मुसलमान मर्दों की एक से ज़्यादा शादी को चुनौती, क्या कहते हैं जानकार

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्या मुसलमान मर्दों को चार शादियों की अनुमति दी गई है?
ये तथ्य है कि क़ुरान में मुसलमान मर्दों को एक से ज़्यादा शादी करने की इजाज़त दी गई है. लेकिन ये अनुमति एक ख़ास परिस्थिति में कई शर्तों के साथ दी गई है.
हाल ही में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन यानी बीएमएमए ने सुप्रीम कोर्ट में पॉलीगेमी या बहुविवाह को हटाने के लिए एक याचिका दायर की है.
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से सारे मामले पर जवाब मांगा है. याचिका मुसलमान महिलाओं के मूलभूत अधिकारों को लागू करने की अपील की गई है.
दरअसल महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था बीएमएमए ने पॉलीगेमॉस या बहुविवाह में रहने वाली महिलाओं की स्थिति पर एक रिपोर्ट तैयार की है. इस रिपोर्ट में ऐसी शादियों में रह रही मुसलमान महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर गुहार लगाई गई है.
इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए एक सर्वेक्षण किया गया और उसमें 50 केस स्टडी ली गईं थीं. इन सभी से 289 प्रश्न पूछे गए. इसमें दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश और ओडिशा की महिलाओं को शामिल किया गया था.
इस सर्वेक्षण में शामिल महिलाएं न तो आर्थिक रूप से सक्षम थीं और न ही 12वीं कक्षा तक पढ़ी थीं. इनमें से 49 फ़ीसदी महिलाओं के लिए इनके माता-पिता ने पति का चुनाव किया था.
इनमें से 50 फ़ीसदी महिलाओं का कहना था कि वे अवसाद से जुझ रही हैं. सर्वेक्षण के निष्कर्ष के मुताबिक़ कुल महिलाओं में से 29 फ़ीसदी महिलाएं जब अपने शौहर की दूसरी शादी का मसला लेकर क़ाज़ी के पास समाधान के लिए गईं तो उन्हें शादी में एडजस्ट करने को कहा गया. साथ ही उन्हें बताया गया कि शरीयत में बहुविवाह की अनुमति है.
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हालांकि इस सर्वे पर एक तबक़ा सवाल उठाता है. उनके अनुसार इस्लाम में महिलाओं को अन्य धर्मों की तुलना में ज़्यादा अधिकार दिए गए हैं.
बीएमएमए की ज़किया सोमन के अनुसार, "हम मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करते हैं और उनके सभी मुद्दों का समाधान संविधान और इस्लाम के दायरे में खोजते हैं."
उनके अनुसार, ''जिस तरह से हिंदू और ईसाई धर्म की महिलाओं को क़ानून में अधिकार मिले हुए हैं वैसे अधिकार मुसलमान महिलाओं को नहीं हैं. ये मांग हम लंबे समय से कर रहे हैं. हमारे देश में 1937 का शरिया क़ानून लागू है जो कि अंग्रेज़ों का बनाया हुआ है. इसमें महिलाओं के अधिकारों की बात नहीं है. न इसमें कोई सुधार हुआ है.''
"इसी के आधार पर पुरुषों को लगता है कि उन्हें चार शादियों का अधिकार है जबकि ऐसा नहीं है."
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कमाल फ़ारूक़ी के अनुसार इस्लाम में निकाह को सबसे पवित्र बंधन माना गया है और महिलाओं के अधिकारों को साफ़तौर पर परिभाषित किया गया है. साथ ही पति की ज़िम्मेदारियों को बताया गया है.
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ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कमाल फ़ारूक़ी कहते हैं, ''मैं सर्वेक्षण पर कुछ बात नहीं करना चाहूंगा. जब तक ऐसे सर्वेक्षण आधिकारिक न हों.''
हालांकि वे मानते हैं कि उनके पास भी जो मामले आते हैं तो वो पहली और दूसरी पत्नी को शादी में उनके अधिकारों के बारे में ज़रूर बताते हैं.
साथ ही वे कहते हैं कि जो महिलाएं शादी में ऐसी दिक़्क़तों को सामना कर रही हैं वो क़ाज़ी के पास तो जा ही सकती हैं. इसके अलावा भी वो जमाते इस्लामी, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमियत उलेमा-ए-हिंद जैसी संस्थाओं का दरवाज़ा खटखटा सकती हैं.
हर जगह पर दारुल क़ज़ा है जहां ऐसे मर्दों को समझाया जाता कि ये ग़लत काम है, वहां उन्हें इस संबंध में क़ानूनी और नैतिक बातें भी बताई जाती हैं.
फ़ारूक़ी कहते हैं कि अगर कोई महिला कोर्ट का रुख़ करना चाहती है तो वो कर सकती है लेकिन दारुल क़ज़ा में धार्मिक दायरे में चीज़ें समझाई जाती हैं और अंतिम समय तक समस्या का हल खोजने की कोशिश की जाती है.
'हर मुसलमान महिला के साथ ऐसा नहीं हो रहा'

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भारत के जाने-माने संविधान विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का कहना है कि बीएमएमए के शोध का सैंपल साइज़ कितना था और उसके लिए महिलाएं कैसे चुनी गईं वो ग़ौर करने बात है.
वे अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ''अब इस समुदाय की आबादी 17-18 करोड़ है. ऐसे में इस शोध का निष्कर्ष पूरी आबादी पर तो लागू नहीं हो सकता. साथ ही शोध कितना प्रामणिक है उसको भी देखना होगा.''
प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा के तर्क के जवाब में ज़किया सोमन कहती हैं, ''यहां सैंपल मायने नहीं रखता बल्कि मर्दों को जो एक से अधिक शादी करने की वैधानिक मान्यता दी गई वो एक महिला को शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर बुरी तरह से प्रभावित करती है. इससे महिला भावनात्मक तौर पर भी पूरी तरह से टूट जाती हैं. उसका कोई अस्तित्व ही नहीं बचता.''
उनके अनुसार, "हम जानते हैं कि ये कहा जाएगा कि हम इस्लाम में दख़ल दे रहे हैं और शरिया के साथ खिलवाड़ हो रहा है लेकिन हम कोर्ट में यही तर्क देंगे जो हमने जुबानी ट्रिपल तलाक़ को लेकर दिया था. हम यही कहेंगे कि ये ग़ैर-इस्लामी है. हम क़ुरान का हवाला देकर ही ये साबित करेंगे."
''हम जानते हैं कि हमें आरएसएस और बीजेपी का एजेंट कहा जाएगा लेकिन हम केवल महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ रहे है और वहीं हमें मनोबल देता है.''
अपनी बात को समझाते हुए प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं, "भारत जैसे आधुनिक और प्रगतिशील देश में कोई दूसरी शादी की इजाज़त दे ये बहुत मुश्किल है. ये भी देखना चाहिए कि अगर किसी पुरुष के एक से ज़्यादा विवाह पर कानून आता है तो क्या इससे वाक़ई महिलाओं का भला होगा?"
प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा कहते हैं कि इसे किसी धर्म से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.
उनके अनुसार, ''साल 1955 तक हिंदू धर्म में दो विवाह स्वीकार्य थे. वहीं इस्लाम में सातवीं सदी में चार शादियों की स्वीकृति थी. इसलिए 1955 के बाद क़ानून बनाया गया और द्विविवाह को अंत किया गया. सरकार के ताज़ा आंकड़ों को भी देखें तो हिंदुओं में मुसलमानों से ज़्यादा द्विविवाह हो रहे हैं."
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हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के सेक्शन 5 में वैध शादी के बारे में बताया गया है. इस अधिनियम के मुताबिक़ लड़का और लड़की पहले से शादीशुदा नहीं होने चाहिए.
अगर कोई दोबारा शादी कर रहा है तो उसका तलाक़ हो चुका होना चाहिए या उनके पति या पत्नी जीवित नहीं होने चाहिए. साथ ही दोनों एक दूसरे के ख़ून के रिश्ते में नहीं होने चाहिए.

प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा के मुताबिक क़ुरान की 'सुरह निसा' में क्या कहा गया है-
- क़ुरान में एक से ज़्यादा शादी की बात एक ख़ास परिस्थिति में दी गई है.
- दरअसल जंग-ए-ओहद में मुसलमानों की हार हुई थी. उसमें शामिल कई मुसलमान मारे गए थे.
- इससे उनकी विधवाओं और उनके बच्चों के लिए सामाजिक, शारीरिक और आर्थिक समस्या पैदा हो गई थी.
- इस ख़ास समस्या के समाधान के लिए आयत नाज़िल हुई जिसमें मर्दों को कहा गया कि आप उन महिलाओं की मदद और यतीम बच्चों को पिता का साया देने के लिए उन विधवाओं से शादी करें.
- लेकिन उसमें भी शर्त रखी गई कि एक से ज़्यादा शादी करने वाले पुरुष शारीरिक और आर्थिक रूप से सक्षम होने चाहिएं.
- पुरुषों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वो सभी पत्नियों के साथ एक जैसा आचरण करें.
- सबसे अहम बात यह थी कि उन्हें अपनी पत्नी या पत्नियों से इजाज़त लेनी होगी.
- मर्दों से कहा गया कि अगर यह सब शर्त का पालन नहीं कर सकते तो बेहतर है कि आप दूसरी शादी न करें.

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बेबाक क्लेक्टिव मुंबई का एक सामाजिक संगठन है.
इसकी सदस्य और महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली हसीना ख़ान बीबीसी से बातचीत में कहती हैं कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में शादीशुदा महिलाओं के साथ भेदभाव किया गया है और वो पितृसत्तात्मक सोच पर आधारित है जिसमें पुरुष को प्रधानता दी गई है.
हसीना ख़ान कहती हैं, "मुसलमान समुदाय में पुरुष अगर एक या दो फ़ीसदी भी दूसरी शादियां बहुत कर रहे हैं तो ये ग़लत है. अगर ये बहुविवाह बंद भी हो जाते हैं तो उसके बावजूद उसकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का सवाल बना रहेगा."
ज़किया सोमन बताती हैं कि सर्वेक्षण में सामने आए नतीजों को महिला और बाल विकास मंत्रालय, महिला आयोग और अल्पसंख्यक आयोग के साथ-साथ राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर भी साझा किया जाएगा.
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