बच्चों की जान बचा सकते हैं ये बैक्टीरिया

कीटाणु, बैक्टीरिया, कुपोषण

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    • Author, डेविड रॉबसन
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

दुनिया भर में करोड़ों बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. पिछले कई दशकों से उन्हें ज़्यादा कैलोरी और प्रोटीन वाली ख़ुराक देकर उनका इलाज किया जाता रहा है. इसके पीछे एक ही मक़सद होता है कि उनका कुपोषण दूर हो और वो सामान्य बच्चों की तरह विकसित हों.

ये ख़ुराक उन बच्चों पर से मौत का ख़तरा तो टाल देती है. मगर, कुपोषण के ख़िलाफ़ ये लड़ाई तब भी अधूरी ही रह जाती है.

कुपोषण का दौर तो कुछ महीनों का ही होता है लेकिन इसका असर उस बच्चे पर ताउम्र दिखने का डर होता है. बचपन और किशोरावस्था में उसके शरीर का ठीक से विकास नहीं होता. उसे बीमारियां जल्दी होती हैं.

उसकी बुद्धि का विकास सामान्य नहीं होता. कुपोषण के शिकार बच्चे अक़्लमंदी के पैमाने पर पिछड़ जाते हैं. नतीजा ये होता है कि बड़े होने पर उन्हें काम पाने में दिक़्क़त होती है. कुल मिलाकर, कुपोषण की वजह से बच्चे ज़िंदगी की रेस में ही पिछड़ जाते हैं.

हालिया कुछ रिसर्च से इस मोर्चे पर उम्मीद की रोशनी दिखी है. कुपोषण के शिकार बच्चों के मददगार हो सकते हैं, कीटाणु और ये कीटाणु, इन बच्चों के पेट में रहते हैं.

हर इंसान के पेट में कीटाणुओं की अनेक नस्लें डेरा जमाए रहती हैं. इनमें से कुछ फ़ायदेमंद होते हैं, तो कुछ नुक़सान पहुंचाने वालीं.

वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के जेफरी गॉर्डन कहते हैं कि इंसान के शरीर में बैक्टीरिया का बहुत अहम रोल है. कई वैज्ञानिक तो हमारे पेट में पाए जाने वाले बैक्टीरिया को अलग अंग ही मानते हैं.

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बच्चों के मददगार बैक्टीरिया

जेफरी गॉर्डन मानते हैं कि पेट में पलने वाले ये बैक्टीरिया, कुपोषण के शिकार बच्चों के मददगार हो सकते हैं. उनके विकास को पटरी पर ला सकते हैं.

बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की मदद से जेफरी गॉर्डन, मलावी और बांग्लादेश के कुपोषित बच्चों पर रिसर्च कर रहे हैं. इसका मक़सद पेट में पाए जाने वाले बैक्टीरिया के फ़ायदों को समझकर उनसे काम लेना है. इस रिसर्च के शुरुआती संकेत हौसला बढ़ाने वाले हैं.

अगर ये रिसर्च पूरी तरह सही साबित होता है, तो दुनिया भर के क़रीब 20 करोड़ कुपोषित बच्चों की बेहतरी का नया रास्ता निकल सकता है.

पेट में पलने वाले बैक्टीरिया के फ़ायदों पर सबसे पहली रिसर्च दक्षिण अफ्रीका के डॉक्टर पीएम स्माइथ ने 1958 में की थी. उनकी रिसर्च के नतीजे मशहूर विज्ञान पत्रिका लैंसेट में छपे थे.

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डॉक्टर स्माइथ की रिसर्च से एक बात एकदम साफ़ हो गई थी कि हमारे पेट में जो कीटाणु पलते हैं उनमे से कई हमारे अच्छे दोस्त हैं. जो खाने-पीने की चीज़ों से हमारे लिए ज़रूरी अवयव निकालते हैं.

इस रिसर्च के बाद डॉक्टर स्माइथ ने कुपोषण की बीमारी यानी क्वाशरकोर के शिकार बच्चों की पड़ताल की. उन्होंने देखा कि जो बच्चे इस बीमारी के शिकार हैं, उनके पेट में पाए जाने वाले बैक्टीरिया, सामान्य बच्चों के पेट में पाए जाने वाले बैक्टीरिया से अलग हैं.

डॉक्टर स्माइथ इस नतीजे पर पहुंचे कि शरीर के भीतर कीटाणुओं का संतुलन बिगड़ने से इन बच्चों की बीमारी और बिगड़ी. अगर इस संतुलन को फिर से क़ायम कर दिया जाए, तो कुपोषित बच्चों की रिकवरी ज़्यादा तेज़ और आसान हो सकती है.

टेक्सस के बेलर कॉलेज ऑफ़ मेडिसिन के ज्योफ्री प्रीडिस कहते हैं कि पेट के बैक्टीरिया अगर अपने सही ठिकाने पर हैं, तो वो कुपोषण के शिकार बच्चों के बहुत मददगार हो सकते हैं.

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स्माइथ ने क्वाशरकोर बीमारी के शिकार बच्चों को एंटीबायोटिक देकर पहले नुक़सान पहुंचाने वाले बैक्टीरिया का ख़ात्मा किया. फिर प्रोबायोटिक चीज़ें खिलाकर उनके शरीर में सेहतमंद बैक्टीरिया की आबादी बढ़ाई. स्माइथ ने अपने इस तजुर्बे के बारे में लिखा कि इससे कुपोषित बच्चों की सेहत में बहुत तेज़ी से सुधार हुआ.

डॉक्टर स्माइथ का तजुर्बा बहुत छोटा सा था. ऐसे ही प्रयोग जब दोबारा किए गए, तो, उसके ऐसे ही नतीजे नहीं आए. उस वक़्त तकनीक ने भी इतनी तरक़्क़ी नही की थी कि पेट के अंदरूनी हिस्सों की अच्छे से पड़ताल हो सके. पेट के बैक्टीरिया के सैंपल लेकर लैब में उन्हें पैदा करना बहुत मुश्किल काम था.

लेकिन साइंस की तरक़्क़ी ने साठ साल पहले हुई इस रिसर्च को नई रफ़्तार दी है.

प्रीडिस कहते हैं कि अब बैक्टीरिया को उगाने की ज़रूरत ही नहीं. अब तो उनके डीएनए सैंपल लेकर ही रिसर्च की जा सकती है. असल में पेट में पाए जाने वाले बैक्टीरिया को लैब में उगाना बहुत मुश्किल होता है जबकि उनके डीएनए सैंपल लेकर रिसर्च करना आसान है. इसलिए अब इंसान के पेट में पाए जाने वाले बैक्टीरिया पर ज़्यादा रिसर्च हो रही है.

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बैक्टीरिया ऐसे करते हैं काम

हमारे पेट में पाए जाने वाले लैक्टोबैसिलस और बाइफिडोबैक्टीरियम जैसे कीटाणु, बीमारियों के कीटाणुओं से लड़ने में मदद करते हैं. वो प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट को पचाने में भी हमारी मदद करते हैं.

वो शरीर के विकास के लिए ज़रूरी अमीनो एसिड के निर्माण में भी हमारे शरीर की मदद करते हैं. ऐसे तमाम बैक्टीरिया अगर हमारे पेट में हैं, तो ये शिगेला, लिस्टेरिया और कई दूसरी बीमारियों से लड़ने में भी हमारी सहायता करते हैं. वो बीमारियों वाले बैक्टीरिया को पेट में टिकने नहीं देते. बीमारियों से लड़ने वाले हमारे इम्यून सिस्टम के मददगार होते हैं.

लंदन के इम्पीरियल कॉलेज के जोनाथन स्वान कहते हैं कि, घटिया खाना खाने से बच्चे कुपोषित होते हैं. फिर उनके पेट के कमज़ोर बैक्टीरिया, बीमारी वाले कीटाणुओं का मुक़ाबला नहीं कर पाते. कुपोषित बच्चे अक्सर ऐसे माहौल में रहते हैं, जहां उनका संपर्क बीमारी वाले कीटाणुओँ से होता है. फिर वो ऐसे दुष्चक्र में फंस जाते हैं कि कुपोषण से बीमार हो जाते हैं और फिर बीमारी से और कुपोषण होता है. ऐसे बच्चों का विकास रुक जाता है. शरीर में अच्छे बैक्टीरिया न होने से इन बच्चों को जो खाना मिलता है, उसे पचाने में भी मुश्किल पेश आती है.

जेफरी गॉर्डन को ये तो पता है कि पेट के 'गुड बैक्टीरिया' कुपोषित बच्चों की मदद कर सकते हैं. इसलिए वो इस रिसर्च को बांग्लादेश की राजधानी ढाका और अफ़्रीकी देश मलावी में आगे बढ़ा रहे हैं. स्थानीय डॉक्टरों-नर्सों और कुपोषित बच्चों की माओं के साथ मिलकर वो बच्चों के बेहतर भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं. रिसर्च में ऐसे बच्चों की माओं का रोल भी अहम हो जाता है. क्योंकि बच्चों के तमाम सैंपल जमा करने और उनके खान-पान पर ध्यान देने का काम माओं का ही होता है.

जब कुपोषित बच्चों को बीमारी से बचाने वाला खाना दिया गया, तो उससे उनकी हालत में ज़्यादा सुधार नहीं देखा गया. जेफरी गॉर्डन कहते हैं कि इन बच्चों की हालत और बिगड़ने से तो बच गई. मगर, कुपोषित बच्चे, सामान्य बच्चों की तरह विकसित नहीं हो रहे थे. यानी कुछ तो गड़बड़ थी.

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चूहों और सुअरों पर असर

इसका पता लगाने के लिए गॉर्डन और उनकी टीम ने लैब में कुछ चूहे पैदा किए. इनके पेट में कोई बैक्टीरिया नहीं थे. गॉर्डन ने देखा कि इन चूहों को कुपोषित बच्चों के पेट से लिया गया खाना दिया गया, तो इनका भी वही हाल हुआ, जो कुपोषित बच्चों का हो रहा था. फिर यही तजुर्बा सुअरों पर दोहराया गया. सुअरों के शरीर की बनावट और काम का तरीक़ा इंसानों से बहुत हद तक मिलता है. इन सुअरों के बच्चों पर भी कुपोषित बच्चों जैसा ही असर दिखा. यानी इनका विकास भी रुक गया.

पेट के बैक्टीरिया का विकास और बीमारी से लड़ाई का सीधा ताल्लुक़ स्थापित हो चुका है. लेकिन अभी इस दिशा में और भी काम किया जाना बाक़ी है. प्रीडिस कहते हैं कि अभी हमें ये समझना है कि बच्चे कुपोषण के दुष्चक्र में फंसते कैसे हैं.

वहीं जेफरी गॉर्डन और उनकी टीम बांग्लादेश और मलावी के कुपोषित बच्चों को अच्छे खाने के साथ अच्छे बैक्टीरिया की डोज़ भी दे रही है, ताकि उनका सही विकास हो सके. सदियों से माएं जिस खाने को बच्चे के लिए सेहतमंद मानती हैं, वो खाना इन बच्चों को खिलाया जा रहा है और उनके शरीर के विकास की निगरानी की जा रही है.

जेफरी गॉर्डन ने अपनी रिसर्च के नतीजे दुनिया के तमाम डॉक्टरों से साझा किए हैं, ताकि उनकी राय ले सकें. वो अभी ये नहीं बताते कि बाक़ी डॉक्टरों की क्या राय है. बस इतना कहते हैं कि जो प्रतिक्रियाएं आई हैं वो हौसला बढ़ाने वाली हैं.

गॉर्डन का इस सावधानी बरतने को समझने की ज़रूरत है. इंसान को इंसान के शरीर की बनावट समझने में हज़ारों साल लग गए. अब धीरे-धीरे वो इन नए अंगों यानी शरीर के बैक्टीरिया का अध्ययन कर रहा है. उनके बारे में अपनी समझ बढ़ा रहा है. लेकिन, जो़ रिसर्च गॉर्डन और प्रीडिस कर रहे हैं, वो करोड़ों कुपोषित बच्चों के सामान्य जीवन जीने के लिए बहुत बड़ी उम्मीद है.

(नोटः ये डेविड रॉबसन की मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं)

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिककरें, जोबीबीसीपर उपलब्ध है.)

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