ज्ञानवापी: विचाराधीन मामले पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बयान देना कितना सही?

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- Author, अनंत झणाणें
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तीन अगस्त को इलाहाबाद हाई कोर्ट इस बात पर फ़ैसला सुनाने जा रहा है कि ज्ञानवापी के परिसर का एएसआई सर्वेक्षण होना चाहिए या नहीं.
हिंदू पक्ष चाहता है कि परिसर का एक वैज्ञानिक सर्वेक्षण हो.
हिंदू पक्ष के मुताबिक़, इससे ये साबित किया जा सकेगा कि मौजूदा ढांचा एक हिंदू मंदिर पर बनाया गया है.
मुस्लिम पक्ष का विरोध है कि अगर एएसआई सर्वे करती है तो उससे ज्ञानवापी के ढांचे को नुकसान पहुंचेगा.
लेकिन इस बीच निचली अदालत, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चल रहे तमाम मुकदमों में उलझे ज्ञानवापी मामले पर पहली बार कोई बड़ी राजनीतिक राय सामने आई है.
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योगी: 'ऐतिहासिक साक्ष्यों को देखने की भी आवश्यकता है...'
एक इंटरव्यू में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मुस्लिम समाज से अपील करते हुए कहते हैं कि, "वो पुरानी गलतियों की पुनरावृत्ति ना होने दें. वहां साक्ष्य हैं, भौतिक साक्ष्य हैं, शास्त्रीय प्रमाण होंगे, अन्य पुरातात्विक प्रमाण भी होंगे, तो स्वाभाविक रूप से इस पर निर्णय होना चाहिए."
योगी आदित्यनाथ आगे कहते हैं, "मुझे लगता है कि भगवान ने जिसको दृष्टि दी है वो देखे ना. त्रिशूल मस्जिद के अंदर क्या कर रहा है? हमने तो नहीं रखे हैं ना. वहां तो सुरक्षा है. सेंट्रल फोर्सेज़ हैं. उनके (मस्जिद के) मुतवल्ली हैं. ताला चाबी उनके पास रहती है. त्रिशूल कैसे वहां बने हुए हैं? ज्योतिर्लिंग हैं. देव प्रतिमाएं हैं. पूरी दीवारें चिल्ला चिल्ला के क्या कह रही हैं?"
अंत में योगी आदित्यनाथ ने कहा, "देखिये, आप इतिहास में तोड़ मरोड़ वाली बात कर सकते हैं, लेकिन उन ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ नहीं, जो वहां की दीवारें चिल्ला चिल्ला कर कहती हैं और उन ऐतिहासिक साक्ष्यों को देखने की भी आवश्यकता है. और मुझे लगता है कि ये प्रस्ताव मुस्लिम पक्ष की तरफ से आना चाहिए, कि साहब ऐतिहासिक गलती हुई है और उस गलती के लिए हम चाहते हैं कि समाधान हो."
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जो सवाल पूछा नहीं गया...
इंटरव्यू में योगी आदित्यनाथ से कोई ऐसा कोई सवाल नहीं पूछा गया कि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री होते हुए उनके एक संवेदनशील लंबित अदालती मामले पर अपनी राय सार्वजनिक करना कितना सही है?
कम से कम ऐसा प्रसारित की गई क्लिप में तो नज़र नहीं आया.
उत्तर प्रदेश से वरिष्ठ पत्रकार और अयोध्या से प्रकाशित होने वाले 'जनमोर्चा' अखबार की एडिटर-इन-चीफ सुमन गुप्ता को योगी के बयान में कुछ नया नज़र नहीं आता है.
वो कहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अयोध्या में राम मंदिर का का मुद्दा विवाद के परे जा चुका है और यह बयान ये दर्शाता है कि "भाजपा अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे पर काम कर रही है."
योगी के ज्ञानवापी में 'इतिहास से जुड़े साक्ष्यों को देखने' की बात पर पत्रकार सुमन गुप्ता कहती हैं, "इतिहास में बहुत कुछ हुआ है. शासकों ने बहुत कुछ किया और वो शासक थे, कोई लोकतांत्रिक तरीके से चुन कर आए हुए लोग नहीं थे. उनके करने के बहुत सारे कारण रहे होंगे."
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विचाराधीन मुद्दों पर सार्वजनिक बयानबाज़ी
जब कभी भी कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री अपने पद की शपथ लेते हैं तो शपथ में वो कहते हैं कि, "मैं, भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूंगा."
योगी आदित्यनाथ ने भी मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते वक़्त यही कहा था.
तो क्या फिर उनका ज्ञानवापी पर अपनी राय सार्वजनिक करना और एक धर्म विशेष के पक्ष में बयान देना उनके मुख्यमंत्री पद से जुड़ी संवैधानिक मर्यादा को लांघता है?
संकट मोचन के महंत प्रोफेसर विश्वम्भरनाथ मिश्र का कहना है कि, "अगर मामला विचाराधीन है तो हमें नहीं लगता है कि किसी को इसमें उतावलापन दिखाना चाहिए. हम अगर शपथ लेकर किसी संवैधानिक पद पर बैठे हैं तो यह हमारा फिर राजधर्म हो जाता है. और राजधर्म की बात जो अटल जी ने कही थी, कि हमारे व्यक्तिगत विचार राजधर्म से ज़्यादा मतलब नहीं रखते हैं. हम अगर किसी संवैधानिक पद पर बैठे हुए हैं तो हमें उसके अनुसार आचरण करना चाहिए."
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अदालत के बहार संवेदनशील मुद्दों पर बयानबाज़ी के बारे में महंत प्रोफेसर विश्वम्भरनाथ मिश्र कहते हैं, "अभी जो यह समस्या देख रहे हैं कि कोई चीज़ आप हल्ला बोल कर, भीड़ का दबाव बना कर के आप चाह रहे हैं कि कोई फैसला हो जाए, यह अच्छी बात नहीं है."
अयोध्या प्रकरण को लंबे समय से देखते और उस पर रिपोर्टिंग करती आईं पत्रकार सुमन गुप्ता कहती हैं, "जब अयोध्या में राम मंदिर का मामला भी लंबित था तो संवैधानिक पदों पर बैठे लोग इन सब टिप्पणियों से बचते थे. जब कोई चुन कर संवैधानिक पद पर जाता है तो हिंदुस्तान की जनता यह अपेक्षा करती है कि वो सभी के साथ समान व्यवहार करेगा, और उसके कार्यों और बयानों से कोई गलत संदेश नहीं जाएगा. लेकिन इस इंटरव्यू के माध्यम से उनको जो संदेश देना था... वो अपने लोगों को उन्होंने दे दिया."
प्रोफेसर विश्वम्भरनाथ मिश्र कहते हैं, "हमारे हिसाब से अगर कोई प्रक्रिया जारी है तो लोगों को उसे स्वीकार करना चाहिए और अदालत के फैसले का इंतज़ार करना चाहिए."
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योगी: 'मुस्लिम पक्ष की तरफ से आए समाधान का प्रस्ताव'

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योगी आदित्यनाथ ने इंटरव्यू में ज्ञानवापी का 'समाधान' सुझाते हुए कहा, "मुझे लगता है कि यह प्रस्ताव मुस्लिम पक्ष की तरफ से आना चाहिए, कि साहब ऐतिहासिक गलती हुई है और उस गलती के लिए हम चाहते हैं कि समाधान हो."
इस बारे में संकट मोचन मंदिर के महंत प्रोफेसर विश्वम्भरनाथ मिश्र कहते हैं, "तो यह बात तो वो लोग (मुस्लिम पक्ष) भी कह सकते हैं."
महंत विश्वंभरनाथ मिश्र कहते हैं, "हर आदमी सुरक्षित महसूस करना चाहता है. सबको यह देश प्रिय है, सबको अपनी चीज़ें प्रिय हैं. तो बताइए कौन अपनी चीज़ नहीं बचाना चाहेगा? आप उनके नज़रिये से भी तो देखिए. वो लोग तो आपसे चाहेंगे कि हम लोग अल्पसंख्यक हैं, हमारी संख्या कम है तो वो अपने हिंदू भाइयों से ज़्यादा आशा करेंगे."
इस बारे में पत्रकार सुमन गुप्ता कहती हैं, "यह कोई समाधान और समझौता ढूंढ़ने का मुद्दा ही नहीं है. अब तो मामला तरह-तरह रूप में ज़िला अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है."
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सीएम योगी के बयान पर मुस्लिम पक्ष चुप
सीएम योगी के बयान की मीडिया में काफी चर्चा है लेकिन मुस्लिम पक्ष फिलहाल किसी बयानबाज़ी में उलझने से बचता नज़र आ रहा है. वो अदालतों के माध्यम से ही समाधान खोजने की कोशिश में है.
जहाँ तक एएसआई सर्वेक्षण की बात है तो मुस्लिम पक्ष ने अदालत में यही दलील रखी है कि, "एएसआई सर्वे कराने की नौबत तभी आती है जब अदालत में दोनों हिंदू और मुस्लिम पक्षों द्वारा दिए गए सबूतों में कमी पाई जाती है. और निचली अदालत में मामला अभी उस स्टेज तक नहीं पहुंचा है."
मुस्लिम पक्ष ने यह भी कहा है कि एएसआई के सर्वेक्षण में कई खुदाई हो सकती है जिससे ज्ञानवापी मस्जिद के ढांचे को नुकसान पहुँच सकता है.
लेकिन 2022 से अपनी मांग पर कायम हिंदू पक्ष ने पहले निचली अदालत के ज़रिए एक अधिवक्ता कमिश्नर द्वारा सर्वेक्षण करवाया जिसमें मस्जिद के वजूखाने में कथित शिवलिंग बरामद होने का दवा किया गया.
सर्वे की रिपोर्ट अदालत में सौंपे जाने के पहले ही मीडिया में लीक हो गई. अब गुरुवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट निचली अदालत के एएसआई सर्वे के आदेश पर अपना फैसला सुना सकती है.
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