भारत में मुसलमानों की आबादी के बारे में दावों का सच क्या है?

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- Author, श्रुति मेनन और शादाब नज़्मी
- पदनाम, बीबीसी रियलिटी चेक
भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारत में मुसलमानों की स्थिति को लेकर कई दावे किए हैं.
अमेरिका की यात्रा के दौरान निर्मला सीतारमण ने उन दावों को ख़ारिज किया जिनमें कहा गया था कि भारत में बीजेपी के शासन के दौरान मुसलमानों के हालात ख़राब हुए हैं.
बीबीसी ने उनकी कुछ टिप्पणियों पर नज़र डाली
'भारत में मुसलमानों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है'
इस दावे को लेकर पुख़्ता तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है क्योंकि भारत की जनगणना के आंकड़े ताज़ा नहीं हैं.

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अमेरिका की शोध संस्था प्यू रिसर्च के 2020 के अनुमान के मुताबिक भारत में मुसलमानों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है. पहले नंबर पर इंडोनेशिया और तीसरे पर पाकिस्तान है.
हालांकि, प्यू रिसर्च के अनुमान भारत और पाकिस्तान की पिछली जनगणनाओं के आधार पर हैं. भारत में 2011 और पाकिस्तान में 2017 में जनगणना हुई थी.
वहीं, पाकिस्तान की जनगणना के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर विश्लेषकों ने सवाल उठाए हैं.


पाकिस्तान की 2017 की जनगणना में कुछ प्रांतों और शहरों (सिंध, कराची, बलूचिस्तान) में गिनती करने में दिक्कतें रिपोर्ट की गईं थीं.
प्यू रिसर्च में धार्मिक मामलों के एसोसिएट डायरेक्टर कोनार्ड हेकेट कहते हैं, "पाकिस्तान के आंकड़ों को लेकर कुछ अनिश्चितता है. ऐसा संभव है कि अब पाकिस्तान में भारत की तुलना में मुसलमानों की संख्या कुछ अधिक हो."
'...और भारत में मुसलमानों की आबादी बढ़ रही है'
निर्मला सीतारमण का ये कथन सही है कि भारत में मुसलमानों की संख्या बढ़ रही है. लेकिन भारत की समूची जनसंख्या बढ़ रही है जिसमें दूसरे धर्म भी शामिल है.
लेकिन अगर आप बीते कुछ दशकों में भारत में मुसलमानों की आबादी की वृद्धि के आंकड़े देखेंगे तो पाएंगे कि 1991 के बाद से भारत की जनसंख्या में मुसलमानों की वृद्धि दर कम हुई है. आम आबादी की वृद्धि दर भी 1991 के बाद कम हुई है.
2019 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार प्रमुख धार्मिक समूहों में मुस्लिम आबादी की प्रजनन दर सबसे अधिक है, जो कि बच्चे पैदा करने वाली उम्र की प्रति महिला बच्चे जनने की औसत संख्या है.
लेकिन डाटा के मुताबिक बीते दो दशकों में इस दर में भारी गिरावट आई है.
वास्तव में, प्रति महिला जन्मदर की गिरावट मुसलमानों में हिंदुओं के मुक़ाबले अधिक है. ये 1992 में 4.4 जन्म थी जो 2019 में गिरकर 2.4 हो गई.
पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की संघामित्रा सिंह कहती हैं कि जन्म दर में बदलाव के पीछे आर्थिक और सामाजिक कारण होते हैं और इसका धर्म से संबंध नहीं हैं.
वो कहती हैं, "जन्म दर में गिरावट शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुंच का नतीजा है."

इसके बावजूद कुछ हिंदू समूह और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि के बारे में भ्रामक दावे करते रहते हैं, कुछ मामलों में तो वो हिंदुओं को अधिक बच्चे पैदा करने की सलाह भी देते हैं.
विशेषज्ञ इस विचार को ख़ारिज कर चुके हैं कि भारत में एक दिन मुसलमानों की आबादी हिंदुओं से अधिक होगी. भारत में अभी हिंदुओं की आबादी 80 प्रतिशत है.
दरअसल, परिवार कल्याण कार्यक्रम की समीक्षा करने वाली राष्ट्रीय समिति के पूर्व अध्यक्ष देवेंद्र कोठारी ने भविष्य के एक अलग परिदृश्य की भविष्यवाणी की है.
वो कहते हैं कि प्रजनन दर में दर्ज की गई गिरावट के आधार पर अगली जनगणना में हिंदू आबादी का अनुपात मुसलमानों की आबादी की तुलना में अधिक बढ़ा होगा.
'अगर ये धारणा है या वास्तविकता कि उनका जीवन मुश्किल है…तो क्या मुसलमानों की आबादी जो 1947 में थी उसकी तुलना में बढ़ रही होती?'
यहां निर्मला सीतरमण ने अल्पसंख्यक मुसलमानों के ख़िलाफ़ बढ़ती नफ़रत से जुड़ी ख़बरों के संदर्भ में कहा कि अगर ऐसा होता तो भारत में मुसलमानों की आबादी बढ़ नहीं रही होती.
उन्होंने ये भी कहा कि भारत के मुसलमान कारोबार कर सकते हैं, अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सकते हैं और सरकार से उन्हें मदद भी मिलती है.
मुसलमानों समेत अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर किए जा रहे हमले बढ़ रहे हैं और मानवाधिकार समूहों ने इन्हें दर्ज किया है.
2023 में जारी रिपोर्ट में ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि भाजपा सरकार ने 'धार्मिक अल्पसंख्यकों, ख़ासकर मुसलमानों के साथ व्यवस्थित भेदभाव करना जारी रखा है.'
धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ अपराधों का आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है लेकिन स्वतंत्र शोध और संस्थानों ने नफ़रत की हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की है.
'पाकिस्तान में सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों की संख्या घट रही है और वो ख़त्म हो रहे हैं'
निर्मला सीतारमण ने मुस्लिम बहुल पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा का संदर्भ देते हुए कहा कि इसकी वजह से ग़ैर-मुसलमानों की संख्या गिर रही है.
पाकिस्तान एक मुसलमान बहुल देश है. 2017 के आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तान में 2.14 प्रतिशत हिंदू हैं, ईसाई 1.7 प्रतिशत है और अहमदिया 0.09 प्रतिशत हैं.

ये भी सच है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ हिंसा हुई है और वो प्रताड़ना का शिकार हैं.
2020 की ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के मुताबिक अहमदिया मुसलमानों के ख़िलाफ़ बड़े हमले हुए हैं. पाकिस्तान के सख़्त ईशनिंदा क़ानूनों और अहमदिया मुसलमानों के ख़िलाफ़ बने क़ानूनों के तहत भी अहमदिया प्रताड़ित हैं.
हिंदुओं और ईसाइयों पर भी ईशनिंदा के आरोप लगते हैं और उन पर हमले होते हैं.
पाकिस्तान के मानवाधिकार संगठन सेंटर फॉर सोशल जस्टिस के मुताबिक 1987 और फ़रवरी 2021 के बीच पाकिस्तान में 1855 लोगों के ख़िलाफ़ ईशनिंदा क़ानूनों के तहत मामले दर्ज हुए.
लेकिन ऐसे ताज़ा आंकड़े नहीं है जिनके आधार पर ये कहा जा सके कि अल्पसंख्यकों की संख्या गिरी है या उन्हें वहां 'समाप्त कर दिया गया है', जैसा कि सीतारमण ने दावा किया है.
हमने इससे पहले बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदुओं की जनसंख्या में गिरावट पर बीजेपी के दावों को लेकर आंकड़े जुटाए थे और ये पता चला था कि जो आंकड़े पेश किए गए थे वो भ्रामक थे क्योंकि उनमें उन अल्पसंख्यकों की संख्या को शामिल किया गया था जो तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में थे जो अब बांग्लादेश है


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