बिहार के बेगूसराय में क्या आदमख़ोर हो रहे हैं कुत्ते?

BIHAR BEGUSARAI VOILENT DOGS

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इमेज कैप्शन, आवारा कुत्तों के हमलों के खौफ में कादराबाद पंचायत के लोग
    • Author, विष्णु नारायण
    • पदनाम, बेगूसराय से, बीबीसी हिन्दी के लिए

"मेरी दादी थी. कुत्तों के झुंड ने उन्हें मार डाला. शरीर के हिस्सों को खा लिया. बचे हुए हिस्से को जलाकर हमने अंतिम संस्कार किया."

"मेरी मां सुबह 10-11 बजे घास काटने के लिए खेत गई थी. हल्ला हुआ कि कुत्तों ने काट लिया तो हम भी देखने पहुंचे. आसपास के लोग पहुंचे. बुरी तरह से काटा था. हमारे पहुंचते-पहुंचते सबकुछ ख़त्म हो चुका था."

ऐसा कहना है बिहार के बेगूसराय ज़िले के कादराबाद पंचायत में रहने वाले 26 साल के विकास और 33 साल के लक्ष्मण साव का, जिनकी मां और दादी की मौत कुत्तों के काटने से हुई है.

दोनों महिलाएं अपने खेतों में काम से गईं थीं लेकिन जीवित नहीं लौट सकीं.

आवारा कुत्तों के काटने के अधिकांश मामले बेगूसराय ज़िले के बछवाड़ा विधानसभा के चार पंचायत क्षेत्रों- कादराबाद, अरवा और रुदौली और रानी में रिपोर्ट हुए हैं.

कादराबाद के मुखिया टुनटुन पासवान के दावे पर यक़ीन करना भले मुश्किल हो लेकिन वे कहते हैं कि बछवाड़ा प्रखंड के अलग-अलग ग्राम पंचायतों में कुत्तों के काटने के चलते अब तक छह लोगों की मौत हुई है.

इसके अलावा दर्जन भर से अधिक लोग बुरी तरह घायल हैं. टुनटुन पासवान के मुताबिक उनके ग्राम पंचायत में दो मौतें हुई हैं. वहीं रुदौली, रानी, अरवा और भीखमचक ग्राम पंचायत में क्रमशः एक-एक मौतें हुई हैं.

बछवाड़ा ग्राम पंचायत के मुखिया प्रतिनिधि राजीव चौधरी भी अलग-अलग ग्राम पंचायतों में हुई छह मौतों का ज़िक्र करते हैं. हालांकि बेगूसराय ज़िले के ज़िलाधिकारी केवल दो मौतों के रिपोर्ट किए जाने की बात स्वीकारते हैं.

इन कुत्तों ने इंसानों के अलावा इलाक़े के जानवरों को भी निशाना बनाया है. इससे पूरे इलाके में दहशत व्याप्त है. लोग डर के मारे बच्चों को स्कूल नहीं भेजना चाह रहे. लोग डर के चलते खेतों में नहीं जा रहे हैं.

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इमेज कैप्शन, कुत्तों के हमले में मारी गईं बुजुर्ग महिला का श्राद्ध हाल ही में हुआ

कोई पांच-छह महीने पहले भी इसी इलाके में ऐसे मामले दिखे थे. तब प्रशासन ने स्थानीय लोगों और वन विभाग की मदद से इस पर क़ाबू पा लिया था लेकिन इस बार शुरू हुए मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं.

आम लोग सुरक्षा के लिए लाठी-डंडा लेकर घूमने को मजबूर हैं. लोगों को भी जानवरों की तरह झुंड में चलना पड़ रहा है. लोग डरे हुए हैं कि कहीं अगले शिकार वे ही न हो जाएं.

कादराबाद गांव व पंचायत की रहने वाली सीता देवी आवारा कुत्तों से बाल बाल बची हैं. उन पलों को याद करते हुए सीता देवी ने बताया, "हम सुबह-सुबह खेत की ओर गए थे कि चार-पांच कुत्तों ने घेर लिया. शुरू में लगा कि ऐसे ही है, लेकिन बाद में काट लिया. हम किसी तरह जान बचाकर भागे. ये सब घरेलू कुत्ता नहीं है. इनके मुंह में खून लग गया है."

वहीं कादराबाद वार्ड नंबर 2 के वार्ड सदस्य धनंजय निषाद के हिसाब से पहले भी कुत्तों ने कई लोगों को काटा है लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि वे 'आदमख़ोर' होते जा रहे हैं.

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कादराबाद ग्राम पंचायत के अलग-अलग गांवों और इलाके में कुत्तों के काटने के ऐसे मामले हमने मुखिया टुनटुन पासवान कहते हैं, "मेरे ग्राम पंचायत क्षेत्र में ऐसे 7-8 मामले सामने आए हैं कि कुत्ते झुंड में हमला कर रहे. उनमें से दो महिलाओं की मौत हुई और उनकी लाश देखकर लगता है जैसे किसी आदमख़ोर ने हमला किया है."

उन्होंने कहा, "हमने इस संदर्भ में प्रशासन को सूचित किया. स्थानीय प्रशासन के संज्ञान में तो बातें शुरू से ही हैं. मौत के बाद तो स्थानीय प्रशासन मौके पर पहुंचा भी था लेकिन उनका कहना है कि वो (कुत्ते) तो पालतू जानवर हैं. वो जंगली जानवर तो हैं नहीं कि वे उन्हें पकड़कर कहीं रख दें."

आदमख़ोर कुत्तों का डर लोगों में इस कदर फैल गया है कि इस इलाके में खेतिहर मजदूर नहीं मिल रहे हैं. रुदौली ग्रामपंचायत के बासिंदे गुड्डू वार्ड सदस्य होने के साथ ही किसान भी हैं.

खेती-किसानी में होने वाली दिक़्क़तों के सवाल पर वे कहते हैं, "हमें इतनी परेशानी हो रही कि क्या कहा जाए? किसान के लिए यह खेती का समय है. पटवन और खाद छींटने का समय है लेकिन इधर कुत्तों का आतंक इस कदर बढ़ गया है कि खेती के लिए कोई मजदूर आना नहीं चाह रहा. तो खेती का प्रभावित हो जाना तो तय है."

कुत्तों को आदमख़ोर बनने की वजह?

वैसे तो घरेलू या आवारा कुत्तों के इस इलाके में इंसानों पर हमले करने या आदमख़ोर हो जाने को लेकर कहीं कोई रिसर्च या जांच नहीं हुई है लेकिन स्थानीय लोग इस बात का अंदेशा ज़रूर जता रहे कि इन कुत्तों के व्यवहार के पीछे देसी दारू या जानवरों का मांस खाना भी एक वजह हो सकती है.

इल इलाके में महुआ-दारू बनाने का अवैध धंधा चोरी-छिपे चलता है. पुलिस-प्रशासन ने इस इलाके में कई बार शराब की भट्ठियां नष्ट भी की हैं, लेकिन फिर भी शराब का बनना बंद नहीं हो सका है.

रुदौली ग्राम पंचायत के पप्पू सिंह कहते हैं, "इस इलाके में कुछ लोग अवैध दारू का धंधा तो करते हैं, और अवैध दारू के निर्माण में लगे सिक्ठी और ड्राई फ्रूट्स को खाने के बाद कुत्ते एबनॉर्मल हो जाते हैं. तो एबनॉर्मल होने के बाद वो किसी पर भी हमला करते हैं."

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कुत्तों के असमान्य व्यवहार और अवैध शराब के निर्माण के बाद बची-खुची चीजों के सेवन के बाद कुत्तों के व्यवहार में आए बदलाव को ज़िलाधिकारी रोशन कुशवाहा सिरे से नकारते हैं.

उन्होंने कहा, "किसी भी अवैध शराब भट्ठी के संचालन की ख़बर लगते ही मद्य निषेध और पुलिस विभाग के लोग त्वरित कार्रवाई करते हैं. चीज़ों को तत्काल प्रभाव से नष्ट भी करते हैं. इस तरह की बातें खबरों में ज़रूर हैं लेकिन उसकी कोई पुष्टि नहीं है."

क्या कह रहा है ज़िला प्रशासन?

बेगूसराय के ज़िलाधिकारी रोशन कुशवाहा बताते हैं, "बछवाड़ा प्रखंड के कुछ पंचायतों में इस तरह के मामले आए हैं कि कुछ आदमख़ोर कुत्ते पांच से छह की संख्या में एक साथ आते हैं, और स्थानीय लोगों पर हमला करते हैं. हाल ही में उसमें दो मौत भी रिपोर्ट हुई है."

"आज से पांच-छह महीने पहले भी इस तरह की घटनाएं रिपोर्ट हुई थीं. उस वक्त भी हमने वन विभाग, पशु पालन विभाग और लोकल लोगों की मदद से ऐसे कुत्तों को मारा था और लोगों के इनके आतंक से निज़ात दिलाई थी. इस बार भी हम लोग स्थानीय लोगों की मदद से आगे काम कर रहे हैं. साथ ही हमने लोगों से जागरुकता बढ़ाने के लिए भी अनुरोध किया है कि ऐसे जानवरों और कुत्तों के आतंक को ख़त्म किया जा सके."

वहीं आवारा कुत्तों के आतंक और धरपकड़ पर बेगूसराय ज़िले के पशुपालन पदाधिकारी डॉक्टर अनिमेष कुमार कहते हैं, "हमारे संज्ञान में ऐसी बातें बिल्कुल आई हैं. रही बात हम लोगों की तरफ़ से कार्रवाई की तो हम लोग चिकित्सा कार्य और पालतू जानवरों के लिहाज़ से काम करते हैं. जहां तक बात आवारा कुत्तों की है तो यदि कोई एनजीओ हमें कुत्ते पकड़कर दे सके तो हम उसका बन्ध्याकरण भर कर सकते हैं. बाकी चीज़ें वन विभाग देखता है."

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क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट?

कुत्तों द्वारा लोगों पर जानलेवा हमले करने और आदमख़ोर की तरह व्यवहार के पीछे की वजहों पर पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादन संस्थान, पटना से सम्बद्ध डॉक्टर रमेश कुमार कहते हैं, "कुत्ते स्वाभाविक तौर पर मांसाहारी जानवर होते हैं. उन्हें जंगली से पालतू बनाया गया है. उनके मूल में शिकार करना तो है ही."

"दूसरी वजहें देखें तो इन दिनों ठंड पड़ रही है. ठंड के दिनों में किसी भी जानवर को एक्सरसाइज और भोजन की ज़रूरत पड़ती है. गर्माहट बनाए करने के लिए भी अधिक भोजन की ज़रूरत पड़ती है. वे आवारा जानवर हैं तो उन्हें आसानी से भोजन मिल नहीं पा रहा होगा. तो वे शिकार कर रहे हैं."

वहीं इन कुत्तों के शिकारी और आदमख़ोर की तरह व्यवहार करने के पीछे शराब निर्माण के बाद बची-खुची या सड़ी चीजों के सेवन के सवाल पर डॉक्टर रमेश कहते हैं, "कुत्तों के व्यवहार के पीछे एक गौर करने वाली बात है कि कुत्ते स्वाभाविक तौर पर मांसाहारी जानवर होते हैं. वे शराब निर्माण के बाद बची-खुची या सड़ी चीजें खाएंगे ही नहीं. वो उनका खाना है ही नहीं. चाहे चावल का माड़ी हो या फिर बचा हुआ सिक्ठी. या महुआ का सिक्ठी ही क्यों न हो."

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