मुसलमानों का पर्सनल लॉ कैसे बना, समान नागरिक संहिता इसके लिए कितनी बड़ी चुनौती?

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ज़ुबैर अहमद
बीबीसी संवाददाता
अमेरिका की यात्रा से लौटने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को देश भर में लागू करने की पुरज़ोर वकालत करनी शुरू कर दी.
विपक्ष की तरफ़ से प्रतिक्रियाएं भी आने लगीं और तब से देश भर में ये एक बार फिर से बहस का मुद्दा बन गया है.
यूसीसी को लाने के लिए बीजेपी 'एक देश, एक क़ानून' का नारा दे रही है, जिससे मुस्लिम समुदाय पर्सनल लॉ को लेकर गहरी चिंता में है.
समुदाय के अंदर यूसीसी के विरोध में माहौल तैयार किया जा रहा है और व्हाट्सऐप ग्रुप और सोशल मीडिया के माध्यम से कहा जा रहा है कि लोग अपनी राय लॉ कमीशन (विधि आयोग) को जल्द-से-जल्द भेजें.
जून के मध्य में 22वें विधि आयोग ने लोगों से यूसीसी पर एक महीने के अंदर राय मांगी है.
कमीशन अपनी रिपोर्ट इस महीने के मध्य में जारी कर सकता है, जिसमें लोगों की राय के आधार पर यूसीसी लागू करने या न करने की सलाह दी जाएगी.
इससे पहले 21वें विधि आयोग ने कहा था "समान नागरिक संहिता ग़ैर-ज़रूरी है."
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मुस्लिम पर्सनल लॉ का लंबा इतिहास
यूसीसी का विरोध कई समुदाय कर रहे हैं, जिनमें मुसलमान सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है.
उन्हें आशंका है कि समुदाय के शरिया पर आधारित मुस्लिम पर्सनल लॉ को ख़त्म कर दिया जाएगा.
मुस्लिम पर्सनल लॉ सालों से विवाद में है लेकिन मुसलमान धर्म गुरुओं का कहना है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के बारे में लोगों के अंदर ग़लतफ़हमियां जानकारी की कमी के कारण है.
प्रारंभिक इस्लामी काल (7वीं - 12वीं शताब्दी)
भारत में इस्लाम 7वीं शताब्दी में आया और इसके मानने वालों ने क़ुरान और हदीस (पैग़ंबर मुहम्मद की बातें और प्रथाएँ) में निर्धारित इस्लामी क़ानून का पालन किया.
भारत में मुस्लिम समुदाय मुख्य रूप से स्थानीय रीति-रिवाजों और परंपराओं पर निर्भर करता था.
जबकि उन्होंने अपने व्यक्तिगत मामलों, जैसे विवाह, तलाक़, विरासत और पारिवारिक विवादों में इस्लामी क़ानूनी सिद्धांतों का सहारा लिया.
मुस्लिम पर्सनल लॉ इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित एक विशिष्ट क़ानूनी प्रणाली के रूप में उभरा.

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दिल्ली सल्तनत (13वीं - 16वीं शताब्दी)
13वीं शताब्दी में उत्तर भारत में मुस्लिम शासन की शुरुआत हो चुकी थी.
दिल्ली सल्तनत ने इस्लामी क़ानून से प्रभावित प्रणाली की शुरुआत कर दी थी.
इस्लामी सिद्धांतों के आधार पर न्याय करने के लिए क़ाज़ी (इस्लामी जज) नियुक्त किए जाने लगे थे.
मुस्लिम पर्सनल लॉ का विकास जारी रहा, जो इस्लामी न्यायविदों और विद्वानों की व्याख्याओं से लिया गया, जैसे कि हनफ़ी स्कूल ऑफ लॉ, जो भारत में प्रमुख हो गया.
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क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ?
डॉक्टर ताहिर महमूद इस्लामिक क़ानून और भारतीय फ़ैमिली क़ानूनों के जाने-माने जानकार हैं.
उन्होंने भारतीय क़ानून और संविधान पर कई किताबें लिखी हैं, उनमें से दो की मदद से अदालतें कई फ़ैसले सुना चुकी हैं- "भारत का मुस्लिम क़ानून" और "भारत और विदेशों में मुस्लिम क़ानून".
वो कहते हैं कि मुस्लिम लॉ हर मुस्लिम दौर में संहिताबद्ध (कोडिफाइड ) रहा है. उनका कहना था, "ये ग़यासुद्दीन बलबन (दिल्ली सल्तनत) के ज़माने से शुरू हुआ.
दिल्ली सल्तनत के दौर में इस्लामी अदालतें थीं, मुग़लों के ज़माने में ज़्यादा थीं. औरंगज़ेब ने 'फ़तवा -ए-आलमगीरी' लिखवाई जो इस्लामिक क़ानून पर आधारित थी.
औरंगज़ेब के दौर में एक कमीशन का गठन करके इस क़ानून को लाया गया था. ये सरकारी तौर पर नहीं बनाई गई थी.
डॉक्टर महमूद कहते हैं, "मुग़लों के ज़माने में सिविल मामलों की अदालतों की हैसियत अपेलेट कोर्ट की होती थी. उनके ज़माने में भी अदालतों की वरीयता होती थी. आज के सुप्रीम कोर्ट जैसी हैसियत बादशाह ख़ुद होते थे"
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मुग़ल साम्राज्य (16वीं - 18वीं शताब्दी)
1526 से मुग़लों का दौर शुरू हुआ. मुग़ल साम्राज्य का मुस्लिम पर्सनल लॉ के विकास में अच्छा-ख़ासा योगदान रहा.
अकबर ने तो दीन-ए इलाही के नाम से एक अलग मज़हब की शुरुआत भी की जिसका उद्देश्य विभिन्न धार्मिक प्रथाओं में सामंजस्य स्थापित करना था.
क़ानून के माहिर प्रोफ़ेसर फैज़ान मुस्तफ़ा इन दिनों मुस्लिम पर्सनल लॉ और समान नागरिक संहिता पर यूट्यूब पर एक सीरीज़ चला रहे हैं, जिसमें उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ के इतिहास पर गहराई से रौशनी डाली है.
वो कहते हैं कि मुस्लिम शासकों ने शरिया क़ानून को सख़्ती से लागू नहीं किया और हिन्दुओं को उनके धर्म के हिसाब से बने रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप नहीं किया.
अपने एक वीडियो में वो कहते हैं, "चाहे दिल्ली सल्तनत 1206 से 1526 तक, या मुग़ल काल हो 1526 से अंग्रेज़ों के आने तक, इन्होंने हिन्दू लॉ में दख़ल नहीं दिया. यानी जो हिन्दुओं के पर्सनल मसले थे, उनमें उन्हें धार्मिक आज़ादी दे दी गई. ''
''पंचायतों के फ़ैसलों पर राज्य हस्तक्षेप नहीं करता था. रीति-रिवाज पर आधारित क़ानून को तरजीह दी जाती थी. इस्लामी क़ानून को उन पर थोपा नहीं गया".
प्रोफ़सर फैज़ान मुस्तफ़ा का कहना है कि औरंगज़ेब ने 40 के क़रीब इस्लामी विशेषज्ञों को बुलाकर 'फ़तवा -ए-आलमगीरी' क़ानूनी किताब को लिखवाया था जो शाही फरमान से अलग था.
उनका दावा था कि मुग़लों ने शरिया को असली शक्ल में कभी लागू नहीं किया.

औपनिवेशिक युग (18वीं - 20वीं शताब्दी)
18वीं शताब्दी में अंग्रेज़ों के आने के बाद भारत में क़ानूनी व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए.
प्रोफ़सर फैज़ान मुस्तफ़ा के मुताबिक़, जब हिंदुस्तान में अंग्रेज़ आए तो उन्होंने ये माना कि हिंदुस्तान में धार्मिक क़ानून हैं.
वो कहते हैं, "पर्सनल लॉ का विकास अब अंग्रेज़ कर रहे थे. किसी मामले में अगर दोनों पक्ष मुसलमान हैं तो मुस्लिम क़ानून से फ़ैसला होगा, अगर दोनों हिन्दू हैं, तो हिन्दू शास्त्रों पर आधारित क़ानून से फ़ैसला होगा".
वो कहते हैं कि 18वीं शताब्दी के आते-आते अंग्रेज़ों ने तय किया कि वो खुद ही तय करेंगे ये मामले, उन्हें पंडितों और उलेमा की ज़रूरत नहीं है, "तो अंग्रेज़ों ने मुसलमानों और हिन्दुओं की धार्मिक पुस्तकों के अनुवाद का प्रोजेक्ट शुरू किया. यहाँ समझिए कि जो क़ानून बनेगा वो इन किताबों के आधार पर बनेगा."
अंग्रेज़ों ने अब फ़ैसले हनफ़ी मत की क़ानूनी किताब अल-हिदाया पर आधारित करके सुनना शुरू कर दिया. ये किताब अरबी में थी, जिसका पहले फ़ारसी और उसके बाद अंग्रेज़ी में अनुवाद हुआ.
इसका अनुवाद 1791 में चार्ल्स हैमिलटन नाम के एक अंग्रेज़ ने किया.

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कैसे बना मुस्लिम पर्सनल लॉ एक्ट?
प्रोफ़ेसर मुस्तफा कहते हैं, "मेरे हिसाब से ये अनुवाद एक सियासी प्रोजेक्ट था. इसमें बहुत-सी ग़लतियां थीं. अंग्रेज़ अदालतों ने चार्ल्स हैमिल्टन की अल-हिदाया के हिसाब से फ़ैसले सुनाए.''
''वो अंग्रेज़ जो हिंदुस्तान आकर वकालत करना चाहते थे, उनके लिए किताब अनिवार्य कर दी गई, तो जो मुस्लिम पर्सनल लॉ आज है वो इस्लामिक लॉ नहीं है, वो क़ानून इस ग़लत अनुवाद वाले अल-हिदाया पर आधारित है."
डॉक्टर ताहिर महमूद के मुताबिक़ जब अंग्रेज़ आए तो उन्होंने समझा कि सब ही समुदायों के लोगों में रिवाज एक जैसा है और उन्होंने ने फ़ैसले स्थानीय कस्टम के हिसाब से देने शुरू कर दिए.
डॉक्टर महमूद कहते हैं, "1873 के मद्रास सिविल कोर्ट एक्ट और 1876 के अवध लॉज़ एक्ट में लिखा गया कि मज़हबी क़ानून पर स्थानीय परंपरा को तरजीह दी जाएगी.''
इसमें महिलाएं पीड़ित हुईं क्योंकि स्थानीय प्रथाओं में महिलाओं को कोई अधिकार नहीं दिए गए थे, जायदाद में महिलाओं को कोई शेयर नहीं मिलता था. हालाँकि मुसलमानों में औरतों को जायदाद में आधा हिस्सा मिलने का रिवाज है."
ये क़दम हिन्दू क़ानून के मुताबिक़ था लेकिन शरिया के बिल्कुल विपरीत. डॉक्टर ताहिर महमूद कहते हैं, "इसको ख़त्म कराने के लिए उलेमा ने एक अभियान छेड़ा, उसके नतीजे में 1937 में मुस्लिम पर्सनल लॉ एक्ट बना".

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भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ मुख्य रूप से 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लिकेशन अधिनियम से संचालित होता है. यह अधिनियम मुसलमानों के बीच विवाह, तलाक़, विरासत और रखरखाव के मामलों में इस्लामी क़ानून को लागू करने को मान्यता देता है.
लेकिन ये क़ानून 1935 में मौजूदा पाकिस्तान के सूबा सरहद (अब ख़ैबर-पख्तूनख्वाह) में लाया गया था.
डॉक्टर ताहिर महमूद कहते हैं, "मौजूदा पाकिस्तान के सूबा सरहद में एक क़ानून बना जिसका नाम मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1935 था. उस क़ानून का सब कुछ उठाकर केंद्र में लाया गया और 1937 वाला एक्ट लागू किया गया".
स्वतंत्रता के बाद (20वीं शताब्दी - वर्तमान)
1947 में भारत को ब्रिटिश शासन से आज़ादी मिलने के बाद, 1950 में भारत का संविधान अपनाया गया, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता और धर्म का पालन और प्रचार करने का अधिकार और आज़ादी दी गई.
यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि 1937 वाले अधिनियम में कोई क़ानून कोडिफाइड नहीं है.
इसको सरल शब्दों में बताते हुए डॉक्टर ताहिर महमूद कहते हैं, "1937 में मुस्लिम पर्सनल लॉ एक्ट में सिर्फ़ लिखा है कि दोनों पक्ष मुसलमान हों तो शरीयत के हिसाब से फ़ैसला हो. ये एक्ट छोटे-से दो सेक्शंस पर आधारित है. पर्सनल लॉ कोडिफाई नहीं किया गया है. ''
''शरीयत का क़ानून क्या है वो नहीं लिखा है. उसमे कुछ मुद्दे लिखे हुए हैं, जैसे कि शादी, तलाक़, जायदाद, विरासत से जुड़े मामले हों और दोनों पक्ष मुसलमान हों, तो फ़ैसला शरीयत के हिसाब से होगा. दोनों पक्ष जिस मत के होंगे उसी मत के हिसाब से फ़ैसला होगा. और पर्सनल लॉ उसी समय लागू होगा जब दोनों पक्ष एक ही मज़हब के होंगे, वरना देश का सामान्य क़ानून लागू होगा."
''इस परिदृश्य में अदालतें इस्लामी विद्वानों की किताबों से मार्गदर्शन लेती हैं. डॉक्टर ताहिर महमूद कहते हैं, "सुन्नी मुसलमानों की सबसे मशहूर किताबें अल-हिदाया और फ़तवा-ए-आलमगीरी थीं. अदालतें इन किताबों की मदद से ही फ़ैसले देती थीं."
शिया मुसलमानों के मामले में उनकी किताब की रौशनी में फ़ैसले सुनाए जाते थे. आजकल अदालतें ख़ुद डॉक्टर ताहिर महमूद की किताबों के आधार पर फ़ैसले सुनाती हैं.
डॉक्टर महमूद के मुताबिक़ अदालतों ने अब तक 67 मामलों में उनकी किताब के हवाले से फ़ैसला दिया है. इसके अलावा सर दिनशा फ़र्दुनजी मुल्ला और आसिफ़ अली असग़र फ़ैज़ी की इस्लामिक क़ानून की किताबों के आधार पर भी अदालतें फ़ैसले सुनाती हैं.

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मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार की मांग
समान नागरिक संहिता पर क़ानून बनाना सालों से बीजेपी के चुनावी मैनिफेस्टो में रहा है.
बीजेपी सरकार उसे जल्द-से-जल्द लागू करना चाहती है और सूत्रों के अनुसार इस संदर्भ में संसद के मॉनसून सत्र में ही एक बिल पेश किया जाएगा जिसे पारित कराने के लिए सत्तारूढ़ पार्टी हर मुमकिन कोशिश करेगी.
भारत में, विभिन्न धार्मिक समुदाय पारिवारिक मामलों में अपने व्यक्तिगत क़ानूनों का पालन करते हैं, जो उनके संबंधित धार्मिक ग्रंथों और रीति-रिवाजों पर आधारित हैं.
ये पर्सनल लॉ शादी, तलाक़, गोद लेने और विरासत समेत दूसरे पारिवारिक मामलों को नियंत्रित करते हैं इसीलिए विभिन्न धार्मिक समुदायों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ हैं.
समान नागरिक संहिता का मतलब सभी नागरिकों के लिए एक समान व्यक्तिगत कानून लागू होगा.
यूसीसी की अवधारणा की जड़ें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में हैं, जो सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता के अधिनियम की सिफ़ारिश करती है, हालांकि यूसीसी को लागू करना भारत में कई वर्षों से बहस और चर्चा का विषय रहा है.

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यूनिफॉर्म सिविल कोड के समर्थन और विरोध में तर्क
यूसीसी के समर्थकों का तर्क है कि यह भेदभावपूर्ण प्रथाओं को ख़त्म करके और सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करके लैंगिक समानता, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा देगा.
उनका मानना है कि समान नागरिक संहिता राष्ट्रीय एकता को मज़बूत करेगा और विविध धार्मिक समुदायों में सामंजस्य स्थापित करेगा.
दूसरी ओर, यूसीसी के विरोधियों का तर्क है कि पर्सनल लॉ धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान का एक अभिन्न अंग हैं. उनका तर्क है कि एक समान संहिता लागू करने से अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों का उल्लंघन होगा और उनकी विशिष्ट पहचान पर बुरा असर होगा.
ज़किया सोमन भारतीय मुस्लिम महिला नाम का संगठन चलाती हैं और बरसों से मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार चाहती हैं ताकि मुस्लिम महिलाओं को उनके अधिकार मिलें.
वो कहती हैं, "सुधार की ज़रूरत है. रिफॉर्म होना चाहिए कोडिफाइड मुस्लिम फैमिली क़ानून लाकर. वो लाने नहीं दे रहे हैं. हम ये मांग पिछले 20 साल से कर रहे हैं. हमें उम्मीद नहीं है कि मुस्लिम क़ानून में मुस्लिम पर्सनल बोर्ड वाले रिफॉर्म होने देंगे. हमारे पास एक ही रास्ता है कि सरकार जो यूसीसी लागू करने जा रही है उस प्रक्रिया में हम भी शामिल हों. हम चाहते हैं कि सरकार मुस्लिम औरतों की बातें भी सुने."

'मेहर से जुड़े क़ानूनों में बदलाव हो'
अपनी मांगों को गिनाते हुए वो कहती हैं, "हमारी मांग है कि शादी के लिए उम्र 18 और 21 साल जो सबके लिए है वो हमारे लिए भी होनी चाहिए. हमारे यहाँ ये है कि बालिग़ होने के बाद लड़की शादी के लायक हो जाती है.''
''इस्लाम कहता है कि शादी एक सोशल कॉन्ट्रैक्ट है तो 13 साल की बच्ची को आप कैसे मान लेंगे कि वो सोशल कॉन्ट्रैक्ट करने के लायक हो गई है? वो तो एक माइनर है, वो इस क़ाबिल ही नहीं है कि वो सोशल कॉन्ट्रैक्ट को समझे. शादी एक गंभीर मामला है जिसको निभाने के लिए परिपक्वता चाहिए."
ज़किया सोमन अपनी मांगों पर नज़र डालते हुए कहती हैं, "हम चाहते हैं कि क़ुरान में मेहर की जो बात है उसको क़ानूनन लागू किया जाए. हमने पाया कि 90 प्रतिशत मामलों में मेहर को या तो माफ़ कर दिया गया है या वो लड़की को मेहर कम दिया गया है.''
''मेहर अल्लाह का दिया हुआ हक़ है जो लड़की को नहीं मिलता. हम चाहते हैं कि क़ानून इस सिलसिले में बने और मुस्लिम औरतों को कम-से-कम उनके पतियों के एक साल की सैलरी या कमाई के बराबर मेहर मिले".
''दूसरे लड़की के कंसेंट (लड़की की अनुमति) के बिना शादी नहीं हो. कंसेंट को भी क़ानूनी दर्जा दिया जाए, ये भी क़ुरान में है. और बच्चों की कस्टडी का जो मामला है वो माँ के पास होना चाहिए. उस पर क़ानून बने. इसके अलावा चार शादियों की आज के सन्दर्भ में इजाज़त नहीं है. जब इजाज़त थी उस समय हालात अलग थे."

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समान नागरिक संहिता को लागू करना आसान होगा?
डॉक्टर ताहिर महमूद के मुताबिक़ यूसीसी पारित करना और लागू करना इतना आसान नहीं होगा. लेकिन अगर इसमें हर तरह के भेदभाव का अंत हो तो इसे लागू करना चाहिए.
वो कहते हैं, "मैंने कहा है कि अगर कोई ऐसा बिल आता है, जिसमें कोई धार्मिक भेदभाव न हो, जिसमे कोई जेंडर भेदभाव न हो, महिलाओं के ख़िलाफ़ कोई भेदभाव न हो, तो उसको लागू होना चाहिए".
लेकिन उनका कहना है कि यूसीसी पर पूरी तरह से राय बिल का मसौदा देखने के बाद ही दी जा सकती है.
बिल की मुश्किलों पर नज़र डालते हुए वो कहते हैं कि संयुक्त परिवार की मान्यता हिन्दू लॉ में है मुसलमानों में अविभाजित परिवार की मान्यता नहीं है, संयुक्त परिवार पर टैक्स का क़ानून अलग है, टैक्स के रेट अलग हैं. "तो या तो वो सब को देंगे या उनसे भी हटा देंगे तब ही तो क़ानून में समानता आएगी".
डॉक्टर ताहिर महमूद कहते हैं "ये एक ऐसी समस्या है, जिसका हल नहीं, इसलिए ये सब ऐसे ही चलता रहेगा. 2024 तक इसका पारित होना बहुत मुश्किल है."
प्रोफ़ेसर फैज़ान मुस्तफ़ा पहले तो सरकार से ये पूछते हैं कि बिल का ब्लूप्रिंट कहाँ है, किसी ने देखा है? फिर अपनी राय देते हुए कहते हैं कि यूसीसी को एक ही बार में लागू करना सही नहीं होगा.
वो चाहते हैं कि इसे धीरे-धीरे लागू किया जाए. उनका कहना है कि अगर सरकार की मंशा वोट हासिल करने के लिए यूसीसी लागू करना है तो संसद में इसे कभी भी पारित कर दे, लेकिन अगर मंशा सामाजिक न्याय है तो इसे धीरे-धीरे लागू करना चाहिए.

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सामाजिक कार्यकर्ता ज़किया सोमन भी सरकार के इरादे पर सवाल करती हैं.
वो कहती हैं, "आज की तारीख़ में मुसलमानों और मुसलमान औरतों के साथ भेदभाव सबसे ज़्यादा है. सिर्फ मुसलमान ही ऐसे हैं जिनके लिए लिखित कोई पर्सनल लॉ नहीं है. तो यूसीसी के आने से फ़ायदा तो मुसलमानों को होगा. नुकसान रूढ़िवादी मुसलमानों का होगा जो औरतों को दबाकर रखना चाहते हैं. हिन्दुओं में भी औरतों के खिलाफ़ जो राय रखते हैं यूसीसी से उनका भी नुकसान होगा, बर्शते सही तरीके से क़ानून बने".
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