भारत में धर्मनिरपेक्षता का क्या अब कोई भविष्य नहीं है?

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के 75वें गणतंत्र दिवस के चार दिन पहले यानी 22 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यजमान बनकर अयोध्या में नए राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा करवाई.
अब से तकरीबन 73 साल पहले भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद भी गुजरात के सोमनाथ मंदिर में ऐसे ही आयोजन में शामिल हुए थे.
सोमनाथ मंदिर पर अफ़गान हमलावरों ने कई बार हमले किए, उसे नुक़सान पहुँचाया, सबसे ज़्यादा नुक़सान महमूद ग़ज़नी के 11वीं सदी के हमले में हुआ था.
आज़ादी के बाद फिर से इस मंदिर का निर्माण किया गया और राजेंद्र प्रसाद की मौजूदगी में मंदिर में पूजा अर्चना की शुरुआत हुई थी.
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस बात से सहमत नहीं थे कि देश के राष्ट्रपति को इस धार्मिक आयोजन में हिस्सा लेना चाहिए.
1951 में नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को लिखा था, "प्रिय राजेंद्र बाबू, मैं सोमनाथ मामले को लेकर बहुत चिंतित हूँ. जैसा कि मुझे डर था कि इस मामले के राजनीतिक मायने निकाले जाएँगे, हमसे पूछा जा रहा है कि एक धर्मनिरपेक्ष सरकार ऐसे आयोजनों से कैसे जुड़ सकती है. ख़ास तौर पर जब इस कार्यक्रम को धार्मिक पुनरुत्थान के रूप में पेश किया जा रहा है."
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिन्दुत्व की राजनीति से निकले हैं और नेहरू ब्रिटिश साम्राज्य से आज़ादी की लड़ाई से निकले थे.
नेहरू का राष्ट्रवाद उपनिवेशवाद का विरोधी था, जिसके केंद्र में बहुसंख्यकवाद नहीं बल्कि बहुलतावाद था.
मोदी का राष्ट्रवाद उनकी पार्टी के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस का राष्ट्रवाद है. कई इतिहासकार मानते हैं कि आरएसएस ने उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रवाद की जगह धर्म आधारित राष्ट्रवाद को अपनाया.
अयोध्या का होना भारतीय पहचान का फिर से उभार है. हम इतिहास को करेक्ट नहीं कर सकते लेकिन पहले कोई स्वीकार भी नहीं करता था कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी.
हिन्दुत्व और आज़ादी के लिए साझा संघर्ष

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नेहरू के राष्ट्रवाद में भारत को ब्रिटिश साम्राज्य का ग़ुलाम माना जाता है जबकि मोदी और आरएसएस भारत को 1200 सालों तक ग़ुलाम मानते हैं.
आरएसएस पूरे मध्यकाल के भारत को ग़ुलाम ही मानता है. ऐसे में मुसलमान शासकों के प्रतीकों और उनके निर्माणों को हटाना आरएसएस और बीजेपी की विचारधारा का हिस्सा है.
नेहरू चाहते थे कि धार्मिक कार्यक्रमों से सरकार दूर रहे जबकि मोदी ख़ुद ही राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा आयोजन में यजमान बने. इतिहासकार मुकुल केसवन इन दोनों वाक़यों को भारतीय राजनीति के लिए काफ़ी अहम मानते हैं.
मुकुल केसवन ने बीबीसी से कहा, "नेहरू, धर्म और राज्य के बीच की जो लक्ष्मण रेखा थी, उसे किसी भी हाल में तोड़ना नहीं चाहते थे. दूसरी तरफ़ नरेंद्र मोदी ने धर्म और राज्य के बीच की लक़ीर लगभग मिटा दी है. अयोध्या में राम मंदिर एक शक्तिशाली धार्मिक प्रतीक तो है ही लेकिन मुख्य रूप से यह बहुसंख्यकों के वर्चस्व का एक राजनीतिक संदेश है.''
उन्होंने कहा, '' संघ और उसके नेताओं की अन्य कई मस्जिदों को लेकर जो योजना है, उस कड़ी में बाबरी पहली मस्जिद है, जिस पर जीत की खुलेआम घोषणा की गई. बहुसंख्यकों की भावनाओं को लगातार उकसाने और अल्पसंख्यकों को डराने की यह कोशिश भारतीय गणतंत्र की लोकतांत्रिक नींव नष्ट कर देगी."
इसी महीने बनारस की ज्ञानवापी मस्जिद में हिन्दू पुजारियों को पूजा करने की अनुमति कोर्ट ने दे दी है. निचली अदालत के इस फ़ैसले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है.
मथुरा में भी मस्जिद को लेकर इसी तरह की मांग हो रही है.
कई लोग मानते हैं कि 1925 में आरएसएस अपने गठन के बाद से ही कांग्रेस के उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रवाद के बरक्स जिस हिन्दू बहुसंख्यक राष्ट्रवाद को स्थापित करना चाहता था, वो अब पूरा होता दिख रहा है.
मुकुल केसवन कहते हैं, "हिन्दुत्व की राजनीति जानबूझकर इतिहास को फिर से लिखने और उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रवाद को नीचा दिखाने की कोशिश कर रही है. आज़ादी के आंदोलन में आरएसएस और हिन्दू महासभा की भूमिका न के बराबर रही है. ये संगठन बहुलतावादी राष्ट्रवाद के नेता गांधी और उनके विचारों से गहरा बैर रखते थे."

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बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और लेखक सपन दासगुप्ता राज्यसभा सांसद भी रहे हैं.
दासगुप्ता ऐसा नहीं मानते हैं कि राम मंदिर बनने और वहाँ प्राण प्रतिष्ठा आयोजन में पीएम मोदी के जाने से भारत की धर्मनिरपेक्षता ख़तरे में पड़ गई है.
दासगुप्ता ने बीबीसी से कहा,"देखिए आप संवैधानिक पहचान और सांस्कृतिक पहचान को अलग नहीं कर सकते हैं. दोनों एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं. इस लिहाज़ से देखें तो नेहरूवादी जिस धर्मनिरपेक्षता को अपनाने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें लगता था कि संवैधानिक पहचान का सांस्कृतिक पहचान से कोई संबंध नहीं है. इन्हें लगता था कि भारत 1950 में बना था लेकिन भारत 1950 में नहीं बना था. भारत हज़ारों सालों से था."
दासगुप्ता कहते हैं, "मुझे लगता है कि अयोध्या का होना भारतीय पहचान का फिर से उभार है. हम इतिहास को करेक्ट नहीं कर सकते लेकिन पहले कोई स्वीकार भी नहीं करता था कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी. आप इतिहास को कम-से-कम स्वीकार तो कीजिए. राम मंदिर का बनना इतिहास को सुधारना नहीं है लेकिन इतिहास की ग़लतियां याद तो कराई जा सकती हैं."
मध्यकालीन भारत में पूजा स्थलों पर हमले को क्या आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में हिन्दू बनाम मुस्लिम के रूप में देखना चाहिए?
भारत के जाने-माने समाज विज्ञानी असग़र अली इंजीनियर कहते थे, ''पहले के शासकों का पूजा स्थलों को नष्ट करना युद्ध या आक्रमण में विजय का प्रतीक था, इसे हिन्दू बनाम मुसलमान के रूप में देखना सही नहीं है.''
सपन दासगुप्ता कहते हैं, "इसमें कोई शक नहीं है कि हिन्दुत्व एक राजनीतिक विचारधारा है. धर्म इसका पार्ट है. मैं भी मानता हूँ कि राज्य और धर्म को एक नहीं करना चाहिए. अयोध्या में राज्य शामिल था लेकिन राज्य ख़ुद को इतना भी अलग नहीं कर सकता. मुझे नहीं लगता है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता ख़तरे में है. अगर धर्म के आधार पर भेदभाव होता है, तो ऐसा कह सकते हैं."
बीजेपी अभी भारी बहुमत के साथ सत्ता में है और भारतीय गणतंत्र को अपने हिसाब से गढ़ रही है.
भारत की सांप्रदायिक और धार्मिक बहुसंख्यकवाद की राजनीति पर किताब लिख चुके राम पुनयानी कहते हैं, "आरएसस को लगता है कि 1947 से 1950 के बीच भारत का जो संविधान लिखा गया, उसमें भारत की आत्मा कुचल दी गई थी और अब उसके पास मौक़ा है कि संविधान को अपने हिसाब से बना सके."
अयोध्या में राम मंदिर एक शक्तिशाली धार्मिक प्रतीक तो है ही लेकिन मुख्य रूप से यह बहुसंख्यकों के वर्चस्व का एक राजनीतिक संदेश है.
भारत और यूरोप की धर्मनिरपेक्षता

पश्चिम में धर्मनिरपेक्षता का उभार धार्मिक राज्यों के अत्याचार के ख़िलाफ़ आंदोलन से शुरू हुआ था. यह आंदोलन व्यक्तिगत आज़ादी के लिए था क्योंकि धर्म का हस्तक्षेप ज़्यादा था.
चर्च की सत्ता ज़्यादा मज़बूत थी. कई लोग मानते हैं कि यूरोप में पूंजीवाद और व्यापार के विस्तार के साथ जिस वर्ग का उदय हुआ वही धर्मनिरपेक्षता की वकालत करता था लेकिन यूरोप में अल्पसंख्यक उसी धार्मिक राज्य में रहने के लिए अभिशप्त थे.
भारत में कांग्रेस के लिए शुरुआत में धर्मनिरपेक्षता राज्य को धर्म से अलग करने वाला विचार था लेकिन औपनिवेशिक शासन की नीतियाँ और भारतीयों के अलग-अलग समूहों के रुख़ की वजह कांग्रेस को भी धर्मनिरपेक्षता के मोर्चे पर बदलना पड़ा.
आज़ादी के बाद भारत की धर्मनिरपेक्षता में सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करने के प्रति प्रतिबद्धता जताई गई.
नेहरू ने सेक्युलरिज़्म पर 1961 में कहा था, ''हम भारत में एक सेक्युलर स्टेट की बात करते हैं लेकिन हिन्दी में शायद 'सेक्युलर' के लिए एक अच्छा शब्द खोजना आसान नहीं है. कुछ लोग सोचते हैं कि सेक्युलर का मतलब धर्म का विरोध करने जैसा है. ज़ाहिर है, यह सच नहीं है. इसका मतलब यह है कि स्टेट सभी धर्मों का समान रूप से आदर करेगा और सभी धर्म के लोगों को बराबर मौक़ा देगा.''
कोलंबिया यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के प्रोफ़ेसर अकील बिलग्रामी ने पिछले महीने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में कहा था, "भारत की धर्मनिरपेक्षता तीन प्रतिबद्धताओं से बनी है. पहली धार्मिक आस्था और उसके पालन की आज़ादी. दूसरी संविधान के बुनियादी अधिकार जैसे- समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लैंगिक समानता सुनिश्चित करने में धर्म की कोई भूमिका नहीं होगी. तीसरी प्रतिबद्धता यह है कि अगर पहले और दूसरे में कोई टकराव होता है तो दूसरी प्रतिबद्धता को अनिवार्य रूप से प्राथमिकता मिलनी चाहिए."
प्रोफ़ेसर बिलग्रामी कहते हैं, "महात्मा गांधी को लगता था कि यूरोप को धार्मिक बहुसंख्यकवाद से जो नुक़सान पहुँचा, उसकी भरपाई के लिए धर्मनिरपेक्षता के विचार को लाया गया. ऐसे में गांधी सोचते थे कि इस तरह का नुक़सान भारत के धार्मिक बहुसंख्यकों ने नहीं किया है इसलिए यहाँ उस तरह की धर्मनिरपेक्षता की ज़रूरत नहीं है. भारतीय संदर्भ में यह अप्रासंगिक था. गांधी के लिए राष्ट्रवाद का मतलब उपनिवेशवाद का विरोध था. ऐसे में भारत का राष्ट्रवाद भी यूरोप के राष्ट्रवाद से अलग और बहुलतावादी है."

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भारत के जाने-माने समाजविज्ञानी और मनोवैज्ञानिक आशीष नंदी ने भारत की धर्मनिरपेक्षता पर कहा था, "भारतीय सहिष्णुता आस्था पर आधारित है. अकबर और अशोक ने कभी सेक्युलरिज़्म के बारे में नहीं सुना था. अकबर मुसलमान थे और वह उनका उदार इस्लाम था. अशोक बौद्ध थे और उनका बुद्धिज़्म उदार था. अशोक और अकबर की विचारधारा लोगों के लिए ज़्यादा सहज थी न कि आज के सेक्युलरिज़्म की विचारधारा. ऐसे शब्द के इस्तेमाल का क्या मतलब है जिससे लोग ख़ुद को जुड़ा महसूस नहीं करते हैं."
क्या भारत में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा नाकाम हो रही है? या फिर धर्मनिरपेक्षता को अलग तरह से देखने की ज़रूरत है? धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों को बचाने के लिए राजनीतिक वर्ग और समाज को क्या करना चाहिए?
मुकुल केसवन इसके जवाब में कहते हैं, "हमें मौजूदा समय में सेक्युलरिज़्म के अमूर्त तर्क में नहीं जाना चाहिए. हमें संवैधानिक अधिकारों को लागू करने ज़रूरत है. नागरिकता के लिए सीएए के तहत धार्मिक पहचान को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, उसे रोकना चाहिए. अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ भेदभाव करने वाले क़ानूनों को वापस लेना चाहिए. नागरिकों की आजीविका पर धार्मिक पहचान के आधार पर हमले रुकने चाहिए.''
वो कहते हैं, '' मिसाल के तौर पर यूपी पुलिस मांस के व्यापार में शामिल मुसलमानों को निशाना बना रही है. बीजेपी ने बहुसंख्यक मतदाताओं के मन में यह भावना भर दी है कि मुसलमानों को यह दिखाने का वक़्त आ गया है कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है. इसके साथ ही मुसलमानों का अपमान देश की बढ़ती सियासी ताक़त के प्रतीक के रूप में पेश किया जा रहा है."
केसवन कहते हैं कि धर्मनिरपेक्षता की बहस में "हमें आजीविका और नागरिकता के समान अधिकार को लेकर लड़ने की ज़रूरत है".
राज्य और धर्म के रिश्ते

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हिन्दुत्व की राजनीति हिन्दू वर्चस्व की राजनीति है. उनका एक ही वैचारिक एजेंडा है अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिन्दुओं को एकजुट करना."
जाने-माने राजनीतिक विज्ञानी और सीएसडीएस में प्रोफ़ेसर राजीव भार्गव ने अयोध्या में 2020 में राम मंदिर के लिए पीएम मोदी के भूमि पूजन करने पर लिखा था, ऐसा लग रहा है कि भूमि पूजन ने धर्मनिरपेक्षता के अवशेष को भी जला दिया है.
प्रोफ़ेसर भार्गव भारत में धर्मनिरपेक्षता को दो हिस्सों में देखते हैं. एक संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता और दूसरी दलीय-राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता.
प्रोफ़ेसर भार्गव संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता में दो अहम बातों का उल्लेख करते हैं. पहला कि सभी धर्मों का आदर होना चाहिए क्योंकि बाक़ी देशों के सेक्युलरिज़्म की तरह भारत का सेक्युलरिज़्म धर्म विरोधी नहीं है.
बीआर आंबेडकर कहा करते थे कि धर्म के हर पहलू या उसके हर रिवाज का सम्मान नहीं हो सकता यानी धर्म का आदर हो लेकिन आलोचना के साथ. इसके साथ ही स्टेट और धर्म का अलगाव बना रहना चाहिए लेकिन "जब धार्मिक समूह सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने लगें और धर्म भेदभाव की वजह बने तो स्टेट को हस्तक्षेप भी करना चाहिए. दूसरी बात यह कि स्टेट धर्म से ख़ुद को पूरी तरह अलग नहीं करता है बल्कि सभी धर्मों से एक सैद्धांतिक दूरी बनाकर चलता है."
उन्होंने लिखा, "मिसाल के तौर पर छुआछूत को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है और पर्सनल लॉ को उसी रूप में नहीं रहने दिया जा सकता है. स्टेट को फ़ैसला करना होता है कि कब धर्म में हस्तक्षेप करना है और कब दूरी बनानी है. हमें धर्म को संवैधानिक प्रतिबद्धता के तहत स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व में आड़े नहीं आने देना चाहिए."
इंडियन स्टेट ने ज़रूरत पड़ने पर धर्म के मामलों में कई बार निर्णायक हस्तक्षेप किया है. जानवरों की बलि पर प्रतिबंध और मंदिरों में दलितों के प्रवेश को स्टेट ने ही सुनिश्चित किया. नेहरू ने सभी धर्मों को समानता से देखने की बात कही है.
संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता सरकार के भरोसे टिकी नहीं रह सकती. इसे टिकाए रखने के लिए निष्पक्ष न्यायपालिका, ईमानदार मीडिया, सिविल सोसाइटी एक्टिविस्ट और सतर्क नागरिकों की ज़रूरत होती है.
हालाँकि प्रोफ़ेसर भार्गव कहते हैं कि भारत के सेक्युलर दृष्टिकोण में धर्मों से दूरी सैद्धांतिक है न कि बराबर की दूरी. सरकार कई बार अलग-अलग धार्मिक समूहों के साथ अलग-अलग रुख़ अपनाती है. मिसाल के तौर पर इंडियन स्टेट ने हिन्दू पर्सनल लॉ में सुधार किया और नया हिन्दू कोड बिल आया लेकिन इसी तरह का बदलाव धार्मिक अल्पसंख्यकों के मामलों में नहीं किया गया. मुसलमानों को शरिया क़ानून से दूर नहीं किया गया.
प्रोफ़ेसर भार्गव कहते हैं, ''संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता सरकार के भरोसे टिकी नहीं रह सकती. इसे टिकाए रखने के लिए निष्पक्ष न्यायपालिका, ईमानदार मीडिया, सिविल सोसाइटी एक्टिविस्ट और सतर्क नागरिकों की ज़रूरत होती है.''
प्रोफ़ेसर भार्गव कहते हैं कि भारत में पार्टी-पॉलिटिकल सेक्युलरिज़्म का जन्म क़रीब 40 साल पहले हुआ और चुनाव जीतने के लिए इसका इस्तेमाल सभी ने किया. इसमें कथित धर्मनिरपेक्ष पाार्टियां भी शामिल हैं.
प्रोफ़ेसर भार्गव कहते हैं, ''पार्टी-पॉलिटिकल सेक्युलरिज़्म ने सभी मूल्यों को दफ़ा कर मौक़ापरस्ती को जगह दे दी. राजनीतिक पार्टियों ने धर्म से अवसरवादी दूरी बनानी शुरू कर दी और तत्काल चुनावी फ़ायदे के लिए धार्मिक समूहों से अवसरवादी गठजोड़ बनाने लगे. चाहे बाबरी मस्जिद/राम मंदिर में पूजा के लिए ताला खुलवाने का मामला हो या शाहबानो मामले में महिलाओं के अधिकारों को नज़रअंदाज़ कर धार्मिक कट्टरता से समझौता करने का वाक़या हो."
नेहरू के बाद कांग्रेस की सेक्युलर विरासत पर चोट

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नेहरू जिस धर्मनिरपेक्षता को लेकर हमेशा अडिग रहे, उसे कमज़ोर करने की शुरुआत उनके परिवार से ही होती है. 1980 के दशक से भारत की धर्मनिरपेक्षता संकट में घिरने लगती है.
कांग्रेस पार्टी ने अपनी कम होती लोकप्रियता के कारण कई ऐसे फ़ैसले लिए जिनसे आरएसएस की हिन्दुत्व की राजनीति को मज़बूती मिली. इंदिरा गांधी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिया.
इंदिरा गांधी ने हिन्दूवादी पार्टी शिव सेना से भी मदद ली. पंजाब में अकाली दल को अस्थिर करने के लिए जनरैल सिंह भिंडरांवाले को बढ़ावा देने का आरोप लगा और 1983 में उन्होंने विश्व हिन्दू परिषद के समर्थन से बने भारत माता मंदिर में पूजा की शुरुआत की.
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी पीएम बने और उनकी नीतियों पर भी गंभीर सवाल उठे. राजीव गांधी पर आरोप लगा कि शाहबानो मामले में उन्होंने मुस्लिम कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक दिए थे.
शाहबानो इंदौर की एक मुस्लिम महिला थीं, सुप्रीम कोर्ट ने तलाक़ के मामले में उनके पति को गुज़ारा भत्ता देने का आदेश दिया था लेकिन राजीव गांधी ने संसद में क़ानून में बदलाव की प्रक्रिया अपनाकर इस फ़ैसले को पलट दिया था.
राजीव गांधी के इस फ़ैसले से हिन्दुत्व की राजनीति करने वालों को यह कहने का मौक़ा मिला कि कांग्रेस छद्म धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करती है. यहीं से मुस्लिम तुष्टीकरण जैसा शब्द चलन में आया. इसके बाद हिन्दू राष्ट्रवाद की बात करने वालों को अपनी राजनीति मज़बूत करने का अवसर मिला.
क्या भारतीय सांप्रदायिक हो गए हैं?

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1952 के आम चुनाव में नेहरू की जीत को धर्मनिरपेक्षता की जीत तौर पर देखा गया. ऐसा कहा जाने लगा कि भारत की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी ने पाकिस्तान के इस्लामिक राष्ट्र बनने के बावजूद धर्मनिरपेक्ष भारत पर अपनी मुहर लगा दी है और साझी संस्कृति में रहने के लिए तैयार है.
ऐसा तब था जब लोगों के मन में विभाजन के बाद सांप्रादायिक हिंसा की यादें ताज़ा थीं.
जब बाबरी मस्जिद टूटी तो उस वक़्त भी राम मंदिर के लिए अभियान चलाने वाले बीजेपी नेताओं ने भी सार्वजनिक रूप से अफ़सोस ज़ाहिर किया था.
1992 में जब बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से इस्तीफ़े की पेशकश की थी लेकिन पार्टी ने उनका इस्तीफ़ा स्वीकार नहीं किया था. अटल बिहारी वाजपेयी ने तब करण थापर को दिए इंटरव्यू में कहा था, "अयोध्या में छह दिसंबर को जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था."
लेकिन अब समय बदल चुका है और बीजेपी के लोग बाबरी मस्जिद टूटने पर कोई अफ़सोस ज़ाहिर नहीं करते हैं. बल्कि उमा भारती जो कि राम मंदिर के अभियान में मुखर थीं, वह इस पर गर्व करने की बात कहती हैं. बाबरी मस्जिद टूटने के बाद उत्तर भारत और मुंबई में भीषण दंगे हुए थे.
हिन्दू राष्ट्रवाद के जाने-माने विशेषज्ञ और ‘मोदीज़ इंडिया’नाम की किताब लिख चुके प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफ़ जेफ़रलो से वरिष्ठ पत्रकार और लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय ने पूछा कि भारतीयों के बारे में कहा जाता था कि धर्मनिरपेक्षता उनके ख़ून में है, क्या वाक़ई ऐसा है?
क्रिस्टोफ़ ने इसके जवाब में कहा,''अब पूरी बहस बदल गई है. हम ये नहीं कह सकते कि भारतीय स्वभाव से ही सेक्युलर हैं. जब 1984 में अयोध्या आंदोलन शुरू हुआ तो लोगों को एकजुट करना बहुत मुश्किल हो रहा था. आख़िरकार 1989 के बाद कई दंगे हुए और इन दंगों ने ध्रुवीकरण में बड़ी भूमिका निभाई. मैं ये भी नहीं कह सकता कि स्वभाव से कोई सांप्रदायिक होता है. लोगों को डर दिखाकर सांप्रदायिक बनाया जाता है. सामने एक दुश्मन खड़ा किया जाता है और असुरक्षा की भावना पैदा की जाती है."
क्रिस्टोफ़ कहते हैं, ''1992 के दौरान और उससे कुछ पहले तक हिंन्दुत्व के प्रोग्राम में एक क़िस्म की अनिश्चितता थी, संघर्ष था लेकिन अब बीजेपी के लिए हिन्दुओं को लामबंद करना मुश्किल नहीं है.'
किस नए कालचक्र की बात कर रहे हैं मोदी?

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22 जनवरी को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहाँ आए लोगों को संबोधित करते हुए कहा था, ''22 जनवरी 2024, ये कैलेंडर पर लिखी तारीख़ नहीं है, ये एक नए कालचक्र का उद्गम है. हमारे राम लला अब टेंट में नहीं रहेंगे बल्कि दिव्य मंदिर में रहेंगे.''
प्रधानमंत्री जब ऐसा कह रहे थे, तब उनके चेहरे पर जीत की मुद्रा साफ़ झलक रही थी.
नरेंद्र मोदी किस नए कालचक्र के उद्गम की बात कह रहे हैं? 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से जो कालचक्र जारी है, उसकी बात कर रहे हैं या किसी नए कालचक्र की बात कर रहे हैं?
पीएम मोदी और बाबरी मस्जिद विध्वंस पर किताब लिख चुके नीलांजन मुखोपाध्याय ने इस सवाल के जवाब में कहा, ''नए कालचक्र का तो नहीं पता लेकिन अभी के कालचक्र में कई चीज़ें दिख रही हैं. अयोध्या की तर्ज़ पर ज्ञानवापी का मामला खुल चुका है. मथुरा में भी यही कोशिश की जा रही है.''
''सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या का फ़ैसला दिया था तो यह भी कहा था कि आगे ऐसे मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है. 2014 से बहुत कुछ हो रहा है, हिन्दुस्तान के अल्पसंख्यकों में असुरक्षा बढ़ी है. जिस तरह से कई क़ानून आए हैं, उनसे अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेला जा रहा है. इसके अलावा तो मुझे और नया कालचक्र समझ में नहीं आ रहा है.''
नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं, ''पीएम ने कहा कि राम लला अब टेंट में नहीं, दिव्य मंदिर में रहेंगे. लेकिन भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान की दिव्यता और भव्यता का क्या होगा? धर्म और राजनीति के बीच जो अलग करने वाली लाइन थी, उसे पीएम मोदी ने लगभग मिटा दिया है. यहाँ तक कि इंडियन स्टेट और धर्म की लाइन भी एक कर दी है. पीएम मोदी पिछले तीन सालों में चार ऐसे आयोजनों में शामिल हुए, जिनमें धर्म, राजनीति और इंडियन स्टेट का घालमेल किया गया.''
''इन चारों में पीएम मोदी यजमान की भूमिका में रहे. सबसे पहले पीएम मोदी ने पाँच अगस्त 2020 को अयोध्या में राम मंदिर के लिए भूमि पूजन किया था. उसके बाद दिसंबर 2020 में नए संसद भवन के लिए भूमि पूजन हुआ था. तीसरा पिछले साल मई महीने में नए संसद भवन का उद्घाटन हुआ था, जिसे पूरी तरह से हिन्दू प्रतीक और रीति रिवाज से किया गया था.''
''यह अपने-आप में आपत्तिजनक है क्योंकि एक सेक्युलर नेशन की संसद का उद्घाटन हिन्दू रिवाज से किया गया. मानो हिन्दू भारत का राजकीय धर्म है. चौथा इन्होंने राम मंदिर का उद्घाटन किया और ख़ुद मुख्य यजमान बने. ये दिखाता है कि भारत औपचारिक रूप से ‘धार्मिक स्टेट’ बन सकता है.''
पीएम ने कहा कि राम लला अब टेंट में नहीं, दिव्य मंदिर में रहेंगे. लेकिन भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान की दिव्यता और भव्यता का क्या होगा?
सरदार पटेल, आंबेडकर और बीजेपी

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बीजेपी ने सत्ता में आने बाद इतिहास से लेकर वर्तमान तक को अपने हिसाब से पारिभाषित किया और यहाँ तक कि आज़ादी के आंदोलन के नेताओं को अपने हिसाब से इस्तेमाल किया.
जॉर्ज ऑरवेल ने अपने मशहूर उपन्यास 1984 में लिखा है कि जिसका वर्तमान होता है, अतीत भी उसी का होता है.
सरदार पटेल भारतीय राजनीति में लौह पुरुष के रूप में जाने जाते हैं और आज़ाद भारत के पहले गृह मंत्री बने थे. लालकृष्ण आडवाणी सरदार पटेल को अपना आदर्श मानते रहे हैं और अपने प्रशंसकों से लौह पुरुष कहलाना भी पसंद करते थे.
आडवाणी भी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में गृह मंत्री बने थे.
सरदार वल्लभभाई पटेल ने 1931 में कराची में आयोजित कांग्रेस के 45वें अधिवेशन को अध्यक्ष के रूप में संबोधित करते हुए कहा था, ''हिन्दू-मुस्लिम एकता तभी आ सकती है, जब बहुसंख्यक हिम्मत दिखाएं और अल्पसंख्यकों की जगह ख़ुद को रखकर देखें. यही बहुसंख्यकों की सबसे बड़ी समझदारी होगी.''
19 नवंबर, 1990 को अयोध्या में लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था, "जो हिन्दू हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा".
दो अक्टूबर 1990 को आडवाणी ने शिकायती लहजे में कहा था कि "धर्मनिरपेक्ष नीतियाँ हिन्दू महत्वाकांक्षाओं पर अतार्किक पाबंदियाँ लगा रही हैं."
13 जनवरी 1991 को बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने कहा था, "हिन्दू राष्ट्र को कोई औपचारिक रूप देने की ज़रूरत नहीं है. हिन्दू राष्ट्र इस देश की बुनियादी संस्कृति है. सभी भारतीय मुसलमान मोहम्मदिया हिन्दू हैं और सभी भारतीय ईसाई क्रिस्टी हिन्दू हैं. ये वही हिन्दू हैं, जिन्होंने बाद में ईसाई और इस्लाम धर्म अपना लिया."
नरेंद्र मोदी की सरकार ने सरदार पटेल की बहुत ऊँची मूर्ति बना दी है और बीजेपी उन्हें अपने आदर्श के रूप में पेश करती है. लेकिन सरदार पटेल ने हिन्दुत्व की राजनीति को हमेशा ख़ारिज किया. यहां तक कि उन्होंने गृह मंत्री रहते हुए आरएसस पर पाबंदी भी लगाई थी.

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जाने-माने उद्योगपति बीएम बिड़ला ने पाँच जून 1947 को सरदार पटेल को एक पत्र लिखा था. उस पत्र में बिरला ने लिखा था, "मैं यह देखकर खुश हूँ कि भारत के विभाजन पर वायसराय की घोषणा वैसी ही है, जैसा आप चाहते थे. इसमें कोई शक नहीं है कि हिन्दुओं के लिए ये अच्छा है. हम अब सांप्रदायिक नासूर से मुक्त हो गए हैं. ज़ाहिर है कि विभाजित इलाक़ा मुस्लिम स्टेट होगा. क्या यह सही समय नहीं है कि हिन्दुस्तान को हिन्दू राष्ट्र बनाने पर विचार किया जाए?"
पटेल ने 10 जून 1947 को बिड़ला के पत्र के जवाब में लिखा था, "मैं भी इस बात को लेकर ख़ुश हूँ कि तीन जून की घोषणा से कम-से-कम अनिश्चितता की स्थिति तो ख़त्म हो गई. मुझे नहीं लगता कि हिन्दुस्तान को हिन्दू राष्ट्र और हिन्दू धर्म को राजकीय धर्म बनाने पर विचार करना संभव होगा. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाक़ी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा भी हमारी पहली ज़िम्मेदारी है. स्टेट सभी के लिए होना चाहिए न कि किसी ख़ास जाति और नस्ल के लिए." (सरदार पटेल के पत्र, वॉल्युम 4, पेज 56).
बीजेपी न केवल सरदार पटेल बल्कि आंबेडकर को भी ऐसे पेश करती है, जैसे दोनों में वैचारिक क़रीबी थी.
बीआर आंबेडकर ने अपनी किताब ‘पाकिस्तान और द पार्टिशन ऑफ इंडिया’ में लिखा है, ''अगर हिन्दू राज हक़ीक़त बन जाता है तो ये बेशक इस देश के लिए सबसे बड़ी त्रासदी होगी. किसी भी क़ीमत पर हिन्दू राज को रोकना होगा.'' (1946, पेज संख्या- 354-355)
आंबेडकर ने 24 मार्च 1947 को राइट्स ऑफ स्टेट एंड माइनॉरिटी पर एक रिपोर्ट तैयार की थी.
उन्होंने इस रिपोर्ट में लिखा था, ''भारतीय अल्पसंख्यकों का यह दुर्भाग्य है कि भारतीय राष्ट्रवाद ने एक नया सिद्धांत गढ़ लिया है कि बहुसंख्यकों का अल्पसंख्यकों पर राज करने करने का दैवीय अधिकार है. अल्पसंख्यक अगर सत्ता में हिस्सेदारी माँगते हैं तो उन्हें सांप्रदायिक करार दिया जाएगा जबकि बहुसंख्यकों के सत्ता पर एकाधिकार को राष्ट्रवाद कहा जाएगा.''

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इतिहास के अध्येता और धार्मिक राष्ट्रवाद पर किताब लिख चुके राम पुनयानी कहते हैं कि आंबेडकर जिस बहुसंख्यक राष्ट्रवाद को लेकर सतर्क थे, वह अब सच बनकर सामने आ रहा है. भारत के अल्पसंख्यक न केवल राजनीतिक रूप से हाशिए पर आ गए हैं बल्कि सामाजिक रूप से भी अलगाव झेल रहे हैं.
नरेंद्र मोदी कैबिनेट में एक भी मुसलमान मंत्री नहीं है. लोकसभा और राज्यसभा में बीजेपी के क़रीब 400 सांसद हैं लेकिन कोई भी मुसलमान सांसद नहीं है. यहाँ तक कि बीजेपी ने अब टोकन मुस्लिम प्रतिनिधित्व को भी दफ़ा कर दिया है.
प्यू रिसर्च के मुताबिक़ भारत में 2060 तक दुनिया की सबसे ज़्यादा मुस्लिम आबादी होगी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व इस हाल में है. 2014 के आम चुनाव में बीजेपी ने कुल 482 में से सात मुसलमानों को उम्मीदवार बनाया था लेकिन किसी को जीत नहीं मिली थी.
2019 के आम चुनाव में बीजेपी ने छह मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे. इनमें से जम्मू-कश्मीर में तीन, पश्चिम बंगाल में दो और लक्षद्वीप में एक मुस्लिम को बीजेपी ने उम्मीदवार बनाया था. लेकिन 2019 में भी किसी को जीत नहीं मिली थी.
भारत की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी बढ़ रही है लेकिन राजनीतिक भागीदारी सिमट रही है. 2001 और 2011 में आख़िरी बार भारत में जनगणना हुई थी और मुसलमानों की आबादी 13.4% से बढ़कर 14.2% हो गई थी. 2014 के आम चुनाव में जीतने वालों में केवल चार प्रतिशत मुसलमान थे जो कि 1980 में लगभग 10 प्रतिशत थे.
स्वप्न दासगुप्ता इसके लिए भी मुसलमानों को ही ज़िम्मेदार बताते हैं. वह कहते हैं, "मुसलमानों की सियासी गणित और गलत चुनाव के कारण ऐसा हो रहा है. उन्होंने बीजेपी विरोधी राजनीति के साथ ख़ुद को खड़ा कर लिया है, ऐसे में राजनीति में उनका प्रतिनिधित्व कम होना चौंकाता नहीं है".
मुसलमानों की भारतीयता पर शक़

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कांग्रेस नेता और राजीव गांधी के दोस्त रहे मणिशंकर अय्यर ने किताब लिखी है-‘कन्फेशंस ऑफ अ सेक्युलर फ़ंडामेंटलिस्ट.’ बीजेपी और आरएसएस के एक हज़ार साल की गुलामी की बात पर अय्यर कहते हैं, "दिलचस्प है कि आरएसएस का विचार एक हज़ार साल के उस ग़ैर हिन्दू शासन को शामिल नहीं करता, जिसका समय सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म के स्वीकार करने से लेकर आख़िरी महान बौद्ध सम्राट हर्षवर्धन तक था. ग़ैर हिन्दू शासन में उन्होंने केवल ईसाइयों और मुसलमानों को रखा है."
मुसलमानों की निष्ठा पर शक करना हिन्दुत्व की राजनीति के लिए कोई नई बात नहीं है. हिन्दुत्व के झंडाबरदार विनायक दामोदर सावरकर मुसलमानों को हमेशा बाहरी ही मानते रहे.
सावरकर ने 'हिन्दुत्व: हू इज अ हिन्दू' में लिखा है, ''जिन लोगों को जबरन मुसलमान या ईसाई बनाया गया यह उनकी भी पितृभूमि है और संस्कृति का बड़ा हिस्सा भी एक जैसा ही है लेकिन फिर भी उन्हें हिन्दू नहीं माना जा सकता. यह उनकी पुण्यभूमि नहीं है. उनकी पुण्यभूमि सुदूर अरब में है. उनकी मान्यताएँ, उनके धर्मगुरु, विचार और नायक इस मिट्टी की उपज नहीं हैं. ऐसे में उनके नाम और दृष्टिकोण मूल रूप से विदेशी हैं. उनका प्यार बँटा हुआ है."
स्वप्न दासगुप्ता कहते हैं कि वह सावरकर की इस बात से सहमत नहीं हैं. दासगुप्ता ने कहा, "सावरकर ने हिन्दुत्व को कोडिफाई करने की कोशिश की है जबकि मेरे हिसाब से हिन्दुत्व एक भावना है. मैं राष्ट्रीयता और धर्म को जोड़ने से सहमत नहीं हूँ."
सावरकर ने हिन्दुत्व को कोडिफाई करने की कोशिश की है जबकि मेरे हिसाब से हिन्दुत्व एक भावना है. मैं राष्ट्रीयता और धर्म को जोड़ने से सहमत नहीं हूँ.
मुकुल केसवन भी सावरकर के तर्क को नहीं मानते और कहते हैं कि लोकतांत्रिक समाज में नागरिकता जन्म पर आधारित अधिकार होता है, न कि धार्मिक आस्था पर आधारित.
अपनी किताब ‘कन्फेशंस ऑफ अ सेक्युलर फ़ंडामेंटलिस्ट’ में मणिशंकर अय्यर ने अटल बिहारी की सरकार में मंत्री रहे अरुण शौरी से बात की है. अरुण शौरी जाने-माने पत्रकार और संपादक भी रहे हैं.
अरुण शौरी से मणिशंकर अय्यर पूछते हैं, एक मुसलमान होना क्या भारतीय होने की राह में मुश्किलें पैदा करता है?
इसके जवाब में अरुण शौरी कहते हैं, "इस्लाम धर्म का पालन करने के बाद किसी बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक समाज में जीना असंभव होता है क्योंकि इस्लाम के मूल सिद्धांतों का पालन करते हुए आप ऐसा नहीं कर सकते."
अरुण शौरी के इस जवाब पर मणिशंकर अय्यर दूसरा सवाल पूछते हैं- तो आप यह कहना चाहते हैं कि अच्छे भारतीय के रूप में जीने की कोशिश करते हैं तो आप आप एक बुरे मुसलमान होते हैं?
अरुण शौरी ने अपने जवाब में कहा, "मुझे लगता है कि आप इस बात को थोड़े कड़े शब्दों में बयां कर रहे हैं लेकिन निश्चित रूप से उसे क़ुरान और हदीस के मूल सिद्धांतों से थोड़ा अलग होना पड़ेगा."
लेकिन प्रोफ़ेसर राजीव भार्गव अरुण शौरी की बातों से सहमत नहीं हैं. वे कहते हैं, "श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता में उपदेश देते हैं तो कोई कह सकता है कि वे हिंसा के लिए उकसा रहे हैं, लेकिन श्रीकृष्ण के उपदेश को संदर्भ से काटकर देखना ठीक नहीं होगा. उसी तरह हम क़ुरान और हदीस को भी नहीं देख सकते. हर कोई अपने हिसाब से व्याख्या करता है."
पिछले 10 सालों में बहुत कुछ बदल चुका है. जम्मू-कश्मीर को संविधान से विशेष दर्जा मिला हुआ था, मोदी सरकार ने इसे ख़त्म कर दिया. बाबरी मस्जिद विध्वंस को सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक कृत्य बताया लेकिन वहीं राम मंदिर बनाने की इजाज़त भी दे दी. बीजेपी शासित राज्य उत्तराखंड यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड लागू करने जा रहा है.
मुकुल केसवन इन सबको हिन्दू श्रेष्ठता को सामान्य बनाने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं. वह कहते हैं, "हिन्दुत्व की राजनीति हिन्दू वर्चस्व की राजनीति है. उनका एक ही वैचारिक एजेंडा है अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिन्दुओं को एकजुट करना."
राम पुनयानी कहते हैं कि अगर कांग्रेस की सरकार भी आती है तो इन्हें रोलबैक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगी.
वे कहते हैं कि जो नुक़सान हो चुका है, उसकी भरपाई मुश्किल है, अब लड़ाई इस बात की है कि आगे के नुक़सान को कैसे रोका जाए. क्रिस्टोफ़ जेफ़रलो कहते हैं कि अब शायद ही भारत का राष्ट्रपति कोई मुसलमान बने और कोई दूसरी सरकार आए तो उग्र हो चुके हिंदू संगठनों को रोके-टोके.
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