क्या भारत में हर धर्म की महिला की शादी एक ही उम्र में होनी चाहिए?

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में लड़कियों की शादी की उम्र को 18 से बढ़ाकर 21 साल करने को लेकर केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी लोकसभा में बिल पेश कर चुकी हैं. हालांकि अभी उस बिल को विचार-विमर्श के लिए स्थायी समिति के पास भेजा गया है.
इस बीच राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडबल्यू) ने सुप्रीम कोर्ट में सभी धर्मों में महिलाओं के लिए शादी की उम्र एक समान रखने के लिए याचिका डाली है.
इस याचिका में कोर्ट से हर समुदाय और धर्म में महिलाओं की शादी की उम्र 18 साल किए जाने के लिए निर्देश देने की मांग की गई है.
सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है.
इस याचिका पर राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में बताया, ''हाई कोर्ट में एक मामला आया था, जिसमें कोर्ट ने 15 साल की मुस्लिम लड़की की शादी को वैध ठहराया था और मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत इसे जायज़ ठहराया गया था.''
दिल्ली हाई कोर्ट में एक नाबालिग़ मुस्लिम महिला और उसके पति ने एक साथ रहने की आज़ादी और सुरक्षा मांगी थी और उसका आधार उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को बनाया था.

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क्या कहता है मुस्लिम लॉ
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कमाल फ़ारूक़ी बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहते हैं कि इस्लाम एक प्राकृतिक धर्म है यानी तमाम चीज़ें प्रकृति से संबंधित हैं और वैसे ही धर्म में इज़ाज़त दी गई है.
इस्लाम में कहा गया है कि जब एक लड़का और लड़की में प्यूबर्टी या यौवन की शुरुआत हो जाती है तो वो शादी कर सकते हैं. इस्लाम इसकी स्वीकृति देता है और इसका मतलब ये क़तई नहीं है कि धर्म इसे बढ़ावा देता हो.
साथ ही इस्लाम में ये भी कहा गया है कि जब तक लड़के और लड़की परिपक्व न हो जाएं , शादी नहीं होनी चाहिए लेकिन वो मामले जिनमें निक़ाह हो गया हो उसमे फिर माता-पिता कुछ नहीं कर सकते हैं.
कमाल फ़ारूकी कहते हैं कि कई ऐसे राज्य हैं जहां बाल विवाह अभी भी होते हैं. ऐसे में ये देखा जाना चाहिए कि अगर कोई परिवार सक्षम नहीं है और ग़रीबी के कारण अपनी लड़की की शादी करना चाहता है तो इस पर क्यों एतराज होना चाहिए?
उनके अनुसार, ''अगर किसी ने शादी की है और वो बच्ची को सही तरीक़े से रख रहा है तो इसमें क्या ख़ामी है? यहां केवल इस्लाम को बदनाम करने का एजेंडा चलाया जा रहा है जो सही बात नहीं है क्योंकि भारत में कई आदिवासी समाज और राज्यों में बाल विवाह हो रहे हैं. ''
लेकिन रेखा शर्मा इस तर्क से सहमत नहीं दिख कहती हैं, ''आजकल दस साल की बच्ची को भी प्यूबर्टी या पीरियड्स हो जाते हैं तो क्या दस साल की बच्ची की शादी की जा सकती है. तो ऐसे में उनके स्वास्थ्य, उनकी शिक्षा का क्या होगा.''
साथ ही वो पॉक्सो क़ानून का मुद्दा भी उठाती हैं.
संविधान विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का मानना है कि किसी भी विचारधारा के लिए कोर्ट का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए.
इस्लाम की अलग-अलग व्याख्या

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कुछ जानकार कहते हैं कि जब सरकार शादी की उम्र बढ़ाने का निर्णय ले चुकी है और मामला संसद में है तो ऐसे में कोर्ट जाने के बजाए संसद के फ़ैसले का इंतज़ार करना चाहिए. क्योंकि संसद शादी की उम्र को लेकर सभी समुदायों के लिए क़ानून लेकर आएगी. और ये पर्सनल लॉ पर आधारित नहीं होगा, बल्कि पूरे देश में ये क़ानून लागू होगा.
फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का कहना है कि क़ुरान में बताए गए मुस्लिम लॉ को अलग-अलग तरीक़े से समझाया गया है.
उनके अनुसार, ''मुस्लिम लॉ में रूढ़ीवादी सोच रखने वालों के मुताबिक़ एक लड़की को पीरियड्स आने के बाद उसे शादी के लिए योग्य समझा जाता है. वहीं उदारवादी विचार रखने वाला तबक़ा मानता है कि एक लड़की की शादी तभी होनी चाहिए जब वो मानसिक तौर पर परिपक्व हो जाए और एक लड़की मानसिक तौर पर परिपक्व है या नहीं, वो धर्म नहीं तय कर सकता है.''
वकील सोनाली कड़वासरा कहती हैं कि मुस्लिम समाज में शादी एक कॉन्ट्रेक्ट होता है और उसमें निक़ाह से पहले दोनों से सहमति ली जाती है, जिसे एक तरह से प्रगतिशील माना जाना चाहिए.
वो कहती हैं, ''लेकिन यहां देखा जाना चाहिए कि सहमति या कंसेंट बालिग़ की मानी जाती है. वहीं ये देखा जा रहा है कि लड़कियों की प्यूबर्टी 10 साल की उम्र में भी आ जाती है तो ऐसे में क्या वो इस उम्र में सहमति देने की समझ रखती हैं ये देखने की ज़रूरत है. इसलिए इसे लेकर एक क़दम उठाने की ज़रूरत है अब चाहे वो बिल लाकर हो या फिर न्यायपालिका इस पर फ़ैसला ले.''

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अलग-अलग धर्मों में क्या है शादी की उम्र
- भारत में हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के अनुसार लड़की की उम्र 18 और लड़के की उम्र 21 साल होनी चाहिए.
- भारतीय ईसाई विवाह क़ानून ,1872 में पास किया गया था उसके मुताबिक़ शादी के लिए लड़के की उम्र 21 से कम और लड़की की उम्र 18 साल से नीचे नहीं होनी चाहिए.
- पारसी विवाह और तलाक़ क़ानून, 1936 में पास हुआ था. इस क़ानून के अनुच्छेद 3 के मुताबिक़ पारसी शादी तभी मान्य होगी जब लड़के की उम्र 21 और लड़की की उम्र 18 साल होगी.
- अगर कोई जोड़ा स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी के बंधन में बंधना चाहता है तो इस क़ानून के सेक्शन 4 के अनुसार लड़के की उम्र 21 साल और लड़की की उम्र 18 साल होनी चाहिए.
- बाल विवाह को रोकने के लिए बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 लाया गया था.
- यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण के लिए पॉक्सो एक्ट 2012 लाया गया था और इसमें 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को 'बच्चा' परिभाषित किया गया है.

रेखा शर्मा का कहना है, ''ये लड़कियों के वेल्फ़ेयर या कल्याण का मुद्दा है और ये भेदभाव क्या इसलिए हो रहा है क्योंकि वो एक धर्म से आती हैं. मोहम्मडन लॉ देश के क़ानून से सर्वोपरि नहीं हो सकता. आप 18 साल तक वोट देने का अधिकार नहीं देते लेकिन आप उसे शादी का अधिकार कैसे दे रहे हैं?
अगर एक नाबालिग़ लड़की की शादी होती है तो उसके कम उम्र में मां बनने की आशंका बढ़ जाती है. ऐसे में उसके विकास, स्वास्थ्य पर ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है.
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सुप्रीम कोर्ट में वकील एम आर शमशाद कहते हैं कि ये मामला क़ानून के साथ-साथ सामाजिक मुद्दा भी है. साथ ही वे कहते हैं कि ऐसे मामलों को पॉक्सो से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.
वो अपना पक्ष रखते हुए कहते हैं, ''भारतीय समाज में कई ऐसी आदिवासी जातियां हैं जहां 18 साल से कम उम्र में शादियां होती हैं तो ऐसे में उन शादियों का क्या होगा? पिछले दस सालों में हर मुद्दे को धर्म से जोड़कर देखने की एक होड़ लगती जा रही है चाहे वो मीडिया हो या क़ानून से जुड़ी याचिकाएं हों.''
साथ ही वे कहते हैं कि मुस्लिम लॉ के अनुसार एक लड़की के पीरियड्स आने के बाद वो शादी के योग्य हो जाती है. ऐसे में जब शारीरिक रूप से वो परिपक्व हो जाती है तो किस उम्र में लड़की शादी लेने का फ़ैसला ले सकती है वो एक मुद्दा है.
इस संबंध में वकील एम आर शमशाद , चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ द्वारा कही बात का उदाहरण देते हैं.
शमशाद कहते हैं, ''चीफ़ जस्टिस कह चुके हैं कि ऐसे कई मामले होते हैं जो आमसहमति से बनाए जाते हैं जिसमें बलात्कार के मामले होते हैं, जिसमें सज़ा भी होती है और लोग छूट भी जाते हैं. तो मैं यहां ये कहना चाहूंगा कि ऐसे में इसकी समीक्षा होनी चाहिए."
चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने रविवार को एक कार्यक्रम में रोमेंटिक रिलेशनशिप को पॉक्सो में शामिल करने पर चिंता जताते हुए कहा था कि न्यायपालिका को पॉक्सो एक्ट के तहत सहमति की उम्र को लेकर चल रही बहस पर ध्यान देने की ज़रूरत है.
साथ ही उनका कहना था पॉक्सो एक्ट 18 साल के कम उम्र वालों के बीच सेक्शुअल एक्ट को अपराध मानता है ये देखे बिना कि नाबालिग़ों के बीच सहमति थी या नहीं.

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जया जेटली कहती हैं कि हमने जब लड़कियों की शादी की उम्र 18 साल से बढ़ाने को लेकर युवाओं से बात की थी तो हर धर्म के युवा इससे सहमत थे कि लड़के और लड़कियों की उम्र बढ़ानी चाहिए.
वो इस संबंध में सरकार द्वारा गठित की गई समिति की अध्यक्ष रह चुकी हैं. जया जेटली देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड लाने की बात पर ज़ोर देती हैं.
उनके अनुसार, ''देश में एक क़ानून रहेगा तो अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न क़ानून नहीं होंगे और विभाजन नहीं होगा. हालांकि हमने कभी युवाओं से इस बारे में चर्चा नहीं की. हमें पितृसत्तात्मक सोच से बाहर निकलना है, लड़कियों को समाज में बराबर का दर्जा देना है तो पुरुष प्रधान समाज में जो भी ऐसे क़ानून हैं चाहे वो पर्सनल लॉ हो उन्हें हटाना ही होगा, शुरुआत तो करनी होगी. ये भारत के हर नागरिक पर लागू होगा चाहे वो जो भी हो.''
कमाल फ़ारूक़ी के अनुसार भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में हर धर्म के व्यक्ति को आज़ादी है जब तक वो किसी आपराधिक गतिविधि में लिप्त न हो.
भारत में कई राज्य जैसे हरियाणा, राजस्थान या झारखंड ऐसे हैं जहां बाल-विवाह हो रहे हैं. ऐसे मामले कोर्ट में पहुंचाने की बजाए समाज के लोगों को जागरूक करना चाहिए कि कम उम्र में शादी के क्या नुक़सान हैं. लड़कियों को शिक्षा दी जानी चाहिए और कम उम्र में शादी के स्वास्थ्य पर होने वाले नुक़सान के बारे में बताना चाहिए. इससे हिंदूओं में नहीं बल्कि मुसलमानों में भी ऐसी शादियां कम होंगी क्योंकि इस्लाम धर्म कभी कम उम्र की शादी को बढ़ावा नहीं देता.
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