ज्ञानवापी मामला: कथित शिवलिंग की कार्बन डेटिंग की मांग कोर्ट ने खारिज की

ज्ञानवापी मस्जिद

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    • Author, अनंत झणाणे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ज्ञानवापी मस्जिद में कथित शिवलिंग की कार्बन डेटिंग करवाए जाने के फ़ैसले को वाराणसी की अदालत ने खारिज कर दिया है.

चार महिला याचिकाकर्ताओं ने बनारस के ज़िला जज की अदालत में सील किए गए वज़ूखाने की कार्बन डेटिंग करने की मांग की थी.

वैज्ञानिक जांच के ज़रिए याचिकाकर्ता ये पता करना चाहते हैं कि कथित शिवलिंग कितना लंबा, कितना चौड़ा और कितना अंदर तक है. उनका कहना है कि इस जांच के बाद ये साफ हो जाएगा कि ये फव्वारा है या शिवलिंग.

आपको बता दें कि इसी साल मई के महीने में ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे हुआ था, जिसके बाद हिन्दू पक्ष ने दावा किया था कि मस्जिद के वज़ूखाने के बीचों बीच एक 'शिवलिंग' बरामद हुआ है. जिसके बाद एक निचली अदालत ने उसे सील करने के आदेश दिए थे.

ज्ञानवापी मस्जिद काशी विश्वनाथ मंदिर

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शुक्रवार को हुई सुनवाई में ज़िला जज एके विश्वेश की अदालत ने ये समझने की कोशिश की कि वैज्ञानिक जांच और कार्बन डेटिंग की प्रक्रिया क्या होगी और उससे क्या हासिल होगा.

अदालत ने मस्जिद पक्ष के वकीलों को भी इस मांग पर अपना लिखित जवाब 11 तारीख़ तक दाखिल करने को कहा.

सुनवाई के बाद मीडिया से बात करते हुए हिन्दू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने बताया कि, "मुस्लिम पक्ष ने यह कहा है कि यह एक फव्वारा है. हमारा कहना है कि यह शिवलिंग है. अगर दो पक्ष अलग-अलग बात कह रहे हैं तो उसका पता लगाने का एक ही तरीका है, वो है वैज्ञानिक जांच. इसका कोई मौखिक साक्ष्य नहीं है, ना ही कोई दूसरा तरीका है जिससे यह पता लगाया जा सके की यह शिवलिंग है या फव्वारा है. इसलिए हमने साइंटिफिक जांच की मांग की है."

क्या है 4 महिला याचिकाकर्ताओं की मांग?

पांच में से चार महिला वादियों के वकील सुधीर त्रिपाठी कहते हैं, "हमारी मांग है कि कार्बन डेटिंग के साथ-साथ वैज्ञानिक जांच कराई जाए. लेकिन बिना शिवलिंग को क्षति पहुंचाए चीज़ें पता चले. वैज्ञानिक जांच के ज़रिए वो यह पता लगा सकते हैं कि कितना लंबा चौड़ा है, कितने अंदर तक है. बहुत सारी चीज़ें हैं जो वैज्ञानिक तरीक़े से वैज्ञानिक बताएंगे. मुख्य काम तो ये पता करना है कि यह फ़व्वारा नहीं है, शिवलिंग है. उससे संबंधित वैज्ञानिक साक्ष्य होगा."

सुधीर त्रिपाठी यह भी कहते हैं, "ये पता लग सकता है कि कितना पुराना है, क्या है और ज़मीन के अंदर कितना गया है, अरघा (अरघा देने का पात्र) है कि नहीं है, इसके अंदर सारी चीज़ें हैं."

वैज्ञानिक विधियों से आजकल कुछ भी पता लगा सकते हैं और हम यह जानना चाहते हैं कि कितना पुराना है, कितना लंबा चौड़ा है, क्या है? वो फ़व्वारा नहीं है, शिवलिंग हैं तो हमको साबित करना पड़ेगा और यही साबित करने के लिए हम लोग यह मांग कर रहे हैं."

ज्ञानवापी मस्जिद

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क्या है मस्जिद पक्ष और सरकार की राय?

मुस्लिम पक्ष के वकील अख़लाक अहमद कार्बन डेटिंग की अर्ज़ी के बारे में अंजुमन इंतेज़ामिया मस्जिद कमेटी की अदालत में आपत्ति के बारे में कहते हैं, "हमने इस मांग का विरोध किया है. क्योंकि कार्बन डेटिंग ऐसी चीज़ों की होती है जो कार्बन अवशोषित करे."

"जैसे इंसान है वो मर गया उसकी हड्डियों की जांच हो सकती है, जानवर हैं. पेड़ पौधे भी हैं. ये पत्थर और लकड़ी की कार्बन डेटिंग नहीं हो सकती है. क्योंकि ये कार्बन एब्जॉर्ब नहीं कर सकते हैं. इसी पर कोर्ट ने बहस को सुना है और इसी पर आदेश आएगा कि उनकी एप्लीकेशन मानी जाएगी या नहीं."

लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या है कार्बन डेटिंग की मांग को लेकर अदालत में हिन्दू पक्ष के याचिकाकर्ता बंटे हुए हैं?

सरकारी वकील महेंद्र पांडेय कहते हैं, "कार्बन डेटिंग जांच का विरोध मुस्लिम पक्ष के साथ साथ वादी पक्ष संख्या एक राखी सिंह ने भी किया है."

वकील महेंद्र पांडेय बताते हैं कि अदालत में बहस के दौरान, "वादी राखी सिंह के वकीलों का कहना था कि कार्बन डेटिंग करने से शिवलिंग को क्षति पहुंचेगी. जो मूर्ति है वो खंडित हो सकती है. और कार्बन डेटिंग करा कर उसके प्रति अविश्वास पैदा किया जा रहा है."

सरकारी वकील महेंद्र पांडेय के मुताबिक़, "राखी सिंह के वकीलों ने कहा कि जब इस बात का कोई प्रश्न है ही नहीं कि वो शिवलिंग नहीं है. राखी सिंह के वकीलों का कहना था कि वो शिवलिंग था, शिवलिंग है और शिवलिंग ही रहेगा. राखी सिंह के वकीलों ने अंत में कहा कि ऐसी स्थिति में उसको किसी भी तरह की साइंटिफ़िक इन्वेस्टिगेशन कराए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है. इस तरह के प्रार्थना पत्र खुद राखी सिंह ने कोर्ट को इंगित करते हुए दिया है कि हम उस पर प्रश्न क्यों उठाएं."

सरकारी वकील महेंद्र पांडेय सरकार के रवैये के सवाल पर कहते हैं कि जो भी आदेश कोर्ट की तरफ़ से आएगा उत्तर प्रदेश सरकार उसका अनुसरण करेगी.

12 सितंबर 2022 को हुई सुनवाई में वाराणसी जिला अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में देवी देवताओं की पूजा की मांग को लेकर की गई पाँच महिलाओं की याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया. साथ ही कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की अपील को खारिज कर दिया.

1991: उपासना स्थल क़ानून. कांग्रेस की पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने 1991 में उपासना स्थल क़ानून (विशेष प्रावधान) पास किया. बीजेपी ने इसका विरोध किया लेकिन अयोध्या को अपवाद माने जाने का स्वागत किया और माँग की कि काशी और मथुरा को भी अपवाद माना जाना चाहिए, लेकिन कानून के मुताबिक केवल अयोध्या ही अपवाद है.

1991: ज्ञानवापी मामला कोर्ट पहुँचा. ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर 1991 में पहली बार अदालत में याचिका दाखिल की गई. वाराणसी के साधु-संतों ने सिविल कोर्ट में याचिका दाखिल करके वहाँ पूजा करने की माँग की. याचिका में मस्जिद की ज़मीन हिंदुओं को देने की माँग की गई थी. लेकिन मस्जिद की प्रबंधन समिति ने इसका विरोध किया और दावा किया कि ये उपासना स्थल क़ानून का उल्लंघन है.

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ज्ञानवापी मामला- अब तक क्या हुआ?

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  • 2019: दिसंबर में अयोध्या फ़ैसले के क़रीब एक महीने बाद वाराणसी सिविल कोर्ट में नई याचिका दाख़िल करके ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे कराने की माँग की गई.
  • 2020: वाराणसी के सिविल कोर्ट से मूल याचिका पर सुनवाई की माँग की गई.
  • 2020: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सिविल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाई और फिर इस मामले पर फ़ैसला सुरक्षित रखा.
  • 2021: हाई कोर्ट की रोक के बावजूद वाराणसी सिविल कोर्ट ने अप्रैल में मामला दोबारा खोला और मस्जिद के सर्वे की अनुमति दे दी.
  • 2021: मस्जिद इंतजामिया ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और हाई कोर्ट ने फिर सिविल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाई और फटकार भी लगाई.
  • 2021: अगस्त में पाँच हिंदू महिलाओं ने वाराणसी सिविल कोर्ट में श्रृंगार गौरी की पूजा की अनुमति के लिए याचिका दाखिल की.
  • 2022: अप्रैल में सिविल कोर्ट ने ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे करने और उसकी वीडियोग्राफ़ी के आदेश दे दिए.
  • 2022: मस्जिद इंतज़ामिया ने कई तकनीकी पहलुओं के आधार पर इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जो ख़ारिज हो गई.
  • 2022: मई में मस्जिद इंतज़ामिया ज्ञानवापी मस्जिद की वीडियोग्राफ़ी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.
  • 2022: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू होने से पहले 16 मई को सर्वे की रिपोर्ट फ़ाइल और
  • 2022: 16 मई को वाराणसी सिविल कोर्ट ने मस्जिद के अंदर उस इलाक़े को सील करने का आदेश दिया, जहाँ शिवलिंग मिलने का दावा किया गया था. वहाँ नमाज़ पर भी रोक लगा दी गई.
  • 2022: 17 मई को सुप्रीम कोर्ट ने 'शिवलिंग' की सुरक्षा वुजूख़ाने को सील करने का आदेश दिया, लेकिन साथ ही मस्जिद में नमाज़ जारी रखने की अनुमति दे दी.
  • 2022: 20 मई को सुप्रीम कोर्ट ने ये मामला वाराणसी की ज़िला अदालत में भेज दिया, सुप्रीम कोर्ट ने अदालत से यह तय करने को कहा है कि मामले आगे सुनवाई के लायक है या नहीं.
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ज्ञानवापी मस्जिद और काशी विश्वनाथ मंदिर
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ज्ञानवापी से जुड़ा अहम फ़ैसला

वाराणसी की ज़िला अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के बाहर चबूतरे पर माँ श्रृंगार गौरी देवी के दर्शन और पूजा की की मांग को लेकर की गई पांच महिलाओं की याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है.

12 सितंबर को सुनाए गए इस फैसले पर हिंदू पक्ष के वकील विष्णु जैन ने कहा था कि ज़िला जज ए के विश्वेश की अदालत ने अपने फ़ैसले में मुस्लिम पक्ष की अपील को ख़ारिज़ कर दिया है.

पिछले साल अगस्त में दिल्ली की एक महिला राखी सिंह और चार अन्य महिलाओं ने ज्ञानवापी मस्जिद के परिसर से सटे चबूतरे पर माँ श्रृंगार गौरी और कुछ अन्य देवी-देवताओं के दर्शन-पूजन की अनुमति की मांग करते हुए एक याचिका दाख़िल की थी.

जिला जज एके विश्वेश ने अपने फ़ैसले में कहा कि याचिकाकर्ताओं की याचिका ना तो उपासना स्थल क़ानून का उल्लंघन है और न ही वक़्फ़ कानून का.

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क्या होती है कार्बन डेटिंग की जांच?

कार्बन डेटिंग एक व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली विधि है, जिसका उपयोग कार्बनिक पदार्थों की आयु को जानने के लिए किया जाता है, जो चीज़ें कभी जीवित थीं.

जीवित चीजों में विभिन्न रूपों में कार्बन होता है. डेटिंग पद्धति इस तथ्य का उपयोग करती है कि कार्बन का एक विशेष समस्थानिक (आइसोटोप) होता है, जिसे C-14 कहा जाता है, जिसका परमाणु द्रव्यमान (मास) 14 है, यह रेडियोधर्मी है और समय के साथ यह जैविक शरीर में कम होने लगता है.

तो किसी पौधे या जानवर के मरने के बाद, शरीर में कार्बन -12 से कार्बन -14 का अनुपात या उसके अवशेष बदलना शुरू हो जाते हैं. इस परिवर्तन को मापा जा सकता है और इसका उपयोग जीव की मृत्यु के अनुमानित समय को निकालने के लिए किया जाता है.

हालांकि अत्यंत प्रभावी, कार्बन डेटिंग को सभी परिस्थितियों में लागू नहीं किया जा सकता है. विशेष रूप से, इसका उपयोग निर्जीव चीजों की उम्र निर्धारित करने के लिए नहीं किया जा सकता है, जैसे कि उदाहरण के लिए चट्टानें.

साथ ही, कार्बन डेटिंग के माध्यम से 40,000-50,000 वर्ष से अधिक की आयु की गणना नहीं की जा सकती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि आधे जीवन के आठ से दस चक्र पार करने के बाद, कार्बन -14 की मात्रा लगभग नगण्य हो जाती है.

क्या किसी ऐतिहासिक ढांचे की कार्बन डेटिंग हो सकती है?

ऐतिहासिक भित्ति चित्र

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यह समझने और जानने के लिए बीबीसी ने लखनऊ के बीरबल साहनी पुरावनस्पति विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डॉक्टर राजेश अग्निहोत्री से बात की.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि रेडियो कार्बन डेटिंग एकमात्र तरीका है जिसके माध्यम से सभी जीवित वस्तुओं की उनके मौत के बाद उनकी आयु के बारे में जानकारी मिल सकती है. इस जानकारी को बाद में पुरातात्विक जानकारी से जोड़ कर देखा और समझा जा सकता है.

तो क्या निर्जीव चीज़ों की कार्बन डेटिंग की जा सकती है? डॉक्टर राजेश अग्निहोत्री बताते हैं, "पत्थरों और धातुओं की डेटिंग नहीं हो सकती है क्योंकि उनमें कार्बन नहीं होता है. लेकिन जब निर्जीव वस्तुओं की स्थापना होती है तो उनके साथ दूसरे जैविक सामान जैसे अनाज, कपड़े, लकड़ी, रस्सी जैसी कोई दूसरी चीज़ें भी मिल जाती हैं जिनकी कार्बन डेटिंग हो सकती है."

तो क्या इन जैविक सामान से किसी ढांचे की उम्र का अंदाजा लगाया जा सकता है? इस सवाल के जवाब में डॉक्टर राजेश अग्निहोत्री कहते हैं, "निश्चित रूप से इस तकनीक के इस्तेमाल से किसी ढांचे की विश्वसनीय उम्र का पता लगाया जा सकता है, जिसे उस समय की दूसरी पुरातात्विक जानकारी के साथ जोड़ कर देखा जाना चाहिए."

राजेश अग्निहोत्री कहतें है कि कार्बन डेटिंग तकनीक का इस्तेमाल राम जन्म भूमि और इमामबाड़े के ऐतिहासिक संदर्भ को स्थापित करने के लिए भी किया गया था. यह जांचे भारतीय पुरातत्व विभाग से मिले सैम्पल पर की गयी थी. इन सैम्पल्स को एएसआई और बीरबल साहनी पुरावनस्पतिविज्ञान संस्थान ने मिल कर एकत्रित किया था.

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