बाबरी मस्जिद विध्वंस केस: आख़िर बाबरी मस्जिद को किसने ढहाया था?

बाबरी मस्जिद विध्वंस केस: 'आरोपियों की जीत, लेकिन भारतीयता की हार'

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अयोध्या मसले पर 28 साल बाद फैसला आया है और इसमें सभी 32 अभियुक्तों को बरी कर दिया गया है. इस फै़सले को लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं.

बीजेपी और दक्षिणपंथी धड़ा इसे अपनी जीत बता रहा है और उनमें उत्साह का माहौल है.

लेकिन, कई पत्रकार और सोशल मीडिया पर इस तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं जिनमें अदालत के फै़सले पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं.

बीबीसी हिंदी ने इस फैसले के संबंध में वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी, सीमा चिश्ती और बीबीसी हिंदी के संपादक मुकेश शर्मा के साथ बातचीत की और इस फैसले के मायनों को समझने की कोशिश की.

इस फै़सले को किसकी जीत और किसकी हार के रूप में देखा जाए इस पर वरिष्ठ पत्रकार सीमा चिश्ती कहती हैं, "ये उन सभी लोगों और ताक़तों की जीत है. लोअर कोर्ट ने सभी को बरी कर दिया है, लेकिन हमें एक चीज़ को नहीं भूलना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले इसे एक ग़लत काम बताया था. सुप्रीम कोर्ट के फै़सले में जो ज़मीन भी दी गई राम मंदिर के निर्माण के लिए उसमें भी बाबरी मस्जिद के ध्वंस को ग़लत बताया गया था. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के बाद ये फैसला बड़ा अटपटा लगता है."

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आख़िर बाबरी मस्जिद को किसने ढहाया?

लेकिन, जब सभी अभियुक्त बरी हो गए हैं तो आख़िर बाबरी मस्जिद को किसने ढहाया?

इस पर वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "जजमेंट से तो यही लगता है कि बाबरी मस्जिद ने स्वयं सोचा कि हमारा समय पूरा हो गया है तो ध्वस्त हो गई."

वे कहते हैं, "देखिए क़ानून में षड्यंत्र एक ऐसी चीज़ होती है जिसे साबित करना आसान नहीं होता है. इसमें सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि यह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर होता है. वहां अंजू गुप्ता जो आईपीएस हैं उनकी और कई अन्य लोगों की गवाही थी जिनकी सत्यनिष्ठा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है. दूसरा, अगर कहीं भीड़ इकट्ठी होती है और कोई ग़ैर-क़ानूनी काम करती है तो आईपीसी के सेक्शन 149 के मुताबिक़, भीड़ के लोग एक-दूसरे के कार्यों के लिए ज़िम्मेदार होते हैं. यह तो स्थापित तथ्य है कि बाबरी मस्जिद थी और गिराई गई. ऐसे में क़ानून के हिसाब से उन लोगों की ज़िम्मेदारी बनती है."

मुकेश शर्मा कहते हैं, "इस फैसले में जज एसके यादव ने कहा कि यह कोई सुनियोजित साजिश नहीं थी. तभी इस फै़सले के बारे में चीज़ें स्पष्ट हो गई थीं. कोर्ट ने साक्ष्यों को नहीं माना, बाक़ी विस्तृत फैसला आने पर चीज़ें साफ़ होंगी."

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अहम सवाल

क्या ये घटना अचानक हुई? यह एक अहम सवाल है कि वहां पर इतनी भीड़ कौन लेकर आया और बाबरी मस्जिद कैसे ढहाई गई?

सीमा चिश्ती कहती हैं, "ये बड़ा आश्चर्यजनक है कि यह सब अचानक हो गया. राज्य सरकार वहां क़ानून व्यवस्था के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार थी. मान लीजिए कि भीड़ ने उत्तेजित होकर कुछ कर भी दिया तो बाद में कुछ भी क्यों नहीं किया गया. केंद्र के बलों को अंदर किसने नहीं आने दिया."

वे कहती हैं कि इस बात की गवाही है कि वहां मौजूद नेताओं ने उकसाने वाले भाषण दिए.

फै़सला आने के बाद लालकृष्ण आडवाणी के वकील ने प्रतिक्रिया में कहा है कि साक्ष्य इतने नहीं थे कि आरोप साबित हो सकें. मुरली मनोहर जोशी पत्रकारों के सामने आए और उन्होंने कहा कि राम मंदिर का निर्माण देश के महत्वपूर्ण आंदोलनों में से एक था. मैं यही कहना चाहूंगा- जय सिया राम.

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सुप्रीम कोर्ट

साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि धर्म के कार्यों में बड़ी बाधाएं आती हैं. लेकिन, ईश्वर सत्य के साथ होता है. न्याय हुआ है.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने फै़सले का स्वागत किया है.

इस विवाद में पक्षकार रहे हाशिम अंसारी के बेटे इक़बाल अंसारी ने कहा है कि हम क़ानून का पालन करने वाले मुसलमान हैं. बहुत लंबे वक़्त से मामला लंबित था, अच्छा हुआ है कि फै़सला आ गया है.

सोशल मीडिया पर हालांकि इस फै़सले को लेकर सवाल भी उठाए जा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने ये कहा था कि ये ग़लत हुआ था तो फिर ये कैसे है कि इस ध्वंस के लिए कोई ज़िम्मेदार नहीं है.

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लिब्राहन आयोग के गठन के बाद

ट्विटर पर भारत में टॉप 10 ट्रेंड में से पांच इसी फै़सले के इर्दगिर्द हैं.

रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि एक सभ्य समाज में अगर कोई विवाद हो जाता है तो या तो वह समझौते से हल हो जाए या फिर क़ानूनी प्रक्रिया के ज़रिए उसे हल किया जाता है.

वे कहते हैं कि ये सुप्रीम कोर्ट के साथ धोखा है. कल्याण सिंह सरकार ने वादा किया था कि वे पूरी तरह से सुरक्षा करेंगे जो नहीं हुआ. ये धोखा संविधान के साथ है.

वे कहते हैं, "क्या हम एक बहुसंख्यकवाद की ओर बढ़ रहे हैं. क्या हम रूल ऑफ लॉ को छोड़कर अराजकता की ओर बढ़ रहे हैं?"

लिब्राहन आयोग के गठन के बाद एक लंबी प्रक्रिया चली. आज जब फै़सला आया तो उसकी क्या प्रतिक्रिया आ रही है.

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राम जन्मभूमि विवाद

मुकेश शर्मा बताते हैं कि कई दफा एक्सटेंशन मिलने के बाद 2009 में जब लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट आई तो उसमें साफ़ कहा गया था कि बाबरी मस्जिद को एक गहरी साजिश के तहत गिराया गया था. लेकिन, आज जो फैसला आया है उसमें लिब्राहन आयोग से उलट चीजें दिखाई दे रही हैं.

लेकिन, क्या सुप्रीम कोर्ट में चले राम जन्मभूमि विवाद के मुकदमे के साथ ही इस मामले पर भी फै़सला नहीं दिया जा सकता था?

रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि ऐसा नहीं है. वे कहते हैं, "दोनों मामले अलग थे. सुप्रीम कोर्ट वाला मामला एक सिविल मुकदमा था, जबकि ये एक क्रिमिनल केस था. साथ ही यह केस एक छोटी अदालत में चल रहा था."

वे कहते हैं कि मूल सवाल यह है कि हम कहां जा रहे हैं. उनके मुताबिक़, "दुनिया हम पर हंसेगी कि हम ख़ुद को विश्वगुरु बताते हैं. हज़ारों साल पुरानी सभ्यता बताते हैं, लेकिन क्या हम बर्बरता वाले दौर में जा रहे हैं."

बीजेपी के लिए इसके क्या मायने हैं? इस सवाल पर सीमा कहती हैं कि बीजेपी के उदय की नींव ही बाबरी पर आधारित है. बीजेपी को इससे फायदा है, लेकिन भारतीयता की यह हार है.

सीमा चिश्ती कहती हैं कि सीबीआई को इस केस पर अपील करनी चाहिए.

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