ज्ञानवापी मस्जिद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दी सर्वे की अनुमति, जानिए क्यों बँटे हुए हैं हिन्दू और मुस्लिम पक्ष

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- Author, अनंत झणाणें
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गुरुवार को ज्ञानवापी मस्जिद में एएसआई को सर्वे जारी रखने की अनुमति दे दी है.
अदालत ने एएसआई के एक अधिकारी से भी यह समझने की कोशिश की है कि क्या ज्ञानवापी के ढांचे को बिना कोई नुक़सान पहुँचाए वैज्ञानिक सर्वे हो सकता है या नहीं.
आइए आपको इस सर्वे की मांग से जुड़े दोनों पक्षों की दलीलों के बारे में विस्तार से बताते हैं और कैसे यह मामला बनारस की ज़िला अदालत से इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुँचा.
21 जुलाई: बनारस की अदालत ने दिया एएसआई सर्वे का आदेश
पिछले महीने 21 जुलाई को बनारस के ज़िला जज ने हिन्दू पक्ष की याचिका पर आदेश दिया कि भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) प्लॉट नंबर -9130 की वैज्ञानिक जांच या खुदाई वाला सर्वे करवाए.
बनारस के ज़िला जज ने जांच में ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार से खुदाई कर आधुनिक तरीक़े से जांच करने के आदेश दिए.
ज्ञानवापी मस्जिद का ढांचा इसी प्लॉट नंबर 9130 पर स्थित है. ज़िला जज ने अपने आदेश में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के मई 2022 के आदेश से सील किए गए वज़ुखाने का सर्वे नहीं होगा.
हिन्दू पक्ष का दावा है कि वज़ुखाने में एक कथित शिवलिंग मिला है. लेकिन मुस्लिम पक्ष का कहना है की वो वज़ुखाने का फव्वारा है.
ज़िला जज ने एएसआई को अपना सर्वे कर रिपोर्ट चार अगस्त तक सौंपने को कहा है.
क्यों उठ रहे हैं सवाल
- मुस्लिम पक्ष (अंजुमन इंतेज़ामिया मसाजिद) का कहना है कि बनारस के ज़िला जज ने काफ़ी जल्दीबाज़ी दिखाई और 21 जुलाई को एएसआई सर्वे का आदेश देकर चार अगस्त तक सुनवाई के लिए रिपोर्ट भी तलब कर ली.
- मुस्लिम पक्ष का कहना है कि एएसआई की टीम अदालत के आदेश के ठीक दो दिन बाद सर्वे करने पहुँच गई और किसी ने यह नहीं सोचा कि मुस्लिम पक्ष को बनारस की अदालत को चुनौती देने का समय मिलना चाहिए.
- मुस्लिम पक्ष ने यह भी सवाल उठाया है कि एएसआई 21 जुलाई तक बनारस की निचली अदालत की सुनवाई का हिस्सा नहीं थी तो फिर अचानक अदालत के एएसआई सर्वे के आदेश के बाद 23 जुलाई को कैसे 30 लोगों से साथ सर्वे करने के लिए ज्ञानवापी पर पहुंच गई. मुस्लिम पक्ष का कहना है कि जितनी जल्दबाज़ी से एएसआई ने कार्रवाई की वो अपने आप में हैरान करने वाला है.

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एएसआई सर्वे पर क्यों कायम है हिन्दू पक्ष?
- हिन्दू पक्ष का कहना है कि प्लॉट नंबर 9130 पर आदि विश्वेश्वर मंदिर है जो राजा टोडरमल ने बनवाया था. अपनी दलीलों में वो कहते हैं कि मंदिर का हिस्सा वहाँ अब भी मौजूद है, जो परिसर में जाने पर नज़र आता है. उनका दावा है कि मई 2022 में हुए अधिवक्ता कमिश्नर के सर्वे से कई हिन्दू प्रतीक चिह्न मिले हैं जैसे - "कमल का फूल, त्रिशूल", इत्यादि.
- हिन्दू पक्ष का कहना है कि मंदिर पर मस्जिद बनाने से वो मस्जिद नहीं कहलाएगी. वो मानते हैं कि मंदिर दिख तो रहा है और न्यायालय में इस मंदिर-मस्जिद विवाद को तय करने के लिए एएसआई सर्वे आवश्यक है और सर्वे में कई सारी चीज़ें निकल कर आएंगी.
- हिन्दू पक्ष का कहना है कि ढांचे से जुड़ा कोई भी विवादित पहलू एएसआई सर्वे साफ़ कर देगा और सुनवाई के दौरान सरकार के वकील एमसी चतुर्वेदी ने कोर्ट में यह बोला भी है कि साल में एक बार ज्ञानवापी के बाहर चबूतरे पर पूजा होती आ रही हैं.

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क्या सर्वे में ढांचे की खुदाई होगी?
मुस्लिम पक्ष ने सबसे ज़्यादा एएसआई के सर्वे में खुदाई होने पर आपत्ति जताई है. दरअसल, सर्वे खुदाई शब्द का इस्तेमाल ज़िला जज ने अपने आदेश में किया है.
लेकिन हिन्दू पक्ष का कहना है कि जिस साइंटिफिक सर्वे की उसने मांग की है, उसमें खुदाई नहीं होगी. हिन्दू पक्ष का कहना है कि सर्वे से ढांचे को कोई नुक़सान नहीं होना है.
अदालत को एएसआई के एडिशनल डायरेक्टर राकेश त्रिपाठी ने भरोसा दिलाया है कि वो ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार तकनीक से सर्वे करने जा रहे हैं और खोदना तो दूर वो किसी चीज़ को काटेंगे तक नहीं. यही बात एएसआई ने कोर्ट को दिए अपने हलफ़नामे में भी कही है.
हिन्दू पक्ष का कहना है कि ज़िला जज का अपने आदेश में "खुदाई" शब्द का इस्तेमाल किया है लेकिन उन्हें उम्मीद है की अदालत उसे अपने फ़ैसले में साफ़ कर देगी क्योंकि अदालत में एएसआई ने सब कुछ स्पष्ट कर दिया है.
हिन्दू पक्ष ने कहा कि वो भी खुदाई नहीं चाहते हैं क्योंकि स्थल पर उनके मंदिर के अवशेष हैं तो खुदाई से उनको भी नुक़सान पहुँच सकता है.

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राम मंदिर और ज्ञानवापी में एएसआई सर्वे की तुलना और तर्क
एएसआई सर्वेक्षण पर मुस्लिम पक्ष को यह एतराज़ भी है कि एएसआई को इस पूरे वाद में पार्टी नहीं बनाया गया है और बनारस की निचली अदालत ने अपना फ़ैसला बिना एएसआई को अदालत में बुलाए और उनका पक्ष जाने सर्वे का आदेश दे दिया गया.
ज़िला जज के सामने एएसआई का पक्ष रखने के लिए कोई पेश ही नहीं हुआ.
लेकिन हिन्दू पक्ष का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फ़ैसले हैं कि किसी विवाद को तय करने के लिए किसी साइंटिफ़िक सर्वे की ज़रूरत महसूस होती है तो कोर्ट को सर्वे कराने का पूरा अधिकार है.
मुस्लिम पक्ष कहता है कि सर्वे को जायज़ ठहरने के लिए हिन्दू पक्ष अयोध्या में बाबरी-राम मंदिर विवाद से जुड़े एएसआई सर्वेक्षण का हवाला देता है लेकिन अयोध्या मामला और उसमें हुए एएसआई सर्वे की परिस्थितियां अलग थीं और उनका उदाहरण देकर ज्ञानवापी का एएसआई सर्वे नहीं कराया जा सकता है.
हिन्दू पक्ष का कहना है कि राम मंदिर-बाबरी विवाद वाले मुक़दमे में भी एएसआई पार्टी नहीं थी और उसमें भी एएसआई से एक्सपर्ट ओपिनियन लिया गया था.

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एएसआई सर्वे क्या उपासना स्थल अधिनियम का उल्लंघन है?
मुस्लिम पक्ष का यह कहना है कि उपासना स्थल अधिनियम 1991 के तहत 15 अगस्त 1947 के पहले बने किसी भी धार्मिक स्थल को संरक्षित किया जाएगा और उसके चरित्र को बदलने की कोशिश नहीं की जाएगी. अगर सर्वे में खुदाई होती है तो इस क़ानून का उल्लंघन होगा.
हिन्दू पक्ष का कहना है कि उपासना स्थल अधिनियम 1991 हिन्दू धार्मिक स्थानों की भी रक्षा करता है. हिन्दू पक्ष का दावा है कि अगर ज्ञानवापी के ढांचे में हिन्दू निर्माण हैं और अगर हिन्दू वहाँ पर पूजा कर रहे हैं तो जिस तरह उपासना स्थल क़ानून ज्ञानवापी पर लागू होता है तो उसी तरह वो प्लॉट संख्या 9130 में मौजूद हिन्दू निर्माणों पर भी लागू होता है.
हिन्दू पक्ष का दावा है कि एएसआई सर्वे में यह बिल्कुल साफ़ हो जाएगा कि वहाँ एक हिन्दू ढांचा मौजूद था.
मुस्लिम पक्ष: हिंदू पक्ष के पास सबूतों का आभाव
मुस्लिम पक्ष की एक दलील यह भी है कि हिन्दू पक्ष के पास अपनी दलील को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं हैं, इसीलिए वो एएसआई का सर्वे कराकर सबूत इकठ्ठा करने की कोशिश कर रहे हैं.
मुस्लिम पक्ष कहता है कि हिन्दू पक्ष ने दाखिल किए वाद में यह बात मानी है कि उनके पास यह साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं और इसी लिए वो एएसआई सर्वे चाहते हैं.
मुस्लिम पक्ष का कहना है कि एएसआई का यह काम नहीं है कि वो हिन्दू पक्ष की दलील को साबित करने के लिए सबूत इकट्ठा करे. उनका मानना है कि सबूत पेश करने का बोझ पूर्णतः हिन्दू पक्ष पर है.

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मई 2022 का सर्वे और उससे जुड़े दावे
मई 2022 में बनारस के एडवोकेट कमिश्नर का भी एक सर्वे हुआ था. इस तीन दिन के सर्वे में वीडियोग्राफी और फोटो लिए गए थे, जिसे एक रिपोर्ट के माध्यम से अदालत को सौंपा गया.
हिन्दू पक्ष का दावा है कि इस सर्वे में लिए गए वीडियो और तस्वीरों में हिन्दू प्रतीक चिह्न मिले हैं जैसे, "कमल का फूल, त्रिशूल", इत्यादि. इसी सर्वे में मस्जिद के वज़ुखाने में कथित शिवलिंग मिलने वाली बात सामने आई थी. लेकिन मुस्लिम पक्ष ने उसे फव्वारा बताया था.
इस बारे में मुस्लिम पक्ष का कहना है कि जिन ढांचों का हिन्दू पक्ष ज़िक्र कर रहा है वो काल्पनिक हैं और ज्ञानवापी मस्जिद जब से बनी है तभी से वो अंजुमन इंतेज़ामिया मस्जिद के के पास है.
अधिवक्ता कमिश्नर का सर्वे और उसमे मिली चीज़ें फ़िलहाल ज़िला जज की अदालत में सामने विचाराधीन हैं. मई 2022 की उस रिपोर्ट पर मुस्लिम पक्ष ने लिखित में अपनी आपत्तियां अदालत में दाखिल कर दी हैं.
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