ज्ञानवापी: व्यास तहख़ाने में आठ मूर्तियों की पूजा कैसे शुरू हुई

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- Author, अनंत झणाणें
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वाराणसी से
साल 1993 तक पंडित सोमनाथ व्यास ज्ञानवापी के दक्षिण में स्थित तहख़ाने में पूजा किया करते थे. हिन्दू पक्ष उसे अपनी याचिकाओं में व्यास जी का तहख़ाना भी कहता है.
अब वाराणसी की ज़िला अदालत के फैसले के बाद वहां पर कोर्ट के नियुक्त किए गए रिसीवर (डीएम वाराणसी) ने पूजा, राग-भोग फिर से शुरू करवाया है.
कोर्ट ने ऐसा करने के लिए एक हफ्ते का समय दिया था, लेकिन प्रशासन ने आदेश आने के चंद घंटों के बाद ही देर रात में पूजा शुरू करा दी.
बीबीसी ने काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के अधिकारियों और वाराणसी प्रशासन से समझने की कोशिश की कि कैसे तहख़ाना खुलवा कर पूजा शुरू करवाई गई.
क्यों शुरू की गई रात में पूजा?
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वाराणसी प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, तहख़ाना खुलवा कर पूजा करवाने की अपनी चुनौतियां थीं.
प्रशासन के मुताबिक कोर्ट के आदेश के अनुसार, सिर्फ़ उन्हीं मूर्तियों की पूजा होनी थी जो इस तहख़ाने से मिली थीं.
तो प्रशासन को सबसे पहले इन मूर्तियों को ट्रेज़री से निकलवाना था. इसके लिए पहले इन मूर्तियों की पहचान करना था जिसके लिए इन मूर्तियों की एएसआई रिपोर्ट में छपी हुई तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया.
इन मूर्तियों की पहले ली गई तस्वीरों से पहचान करके निकालने में दो से तीन घंटे लगे. प्रशासन ने 8 मूर्तियों की पहचान की और उन्हें पूजा के लिए ट्रेज़री से तहख़ाने तक पहुँचाया.
आम तौर पर काशी विश्वनाथ मंदिर के कॉरिडोर में तकरीबन 20 से 30 हज़ार श्रद्धालु रहते हैं. प्रशासन को अपनी कार्रवाई करने के लिए पहले परिसर को खाली करवाना था और उस में भी कुछ समय लगा.
वाराणसी के डीएम और पुलिस कमिश्नर ने काशी विश्वनाथ मंदिर प्रबंधन से और पास के थाना चेतगंज के अधिकारियों से फीडबैक लेकर यह तय किया कि प्रशासन फेंस काटने की कार्रवाई और पूजा देर रात में करवाएगा.
सिर्फ प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट के लोग थे मौजूद

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ज़िला प्रशासन के मुताबिक़, रास्ता बनाने के लिए लोहे का बैरीकेड काटकर वहां पर लोहे का एक गेट लगाया गया.
प्रशासन का कहना है कि रास्ता पहले की तरह अब भी बंद है लेकिन अब फिक्स्ड बैरीकेड की जगह दरवाज़ा लगा दिया गया.
तहख़ाने में अँधेरा होने की वजह से वहां पर लाइट के इंतज़ाम भी किए गए. क्योंकि तहखाना बंद था तो उसमें सीलन की समस्या भी थी.
प्रशासन ने धार्मिक कार्यों के कुछ जानकारों से भी इस बात की सलाह ली कि अगर कोई जगह काफी दिनों तक बंद रहती हैं तो वहां पूजा करने के लिए क्या विधान होता है.
प्रशासन के मुताबिक़ काशी मंदिर के पुजारी ओम प्रकाश मिश्रा ने ही पूजा शुरू करवाई.
वाराणसी प्रशासन का कहना है कि जब तहख़ाने में प्रवेश किया गया और पूजा कराई गई तब वहां सोमनाथ व्यास के परिवार और इस मुकदमे का कोई भी याचिकाकर्ता मौजूद नहीं था.
किन मूर्तियों की पूजा की गई ?

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इस तहख़ाने में से बरामद हुई कुल 8 मूर्तियों की पूजा की गई.
यह पहले से ही सरकार के ट्रेज़री में मौजूद थीं.
वहां से उन्हें पूजा के लिए निकाल कर तहखाने में लाया गया.
इसमें पत्थर के बिना शिवलिंग के दो अरघे, एक भगवान विष्णु की मूर्ति, दो भगवान हनुमान की मूर्ति, एक भगवान गणेश की, एक राम लिखा हुआ छोटा सा पत्थर और एक गंगा जी का मकर है.
प्रशासन का कहना है कि इनमे से कोई भी मूर्ति पूरी नहीं है और सभी खंडित हैं.
तहख़ाने का कोई द्वार नहीं था

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वाराणसी प्रशासन के मुताबिक़ तहख़ाने में अंदर जाना सबसे आसान था क्योंकि इसका कोई गेट ही नहीं था.
जब 2022 में कोर्ट कमिश्नर का सर्वे हुआ था तब उसमें सबसे ज़्यादा इसी तहख़ाने का सर्वे हुआ था. यह वही कमीशन का सर्वे था जिसमें हिन्दुओं ने मस्जिद के वुज़ू खाने में शिवलिंग होने का दावा किया था.
जब एएसआई ने अपना सर्वे शुरू किया तो उसने इस तहख़ाने की मिट्टी हटाने का काम किया. अभी तहख़ाने में बल्लियां भी पड़ी हुई हैं. प्रशासन के मुताबिक़ 1993 में यहाँ पूजा होती थी. लेकिन जब यह तहख़ाना बैरिकेडिंग के अंदर चला गया तो तब इस तहख़ाने की दो चाबियां होती थीं.
एक चाबी सोमनाथ व्यास के पास रहती थी और दूसरी ज़िला प्रशासन के पास.
सोमनाथ व्यास साल में एक बार रामायण करवाते थे तो उसके लिए वो प्रशासन से अलग से अनुमति लेते थे, बल्लियां निकाल कर वो टेंट लगते थे और रामायण के बाद उसे वापस अंदर रख देते थे.
बाद में सोमनाथ व्यास के निधन के बाद यह सब भी बंद हो गया, चाबियाँ भी इधर-उधर हो गईं और फिर बाद में तहख़ाने का लकड़ी का दरवाज़ा भी टूट गया.
प्रशासन के मुताबिक़, यह तहखाना 35 से 40 फीट लंबा और 25 से 30 फीट चौड़ा है. इसके पांच चैंबर हैं. एक चैंबर में मिट्टी भरी हुई है और तीन चैंबर खुले हुए हैं. पांचवा चैंबर दीवार से बंद है जिसमें एएसआई का कहना है कि वहां एक कुआं है. तो अगर मान लें कि दक्षिण में तीन तहखाने थे तो यह बीच वाला तहखाना है.
सिर्फ एक पुजारी को अंदर जाने की अनुमति है

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इस तहख़ाने के अंदर सिर्फ एक पुजारी को ही जाने की अनुमति है.
शुरू में साफ-सफाई और लाइट लगाने के लिए लोग गए लेकिन जब से एक बार रात में मूर्ति बैठ गई तो फिर रात को एक आरती हुई और आज भी एक एक पुजारी ही अंदर जाकर पूजा कर रहे हैं.
जो बैरिकेडिंग काट कर गेट लगाया गया है, वो सुबह पहली आरती के समय 3:30 बजे खुलता है और रात को 10:30 बजे की आरती के बाद बंद हो जाएगा.
जो श्रद्धालु देखना चाहते हैं वो सिर्फ एक गेट से ही अंदर देख सकते हैं और गेट के अंदर कदम नहीं रख सकते हैं.
कैसे हो रही है पूजा?

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यह जानने के लिए बीबीसी ने काशी विश्वनाथ मंदिर के ट्रस्ट के सीईओ विश्व भूषण मिश्रा से बात की.
उनके मुताबिक़ जिस हिसाब से काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा का कार्यक्रम चलता है, उसी हिसाब से तहख़ाने में भी पूजा करने का काम ट्रस्ट कर रहा है.
तहख़ाने में सुबह ढाई से साढ़े तीन बजे मंगला आरती की जा रही है. फिर 11 से एक बजे के बीच भोग आरती होती है. इसमें भगवान को भोजन कराया जाता है. शाम को चार बजे एक और आरती होती है.
शाम को सात से आठ बजे के बीच में सप्तर्षि आरती होती है और आख़िरी आरती रात के 10 से 11:30 के बीच में होती है.
कोर्ट के आदेश के मुताबिक़, मंदिर में राग-भोग की व्यवस्था होनी है.
इसे समझाते हुए मंदिर ट्रस्ट के सीईओ विश्व भूषण मिश्रा कहते हैं, "राग-भोग का मतलब है कि कानूनी तौर पर देवता को नाबालिग बच्चे के रूप में परिभाषित किया गया है, उसी हिसाब से भोग लगते हैं, कपड़े बदलते हैं और श्रृंगार करते हैं और उनकी सेवा की जाती है."
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