघाध्यक्ष ब्रह्मानंद भी अपने कुछ साथियों के साथ सर जॉन लारेंस पर सवार हुए थे. संन्यास लेने से पहले उनका नाम राखाल था.
महेंद्र नाथ ने लिखा है, "बलराम बाबू के पिता के निधन के बाद उनके श्राद्ध के मौके पर लोगों को भोजन कराने के लिए तुलसीराम घोष और राखाल कई अन्य लोगों को लेकर सामान के साथ सर जॉन लारेंस पर सवार होकर कोटार जा रहे थे."
दत्त ने लिखा था, "वह जहाज डायमंड हार्बर पहुंचते ही तूफ़ान में फंस गया था. सौभाग्य से सारा सामान जहाज में रख कर दो लोग डायमंड हार्बर से कलकत्ता लौट आए. उसके कुछ दिनों बाद सूचना मिली कि सर जॉन लारेंस के डूबने से सैकड़ों लोगों की मौत हो गई है."
सौभाग्य से इस हादसे से एक और व्यक्ति जीवित बच गया था. हालांकि उनके मन में इस बात से असंतोष था कि पुरी जाने के रास्ते में जहाज डूबने से उनकी मौत क्यों नहीं हुई.
'रामतनु लाहिड़ी और तत्कालीन बंग समाज' पुस्तक में पंडित शिवनाथ शास्त्र ने उस घटना का जिक्र किया था.
साधारण ब्रह्म समाज के पहले अध्यक्ष मोहन बसु की माता उमा किशोरी को भी सर जॉन लारेंस से ही पुरी जाना था. जहाज डूबने की खबर मिलने के बाद उनके नाती-नातिनों ने उनको इसकी सूचना दी.
शिवनाथ शास्त्री ने लिखा था, "यह सुन कर खुश होने की बजाय उमा किशोरी रोने लगीं. उनका कहना था कि हाय मैंने पूर्वजन्म में ऐसा कौन सा पाप किया था? मैं उस जहाज पर क्यों नहीं थी?"
रेलवे रूट की मांग

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उस जहाज हादसे के बाद एक ओर भारतीय भाषाओं के अख़बार जहां लगातार सरकार की आलोचना कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर, कलकत्ता-हावड़ा के साथ कटक होकर पुरी को रेल मार्ग से जोड़ने की मांग भी जोर पकड़ने लगी थी.
हालांकि, ओडिशा के लोग पहले से ही यह मांग कर रहे थे. ओडिशा के इतिहास के शोधकर्ता डॉ. गणेश्वर नायक ने अपने एक शोध पत्र में लिखा है कि वर्ष 1866 में आए अकाल में ओडिशा की एक तिहाई आबादी की मौत हो गई थी.
उसके बाद ही ब्रिटिश सरकार को महसूस हुआ कि उसने ओडिशा पर ठीक से ध्यान नहीं दिया है. इसलिए वर्ष 1867 में फेमिन कमीशन यानी अकाल आयोग ने ओडिशा के विकास के लिए सड़कें, बंदरगाह और नहरें बनाने की सिफ़ारिश की थी. हालांकि उसने रेल मार्ग की बात नहीं कही थी.
डॉ. नायक ने लिखा है कि वर्ष 1881 में इंडियन फेमिन कमीशन ने सिफ़ारिश की कि अकाल जैसी परिस्थिति के मुकाबले के लिए इलाके में रेलवे संपर्क बढ़ाना जरूरी है.
आखिर में 'सर जॉन लारेंस' के डूबने के कुछ महीने पहले नौ मार्च,1887 को सरकार और बंगाल नागपुर कंपनी के बीच एक समझौता हुआ. इसके तहत नागपुर से छत्तीसगढ़ के बीच चालू रेलवे लाइन का ओडिशा तक विस्तार किया जाना था.
इधर, जहाज डूबने के बाद बंगाल की ओर से भी हावड़ा और कटक के बीच रेल संपर्क स्थापित करने का दबाव बढ़ रहा था.
शोधकर्ता अनिल धीर का कहना था, "रेल संपर्क की एक योजना पहले से ही बन रही थी. लेकिन आर्थिक पहलू को ध्यान में रखते हुए सरकार छत्तीसगढ़ और नागपुर के बीच रेल संपर्क पर ही ज्यादा ध्यान दे रही थी. लेकिन सर जॉन लारेंस के डूब जाने और कई अन्य जहाजों को भारी नुकसान पहुंचने की घटनाओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने कलकत्ता से कटक और अगले चरण में दक्षिण भारत के सात रेलवे संपर्क कायम करने की योजना को तेज़ कर दिया."
नवंबर, 1892 में हावड़ा-कटक रेल संपर्क के लिए सर्वेक्षण का निर्देश जारी किया गया.
दक्षिण पूर्व रेलवे की वेबसाइट से मिली जानकारी के मुताबिक, इस मार्ग पर पटरियां बिछाने का काम पूरा होने के बाद ट्रेनों की आवाजाही वर्ष 1899-1900 में शुरू हुई.
इतिहास की तलाश

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सात साल पहले इंटरनेट पर संगमरमर से बने एक धुंधले स्मृति फलक की तस्वीर पर निगाह पड़ी थी. उसके साथ एक लेख भी था.
कुछ अंग्रेज महिलाओं ने उस स्मृति फलक को गंगा घाट पर स्थापित किया था. इस पर लिखा था कि 'सर जॉन लारेंस' जहाज में डूबने वाली महिलाओं और शिशुओं की स्मृति में ही कुछ अंग्रेज महिलाओं ने उसे वहां लगवाया था.
बाद में पता चला चला कि लाल घाट पर यह स्मृति पटल अभी भी मौजूद है. यहां घाट पर मुझे वह धुंधला स्मृति फलक नज़र आ गया.
उस पट्टिका पर अंग्रेजी और बंगाली में लिखा है, "साल 1887 की 25 मई तारीख को एक क्षण में सर जॉन लारेंस नामक भाप से चलने वाले जहाज के साथ जो तमाम तीर्थयात्री, ज्यादातर महिलाएं, जलमग्न हुए हैं, उनकी याद में कुछ अंग्रेजी महिलाओं की ओर से यह स्मृति फलक लगाया गया है."
यही स्मृति फलक कोलकाता के सबसे भयावह जहाज हादसे की एकमात्र याद के तौर पर 137 साल बाद आज भी खड़ा है.
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