जाँबाज़ मां जिसने बाघ के जबड़े से अपने 15 महीने के बच्चे को बचाया

अर्चना
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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ये कहानी है एक मां की जिसने अपने बच्चे को बचाने के लिए जान की बाज़ी लगा दी और बाघ के जबड़े से 15 महीने के बच्चे को बचाने में कामयाब रही.

इस दौरान माँ और बेटे दोनों को ही गंभीर चोटें आई हैं. दोनों को बेहतर इलाज के लिए जबलपुर के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

मामला रविवार सुबह का है. मध्य प्रदेश के बाँधवगढ़ टाइगर रिज़र्व से लगे रोहनिया गाँव में अर्चना अपने बेटे के साथ घर के पास ही खेत में काम कर रहीं थीं. इसी बीच झाड़ियों में से एक विशालकाय बाघ निकल आया और उसने उनके बच्चे को अपने जबड़े में पकड़ लिया.

अर्चना अवाक रह गईं लेकिन फ़ौरन उन्होंने अपने आप को समेटा और बाघ से अपने बेटे को छुड़ाने के लिए जद्दोजहद करने लगीं. बाघ ने उन पर भी हमला किया.

इस बीच शोर सुनकर गांव के लोग लाठी और डंडों के साथ वहां पहुंचे. अर्चना ने किसी तरह अपने बेटे को बाघ के जबड़े से छुड़ा लिया था. फिर लोगों पर भी बाघ ने हमला करने की कोशिश की लेकिन ग्रामीणों ने उसे खदेड़ दिया.

इस घटना के बाद से 1,500 वर्ग किलोमीटर से अधिक में फैले बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व के आसपास बसे गाँवों में रहने वाले ग्रामीण दहशत में हैं.

पिछले कुछ समय से इनके गाँवों में जंगल का बाघ कभी दिन में तो कभी रात में गाँवों में घुस आता है.

उमरिया के सिविल सर्जन डॉक्टर मिस्ठी रूहेला ने बीबीसी से कहा कि बच्चे के शरीर पर घाव उतने गंभीर नहीं हैं, लेकिन मां को गंभीर चोटें आई हैं.

अर्चना का बच्चा
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गंभीर रूप से घायल महिला

डॉक्टर मिस्ठी रूहेला कहते हैं, "अमूमन जंगली जानवरों के हमले के शिकार हुए लोगों को हम 'एंटी रेबीज़ इंजेक्शन' देते हैं. हमने दोनों को वही दिया है. लेकिन महिला की पीठ पर गहरे घाव थे. बाघ के पंजे की वजह से घाव काफ़ी गहरा था और संक्रमण फेफड़ों तक पहुँच चुका था."

इसी चिकित्सा केंद्र के सर्जन डॉक्टर सैफ़ का कहना था कि घाव काफ़ी गहरे थे इसलिए मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों को जबलपुर भेज दिया गया जो यहाँ से 165 किलोमीटर दूर है.

जबलपुर के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मीडिया को प्रवेश की अनुमति नहीं है. वैसे अर्चना को अभी अस्पताल के आईसीयू में रखा गया है, जहाँ किसी का भी जाना मना है.

अर्चना के परिवारजन आईसीयू के बाहर बैठे हुए हैं. सबको भरोसा है कि अर्चना ठीक हो जाएंगी और उनके फेफड़ों में जो संक्रमण हुआ है वो जल्द ठीक हो जाएगा.

मानपुर के उप-वन मंडल अधिकारी आर थिरुकुरल ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि फ़िलहाल वन विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है कि जो बाघ टाइगर रिज़र्व से भटक कर गाँव की तरफ़ आ गया है, उसे वापस पहुँचाया जाए.

वो कहते हैं, "इसके लिए हमने कई उपाय किए हैं. हाथी को लगाया गया है. वन विभाग का पूरा अमला है जो ढोल बजाता हुआ आगे-आगे जा रहा है. पुलिसबल भी हैं जो ज़रूरत पड़ने पर गोली चला सकते हैं. हमारे पास बाघ को बेहोश करने वाली 'डार्ट गन' है. अगर बाघ दिखता है तो उसे बेहोश कर उसके विचरण के इलाक़े में छोड़ा जा सकता है. इस काम के लिए ड्रोन की सहायता भी ली जा रही है."

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बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व

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  • सतपुड़ा की पहाड़ियों में फैला ये टाइगर रिज़र्व उमरिया और कटनी ज़िले में पड़ता है.
  • मध्यप्रदेश वनविभाग की वेबसाइट के अनुसार 1,536 वर्ग किलोमीटर फैला ये टाइगर रिज़र्व बाघों के अलावा 34 प्रजाति के स्तनपायी जीवों और 260 प्रजाति के पक्षियों का भी घर है.
  • रिज़र्व में रहने वाले जानवर कभी -कभी आसपास के गांवों में घुस जाते हैं और लोगों को और फ़सलों को नुक़सान पहुंचाते हैं.
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बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व के पास की एक गांव की सड़क
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प्रशासन हुआ मुस्तैद

उमरिया के कलक्टर संजीव श्रीवास्तव ने वन विभाग के अमले के साथ अलग से बैठक भी की है, जिसमे उन्होंने निर्देश दिए हैं कि टाइगर रिज़र्व से बाघ बाहर ना निकलें इसका इंतज़ाम फ़ौरन करना जरूरी है. उन्होंने ग्रामीणों से भी इस मुद्दे पर बात की है.

बांधवगढ़ 'टाइगर रिज़र्व' के आसपास के गाँवों के रहने वालों की मुश्किलें सिर्फ़ बाघों के कारण नहीं हैं. इस इलाक़े में 46 जंगली हाथियों का भी झुंड विचरण करता है जो 2018 में यहाँ विचरण करते हुए पहुँचा.

अब बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व हाथियों का भी घर है, जिसकी वजह से आसपास के ग्रामीणों की मुश्किलें और भी बढ़ गई हैं.

बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व के पास की एक गांव की सड़क

'वाइल्डलाइफ़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया' की एक रिपोर्ट के हिसाब से इस रिज़र्व में पहले से हाथियों के मौजूदगी बिल्कुल नहीं थी. अब गाँव वालों की शिकायतें हैं कि हाथियों के झुंड ने उनके घर तोड़ दिए और उनकी फ़सल को नुक़सान पहुँचाया है.

यही कारण है कि जानवरों और ग्रामीणों के बीच का संघर्ष तेज़ होता जा रहा है जबकि सामाजिक संगठनों और वन विभाग के अमले ने एक 'रैपिड एक्शन प्लान' भी बनाया है ताकि जंगल में रहने वाले ग्रामीणों को सचेत कर सकें. इस काम के लिए 10 गांवों को चुना गया है जिसमें से एक मानपुर भी है.

लेकिन इन सब के बावजूद इन जंगलों के आसपास के गांवों में रहने वालों को ये चिंता है कि पता नहीं किस घड़ी क्या घट जाए.

गांव वालों का कहना है कि बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व के आसपास के गावों में लोग रोज़ रात को पहरा देते हैं ताकि जानवरों का हमला होने पर वो सबको अलर्ट कर सकें और उनका मुक़ाबला कर सकें.

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