ज्ञानवापी मस्जिद और काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर क्या है विवाद

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- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खुलने और उसके बाद राम मंदिर आंदोलन में आई तेज़ी के बीच, मथुरा और काशी का नाम भी अक्सर आता रहा है.
अब बाबरी मस्जिद गिराए जाने के 30 साल पूरे होने को हैं, ऐसे में काशी और मथुरा के मामले अब अदालत में हैं.
हालाँकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद फ़िलहाल मस्जिद में नमाज़ जारी है.
क्या है वाराणसी का मुक़दमा?
पिछले साल अगस्त में दिल्ली की एक महिला राखी सिंह और चार अन्य महिलाओं ने ज्ञानवापी मस्जिद के परिसर में श्रृंगार गौरी और कुछ अन्य देवी-देवताओं के दर्शन-पूजन की अनुमति की माँग करते हुए एक याचिका दाख़िल की.
वाराणसी की एक निचली अदालत में दाख़िल अर्ज़ी में याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि ये देवी-देवता प्लॉट नंबर 9130 में मौजूद हैं जो विवादित नहीं है. अर्ज़ी में कहा गया कि सर्वे कराके पूरे मामले को सुलझाया जाए.
लगभग आठ माह बाद आठ अप्रैल, 2022 को अदालत ने सर्वेक्षण करने और उसकी वीडियोग्राफ़ी के आदेश दे दिए.
मस्जिद इंतज़ामिया (प्रबंधन समिति) ने कई तकनीकी पहलुओं के आधार पर इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसे अदालत ने नामंज़ूर कर दिया.

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सर्वेक्षण के दौरान मस्जिद के वज़ूख़ाने में एक ऐसी आकृति मिली है, जिसके शिवलिंग होने का दावा किया जा रहा है, जिसके बाद मस्जिद को सील कर दिया गया था. हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद में नमाज़ जारी रखने जाने का आदेश सुनाया, हालाँकि वज़ूख़ाना अब भी सील है.
श्रृंगार गौरी की पूजा अभी भी साल में एक बार नवरात्र चतुर्थी को होती है, लेकिन अब प्रतिदिन पूजा करने की इजाज़त माँगी जा रही है.
मुस्लिम पक्ष के वकील ने सवाल उठाया था कि जब पूजा वाली जगह मस्जिद की पश्चिमी दीवार की बाहरी ओर है यानी विवादित जगह पर नहीं है, तो ऐसे में मस्जिद में प्रवेश करने और वहाँ सर्वेक्षण कराए जाने का क्या औचित्य है?
ज्ञानवापी मामले की सुनवाई वाराणसी की अदालत में हो रही है. 12 सितंबर को इस मामले पर वाराणसी जिला जज एके विश्वेश ने अपने फ़ैसले में मुस्लिम पक्ष की अपील को खारिज कर दिया.
बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने बताया कि अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में देवी देवताओं की पूजा की मांग को लेकर की गई पाँच महिलाओं की याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है.
इस मामले में अगली सुनवाई 22 सितंबर को होनी है. इसी दिन मुस्लिम पक्ष को जवाब दाख़िल करने को भी कहा गया है.
काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर ये पहला अदालती मामला नहीं है.
अंजुमन इंतेज़ामिया मस्जिद के वकील अभय यादव ने बीबीसी संवाददाता अनंत झणाणे को बताया था कि साल 1991 में एक केस फ़ाइल हुई थी, जिसमें दावा किया गया था कि मस्जिद जहाँ बनी है, वो काशी विश्वनाथ की ज़मीन है इसलिए मुस्लिम धर्मस्थल को हटाकर उसका क़ब्ज़ा हिंदुओं को सौंपा जाए.
ये मामला हाई कोर्ट में है.

स्थानीय लोगों के अनुसार मस्जिद को लेकर सबसे पहला विवाद 1809 में हुआ था, जो सांप्रदायिक दंगे में तब्दील हो गया था.
अदालत में एक मुक़दमा 1936 में भी दायर हुआ, जिसका निर्णय अगले साल आया.
फ़ैसले में पहले निचले कोर्ट और फिर उच्च न्यायालय ने मस्जिद को वक़्फ़ प्रॉपर्टी माना.
1996 में भी सोहन लाल आर्य नाम के एक व्यक्ति ने सर्वे की मांग को लेकर बनारस की अदालत में अर्ज़ी दाख़िल की थी लेकिन सर्वे नहीं हुआ.
इस बार सर्वे की मांग उठाने वाली पाँच महिला याचिकाकर्ताओं में से एक बनारस की लक्ष्मी देवी हैं जो सोहन लाल की पत्नी हैं.

ज्ञानवापी मामला- अब तक क्या हुआ?

- 12 सितंबर 2022 को हुई सुनवाई में वाराणसी जिला अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में देवी देवताओं की पूजा की मांग को लेकर की गई पाँच महिलाओं की याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया. साथ ही कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की अपील को खारिज कर दिया.
- 1991: उपासना स्थल क़ानून. कांग्रेस की पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने 1991 में उपासना स्थल क़ानून (विशेष प्रावधान) पास किया. बीजेपी ने इसका विरोध किया लेकिन अयोध्या को अपवाद माने जाने का स्वागत किया और माँग की कि काशी और मथुरा को भी अपवाद माना जाना चाहिए, लेकिन कानून के मुताबिक केवल अयोध्या ही अपवाद है.
- 1991: ज्ञानवापी मामला कोर्ट पहुँचा. ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर 1991 में पहली बार अदालत में याचिका दाखिल की गई. वाराणसी के साधु-संतों ने सिविल कोर्ट में याचिका दाखिल करके वहाँ पूजा करने की माँग की. याचिका में मस्जिद की ज़मीन हिंदुओं को देने की माँग की गई थी. लेकिन मस्जिद की प्रबंधन समिति ने इसका विरोध किया और दावा किया कि ये उपासना स्थल क़ानून का उल्लंघन है.
- 2019: दिसंबर 2019 में अयोध्या फ़ैसले के क़रीब एक महीने बाद वाराणसी सिविल कोर्ट में नई याचिका दाख़िल करके ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे कराने की माँग की गई.
- 2020: वाराणसी के सिविल कोर्ट से मूल याचिका पर सुनवाई की माँग की गई.
- 2020: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सिविल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाई और फिर इस मामले पर फ़ैसला सुरक्षित रखा.
- 2021: हाई कोर्ट की रोक के बावजूद वाराणसी सिविल कोर्ट ने अप्रैल में मामला दोबारा खोला और मस्जिद के सर्वे की अनुमति दे दी.
- 2021: मस्जिद इंतजामिया ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और हाई कोर्ट ने फिर सिविल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाई और फटकार भी लगाई.
- 2021: अगस्त में पाँच हिंदू महिलाओं ने वाराणसी सिविल कोर्ट में श्रृंगार गौरी की पूजा की अनुमति के लिए याचिका दाखिल की.
- 2022: अप्रैल में सिविल कोर्ट ने ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे करने और उसकी वीडियोग्राफ़ी के आदेश दे दिए.
- 2022: मस्जिद इंतज़ामिया ने कई तकनीकी पहलुओं के आधार पर इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जो ख़ारिज हो गई.
- 2022: मई में मस्जिद इंतज़ामिया ज्ञानवापी मस्जिद की वीडियोग्राफ़ी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.
- 2022: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू होने से पहले 16 मई को सर्वे की रिपोर्ट फ़ाइल की गई और वाराणसी सिविल कोर्ट ने मस्जिद के अंदर उस इलाक़े को सील करने का आदेश दिया, जहाँ शिवलिंग मिलने का दावा किया गया था. वहाँ नमाज़ पर भी रोक लगा दी गई.
- 2022: 17 मई को सुप्रीम कोर्ट ने 'शिवलिंग' की सुरक्षा वुजूख़ाने को सील करने का आदेश दिया, लेकिन साथ ही मस्जिद में नमाज़ जारी रखने की अनुमति दे दी.
- 2022: 20 मई को सुप्रीम कोर्ट ने ये मामला वाराणसी की ज़िला अदालत में भेज दिया, सुप्रीम कोर्ट ने अदालत से यह तय करने को कहा है कि मामले आगे सुनवाई के लायक है या नहीं.

उपासना स्थल क़ानून
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1996 में एक निचली अदालत के आदेश और उसके बाद आनन-फ़ानन में प्रशासन की ओर से बाबरी मस्जिद का ताला खोलने के बाद से राम मंदिर निर्माण को लेकर मुहिम दिन-ब-दिन तेज़ी पकड़ रही थी.
भारतीय जनता पार्टी के नेता लाल कृष्ण आडवाणी सोमनाथ से अपनी यात्रा निकाल चुके थे जिसकी वजह से सांप्रदायिक तनाव चरम पर था.
इसी समय और माहौल में कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार ने 18 सितंबर, 1991 को उपासना स्थल क़ानून पास किया, जो बाबरी मस्जिद छोड़कर सभी दूसरे धार्मिक स्थलों पर लागू होता है, यह कानून कहता है कि भविष्य में विवादित धार्मिक स्थलों का रूप नहीं बदला जा सकता.
बीजेपी ने तब इस क़ानून को लाए जाने का विरोध किया था.

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आसान शब्दों में क़ानून के भीतर ये प्रावधान है कि किसी भी धार्मिक स्थल के प्रारूप में--जैसा कि वो 15 अगस्त 1947 को था--किसी तरह का बदलाव नहीं लाया जा सकता है.
दूसरे प्रावधानों के साथ एक प्रावधान ये भी है कि इस तरह के मुक़दमे अदालत में दाख़िल होते ही ख़ारिज हो जाएँगे यानी उनकी आगे सुनवाई नहीं होगी.
लेकिन बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने उपासना स्थल क़ानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी है. उन्होंने अपनी दलील में मुख्य तौर पर दो बातें सामने रखी हैं.
पहली दलील है कि चूँकि 'क़ानून-व्यवस्था' राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में है, इसलिए केंद्र इस पर क़ानून नहीं बना सकता है.
अपनी याचिका में अश्विनी उपाध्याय ने दूसरी दलील ये दी कि 'पिलग्रिमेज' यानी 'तीर्थस्थल' पर क़ानून बनाने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों को है.
लेकिन जब मामला अंतरराष्ट्रीय हो तो, जैसे कैलाश मानसरोवर या ननकाना साहिब, वो अधिकार क्षेत्र केंद्र सरकार का हो जाता है. जब मामला राज्यों से जुड़े धार्मिक स्थलों का हो तो राज्यों के अधिकार क्षेत्र का मामला होता है.
सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई 11 अक्तूबर को करने जा रहा है.
ज्ञानवापी मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए मस्जिद पक्ष के वकील ने तर्क दिया था कि उपासना स्थल क़ानून के लागू रहने के कारण याचिकाकर्ताओं की अर्ज़ी दाख़िल ही नहीं होनी चाहिए थी.
अदालत ने इस मामले में ज़िला मजिस्ट्रेट की कोर्ट में महिलाओं की याचिका को चुनौती देने वाली अपील पर निर्णय का इंतज़ार करने का फ़ैसला किया है.
कैसे तैयार हुई मस्जिद? कब हुआ वर्तमान मंदिर का निर्माण?
मान्यता रही है कि काशी विश्वनाथ मंदिर को मुग़ल बाहशाह औरंगज़ेब आलमगीर के आदेश से तोड़कर उस जगह मस्जिद बनाई गई.
लेकिन इतिहासकारों से बात करने पर पूरी बात उससे कहीं अधिक जटिल नज़र आती है.
वर्तमान में जो काशी विश्वनाथ मंदिर है, उसे मराठा रानी अहिल्याबाई होलकर ने तैयार करवाया था.
हिंदू पक्षकारों में से कुछ का दावा रहा है कि काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़े जाने से पहले एक भव्य धार्मिक स्थल हुआ करता था.
उनके अनुसार मंदिर का निर्माण राजा विक्रमादित्य के काल में करवाया गया था.
उपन्यासकार और कवि मकरंद परांजपे कहते हैं कि वाराणसी में लूट,अपवित्रीकरण और नुक़सान पहुँचाने का सिलसिला महमूद गज़नवी के आक्रमण के समय से शुरू हुआ.
इतिहासकार अबु अल-फज़ल अल-बैहाक़ी के हवाले से मकरंद परांजपे लिखते हैं- 1033 ईस्वी में शहर के कपड़ा, इत्र और जौहरी बाज़ार में सुबह से लेकर दोपहर की नमाज़ तक लूट-मार की गई. बावजूद इसके महमूद गज़नवी के गवर्नर अहमद नियालतिगिन को इस बात का मलाल रहा कि वक़्त इतना कम था कि इससे अधिक कुछ न किया जा सका.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस में अपने लेख में हालाँकि मंदिर पर हमले की बात को लेकर उन्होंने 'संभावना' शब्द का प्रयोग किया है.
मकरंद परांजपे कहते हैं कि जहाँ तक ज्ञानवापी का सवाल है, 'संभव' है उस पवित्र स्थल को बार-बार तोड़ा गया हो और फिर उसका निर्माण हुआ हो.

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इतिहासकार राजीव द्विवेदी ने बीबीसी से एक बातचीत में कहा था कि मंदिर का निर्माण राजा टोडरमल ने साल 1585 में करवाया था.
हालांकि मंदिर निर्माण का काम अकबर से आदेश से हुआ या बाहशाह के दरबार के नवरत्नों में से एक, टोडरमल ने ये काम ख़ुद करवाया, इसको लेकर अलग-अलग राय है.
वरिष्ठ पत्रकार और ज्ञानवापी मस्जिद पर गहन शोध कर चुके योगेंद्र शर्मा ने बीबीसी से कहा था कि टोडरमल के मंदिर बनवाने और फिर 1669 में औरंगज़ेब के आदेश से तोड़े जाने के बाद क़रीब सवा सौ सालों तक कोई विश्वनाथ मंदिर काशी में मौजूद नहीं था.
फिर 1735 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने मंदिर का निर्माण करवाया जिसे आज काशी विश्वनाथ मंदिर कहा जाता है.
इतिहासकारों में पुराने मंदिर की भव्यता को लेकर भी इत्तेफ़ाक़ नहीं रहा है, हालाँकि सभी इसके पौराणिक महत्व को स्वीकार करते हैं.
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स्थानीय इतिहासकार कहते रहे हैं कि विश्वनाथ मंदिर का पौराणिक महत्व तो बहुत पहले से रहा है, लेकिन काशी का मंदिर बहुत विशाल रहा हो ये प्रामाणिक तौर पर कहीं दर्ज नहीं है.
लेकिन हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में कम्पेरेटिव रिलीजन की प्रोफ़ेसर डायना एल ईक के अनुसार, "तीर्थस्थल 'बनावट और कार्यान्वयन में वैभवशाली था, और इसके केंद्र में एक पवित्र स्थल था, जिसे आठ खंडों से घेरा गया था."
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 मार्च, 2019 को 800 करोड़ रुपए की लागत से तैयार होने वाली काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की आधारशिला रखी थी, जिसके तहत मंदिर पहुँचने के रास्ते का सौंदर्यीकरण किया गया, साथ ही अब गंगा नदी से कई रास्तों से सीधे वहाँ पहुँचा जा सकता है.
इसके बाद कई जगहों पर मस्जिद के पक्षकारों में बेचैनी की ख़बरें छपी थीं.
मस्जिद इंतज़ामिया (देख-रेख करनेवाली संस्था) दावा करती है कि काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद दोनों का निर्माण अकबर के समय में हुआ था.
हालांकि वो भी ये मानते हैं कि मंदिर को औरंगज़ेब के शासनकाल में तुड़वा दिया गया.
प्रोफ़ेसर ईक कहती हैं, "आधे-विखंडित हिस्से पर वर्तमान ज्ञानवापी मस्जिद तैयार की गई."
प्रोफ़ेसर ईक आगे लिखती हैं, "मस्जिद को पीछे से देखने पर दो तरह की कलात्मक परंपराओं का फ़र्क़ साफ़ दिख जाता है. मंदिर की सुसज्जित पत्थर की दीवार, जो विखंडित होने के बाद भी शानदार दिखती है, जिसके ऊपर पलस्तर किया हुआ मस्जिद की साधारण गुंबद है."
औरंगज़ेब: द मैन एंड द मिथ नाम की पुस्तक की लेखिका ऑड्रे ट्रुस्के के अनुसार, मंदिर की दीवार को मस्जिद में इस्तेमाल करके शायद ये राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की गई होगी कि मुग़ल प्रभुत्व को चुनौती देने का अंजाम क्या हो सकता है.
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मध्यकालीन इतिहास विभाग के प्रोफ़ेसर हेरम्ब चतुर्वेदी हालांकि कहते हैं कि समकालीन इतिहास में विश्वनाथ मंदिर तोड़े जाने का ज़िक्र नहीं है, 'साक़ी मुस्तईद खां और सुजान राय भंडारी ने, जो औरंगज़ेब के समकालीन इतिहासकार थे और जिनके विवरणों को उस काल का प्रामाणिक दस्तावेज़ माना जाता है, इस घटना का ज़िक्र नहीं किया है.'
बीबीसी से की गई बातचीत में उन्होंने कहा था कि ऐसा लगता है कि 'औरंगज़ेब के बाद आने वाले विदेशी यात्रियों के विवरणों से ये बात आगे बढ़ी होगी, लेकिन सबसे पहले उनका ज़िक्र किसने किया, यह बताना मुश्किल है.'
प्रोफ़ेसर हेरम्ब चतुर्वेदी के अनुसार ज्ञानवापी कोई ज्ञान की पाठशाला रही होगी, उसके साथ शायद एक मंदिर भी था. अगर उस मंदिर को तोड़कर मस्जिद तैयार हुई, तो ऐसा माना जा सकता है कि उसका नाम ज्ञानवापी पड़ गया, क्योंकि मस्जिद निर्माण का कोई दस्तावेज़ी प्रमाण नहीं है. कुछ लोग ये भी कहते हैं किसी मस्जिद का नाम ज्ञानवापी हो इसकी कोई और वजह नहीं दिखती.
पटना विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफ़ेसर ओम प्रकाश प्रसाद की किताब औरंगज़ेब, एक नई दृष्टि में पट्टाभि सीतारमैया की किताब फेदर्स एंड स्टोन्स और मशहूर इतिहासकार बीएन पांडेय के हवाले से उस घटना का ज़िक्र किया है, जिसमें संघर्ष की स्थिति में 'मंदिर नष्ट हुआ.'

किताब में कच्छ की एक रानी के अपहरण, औरंगज़ेब के सैनिकों और कुछ महंतों के बीच लड़ाई की स्थिति, जिसमें धार्मिक स्थल को नुक़सान पहुँचा और एक सुरंग पाए जाने का ज़िक्र है.
कच्छ के राजा कोई और नहीं, आमेर के कछवाहा शासक थे और ज़िक्र है कि मंदिर को गिराने का काम कछवाहा शासक जय सिंह की देख-रेख में हुआ था.
राजस्व दस्तावेज़ों में ज्ञानवापी मस्जिद का पहला ज़िक्र 1883-84 में मिलता है. जहाँ इसे जामा मस्जिद ज्ञानवापी के नाम से दर्ज किया गया है.
मस्जिद निर्माण को लेकर एक दावा ये भी है कि इसका निर्माण 14वीं सदी में जौनपुर के शर्की सुल्तानों ने करवाया, जिसके लिए वहाँ मौजूद विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त किया गया. लेकिन कुछ इतिहासकार कहते हैं कि ये बात साक्ष्यों पर खरी नहीं उतरती.
डायना ईक ने अस्सी के दशक में आई अपनी पुस्तक बनारस, सिटी ऑफ़ लाइट में ज़िक्र किया है कि दिल्ली सल्तनत की मशहूर राजकुमारी रज़ियतुद्दीन (रज़िया) ने अपने अल्प शासनकाल में मस्जिद बनवाया था.
ज्ञानवापी मस्जिद-मंदिर विवाद के बीच कई तर्क और दावे हैं जिनकी पुख़्ता तौर पर पुष्टि नहीं हो सकी है और ना ही ऐसा करना आसान है.
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