कर्नाटक में कांग्रेस रद्द करेगी बीजेपी का धर्मांतरण विरोधी क़ानून, सावरकर और हेडगेवार के भाषण भी हटेंगे

इमरान क़ुरैशी

बीबीसी हिंदी के लिए

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया

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हाल ही में कर्नाटक विधानसभा चुनाव जीतकर सत्ता में आई कांग्रेस सरकार ने बीजेपी सरकार की ओर से लाए गए धर्मांतरण विरोधी क़ानून को रद्द करने का फ़ैसला किया है.

इसके साथ ही कांग्रेस सरकार ने कन्नड़ और सामाजिक अध्ययन की किताबों में शामिल किए गए जीबी हेडगेवार और वीर सावरकर समेत विवादित लेखकों के भाषणों को हटाने का फ़ैसला किया है.

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के मंत्रीमंडल ने आज इस फ़ैसले पर अपनी सहमति जता दी है.

इसका मतलब ये है कि अब जो लोग अपना धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं, उन्हें ऐसा करने से पहले ज़िलाधिकारी की ओर से इजाज़त नहीं लेनी होगी.

इसके साथ ही धर्म बदलने वाले ओबीसी, एससी और एसटी जाति के होने की वजह से मिलने वाले लाभों से वंचित नहीं होंगे.

योगी सरकार का क़ानून थी प्रेरणा

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

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कर्नाटक की बीजेपी सरकार ने यूपी सरकार के क़ानून की तर्ज पर अपने क़ानून में संशोधन को तैयार किया था.

इसके तहत धोखाधड़ी से धर्म बदलने पर तीन से दस साल तक की सज़ा का प्रावधान था.

कर्नाटक सरकार ने साल 2021 के दिसंबर महीने में कर्नाटक प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट टू फ्रीडम ऑफ़ रिलिज़न क़ानून पेश किया था.

इसके बाद 2021 में ही एक ऑर्डिनेंस के ज़रिए इसे लागू किया गया था. और साल 2022 के सितंबर महीने में विधान परिषद में बहुमत हासिल करने के साथ ही इसे क़ानून की शक्ल दी गयी थी.

ईसाई नेताओं ने कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत को दिए अपने ज्ञापन में इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की थी कि धर्मांतरण विरोधी विधेयक असामाजिक तत्वों के लिए कानून अपने हाथ में लेने और शांतिपूर्ण राज्य कर्नाटक में उकसावे, झूठे आरोपों, सांप्रदायिक अशांति के साथ माहौल ख़राब करने का ज़रिया बनकर रह जाएगा.

कांग्रेस सरकार में क़ानून और संसदीय मामलों के मंत्री एचके पाटिल ने बताया है कि ‘हमारा प्रस्तावित विधेयक जिसे कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है, बीजेपी सरकार की ओर से लाए गए संशोधन को पलट देगा. हम एक ऐसा क़ानून लेकर आएंगे जो कि संविधान के अनुरूप होगा.”

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तारीफ़ और आलोचना

कांग्रेस सरकार में क़ानून और संसदीय मामलों के मंत्री एचके पाटिल

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सरकार के फ़ैसले पर बैंगलुरू के आर्चबिशप रेवेरेंड पीटर मचाडो कहते हैं, “बीजेपी ने जो कानून बनाया था वो व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता के लिए ही नहीं बल्कि संविधान के अनुच्छेद 25 में निहित अधिकारों के भी विरुद्ध था. ऐसे कानूनों के बाद कर्नाटक और अन्य राज्यों में ईसाइयों पर हमले बढ़े हैं क्योंकि दक्षिणपंथी तत्वों को इस कानून से प्रोत्साहन मिला था.”

लेकिन बीजेपी के नेता कांग्रेस सरकार के इस फ़ैसले पर हमला बोल रहे हैं. बेंगलुरू से बीजेपी के युवा सांसद तेजस्वी सूर्य ने ट्वीट कर सरकार को घेरा.

उन्होंने लिखा, “कर्नाटक की कांग्रेस सरकार राज्य में पीएफ़आई का एजेंडा पूरा कर रही है. धर्मांतरण के विरुद्ध बने कानून को रद्द करने का फ़ैसले करके, कांग्रेस सरकार संविधान के विरुद्ध जा रही है.

"ये सुप्रीम कोर्ट के भी विरुद्ध जो कह चुका है कि धोखाधड़ी से किसी व्यक्ति का धर्म बदलना ग़ैर-कानूनी है. हेडगेवार और सावरकर से जुड़े पाठों को स्कूली किताबों से हटाकर कांग्रेस अपने अपराध छिपाना चाहती है. कर्नाटक के लिए एक दुखद दिन.”

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बीजेपी नेता तेजस्वी सूर्य

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राजनीतिक टीकाकार और जागरण यूनिवर्सिटी से जुड़े डॉक्टर संदीप शास्त्री राज्य सरकार के फ़ैसले से बिल्कुल हैरान नहीं हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, “जब कर्नाटक में ये बिल पास हुआ था तब उस वक्त के विपक्ष के नेता सिद्धारमैया ( जो अब मुख्यमंत्री हैं) ने कहा था कि वे कांग्रेस की वापसी के बाद इस कानून को रद्द कर देंगे. अपने समर्थकों और पार्टी को ख़ुश रखने के लिए उन्होंने ये क़दम उठाने शुरू किए हैं. वरना उनके चुनावी वादों को को खोखला बोलना शुरू कर देंगे.”

कर्नाटक की कैबिनेट ने राज्य के सभी स्कूलों में भारतीय संविधान की उद्देशिका का पढ़ जाना अनिवार्य कर दिया है. इसके अलावा सभी स्कूलों में राष्ट्र गान और कर्नाटक राज्य के गान को भी अनिवार्य कर दिया है.

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हेडगेवार और सावरकर

वी आर सावरकर की तस्वीर के साथ खड़े बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा

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कर्नाटक की कैबिनेट ने कन्नड़ और सोशल स्टडीज़ की पाठ्यपुस्तकों से आरएसएस के संस्थापक जीबी हेडगेवार और सावरकर से जुड़े पाठों को भी हटाने का फ़ैसला किया है.

इसके अलावा चक्रवर्ती सुलीबेले के बारे में पाठ भी हटाया जा रहा है.

राज्य के प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री मधु बंगारप्पा, “हम सावित्रीबाई फुले, डॉ बीआर आंबेडकर और नेहरू के पुत्री के नाम ख़त को शामिलकर रहे हैं. और कई जगहों पर हम छोटे-मोटे सुधार भी करने वाले हैं. ये हम अगले वर्ष करेंगे जब तकनीकी समिति अपने पूरे सुझाव इकट्ठा कर लेगी.”

पिछले साल जब बीजेपी की सरकार ने पाठ्यक्रम में ये बदलाव किए थे तब शिक्षाविद् प्रोफ़ेसर निरंजन अराध्य ने बीबीसी को बताया था, “इतिहास इसलिए पढ़ाया जाता है ताकि बच्चों में स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों का संचार किया जा सके. विशेषकर भारत की आज़ादी की लड़ाई जो दुनिया में लोगों का सबसे लंबा चलने वाला संघर्ष था. हेडगेवार उस स्वतंत्रता संग्राम में शामिल नहीं थे.”

उधर डॉ संदीप शास्त्री कहते हैं कि जो भी हो रहा है और अपेक्षाओं के अनुकूल ही है.

वे कहते हैं, “ये सब तो कांग्रेस के वादे थे. सिद्धारमैया ने इन सब चीज़ों के बारे में कड़ी टिप्पणियां की हैं और वे इसे तथ्यों से छेड़छाड़ भी बताते रहे हैं. अब अगले साल लोकसभा चुनाव हैं. वे उन लोगों को निराश नहीं करना चाहते जिनकी बदौलत उन्हें जीत मिली है. उन्हें अगले साल एक बार फिर वोट चाहिए होंगे.’’

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