ज्ञानवापीः उपासना स्थल क़ानून के बाद भी मस्जिद में सर्वे कैसे हुआ?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर विवाद काफ़ी पुराना है लेकिन इन दिनों में उसमें नया उफ़ान दिख रहा है.
1991 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस से पहले बने एक क़ानून को समझे बिना ज्ञानवापी विवाद को ठीक से नहीं समझा जा सकता.
सबसे पहले ये जानते हैं कि साल 1991 का उपासना स्थल क़ानून क्या है ?
बात साल 1991 की है. उस वक़्त देश भर में अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर बनाने के लिए चल रहा आंदोलन अपने चरम पर था.
साल 1990 में बीजेपी के नेता लालकृष्ण आडवाणी देश भर में रथयात्रा लेकर निकले थे. बिहार में उनकी गिरफ़्तारी हुई थी. उसी साल कारसेवकों पर गोलियां चलीं. पूरे देश में और ख़ासतौर पर उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक तनाव उबाल पर था.
ऐसे वक़्त में 18 सितंबर 1991 में ये क़ानून बना था.
उस वक़्त केंद्र में नरसिम्हा राव की सरकार ने संसद से उपासना स्थल कानून पारित कराया था.
उपासना स्थल क़ानून कहता है कि भारत में 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थान जिस स्वरूप में था, वह उसी स्वरूप में रहेगा, उसकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जा सकेगा.
ये क़ानून ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की शाही ईदगाह समेत देश के सभी धार्मिक स्थलों पर लागू होता है.
तब उमा भारती सहित बीजेपी के कई नेताओं ने इस नए क़ानून का जमकर विरोध किया था. उन्होंने कहा था कि इस तरह का क़ानून बनाकर हम ऐसे अन्य मामलों में आंखें मूंद नहीं सकते.

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इस क़ानून का सेक्शन (3) कहता है कि कोई भी व्यक्ति किसी धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग (सेक्ट) के पूजास्थल के स्वरूप में किसी तरह का परिवर्तन नहीं कर सकता है.
इसी क़ानून के सेक्शन 4(1) में लिखा है- यह घोषित किया जाता है कि 15 अगस्त, 1947 को मौजूद उपासना स्थल का धार्मिक स्वरूप वैसा ही बना रहेगा जैसा वह उस दिन था.
इसी क़ानून के सेक्शन 4(2) में लिखा है- यदि इस अधिनियम के लागू होने पर, 15 अगस्त, 1947 को मौजूद किसी उपासना स्थल के धार्मिक स्वरूप में परिवर्तन के बारे में कोई वाद, अपील या अन्य कार्रवाई किसी न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकारी के समक्ष लंबित है, तो वह रद्द हो जाएगी. और ऐसे किसी मामले में कोई वाद, अपील, या अन्य कार्यवाही दोबारा से किसी न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकारी के समक्ष शुरू नहीं होगी.
इस क़ानून के सेक्शन (5) के तहत अयोध्या विवाद को इससे अलग रखा गया क्योंकि यह मामला आज़ादी से पहले अदालत में लंबित था. इसका एक और अपवाद वो धार्मिक स्थल हो सकते हैं जो पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग के अधीन आते हैं और उनके रख-रखाव के काम पर कोई रोकटोक नहीं है.

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साल 1991 के समय ज्ञानवापी मस्जिद का मामला कहां था और क़ानून के बाद क्या हुआ?
साल 1991 के पहले भी ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर विवाद था, जिनमें से सबसे अहम विवाद साल 1809 में हुआ था जिसकी वजह से सांप्रदायिक दंगे भी हुए थे.
साल 1991 में उपासना स्थल क़ानून बनने के बाद इस मस्जिद में सर्वे के लिए अदालत में याचिका दायर की गई थी.
याचिका दायर करने वाले हरिहर पांडेय ने बीबीसी को बताया कि 'साल 1991 में तीन लोगों ने ये मुक़दमा दाख़िल किया था. मेरे अलावा सोमनाथ व्यास और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रहे रामरंग शर्मा इसमें शामिल थे. ये दोनों लोग अब जीवित नहीं हैं'.
इस मुक़दमे के दाख़िल होने के कुछ दिनों बाद ही ज्ञानवापी मस्जिद प्रबंधन कमेटी ने 'उपासना स्थल क़ानून, 1991' का हवाला देकर सर्वे के आवेदन को रद्द करने की माँग की. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साल 1993 में स्टे लगाकर यथास्थिति क़ायम रखने का आदेश दिया था.
फिर 2017 में हरिहर पांडेय दोबारा से वाराणसी सिविल कोर्ट पहुँचे. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के किसी दूसरे मामले में रुलिंग दी थी कि कोई भी स्टे ऑर्डर 6 महीने से ज़्यादा वैध नहीं हो सकता, 6 महीने के बाद स्टे ऑर्डर का रिन्यू किया जाना ज़रूरी है.
सुप्रीम कोर्ट की इसी रुलिंग को आधार बनाकर हरिहर पांडेय ने ज्ञानवापी के स्टे ऑर्डर की वैधता पर सवाल उठाया, वे साल 2019 में वाराणसी सिविल कोर्ट में फिर से याचिका लेकर पहुँचे. इस बार उन्होंने मस्जिद परिसर के सर्वे की माँग भी जोड़ दी.
इस मामले में सुनवाई शुरू हुई और इसी सुनवाई के बाद मस्जिद परिसर के पुरातात्विक सर्वे को मंज़ूरी दी गई. लेकिन मस्जिद पक्ष दोबारा से 1991 क़ानून को आधार बनाकर हाईकोर्ट पहुँचा और इस सर्वे पर हाई कोर्ट ने रोक लगा दिया.
हरिहर पांडेय वाली याचिका अब भी इलाहाबाद हाई कोर्ट में है, और उस पर कोई कानूनी निर्णय नहीं हुआ है.
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साल 2020 में उपासना स्थल क़ानून की वैधता को चुनौती
साल 2020 के अक्टूबर में बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करके 1991 के उपासना स्थल क़ानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए.
उन्होंने अपनी दलील में मुख्य तौर पर दो बाते रखीं.
पहली ये कि केंद्र सरकार के पास इस क़ानून को बनाने का अधिकार ही नहीं है. उनकी दलील है कि 'पब्लिक ऑर्डर' यानी 'क़ानून-व्यवस्था' राज्य सरकार का विषय है. नरसिम्हा राव सरकार ने जब ये क़ानून बनाया तो देश और राज्य की बिगड़ती क़ानून व्यवस्था को इसका आधार बनाया.
अपनी याचिका में अश्निनी उपाध्याय ने दूसरी दलील ये दी कि 'पिलग्रिमेज' यानी 'तीर्थस्थल' पर क़ानून बनाने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों को है. लेकिन जब मामला अंतरराष्ट्रीय हो तो, जैसे कैलाश मानसरोवर या ननकाना साहिब, वो अधिकार क्षेत्र केंद्र सरकार का हो जाता है. जब मामला राज्यों से जुड़े धार्मिक स्थलों का हो तो राज्यों के अधिकार क्षेत्र का मामला होता है.
उसी दौर में इसी से मिलती-जुलती एक याचिका लखनऊ स्थित विश्व भद्रा पुजारी पुरोहित महासंघ ने भी दायर की.
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों याचिकाओं पर अलग-अलग सुनवाई की और केंद्र सरकार से इन पर जवाब माँगा. केंद्र सरकार ने अभी तक कोर्ट में अपना जवाब दाखिल नहीं किया है. सुप्रीम कोर्ट ने अब दोनों याचिकों पर एक साथ सुनवाई करने का फ़ैसला किया है.

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साल 2021 में फिर ज्ञानवापी मामला कोर्ट में क्यों पहुँचा?
18 अगस्त 2021 को पाँच महिलाओं ने बनारस की एक अदालत में एक नई याचिका दाखिल की थी.
इन महिलाओं का नेतृत्व राखी सिंह कर रही हैं जो दिल्ली की रहने वाली हैं. बाकी चार महिला याचिकाकर्ता बनारस की निवासी हैं.
इन सभी की मांग है कि उन्हें ज्ञानवापी मस्जिद के परिसर में मां श्रृंगार गौरी, भगवान गणेश, भगवान हनुमान, आदि विशेष और नंदी जी और मंदिर परिसर में दिख रही दूसरे देवी-देवताओं के दर्शन, पूजन और भोग लगाने की अनुमति दी जाए.
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि माँ शृंगार देवी, भगवान हनुमान, गणेश और अन्य देवी-देवता दशाश्वमेध पुलिस थाने के क्षेत्राधिकार में प्लॉट नंबर 9130 में मौजूद हैं जो काशी विश्वनाथ मंदिर से सटा हुआ है.
उनकी यह भी मांग है कि अंजुमन इंतेज़ामिया मसाजिद को देवी-देवताओं की मूर्तियों को तोड़ने, गिराने या नुकसान पहुँचाने से रोका जाए, और उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया जाए कि वो "प्राचीन मंदिर" के प्रांगण में देवी-देवताओं की मूर्तियों के दर्शन, पूजन के लिए सभी सुरक्षा के इंतज़ाम करे.
अपनी याचिका में इन महिलाओं ने अलग से अर्ज़ी देकर यह भी मांग रखी थी कि कोर्ट एक अधिवक्ता आयुक्त (एडवोकेट कमिश्नर) की नियुक्ति करे जो इन सभी देवी-देवताओं की मूर्तियों सुरक्षा सुनिश्चित करे.
इसी मांग को पहले ज़िला अदालत और बाद में हाई कोर्ट, दोनों ने सही ठहराते हुए मस्जिद परिसर के निरीक्षण की कार्रवाई को मंज़ूरी दी.
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साल 2022 में क्या-क्या क्या हुआ?
इन महिलाओं की याचिका पर 8 अप्रैल 2022 को निचली अदालत ने स्थानीय वकील अजय कुमार को एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करके ज्ञानवापी परिसर का निरीक्षण वीडियो कैमरे के साथ करने का निर्देश दिया.
वाराणसी की अंजुमन इन्तेज़ामिया मसाजिद ने एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति और प्रस्तावित निरीक्षण को हाई कोर्ट में चुनौती दी. हाई कोर्ट ने 21 अप्रैल 2022 को मस्जिद प्रबंधन की याचिका खारिज कर दी.
महिलाओं की याचिका पर इस महीने ज्ञानवापी मस्जिद (प्लॉट नंबर 9130) का निरीक्षण हुआ जो 16 मई को पूरा हुआ.
17 मई को निरीक्षण की रिपोर्ट स्थानीय अदालत में दाखिल नहीं हो पाई है और एडवोकेट कमिश्नर ने दो दिन का समय माँगा है.
ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के निरीक्षण के ख़िलाफ़ मस्जिद प्रबंधन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार से सुनवाई शुरू हो गई है.
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