महिलाओं की शादी की उम्र 18 से 21 होने से क्या कुछ बदलेगा?

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- Author, इमरान क़ुरैशी एवं सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के सहयोगी एवं बीबीसी संवाददाता
विवाह के लिए महिलाओं की न्यूनतम उम्र को 18 से बढ़ाकर 21 करने की दिशा में केंद्र सरकार की कोशिशों ने कई विशेषज्ञों को अचरज में डाल दिया है.
विशेषज्ञ इन कोशिशों के मकसद को लेकर परेशान हैं क्योंकि यह मौजूदा बाल विवाह निषेध क़ानून के संशोधन में दिए मूल उद्देश्यों एवं कारणों में से एक का विरोधाभासी है.
संसद में विधेयक पेश किए जाते वक़्त इसके उद्देश्यों एवं कारणों में मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में गिरावट लाने के साथ-साथ पोषण के स्तर को बढ़ाना शामिल था.
लेकिन नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के डेटाशीट पर नज़र डालें तो मातृ मृत्यु दर की मुख्य वजह एनीमिया है और शिशु मृत्यु दर की मुख्य वजह कुपोषण है. इसमें शादी की उम्र शामिल नहीं है.
उम्र बढ़ने से कम होगा कुपोषण?
दिल्ली स्थित सेंटर फ़ॉर वीमन डेवलेपमेंट स्टडीज़ के महिला एवं लैंगिक अध्ययन विभाग की प्रोफ़ेसर मैरी ई जॉन कहती हैं, "इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है. क्योंकि 17 साल की उम्र में विवाह करने वाली महिला अगर एनीमिया की शिकार है तो वह 21 या 24 साल की उम्र में शादी करने पर भी एनिमिक ही रहेगी. ये एक दुखद पहलू है कि महिलाएं बच्चों को जन्म देते हुए अधिक खून बहने की वजह से मर जाती हैं. ये पोषण से जुड़ा मसला है और इसका शादी की उम्र से कोई लेना-देना नहीं है."
प्रोफ़ेसर जॉन ने हाल ही में बाल विवाह पर अपनी क़िताब 'चाइल्ज़ मैरिज़ इन एन इंटरनेशनल फ्रेम' लॉन्च की है. इस क़िताब में नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे (एनएचएफ़एस) - 4 से मिले मैक्रोडेटा का आकलन किया गया है क्योंकि इसमें यूनिट लेवल डेटा उपलब्ध है. एनएचएफ़एस-5 से जुड़ी डेटाशीट सरकार ने जारी नहीं की है.
अजीब बात ये है कि सरकार की ओर से शादी के लिए न्यूनतम उम्र बढ़ाने का कदम तब उठाया जा रहा है जब बाल विवाह के आंकड़ों में लगातार गिरावट देखी जा रही है.
वह कहती हैं, "एनएचएफएस - 3 में भारत में बाल विवाह का आंकड़ा 46 फीसदी था. उसकी तुलना एनएचएफएस - 4 से करें तो इसमें बीस फीसदी की भारी गिरावट देखी जा सकती है. इसका मतलब ये है हमारी कोशिशें कारगर साबित हो रही हैं और आंकड़ों में कमी देखी जा रही है."
साल 2015-16 के एनएचएफ़एस के आंकड़ों के मुताबिक़, 26 फीसदी लोगों की शादी 18 साल से कम उम्र में हुई थी. इन 26 फीसदी लोगों में से छह फीसदी की शादी 15 साल से कम, 20 की शादी 15 से 17 साक के बीच हुई थी. ऐसे में हम 15 साल से कम उम्र में होने वाली शादियों में कमी लाने में सफल हुए हैं."
विपक्षी दलों की ओर से इस अधिनियम पर आपत्ति जताने के बाद इस अधिनियम को संसद की स्थायी समिति के समक्ष भेजा गया था. इसे केंद्रीय महिला एवं बाल कल्याण मंत्री स्मृति ईरानी ने पेश किया था.

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बच्चे की परिभाषा क्या है?
बाल विवाह निषेध (संशोधन) अधिनियम 2021 की राह में सिर्फ मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर ही एक रोड़ा नहीं हैं.
इस प्रस्तावित क़ानून में एक बच्चे को जिस तरह परिभाषित किया गया है, वह बाल श्रम, पोक्सो क़ानून, जुवेनाइल जस्टिस और आरटीई क़ानून में दी गई बच्चे की परिभाषा का विरोधाभासी है.
यंग वॉइसेज़ नेशनल मूवमेंट का नेतृत्व करने वालीं कविता रत्ना का कहना है कि "दुनिया भर में कहीं बच्चे को 21 साल से कम उम्र वाले शख़्स के रूप में परिभाषित नहीं किया गया है. लेकिन इस प्रस्तावित कानून में ऐसा किया गया है.
इसकी वजह से पोक्सो से लेकर पैतृक एवं मातृ संपत्ति से जुड़े अधिकारों आदि पर इसका असर पड़ना लाज़मी है. उदाहरण के लिए, बाल श्रम क़ानून के तहत बच्चे की उम्र 14 से कम रखी गयी है. 14 से 18 साल के शख़्स को किशोर की संज्ञा दी गयी है."
यंग वॉइस नेशनल मूवमेंट (जिसमें शहरी और ग्रामीण इलाकों के 2500 युवा शामिल हैं) उसने इस मुद्दे पर जया जेटली की अध्यक्षता में केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए टास्क फोर्स से मुलाक़ात की है. इसी टास्क फोर्स ने सरकार को बाल विवाह क़ानून में संशोधन का सुझाव दिया है.
जया जेटली ने यंग वॉइस नेशनल मूवमेंट के प्रतिनिधियों, जिसमें दक्षिण, उत्तर, पश्चिम और पूर्वी इलाकों के लोग थे, से बात की है.
रत्ना बताती हैं कि युवाओं ने जया जेटली को बताया कि "सरकार 18 साल से कम उम्र में होने वाली शादियां नहीं रोक सकी. इसकी असली वजह ये थी कि बच्चों को शादी करने के लिए मजबूर किया गया. लेकिन कई मामलों में बाल विवाह बच्चों की मर्जी से भी होते हैं. क्योंकि ग़रीबी जैसी कई वजहों के चलते बच्चों के पास कोई विकल्प नहीं होते हैं. कई ऐसे बच्चे भी थे जो महत्वाकांक्षी थे और जिनके लिए शादी गांव से बाहर निकलने का तरीका था. 16 से 18 उम्र वर्ग के लिए यही वजह थी."

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बच्चों के साथ यौन शोषण बढ़ने की आशंकाएं
रत्ना बताती हैं कि युवाओं ने जेटली को ये भी बताया कि अगर सरकार उन्हें आगे बढ़ने के अवसर दे तो बाल विवाह स्वाभाविक रूप से बंद हो जाएंगे.
वह कहती हैं, "उदाहरण के लिए, कई किशारों के पास हाई स्कूल तक की पढ़ाई करने के बाद करने के लिए कुछ नहीं होता. अगर उन्हें रोजगार के अवसर जैसे इलेक्ट्रिक ट्रेनिंग या गारमेंट इंडस्ट्री ट्रेनिंग उपलब्ध कराई जाए तो बच्चे ऐसे अवसरों की ओर जाएंगे. हमने कर्नाटक मे अपने एक प्रोजेक्ट में इसका प्रभाव देखा है."
जेटली ने बच्चों को आश्वासन दिया है कि उनके रुख को भी रिपोर्ट में रेखांकित किया जाएगा. लेकिन टास्क फोर्स ने अब तक अपनी रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया है.
रत्ना कहती हैं, "अब तक इस रिपोर्ट का सिर्फ एक पहलू शादी की उम्र बढ़ाने वाले विधेयक के रूप में सामने आया है."
यही नहीं, प्रोफेसर जॉन के मुताबिक़, टास्क फोर्स का गठन अपने आप में एक अजीब बात थी. लेकिन वह एक सवाल पूछती हैं.
वह कहती हैं, "अब तक टास्क फोर्स की रिपोर्ट को सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया, ये बड़ा सवाल है. मेरी क़िताब से जुड़े अध्ययन के सारे आंकड़ों को टास्क फोर्स के सामने पिछले साल रखा गया था. टास्क फोर्स की अध्यक्ष के साथ भी मेरी विस्तार से चर्चा हुई थी. ऐसे में अगर टास्क फोर्स के बयान और सरकार के बयान में अंतर सामने आए तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा."
राइट लाइवलीहुड सम्मान पाने वालीं दलित सामाजिक कार्यकर्ता रूथ मनोरमा मानती हैं कि नए क़ानून से 18 साल की उम्र में होने वाली शादियां नहीं रुकेंगी.
वह सवाल करती हैं, "क्या आपको लगता है कि एक नये क़ानून से 18 साल की उम्र में शादियां होना बंद हो जाएंगी?"
वो कहती हैं, "पहले तो अगर लड़कियों की शिक्षा को प्राथमिकता दी जाए तो वे अपने आप ही शादी को आगे बढ़ा देंगी. इसके साथ ही घरवाले भी बच्ची की आकांक्षाओं को समझना शुरू करेंगे. ऐसे में ज़रूरी ये है कि लड़कियों को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा मिले."

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नए क़ानून के संभावित कारण
प्रोफेसर जॉन कहती हैं कि इस अधिनियम को लाने के दो कारण हो सकते हैं.
वह कहती हैं, "मौजूदा बाल विवाह अधिनियम का उद्देश्य मुख्य रूप से जनसंख्या के मुद्दे पर टिका है. हमें अपनी जनसंख्या कम करनी है. और इसका एक तरीका शादियों की उम्र कम करना है. क्योंकि कम उम्र में शादी होने से कम उम्र में बच्चे पैदा होते हैं और ज़्यादा बच्चों के जन्म की संभावना रहती है."
"ये काफ़ी रोचक है कि सरकार लैंगिक समानता की भाषा का इस्तेमाल कर रही है, संभवत: सशक्तिकरण के लिए. ये कुछ ऐसा है जिस पर दक्षिणपंथी ताकतें सामान्य रूप से बात नहीं करती हैं. "
"आप 2020 में स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर दिया प्रधानमंत्री मोदी का भाषण याद करिए. उन्होंने खुलकर जनसंख्या विस्फोट पर बात की थी जिससे सभी दंग रह गए थे. अंतरराष्ट्रीय दानदाता और फंडिंग एजेंसियां जनसंख्या पर बात कर रही हैं. साल 2017 में सामने आए वर्ल्ड बैंक के एक अध्ययन में दावा किया गया था कि अगर जनसंख्या में कमी आएगी तो काफ़ी बचत होगी क्योंकि सार्वजनिक स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च कम हो सकता है. लेकिन वे शादी की उम्र के बारे में बात नहीं कर रहे हैं."
प्रोफ़ेसर जॉन कहती हैं, "आम लोगों की राय ये है कि हिंदुओं पर लागू होने वाले क़ानून में सुधार लाया जा चुका है. लेकिन मुसलमान जो कि पिछड़े हैं और बदल नहीं रहे हैं उनकी जनसंख्या अधिक है. अगर आप आंकड़ों पर नज़र डालें तो जनसंख्या में हिंदुओं की संख्या मुसमलानों से थोड़ी ज़्यादा है."
रुथ मनोरमा प्रोफ़ेसर जॉन के नज़रिए से सहमत हैं. वो कहती हैं, "ये एक मानसिकता है, सोचा जाता है कि अल्पसंख्यकों की जनसंख्या बढ़ जाएगी और इसी मानसिकता की वजह से शादी की उम्र बढ़ाई जा रही है."
हालांकि, रत्ना कहती हैं कि "हमें ये समझने की ज़रूरत है कि ये प्रस्तावित अधिनियम क्यों लाया जा रहा है जब अभी तक 18 साल से छोटी लड़कियों की शादी को रोका नहीं जा सका है.
संसद में पास होने के बाद ये प्रस्तावित क़ानून मौजूदा विवाह एवं व्यक्तिगत कानूनों जैसे इंडियन क्रिश्चियन मैरिज़ एक्ट 1872, पारसी मैरिज़ एवं डायवॉर्स एक्ट 1936, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट 1937, स्पेशल मैरिज़ एक्ट 1954, हिंदू मैरिज़ एक्ट 1955 और फ़ॉरेन मैरिज़ एक्ट 1969 में भी बदलाव करने के रास्ते खोलेगा. यानी चाहे कोई भी धर्म हो, पुरुष और महिला की शादी की न्यूनतम उम्र समान होगी.

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प्रस्तावित क़ानून के असर
एक वकील ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि इस क़ानून का सबसे स्वाभाविक असर, जिस पर सब बात कर रहे हैं, वो ये होगा कि "जिस तरह 18 साल से कम उम्र वाली लड़की की शादी के लिए उसकी उम्र बदली जाती थी, वैसे ही 21 साल होने पर भ्रष्टाचार होगा."
प्रोफ़ेसर जॉन नेपाल का उदाहरण देती हैं जहां लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र लड़कों के बराबर यानी बीस वर्ष कर दी गयी है.
वे कहती हैं, "वहां गंभीर समस्या हो गयी है. लड़कों के परिवारों को सज़ा मिलती है और लड़कियां वापस अपने घर नहीं जा सकतीं क्योंकि पुनर्विवाह एक बड़ी समस्या है. अब वे महिला आश्रय केंद्रों में रहने के लिए मजबूर हैं. ये काफ़ी बर्बर और क्रूर है. ये बदलाव स्वाभाविक रूप से विवाह के बंधन में बंधने जा रही कई महिलाओं की शक्तिहीन बना सकता है."
इस प्रस्तावित क़ानून के सिर्फ सामाजिक और क़ानूनी असर नहीं होंगे. ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक पंडितों और मैरिज ब्यूरो के व्यापार में भी कमी आएगी.
लेकिन उन्हें संभवत: अपनी फीस वापस नहीं करनी होगी क्योंकि शहरी इलाकों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में आर्थिक लेनदेन की प्रकृति अलग होती है.

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मैट्रिमोनियल वेबसाइटों पर असर?
पढ़े-लिखे लोगों में ऑनलाइन मैट्रिमोनियल वेबसाइट का प्रयोग अपेक्षाकृत रूप से ज़्यादा है.
हालिया मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया है कि कोरोना लॉकडाउन के दौरान इसके नकारात्मक प्रभाव से बची रहने वाले उद्योगों में ऑनलाइन मैट्रिमोनियल इंडस्ट्री शामिल है.
लेकिन इस क्षेत्र की बड़ी कंपनियां नए क़ानून की वजह से उनके व्यापार पर पड़ने वाले असर पर चर्चा करने से बचते दिखाई दिए.
अपनी कंपनी का नाम न बताने की शर्त पर एक व्यक्ति ने कहा, "हम पर इसका ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा. मुश्किल से आठ फीसदी पंजीकरण घरवालों की ओर से कराए जाते हैं."
इसका मतलब ये कि अगर पंजीकरण की राशि वापस करनी होगी तो कंपनी उसे वापस कर देगी और इसका उसकी कमाई पर असर नहीं होगा.
शादी डॉट कॉम के प्रवक्ता ने अपने बयान में कहा है, "शादी की न्यूनतम उम्र को बढ़ाकर 21 वर्ष किया जाना सही दिशा में उठाया गया एक कदम है. इसका महिलाओं की शिक्षा एवं लेबर फोर्स में उनकी भागीदारी जैसे अहम पहलुओं पर सकारात्मक असर देखने को मिलेगा. हम 18 से 20 वर्ष की महिलाओं का डेटाबेस हटाने में ख़ुशी महसूस करेंगे. इसके साथ ही इस उम्रवर्ग के सक्रिय सदस्यों को उनके पैसे वापस लौटा देंगे. हम इस समय ये देख रहे हैं कि हमें ये कदम अभी उठाना है या फिर क़ानून पास होने के बाद."
लेकिन ऑनलाइन मैट्रिमोनियल वेबसाइट का नेतृत्व करने वाली इकलौती महिला और एंडवीमैट नामक वेबसाइट की संस्थापक और सीईओ शालिनी सिंह मानती हैं, "सरकार इस समय जो कर रही है, वह अलग है. अगर आप रिश्तों और सामाजिक ताने-बाने को देखें तो शादी की न्यूनतम उम्र को 25 वर्ष कर दिया जाना चाहिए. ये सबसे उचित रहेगा क्योंकि आप शिक्षित हो जाएंगे और फिर आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना भी ज़रूरी है. और शादी के बंधन में बंधने से पहले आपके पास कुछ काम करने का अनुभव होगा. एक रिश्ते के कई पहलू होते हैं जिन्हें आपको शादी के बाद भी सीखना-समझना होता है."
सिंह कहती हैं कि उनकी कंपनी घरवालों की ओर से अपनी 18 साल की बच्चियों की शादी के लिए किए जाने वाले पंजीकरण को स्वीकार नहीं करती है.
इसकी वजह बताते हुए वह कहती हैं, "आप सिर्फ एक घर से दूसरे घर में जा रहे होते हैं. ऐसे में हमारे यहां पंजीकरण 25 साल से शुरू होता है."

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स्थायी समिति के पास पहुंचा बिल
मंगलवार को केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने विपक्ष के विरोध के बीच इस बिल को लोकसभा में पेश किया था.
उनका कहना था, हम भारत के लोकतंत्र में महिला और पुरुष को विवाह में बराबर का अधिकार देने में 75 साल पीछे हैं. साथ ही उन्होंने उल्लेख किया कैसे लड़कियों की शादी की उम्र बीते सालों में बढ़ी है.
उन्होंने कहा, 19वीं सदी की शुरूआत में लड़की की शादी की उम्र दस साल थी. 1940 तक शादी की उम्र को 12 से 14 किया गया, 1978 में 15 साल की लड़कियों का ब्याह किया जाने लगा. आज पहली बार इस संशोधन के माध्यम से महिला और पुरुष दोनों 21 साल की उम्र में समानता के अधिकार को देखते हुए विवाह का निर्णय ले सकते हैं.
कांग्रेस के सांसद अधीर रंजन चौधरी का कहना था, हम सरकार को सलाह देना चाहते हैं कि जल्दबाज़ी में चीज़ें गड़बड़ होती हैं. हिंदुस्तान में इस मुद्दे को लेकर काफी चर्चा हो रही है. सरकार ने न स्टेकहोल्डर और न राज्य से चर्चा की है बल्कि अचानक से सप्लीमेंटरी लिस्ट में इस बिल को लाया गया है. उन्होंने सवाल किया कि सरकार एक के बाद एक बिल ऐसे क्यों लाती है.
साथ ही उन्होंने इस बिल को स्थायी समिति में भेजे जाने की मांग की. इस बिल को लेकर टीएमसी, एनसीपी और डीएमके ने इसी से मिलीजुली राय दी.
ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन के सांसद असदुद्दीन ओवैसी का कहना था, ये स्वतंत्रता के अधिकार अनुच्छेद 19 के ख़िलाफ़ है. एक 18 साल की लड़की प्रधानमंत्री को चुन सकती है, लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकती हैं, तो शादी क्यों नहीं कर सकती?
केन्द्रीय महिला और बाल विकास मंत्रालय ने इस सिलसिले में समता पार्टी की पूर्व अध्यक्ष जया जेटली की अध्यक्षता में एक समिति का गठन भी किया था और समिति ने अपनी रिपोर्ट संबंधित मंत्रालयों और नीति आयोग को सौंपी थी.
जया जेटली का कहना है कि संसद में जो हुआ उस पर वह कुछ कहना नहीं चाहेंगी. हालांकि बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि शादी की उम्र बढ़ाए जाने के मसले पर समिति के सदस्यों ने अलग-अलग मजहब, गांव और शहरों के कई युवाओं से चर्चा की, कॉलेज के छात्रों को प्रश्नवाली भेजकर राय ली गई थी और रिपोर्ट सौंपी थी.
इस रिपोर्ट में अधिकतर लोगों का मत था कि शादी की उम्र 22 साल से कम नहीं होनी चाहिए. वे इस बात पर ज़ोर देकर कहती हैं कि जिन युवाओं की उम्र शादी लायक है, उनसे पहले पूछा जाना चाहिए कि वे क्या कहते हैं और उसके बाद दूसरों की राय सुनी जानी चाहिए.
साथ ही उनका कहना था कि उन्होंने इस रिपोर्ट के ज़रिए सरकार को सुझाव दिए हैं कि वो ये देखे कि लड़कियां स्कूल तक पहुंच पा रही हैं या नहीं और उन्हें आगे बढ़ने के लिए स्कॉलरशिप मिले. साथ ही इसमें कम उम्र में शादी होने पर स्वास्थ्य पर होने वाले प्रभावों के बारे में भी बताया था.
डॉ कृति भारती राजस्थान में बाल विवाह रोकने की दिशा में लंबे समय ये काम कर रही हैं और उन्हें पहला बाल विवाह रद्द कराने का श्रेय दिया जाता है.
उनके अनुसार, "लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए ये बिल अहम भूमिका निभा सकता है और जो लड़कियां आगे पढ़ना चाहती हैं उन्हें भी इससे मदद मिल सकती है. लेकिन क्या इससे बाल विवाह रुक जाएंगे, ये कहना मुश्किल है."
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