शादी का ये इश्तिहार छपते ही वायरल हो गया

- Author, गीता पांडेय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में नारीवादी कार्यकर्ता आमतौर पर अख़बारों के वैवाहिक विज्ञापनों के ज़रिए जीवनसाथी की तलाश नहीं करती हैं.
वैवाहिक विज्ञापन अमूमन जातियों और धर्म के आधार पर वर्गीकृत होते हैं और उनमें त्वचा के रंग, ऊंचाई शक्ल के बारे में बताया जाता है. कई विज्ञापनों में तो आय और पारिवारिक समृद्धि की शेखी भी बघारी जाती है.
पिछले सप्ताह जब अख़बार में एक 'छोटे बालों और छिदे जिस्म का जिक्र करने वाली वैचारिक नारीवादी लड़की' के लिए ऐसे अमीर दूल्हे की तलाश में विज्ञापन प्रकाशित हुआ जो 'अमीर हो, हैंडसम हो, महिलावादी हों और पादता और डकार न लेता हो' तो ये तुरंत वायरल हो गया.
कॉमेडियन अदिति मित्तल ने इस विज्ञापन को ट्विटर पर पोस्ट करते हुए सवाल पूछा कि उनकी तरफ से ये विज्ञापन किसने पोस्ट किया है?
अदिति के ट्वीट पर कई लोगों ने प्रतिक्रियाएं दीं जिनमें फ़िल्म कलाकार रिचा चड्ढा भी शामिल हैं.
रिचा ने लिखा, "कहीं कोई आपका इंतज़ार कर रहा है."
कई लोगों ने विज्ञापन की वास्तविकता पर भी प्रश्न खड़े किए.
बाद में पता चला कि ये विज्ञापन एक भाई, बहन और उसकी बेस्ट फ्रेंड के बीच हुआ एक प्रैंक था.
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विज्ञापन में प्रकाशित ईमेल के ज़रिए बीबीसी ने इसे प्रकाशित करने वाले लोगों से बात की तो उस 'वैचारिक नारीवादी' का पता चला. ये साक्षी हैं और ये विज्ञापन उनके भाई श्रीजन और बेस्ट फ्रेंड दमयंती ने प्रकाशित करवाया था.
ये सभी नाम बदले हुए हैं क्योंकि वो नहीं चाहते कि सोशल मीडिया के ट्रोल उनके पीछे पड़ जाएं.
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साक्षी कहती हैं, "हम सभी पेशेवर हैं, हमारा करियर अच्छा है और आगे हम अच्छे जीवन की कल्पना करते हैं. हम नहीं चाहते कि ख़ून के प्यासे सोशल मीडिया ट्रोल हमारे पीछे भी पड़ जाएं."
श्रीजन के मुताबिक साक्षी के तीसवें जन्मदिन के मौके पर उन्होंने ये छोटा सा प्रैंक किया था.
वे कहते हैं, "तीस साल का होना एक अहम पड़ाव होता है, ख़ासकर हमारे समाज में शादी को लेकर जो बातचीत होती है. जब आप तीस के हो जाते हैं, समाज और परिवार आप पर शादी करने का दबाव डालना शुरू कर देता है."
साक्षी कहती हैं, "वो तीस साल की हैं, उनके बाल छोटे हैं और उन्होंने अपना शरीर छिदवाया हुआ है. पादना और डकार लेना एक पारिवारिक चुटकुला है."
ये विज्ञापन दर्जनों उत्तर भारतीय शहरों में प्रकाशित हुआ था और इसके लिए श्रीजन ने तेरह हज़ार रुपये चुकाए थे.
श्रीजन कहते हैं, "यदि कोविड ना होता और हम जन्मदिन की पार्टी करते तो इतने पैसे तो खर्च हो ही जाते."
साक्षी कहती हैं, "जन्मदिन की पूर्व संध्या उनके भाई ने उन्हें एक लिपटा हुआ काग़ज़ दिया."
जब मैंने इसे खोला तो इस पर ईमेल पता- [email protected] और उसका पासवर्ड था. मुझे पता नहीं था कि इसका क्या करना है.

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कई लोगों ने भेजे मेल
अपने घर से फ़ोन पर बात करते हुए साक्षी कहती हैं, "अगली सुबह श्रीजन मेरे पास अख़बार लेकर आया. वैवाहिक विज्ञापनों वाला पन्ना खुला था. तब हम बहुत हंसे, ये एक अच्छा मज़ाक था."
लेकिन दोस्तों के बीच एक निजी चुटकुले से शुरू हुआ ये प्रकरण जल्द ही सोशल मीडिया पर वायरल हो गया.
कई सेलिब्रिटी ने इसे शेयर कर दिया. बहुत से लोगों ने इस पर टिप्पणियां की और नए बने ईमेल पते पर दर्जनों ईमेल प्राप्त हुए.
साक्षी कहती हैं, "मुझे अब तक 60 से ज़्यादा ईमेल मिल चुके हैं. कई लोगों को पता चल गया है कि ये एक मज़ाक था."
साक्षी कहती हैं, "एक पुरुष ने ईमेल करके बताया कि वो उसके लायक आदमी हैं क्योंकि वो बहुत घरेलू हैं और उनके कोई विचार नहीं हैं. वहीं एक अन्य महिला ने ईमेल करके शुक्रिया किया और कहा कि वो बिल्कुल उन जैसी ही महिला हैं."
लेकिन भारत के पितृसत्तात्मक समाज में 'नारीवादी' एक बुरा शब्द माना जाता और ये ग़लतफ़हमी है कि महिलावादी औरतें पुरुषों से नफ़रत करती हैं. इस विज्ञापन के बाद कई लोगों ने भद्दे और नफ़रत भरे मैसेज भी भेजे.
साक्षी को पैसे की भूखी महिला और दोगला कहा गया क्योंकि वो विचारों से तो पूंजीवाद की विरोधी हैं लेकिन अपने लिए उन्हें जवान और अमीर पति चाहिए.
उन्हें बूढ़ी बिल्ली भी कहा गया क्योंकि वो ख़ुद तो तीस साल से ऊपर की हैं लेकिन उन्हें तलाश 25-28 साल के पति की है. कई लोगों ने तो उन्हें ख़ुद मेहनत करके पैसा कमाने की भी सलाह दी.
कई लोगों ने अपने मैसेज में लिखा कि उनका विज्ञापन ज़हरीला है और ऐसा लगता है कि वो एक मोटी महिला हैं. वहीं एक ने कहा कि सभी महिलावादी मूर्ख होते हैं.
एक महिला तो इतनी गुस्सा हुईं कि उन्होंने अपने मैसेज में लिखा कि उनका भाई उन्हें 78वें माले से फेंक देगा.
दमयंती कहती हैं, "भारत में 90 फ़ीसदी शादियां परिवारों के बीच तय की जाती हैं और हर किसी को एक अच्छा कमाने वाला पति चाहिए होता है लेकिन जब विज्ञापन में यही साफ़तौर पर कहा गया तो बहुत से लोगों को गुस्सा आ गया."

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आत्मसम्मान पर चोट?
साक्षी कहती हैं कि ऐसा लगता है जैसे इस विज्ञापन से बहुत से लोगों के आत्मसम्मान को चोट पहुंची हैं.
"आप खुलकर ये सब नहीं कह सकते हैं. पुरुषों को ऊंची, सुंदर और स्लिम पत्नी चाहिए. वो अपनी दौलत की शेखी बघारते हैं, लेकिन जब एक महिला ऐसी बात करती है तो उन्हें हजम नहीं होता. एक महिला इस तरह की शर्तें कैसे रख सकती है?"
वे कहती हैं, "ये विज्ञापन इस तरह की विचारधारा पर एक व्यंग्य था और इससे वही लोग नाराज़ हुए हैं जिन्हें अपने लिए सुंदर, स्लिम और गोरी लड़की चाहिए होती है."
जिन लोगों को इस विज्ञापन से चोट पहुंची और उन्होंने ईमेल किए उनसे वो एक ही सवाल करती हैं, "क्या आप उन सभी जातिवादी, महिला विरोधी विज्ञापन देने वालों को ईमेल करते हैं जो रोज़ अख़बारों में विज्ञापन छपवाते हैं. यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो आपकी अपनी पितृसत्तात्मकता को दबाने की ज़रूरत है."
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