कितनी कारगर थी वाजपेयी और आडवाणी की ‘जुगलबंदी’?- विवेचना

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
1996 के चुनाव से कुछ महीने पहले मुंबई के शिवाजी पार्क में भारतीय जनता पार्टी ने एक बड़ी रैली का आयोजन किया.
68 साल के लाल कृष्ण आडवाणी लगभग एक दशक से पार्टी के अध्यक्ष थे. उन्होंने राम मंदिर आंदोलन चला कर पार्टी को एक नई दिशा और तेवर प्रदान किए थे.
आडवाणी से बड़े 70 साल के वाजपेयी तब तक पार्टी नेतृत्व की दौड़ में पिछड़ गए थे. पार्टी में उनका सम्मान ज़रूर था लेकिन जब भी कभी पार्टी के भावी प्रधानमंत्री उम्मीदवार की बात की जाती थी आडवाणी का नाम सबसे पहले लिया जाता था.
लेकिन उस दिन शिवाजी पार्क की जनसभा में जब आडवाणी ने पार्टी के भावी प्रधानमंत्री उम्मीदवार के लिए वाजपेयी के नाम की घोषणा की तो वहां मौजूद लोग अपने कानों पर विश्वास नहीं कर पाए.
22 मई, 1996 को आउटलुक पत्रिका में छपे लेख 'अ टेल ऑफ़ टू चीफ़्स में' बताया गया कि "जब वाजपेयी ने आडवाणी से सवाल किया कि इतनी महत्वपूर्ण घोषणा करने से पहले उनकी सहमति क्यों नहीं ली गई तो आडवाणी ने उलटा उन्हीं से सवाल किया, अगर मैंने आप से पूछा होता तो क्या आपने मेरे प्रस्ताव को हाँ कहा होता?"

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ऐलान करने के बारे में आरएसएस से सहमति नहीं ली
वाजपेयी-आडवाणी संबंधों पर हाल में बहुचर्चित किताब 'जुगलबंदी-द बीजेपी बिफ़ोर मोदी' लिखने वाले विनय सीतापति बताते हैं कि उस समय बीजेपी के महासचिव रहे गोविंदाचार्य ने उन्हें बताया था कि इस घोषणा के बाद उन्होंने आडवाणी से सवाल किया था कि आप आरएसएस से पूछे बिना इतनी महत्वपूर्ण घोषणा कैसे कर सकते हैं?
उन्होंने बताया कि "आडवाणी का जवाब था कि 'अगर मैंने इस बारे में संघ से सलाह ली होती तो उन्होंने हामी नहीं भरी होती'."
सीतापति बताते हैं, "यहां तक कि अयोध्या आंदोलन में बीजेपी के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रहे विश्व हिंदू परिषद को भी इसकी हवा नहीं थी. परिषद के नेता अशोक सिंघल ने भी माना था कि मुझे नहीं पता था कि आडवाणी वाजपेयी के नाम का ऐलान करने वाले हैं."
आडवाणी ने अपनी आत्मकथा 'माई कंट्री माई लाइफ़' में लिखा है, "मैंने जो किया वो कोई बलिदान नहीं था. वो एक तार्किक आकलन का नतीजा था कि क्या सही है और पार्टी और देश के हित में क्या है."
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मैंने विनय सीतापति से पूछा कि आडवाणी के इस फ़ैसले के पीछे क्या वजह रही होगी. उनका जवाब था कि बीजेपी के सहयोगी दलों को आडवाणी की तुलना में वाजपेयी ज़्यादा स्वीकार्य थे.
वो कहते हैं, "हो सकता है कि उस समय आडवाणी बीजेपी को अधिक वोट दिलवा पाते लेकिन उन्हें सरकार बनाने के लिए सहयोगी दल नहीं मिलते. उस समय तृणमूल कांग्रेस के नेता दिनेश त्रिवेदी ने मुझसे कहा था कि आडवाणी बहुत चतुर नेता हैं, अगर बीजेपी ने आडवाणी को अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाया होता तो हमने बीजेपी का समर्थन नहीं किया होता. दूसरे पार्टी के अंदर विद्रोहियों को मनाने की जितनी क्षमता वाजपेयी के पास थी, आडवाणी के पास नहीं थी."

जवाहरलाल नेहरू थे वाजपेयी के मुरीद
वाजपेयी जब 1957 में बलरामपुर से चुनाव जीत कर लोकसभा में पहुंचे तो उनकी उम्र थी 33 साल. लोकसभा में घुसते ही उन्होंने सबको अपने भाषणों से प्रभावित करना शुरू कर दिया था. उनके मुरीदों में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी थे.
मशहूर पत्रकार आर वी पंडित एक किस्सा सुनाते हैं, "जब सोवियत प्रधानमंत्री निकिता ख़्रुश्चेव भारत आए तो नेहरू ने वाजपेयी का परिचय कराते हुए कहा कि था कि ये भविष्य में भारत के प्रधानमंत्री बन सकते हैं. ख़्रुश्चेव ने तब हँसते हुए चुटकी ली थी, 'तब ये यहाँ क्या कर रहे हैं? हमारे देश में तो हमने इन्हें गुलाग (एक तरह की जेल जहाँ सरकार के विरोधियों को रखा जाता था) में भिजवा दिया होता'."
उन्हीं दिनों लाल कृष्ण आडवाणी को नव-निर्वाचित वाजपेयी की मदद करने के लिए दिल्ली लाया गया था.

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आडवाणी सबसे पहले वाजपेयी के सरकारी निवास 30 राजेंद्र प्रसाद रोड में रुके थे. आडवाणी को शुरू से ही फ़िल्में देखने का शौक था. कभी-कभी वाजपेयी भी उनके साथ फ़िल्म देखने जाते थे.
उन्हीं दिनों ऑर्गनाइज़र के संपादक के आर मलकानी ने अपने अख़बार के लिए आडवाणी को फ़िल्म समीक्षा लिखने की ज़िम्मेदारी दी थी. आडवाणी 'नेत्र' नाम से ऑर्गनाइज़र में फ़िल्म समीक्षाएं लिखने लगे.
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शुरू में वाजपेयी ने आडवाणी को बराबरी का दर्जा नहीं दिया
1967 में जहाँ वाजपेयी एक बार फिर चुनाव जीत कर लोकसभा में आए, आडवाणी दिल्ली महानगर परिषद के अध्यक्ष चुने गए.
वाजपेयी के नज़दीकी रहे एमएम घटाटे बताते हैं कि "इस समय तक वाजपेयी आडवाणी को अपना जूनियर ही समझते थे. उनके साथ रहने में उन्हें मज़ा ज़रूर आता था लेकिन उन्होंने अभी तक उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया था."
आर वी पंडित कहते हैं कि "वाजपेयी आडवाणी की पत्नी कमला को बहुत मानते थे. आडवाणी के घर में उनकी पत्नी की ही चलती थी. वो अपने पति को आडवाणी कह कर पुकारती थीं. अगर आडवाणी और वाजपेयी के बीच कभी कोई तनाव होता तो कमला ही मसलों को सुलझाती थीं. वो वाजपेयी का बहुत आदर करती थीं."

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अयोध्या पर वाजपेयी और आडवाणी के विचार एक नहीं थे
70 का दशक आते-आते वाजपेयी और आडवाणी के संबंधों में प्रगाढ़ता आनी शुरू हो गई थी. दोनों साथ-साथ फ़िल्में देखते और उसके बाद गोलगप्पे खाते.
उस ज़माने के जनसंघ के एक नेता का कहना है कि वाजपेयी ने आडवाणी को इसलिए चुना क्योंकि वो अच्छी अंग्रेज़ी बोलते थे और उन पर विश्वास किया जा सकता था.
वाजपेयी और आडवाणी के संबंधों के बीच पहली दरार अयोध्या आंदोलन के दौरान दिखाई पड़ी.
विनय सीतापति बताते हैं, "जैसे ही आडवाणी की अयोध्या रथ यात्रा शुरू हुई इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारियों ने दिल्ली में वाजपेयी से मिल कर उन्हें भारत के कई हिस्सों में हिंदु-मुसलमान हिंसा के टेप दिखाए. वाजपेयी ने तुरंत आडवाणी को फ़ोन कर रथ यात्रा रोक देने का अनुरोध किया. उनके शब्द थे कि 'आप शेर की सवारी कर रहे हैं', लेकिन आडवाणी ने वाजपेयी की सलाह मानने से इंकार कर दिया और अपनी रथ यात्रा जारी रखी."
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वाजपेयी के जीवनीकार विजय त्रिवेदी अपनी किताब 'हार नहीं मानूँगा' में लिखते हैं, "वाजपेयी का ये मानना था कि वीपी सिंह की सरकार नहीं गिरनी चाहिए."
लेकिन वाजपेयी की आवाज़ सुनी नहीं गई. पार्टी ने तय किया कि अगर आडवाणी को रथ से उतरने के लिए बाध्य किया गया तो तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह को भी अपनी कुर्सी से उतरना होगा.
विनय सीतापति बताते हैं कि "जब वाजपेयी पार्टी में अलग-थलग पड़ गए तो उन्होंने 5 दिसंबर को लखनऊ जा कर उस अयोध्या आंदोलन के समर्थन में ज़ोरदार भाषण दिया जिसका उन्होंने हमेशा विरोध किया था. इस मौके का फ़ायदा उठा कर पार्टी से अलग होने के बजाए वाजपेयी ने संसद में पार्टी का ज़बरदस्त बचाव किया."
वो कहते हैं, "वाजपेयी का यह चरित्र बाद में कई बार दिखाई दिया. 2002 के गुजरात दंगों के बाद भी उन्होंने शुरू में नरेंद्र मोदी का विरोध किया लेकिन जब पार्टी उनके साथ खड़ी नहीं दिखाई दी तो उन्होंने अपना रुख़ बदल दिया."

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'मुखौटा' कहे जाने पर वाजपेयी की तीव्र प्रतिक्रिया
1997 में बीजेपी के महासचिव गोविंदाचार्य ने ब्रिटिश राजनयिकों से ये कहकर बहुत बड़े विवाद को जन्म दे दिया कि "संगठन के अंदर वाजपेयी के पास वास्तविक ताकत नहीं हैं. वो मात्र एक मुखौटा हैं. बीजेपी में असली ताकत आडवाणी के पास है. जो भी पार्टी का अध्यक्ष हो, बीजेपी को आडवाणी ही चलाएंगे और उनका फ़ैसला ही अंतिम होगा."
वाजपेयी उन दिनों बुल्गारिया की यात्रा पर गए हुए थे. वहाँ से लौटने के बाद उन्होंने दो पत्र लिखे.
पहला पत्र आडवाणी को संबोधित था. पत्र में उन्होंने लिखा, "विदेश यात्रा से लौटने के बाद मैंने श्री गोविंदाचार्य का दिया इंटरव्यू पढ़ा है. आपने भी इसे पढ़ा होगा. आपको विजयादशमी की शुभकामनाएं."
दूसरा पत्र उन्होंने गोविंदाचार्य को भेजा जिसमें उनके इस कथन पर उनकी सफ़ाई माँगी.

इंडिया टुडे ने अपने 27 अक्तूबर, 1997 के अंक में लिखा, "वाजपेयी फ़ोन उठा कर भी आडवाणी से बात कर सकते थे. लेकिन उन्हें पता था कि गोविंदाचार्य आडवाणी के शिष्य हैं और आरएसएस से ख़ासतौर से बीजेपी में उनका असर कम करने के लिए भेजे गए हैं. इन पत्रों के ज़रिए वो आरएसएस को ये संदेश देना चाहते थे कि इस समय उनको वाजपेयी की ज़्यादा ज़रूरत है."
कुछ दिनों बाद एक वरिष्ठ बीजेपी और आरएसएस नेता के पुस्तक विमोचन समारोह में वाजपेयी ने अपने दर्द को बयान करते हुए कहा, "मुझे आश्चर्य है कि मुझे यहाँ बुलाया क्यों गया है अगर मैं पार्टी का मुखौटा भर हूँ?'
एक दूसरे समारोह में जब आडवाणी उनकी बगल में बैठे हुए थे तो वाजपेयी ने फिर दोहराया "अब तो मैं बीजेपी का चेहरा भी नहीं रहा. मैं तो उसका मुखौटा भर हूँ."
बाद में वाजपेयी ने आरएसएस के शीर्ष नेताओं को अपने निवास पर बुला कर पूछा कि क्या आरएसएस की भी यही सोच है? इन सब का नतीजा ये हुआ कि गोविंदाचार्य को दरकिनार कर दिया गया. आडवाणी गोविंदाचार्य को पसंद ज़रूर करते थे लेकिन वाजपेयी के प्रति उनकी जीवनपर्यंत निष्ठा के सामने ये पसंद कुछ भी नहीं थी.
वाजपेयी और आडवाणी दोनों के नज़दीक रहे सुधींद्र कुलकर्णी का मानना है कि "आडवाणी का कभी भी मानना नहीं था कि वाजपेयी एक मुखौटा हैं. उनकी नज़र में वो वैचारिक नेता और सबसे बड़े जन नेता - दोनों थे."

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ब्रजेश मिश्रा बने संबंधों में खटास का कारण
1998 में सत्ता में आने के बाद वाजपेयी और आडवाणी के संबंधों को सबसे बड़ी ठेस पहुंची ब्रजेश मिश्रा की वाजपेयी से करीबी के कारण.
भारत में प्रधानमंत्री के प्रधान सचिवों द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की पुरानी परंपरा रही है. इंदिरा गांधी के ज़माने में पीएन हक्सर और पीसी एलेक्ज़ेंडर और नरसिम्हा राव के ज़माने में अमरनाथ वर्मा की तूती बोला करती थी.
ब्रजेश मिश्रा के साथ ख़ास बात ये थी कि वो न सिर्फ़ अपने बॉस के सलाहकार थे बल्कि उनके सबसे ख़ास दोस्त भी थे. ब्रजेश मिश्रा ने एक बार मशहूर स्तंभकार प्रताप भानु मेहता को बताया था कि "वाजपेयी हर एक बात को ध्यान से सुनते थे लेकिन कोई भी फ़ैसला करने से पहले वो मेरी तरफ़ देख कर पूछते थे, 'पंडितजी जेल तो नहीं जाएंगे न'."
विनय सीतापति बताते हैं, "प्रधानमंत्री देर से सो कर उठा करते थे. अपना पसंदीदा अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स पढ़ने के बाद वो नाश्ता करने बैठते थे. मेज़ पर उनका परिवार उनके साथ होता था और उनके पॉमेरेरियन कुत्ते उनके अगल-बगल मंडराते रहते थे."
"तभी ब्रजेश मिश्रा और उनके दामाद रंजन भट्टाचार्य भी वहाँ पहुंच जाते थे. वहाँ पर ही दिन भर का एजेंडा तय होता था. नाश्ते के दौरान होने वाली उस बैठक में आडवाणी कभी नहीं देखे गए. ये सरकार की सबसे महत्वपूर्ण बैठक होती थी और ये सिर्फ़ प्रधानमंत्री, ब्रजेश मिश्र और रंजन भट्टाचार्य के बीच हुआ करती थी."

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आडवाणी कार्यवाहक प्रधानमंत्री नहीं बनाए गए
आडवाणी वाजपेयी की कैबिनेट में नंबर दो पर नहीं थे, पहली बार इसकी झलक अक्तूबर, 2000 में तब मिली जब वाजपेयी अपने घुटनों के ऑपरेशन के लिए मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती हुए.
वो जितने दिनों तक अस्पताल में रहे उतने दिनों तक ब्रजेश मिश्रा के नेतृत्व में प्रधानमंत्री कार्यालय मुंबई से काम करता रहा. इस दौरान आडवाणी को कार्यवाहक प्रधानमंत्री नहीं बनवाया गया.
हिंदू अख़बार के 10 अक्तूबर, 2000 के अंक में केके कत्याल ने 'वाई इज़ डेल्ही विदआउट एन एक्टिंग पीएम' शीर्षक से लेख लिख कर इस फ़ैसले पर सवाल भी उठाए.

वाजपेयी को राष्ट्रपति, आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने की मुहिम
अप्रैल 2002 में आरएसएस के प्रमुख रहे रज्जू भैया ने वाजपेयी के निवास स्थान पर जा कर उनके सामने प्रस्ताव रखा कि वो क्यों नहीं अगले राष्ट्रपति बन जाते और आडवाणी को प्रधानमंत्री बना देते?
आडवाणी के नज़दीकी लोगों का मानना है कि आडवाणी को इस प्रस्ताव की हवा नहीं थी और न ही इस बारे में आरएसएस के भीतर कोई चर्चा की गई थी. अगले दिन रज्जू भैया ने आडवाणी के साथ भी नाश्ते पर वाजपेयी को दिए अपने सुझाव की चर्चा की थी.
संघ परिवार को नज़दीक से जानने वाले और इस समय इंदिरा गाँधी सेंटर ऑफ़ आर्ट्स के प्रमुख राम बहादुर राय ने मुझे बताया था, कि "रज्जू भैया ने वाजपेयी से कहा था कि हमें दूसरी कतार में खड़े लोगों को भी मौक़ा देना चाहिए. रज्जू भैया ने स्वयं अपना पद छोड़ कर के सी सुदर्शन के लिए रास्ता खाली कर दिया था, इसलिए वो ये अनुरोध करने के लिए हकदार भी थे."
"जब उन्होंने वाजपेयी से ये कहा तो उन्होंने उन्हें मना तो नहीं किया लेकिन उन्होंने ये अंदाज़ा लगाया कि ये लाल कृष्ण आडवाणी का प्रायोजन है. उन्होंने बहुत चतुराई से इस योजना को विफल कर दिया और उसी सिलसिले में राष्ट्रपति पद के लिए एपीजे अब्दुल कलाम का नाम आगे किया गया."

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मतभेद के बावजूद साथ निभाया
विनय सीतापति बताते हैं, "आडवाणी ने अपने आपको एक हिंदुवादी नेता से अधिक दिखाया जितने कि वो वास्तव में थे और वाजपेयी अपने आप को नेहरूवादी-उदारवादी के साँचे में ढला दिखाते रहे जो कि वो शायद नहीं थे. सच्चाई ये है कि दोनों ने ही मुखौटे पहन रखे थे."
वाजपेयी और आडवाणी की जुगलबंदी का एक और दिलचस्प पहलू है कि दोनों ने एक नहीं दो बार एक दूसरे के नेतृत्व में काम किया. 1957 से 1985 तक वाजपेयी नेता थे लेकिन जब इसके बाद 1986 से 1995 तक जब राजनीति ने उग्र मोड़ लेना शुरू किया तो आडवाणी वाजपेयी के नेता बन गए.
वल्लभभाई पटेल ने हमेशा जवाहरलाल नेहरू के मातहत काम किया. उसी तरह जे जयललिता और मायावती ने हमेशा एमजीआर और काँशीराम को अपना नेता माना. दोनों ने सत्ता पाने की इच्छा तभी प्रकट की जब उनके नेता इस दुनिया में नहीं रहे. इस लिहाज़ से वाजपेयी और आडवाणी की टीम भावना का कोई सानी नहीं है, ख़ासकर उस देश में जहां ये परंपरा है कि अगर किसी अफ़सर को उसके सीनियर के ऊपर तरक्की दी जाती है तो वो उसके मातहत काम करने के बजाए अपने पद से इस्तीफ़ा देना अधिक पसंद करता है.

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क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि बराक ओबामा एक दिन अपने कार्यकाल के दौरान उप-राष्ट्रपति रहे जो बाइडन के नेतृत्व में काम करने के लिए राज़ी हो जाएं?
वाजपेयी और आडवाणी में एक तरह की सहमति थी कि आडवाणी संगठन के मामले देखेंगे और सरकार चलाने की ज़िम्मेदारी वाजपेयी की रहेगी. दोनों के संबंधों में तनाव ज़रूर आया लेकिन जब भी वाजपेयी को पार्टी के भीतर बलराज मधोक, एमएल सोंधी, सुब्रमण्यम स्वामी और गोविंदाचार्य जैसे लोगों से चुनौती मिली आडवाणी उनके समर्थन में खुल कर आगे आए.
इसी तरह जब मुरली मनोहर जोशी ने आडवाणी के ख़िलाफ़ माहौल बनाने की कोशिश की तो उन्हें वाजपेयी ने अपना समर्थन नहीं दिया. इन दोनों के संबंधों पर जबसे दिलचस्प टिप्पणी शेखर गुप्ता की तरफ़ से आई.
उन्होंने कहा "आडवाणी और वाजपेयी उस बृद्ध दंपत्ति की तरह हैं जो आपको अक्सर पार्क में बैठे दिख जाते हैं. वो लड़ते ज़रूर हैं लेकिन अगर कोई उन दोनों के बीच आता है तो वो एक दूसरे का बचाव करने लगते हैं."
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