भारत को मुसलमान शासकों का ग़ुलाम बताना आख़िर कितना सही है?

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    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 सितंबर को व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से मुलाक़ात में कहा कि वे भारत में बाइडन सरनेम से जुड़े कुछ दस्तावेज़ लेकर आए हैं.

इस पर राष्ट्रपति बाइडन ने हँसते हुए पूछा कि क्या हम रिश्तेदार हैं? जवाब में पीएम मोदी ने हँसते हुए कहा, "हाँ."

दोनों नेताओं की इस मुलाक़ात की ख़बर को ट्वीट करते हुए पाकिस्तान के नामी-गिरामी पत्रकार हामिद मीर ने लिखा, ''यह अच्छा है कि नरेंद्र मोदी ने बाइडन को उनके पारिवारिक संबंधों का दस्तावेज़ सौंपा. भारतीय प्रधानमंत्री भारत में रहने वाले मुसलमानों के अरब शासकों के साथ पारिवारिक संबंध भी खोज सकते हैं और उन पर भी गर्व कर सकते हैं.''

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ऐसा ही एक और वाक़या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से जुड़ा है. फ़रवरी, 2020 में तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन पाकिस्तान के दौरे पर गए तो साझा प्रेस कॉन्फ़्रेंस में इमरान ने बड़े गर्व से कहा कि "तुर्कों ने हिन्दुस्तान पर 600 सालों तक शासन किया."

इमरान ख़ान ने कहा, ''आपके आने से हम सबको इसलिए भी ख़ुशी हुई क्योंकि हमारी कौम समझती है कि तुर्की से हमारे रिश्ते सदियों से हैं. तुर्कों ने तो 600 साल तक हिन्दुस्तान पर हुकूमत की थी.''

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राष्ट्रपति बाइडन ने भारत में बाइडन सरनेम के बारे में कहा, ''उन्हें पता चला था कि ईस्ट इंडिया टी कंपनी में जॉर्ज बाइडन नाम के एक व्यक्ति कैप्टन थे.'' बाइडन उसी ईस्ट इंडिया कपंनी की बात कर रहे हैं, जिसने भारत को गुलाम बनाया था.

दूसरी तरफ़, इमरान ख़ान ने मध्यकाल के मुस्लिम शासकों को तुर्क कहते हुए, गर्व से कहा कि उन्होंने हुकूमत की थी और इसलिए उनकी कौम को ख़ुशी मिलती है.

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झूठे गर्व और अपनापन

पाकिस्तान के इतिहासकार मुबारक अली ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि गोरों के प्रति भारत के नेताओं का इस तरह अपनापन दिखाना और मध्यकालीन मुस्लिम शासकों के प्रति पाकिस्तानियों और मुसलमानों के एक तबके में दिखने वाली गर्व की भावना, परेशान करने वाली बात है.

मुबारक अली कहते हैं, ''जब कोई मुसलमान कहेगा कि हमने हिन्दुस्तान पर एक हज़ार सालों तक राज किया तो हिन्दू यही सोचेगा कि मुसलमान ख़ुद को यहाँ का नहीं मानते हैं. इसी ओढ़े हुए गर्व के कारण हिन्दुओं के लिए मुसलमानों को बाहरी कहना और आसान हो जाता है.''

''मुसलमानों को सोचना चाहिए कि मध्यकालीन भारत में जो मुस्लिम शासन था वो आम मुसलमानों का शासन नहीं था. वो एक सत्ता वर्ग था. आप जब कहते हैं कि मुसलमानों ने सैकड़ों सालों तक तुम पर राज किया तो इसका यही भाव होता है कि हिन्दुओं को दबाकर रखा गया.''

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मुबारक अली कहते हैं, ''जिन अंग्रेज़ों ने हम पर बेइंतहा जुल्म किया, उनमें भी अब ये गर्व का भाव नहीं है जबकि मुस्लिम शासक तो भारत को अपना चुके थे. यहीं की मिट्टी को अपनी मिट्टी माना. उन मुस्लिम शासकों को लेकर मज़हबी मुसलमानों का ये गर्व भाव हिन्दुओं को चिढ़ाने वाला होता है. पाकिस्तान के स्कूलों में जो किताबें पढ़ाई जा रही हैं, उन्हें पढ़ें तो यही लगता है कि सारे मुस्लिम शासक बहादुर थे और हिन्दू उनके सामने आत्मसमर्पण करते गए, जबकि ये सच नहीं है.''

मुबारक अली कहते हैं, ''पाकिस्तान की किताबें हिन्दुओं और भारत के प्रति नफ़रत ही पैदा करती हैं. यहाँ के शासक वर्ग को लगता है कि मध्यकाल के मुस्लिम शासक उनके अपने थे और उन्होंने हिन्दुओं को सीधा करके रखा. यहाँ की मिसाइलों और हथियारों का नाम देखिए- ग़ज़नी, गोरी, ग़ज़नवी. ये मानसिकता राइट विंग हिन्दू राजनीति के लिए ऊर्जा का काम करती है और इससे भारत में रहने वाले मुसलमानों का जीना दूभर होता है.''

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भारत 1200 सालों तक ग़ुलाम?

नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार 11 जून, 2014 को लोकसभा में बोल रहे थे. अपने पहले ही भाषण में मोदी ने कहा था, ''12 सौ सालों की ग़ुलामी की मानसिकता परेशान कर रही है. बहुत बार हमसे थोड़ा ऊंचा व्यक्ति मिले, तो सर ऊंचा करके बात करने की हमारी ताक़त नहीं होती है.''

प्रधानमंत्री की इस बात ने कई सवाल एक साथ खड़े किए. क्या भारत 1200 सालों तक ग़ुलाम था? क्या भारत ब्रिटिश शासन के पहले भी ग़ुलाम था?

पीएम मोदी ने जब 1200 साल की ग़ुलामी की बात कही तो उन्होंने आठवीं सदी में सिंध के हिंदू राजा पर हुए मीर क़ासिम के हमले (सन 712) से लेकर 1947 तक के भारत को गुलाम बताया. भारत में अंग्रेज़ों का शासनकाल मोटे तौर पर 1757 से 1947 तक माना जाता है, जो 190 साल है. इस हिसाब से गुलामी के बाकी तकरीबन एक हज़ार साल भारत ने मुस्लिम शासकों के अधीन गुज़ारे.

भारत कितने सालों तक ग़ुलाम था? इस सवाल का जवाब आम भारतीय क्या देगा?

भारत में स्कूली किताबों के मुताबिक, 1757 में पलासी के युद्ध में बंगाल के नवाब के ख़िलाफ़ अंग्रेज़ों की जीत के बाद से भारत को ग़ुलाम माना जाता है, लेकिन अब भारत में इतिहास बदलने की बात हो रही है और कहा जा रहा है कि मध्यकाल में मुस्लिम शासक आक्रांता थे और उन्होंने भारत को ग़ुलाम बनाकर रखा था.

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क्या भारत वाक़ई मुसलमान शासकों का ग़ुलाम था?

भारत में मध्यकाल के जाने-माने इतिहासकार इरफ़ान हबीब कहते हैं, ''मध्यकाल की अलग-अलग व्याख्याएँ हैं. 19वीं सदी में सांप्रदायिक इतिहास लेखन की शुरुआत हुई. ऐसा अंग्रेज़ों ने तो किया ही, हिन्दुओं और मुसलमानों ने भी किया. भारतीय इतिहास को धर्म के आधार पर बाँटना कोई नई बात नहीं है. आज़ादी की लड़ाई से जुड़े लोग कहते रहे कि भारत ब्रितानी शासन का ग़ुलाम था, तो दूसरी ओर हिन्दुत्ववादी कहते हैं कि भारत में विदेशी शासन 13वीं सदी या उससे भी पहले से था."

हबीब कहते हैं, "इश्तियाक़ हुसैन क़ुरैशी जैसे मुस्लिम इतिहासकार मध्यकाल को मुस्लिम शासन का दौर कहते हैं. यहाँ तक कि मुस्लिम लीग के लोग भी कहते हैं कि उन्होंने पूरे भारत पर शासन किया. इतिहास की ऐसी व्याख्या दोनों तरफ़ से है और सच्चे राष्ट्रवादी इस व्याख्या को ख़ारिज करते हैं.''

इरफ़ान हबीब कहते हैं, ''मध्यकाल के कई शासकों का जन्म विदेशों में हुआ था लेकिन उन्होंने ख़ुद को भारतीय रंग में ढाल लिया था. आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों का तर्क है कि ब्रिटिश शासन उनसे पहले के मुसलमान राजाओं के दौर से बिल्कुल अलग था क्योंकि अंग्रेज़ भारत की संपत्ति बाहर ले जा रहे थे लेकिन मुसलमान बादशाहों ने भारत की संपत्ति भारत में ही रखी.''

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''ये बात आपको आरसी दत्त और दादाभाई नैरोजी के लेखन में भी मिलेगी. यहीं बस जाने वाले और दौलत अपने देश ले जाने वाले लोगों के बीच के अंतर को दोनों तरफ़ के सांप्रदायिक लोग अक्सर भूल जाते हैं.''

इरफ़ान हबीब कहते हैं, ''आरसी मजूमदार जैसे इतिहासकार भारत में मुस्लिम शासन को अत्याचारी मानते हैं लेकिन वे भी अपनी बात तथ्यों के आधार पर ही करते हैं. आरसी मजूमदार को भी इसलिए गंभीर इतिहासकार माना जाता है क्योंकि उन्होंने जो कुछ भी कहा, वे तथ्यों पर आधारित था. इन तथ्यों को बाकी इतिहासकार भी स्वीकार करते हैं. लेकिन आप जो तथ्य चुनते हैं, उनके अलावा भी कई तथ्य होते हैं. लेकिन आरएसएस ने 1950 के दशक से जो इतिहास बताना शुरू किया, वो बिल्कुल अलग है.''

''वे ऐतिहासिक तथ्यों की बात नहीं करते हैं. उनके लिए इतिहास ये नहीं है कि क्या हुआ था, उनका इतिहास ये है कि क्या होना चाहिए था. भारतीय राजनीति में आने वाले वक़्त में ये सब और देखने को मिलेगा. हमने पाकिस्तान में ऐसा देखा है. पाकिस्तान में तक्षशिला और मोहनजोदाड़ो को इतिहास से बाहर कर दिया गया है.''

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भारतीय इतिहास के तीन कालखंड

भारतीय इतिहास को प्राचीन भारत, मध्यकालीन भारत और आधुनिक भारत में बांटा जाता है. गुप्त काल के बाद प्राचीन भारत का अंत और मध्यकालीन भारत की शुरुआत होती है.

प्राचीन भारत में ही हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्मों का उदय हुआ. मध्यकाल में भी मुग़ल काल यानी 1526 से लेकर औरंगज़ेब की मौत (1707) तक सबसे अहम है.

औरंगज़ेब का लगभग पूरे भारत पर शासन हो गया था. औरंगज़ेब के बाद मुग़ल शासन पतन की ओर बढ़ा. 1857 में मुग़ल वंश के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र को अंग्रेज़ों ने बर्मा निर्वासित कर दिया.

बहादुर शाह ज़फ़र के बाद पूरा भारत अंग्रेज़ों के शासन के अधीन आ गया और इसे आधुनिक काल कहा जाता है. कई इतिहासकार इस ब्रिटिश काल को आधुनिक काल कहने पर सवाल खड़े करते हैं. इरफ़ान हबीब के ही हमनाम एक और इतिहासकार इरफ़ान हबीब कहते हैं कि "जो ब्रिटिश शासन जुल्मों से भरा है, उसे आधुनिक काल कहना पूरी तरह से हास्यास्पद है."

मध्यकालीन भारत के जाने-माने इतिहासकार प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया कहते हैं, "ब्रिटिश लेखक जेम्स मिल ने अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया' में पहली बार भारतीय इतिहास को सांप्रदायिक बनाने की कोशिश की और ये प्रवृत्ति विभाजनकारी शक्तियों को रास आई. जेम्स मिल ने प्राचीन भारत को हिन्दू शासन, मध्यकाल को मुस्लिम और अपने अत्याचारी शासन को आधुनिक भारत कहा."

योगी

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अल्लामा इक़बाल बनाम सावरकर

मुसलमानों को विदेशी और मुस्लिम शासकों को औपनिवेशिक ताक़त बताने का विवाद कोई नया नहीं है. मुखिया और हबीब जैसे इतिहासकार बताते हैं कि इसकी शुरुआत अंग्रेज़ों ने ही कर दी थी और इस नैरेटिव को हिन्दू-मुसलमान दोनों पक्षों के उन लोगों ने लपका जिनको अपनी सांप्रदायिकता पर आधारित राजनीति चलाने के लिए मसाला चाहिए था.

यह तो ऐतिहासिक तथ्य है कि जब अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ाद होने की लड़ाई अपने चरम पर थी उस वक़्त अल्लामा इक़बाल मुस्लिम राष्ट्र और सावरकर हिन्दुत्व की बात कर रहे थे.

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर हेरंब चतुर्वेदी कहते हैं कि जब प्रधानमंत्री संसद में कहते हैं कि भारत 1200 सालों तक ग़ुलाम रहा तो उनका निशाना देश का मुसलमान होता है. प्रोफ़ेसर चतुर्वेदी कहते हैं, ''प्रधानमंत्री कहना चाहते हैं कि मुसलमान बाहरी हैं और उनकी निष्ठा पर शक किया जा सकता है.''

लेकिन आज़ादी से पहले ही ये विवाद छिड़ चुका था. प्रधानमंत्री मोदी ऐसी बात करने वाले कोई पहले व्यक्ति नहीं हैं. आज़ादी के बाद भी कई ऐसे क़दम उठाए गए, जिनसे यही संदेश गया कि मुग़ल भी औपनिवेशक ताक़त थे.

भारत ने सड़कों और शहरों का नाम बदलना शुरू किया. इसकी शुरुआत ब्रिटिश शासन में दिए गए नामों में बदलाव से हुई. मसलन, बॉम्बे को मुंबई, कैलकटा को कोलकाता, त्रिवेंद्रम को तिरुअनंतपुरम और मद्रास को चेन्नई किया गया.

सावरकर

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इसके बाद मुग़ल शासकों के दिए नाम बदले जाने लगे. 1583 में जिस इलाहाबाद शहर की स्थापना अकबर ने की थी, उसका नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया गया. यह बदलाव 2018 में एक चुनी हुई सरकार ने किया. इस बदलाव से यह संदेश गया कि मुग़ल भी अंग्रेज़ों की तरह औपनिवेशिक ताक़त थे.

लेकिन इस तरह के बदलाव केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान में भी किए गए हैं. पाकिस्तान में भी इसी तरह से हिंदू, सिख और बंगाली पहचान मिटाने का अभियान चला.

पाकिस्तान की किताबों और दस्तावेज़ों से पूर्वी पाकिस्तान को मिटा दिया गया है. कुछ ही पाकिस्तानी इस बात को याद करते हैं कि 1971 में हिंसा का चक्र चलने के बाद बांग्लादेश का जन्म हुआ.

कोलंबिया यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर मनान अहमद आसिफ़ ने अपनी किताब 'द लॉस ऑफ हिन्दुस्तान' में बताया है कि कैसे हिन्दुस्तान, इंडिया में तब्दील हुआ और बहुसंख्यकवाद का ज़ोर बढ़ता चला गया. इसे समझाने के लिए आसिफ़ एक मिसाल देते हैं.

हरदयाल नाम के एक युवा क्रांतिकारी ने 1904 में लाहौर के फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज के सामने लोगों को इकट्ठा किया. इसमें अपने दोस्त और युवा कवि मोहम्मद इक़बाल को भी आमंत्रित किया.

इक़बाल तब एक सरकारी कॉलेज में पढ़ाते थे. इक़बाल ने उस बैठक में अपनी एक नई कविता सुनाई थी. वो कविता थी- सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा. इस कविता को बैठक में सभी लोगों ने बड़े जोश के साथ गाया.

उसी में से एक श्रोता ने उस कविता को सुनकर लिखा और उस दौर की अग्रणी उर्दू पत्रिका इत्तेहाद में भेज दिया. यह कविता 1904 में इस पत्रिका के अगस्त महीने के अंक में छपी.

पाकिस्तान

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बाद में इक़बाल की यह कविता 1924 में उनके पहले कविता संग्रह में छपी. इक़बाल उस मुहिम के हिस्से थे, जिसमें हिन्दुस्तान को सबके लिए बताया जा रहा था. उनकी इस कविता में गंगा, हिमालय का ज़िक्र है, जो हिन्दू मान्यताओं में काफ़ी मायने रखते हैं.

इक़बाल की कविता इस बात की पुष्टि कर रही थी कि लोग पहले हिन्दुस्तानी हैं, उसके बाद कोई हिन्दू या मुसलमान है. इक़बाल की कल्पना में वो हिन्दुस्तान था जो सैकड़ों सालों से अस्तित्व में था. इक़बाल की कविता इतनी लोकप्रिय हुई कि वो जनकविता में तब्दील हो गई.

कांग्रेस के अधिवेशनों के उद्घाटन समारोह में यह कविता गाई जाने लगी. आज़ादी की लड़ाई में यह कविता लोगों की जुबान पर चढ़ गई. यहाँ तक कि महात्मा गाँधी को भी काफ़ी पसंद आई थी.

20वीं सदी के पहले दशक में आइडिया ऑफ हिन्दुस्तान को लेकर इक़बाल के रुख़ में भी अहम बदलाव हुए. इक़बाल के कविता संग्रह में 'तराना-ए-मिल्ली' शीर्षक से एक कविता शामिल हुई. इक़बाल ने इस कविता में मुस्लिम राष्ट्र की बात की.

उन्होंने स्थानीय और वैश्विक दोनों स्तर पर मुस्लिम समुदाय की बात की. 'तराना-ए-मिल्ली' कविता में एक पंक्ति है- चीन ओ अरब हमारा, हिन्दुस्तां हमारा, मुस्लिम हैं हम, सारा जहां हमारा.

1930 आते-आते इक़बाल के विचार में और तब्दीली आई. उन्होंने ऑल इंडिया मुस्लिम लीग में अध्यक्षीय भाषण दिया. इस संबोधन में उन्होंने भारत के भीतर मुस्लिम भारत की बात की. उन्होंने भारत को "दुनिया का सबसे महान मुस्लिम देश" कहा.

ताजमहल

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इक़बाल ने अपने भाषण में कहा था, ''भारत में इस्लाम की सांस्कृतिक शक्ति किसी ख़ास क्षेत्र में मुसलमानों के केंद्रीकरण पर निर्भर करेगी. यह केंद्रीकरण उन इलाक़ों में होना चाहिए, जहाँ मुसलमान ज़्यादा तादाद में हैं. मुसलमान ब्रिटिश सेना और पुलिस में भी हैं, जिनकी बदौलत यहाँ अंग्रेज़ शासन कर रहे हैं. अगर किसी ख़ास क्षेत्र में मुसलमानों का केंद्रीकरण होता है तो इससे भारत और एशिया की समस्या का समाधान हो सकता है.''

इक़बाल मुसलमानों के वैश्विक समुदाय की वकालत करने लगे थे. 1947 में भारत का विभाजन हुआ और इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान बना. विभाजन के ठीक बाद दोनों मुल्कों में जंग हुई.

आगे चलकर 1970 के दशक में पाकिस्तान के सैन्य शासक ज़िया-उल-हक़ ने अल्लामा इक़बाल को पाकिस्तान के 'नेशनल फिलॉस्फर' की उपाधि दी. इक़बाल की मौत 1938 में हो गई और वे इस्लामी राष्ट्र देखने का सपना दिल में लिए गुज़र गए.

मध्यकाल के जाने-माने इतिहासकार प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया कहते हैं कि अल्लामा इक़बाल जर्मनी जाने के बाद पूरी तरह से बदल चुके थे. मुखिया कहते हैं, ''इक़बाल जब जर्मनी में दर्शन की पढ़ाई करने गए तो वहाँ के राष्ट्रवाद के प्रभाव में उनके मन में इस्लामिक राष्ट्रवाद का विचार आया. जर्मनी जाने के बाद इक़बाल पूरी तरह से बदल चुके थे और 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा' वाला विचार बहुत पीछे छोड़ चुके थे.''

मुबारक अली भी मानते हैं कि अल्लामा इक़बाल यूरोप जाने के बाद रूढ़िवादी मुसलमान हो गए थे.

लाल क़िला

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मुसलमानों की निष्ठा पर शक

लेकिन अल्लामा इक़बाल से ज़्यादा साफ़ शब्दों में विनायक दामोदर सावरकर हिन्दू राष्ट्र की बात कर रहे थे. सावरकर खुलकर बता रहे थे कि "भारत के साथ एकनिष्ठ प्रेम केवल हिन्दुओं का ही हो सकता है".

भारत में सावरकर हिन्दू श्रेष्ठता और हिन्दुत्व की राजनीति के झंडाबरदार रहे हैं. दरअसल, हिंदुत्व शब्द का पहली बार इस्तेमाल उन्होंने ही किया था.

सावरकर को लंदन में राजद्रोह के मामले में गिरफ़्तार किया गया था और उन्हें 1911 में आजीवान क़ैद के तहत अंडमान की जेल में बंद कर दिया गया था. 1924 में अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ राजनीति न करने का वादा करते हुए माफ़ीनामा देने पर रिहा हुए सावरकर 1937 तक महाराष्ट्र के रत्नागिरी में रहे. महात्मा गाँधी की हत्या के मामले में सावरकर को भी सह-अभियुक्त बनाया गया था, लेकिन उन्हें "सबूतों के अभाव में" बरी कर दिया गया था.

गाँधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे भी सावरकर की हिंदुत्व की विचारधारा से ही प्रेरित थे.

सावरकर का 'भारत का सपना' एक गौरवशाली हिंदू राष्ट्र का सपना था. 1908 में सावरकर ने मराठी में एक कविता लिखी थी. यह कविता थी- अमुचे प्रियकर हिन्दुस्थान (हमारा प्यारा हिन्दुस्थान).

सावरकर ने यह कविता लंदन में ही लिखी थी. देखने में तो ऐसा ही लगता है कि सावरकर भी हिन्दुस्तान को अल्लामा इक़बाल की तरह बाक़ी के सभी मुल्कों से अच्छा बता रहे थे. उन्होंने भी अपनी कविता में हिमालय और गंगा का ज़िक्र किया है. लेकिन सावरकर ने अपनी कविता में मुसलमानों और ब्रितानियों दोनों को बाहरी औपनिवेशिक शक्ति बताया है.

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सावकर ने अपनी कविता में पहली सदी में विक्रमादित्य से हार का सामना करने वाले ग्रीकों के लिए म्लेच्छ शब्द का इस्तेमाल किया है. म्लेच्छ शब्द का प्रयोग अशुद्ध और गंदे के पर्याय के तौर पर किया जाता था. बाद में मुसलमानों के प्रति घृणा जताने के लिए भी इस शब्द का इस्तेमाल होता रहा.

1923 में पहली बार सावरकर का लेख 'एसेन्शियल्स ऑफ हिंदुत्व' प्रकाशित हुआ. सावरकर ने इस लेख में अपने उस विचार को विस्तार दिया कि मुसलमान बाहरी आक्रांता थे. इस लेख में सावरकर ने पहली बार हिन्दुत्व शब्द का इस्तेमाल किया.

इसमें उन्होंने 'हिन्दुस्थान' की परिकल्पना की. सावरकर ने 'हिन्दुस्तान' के बदले 'हिन्दुस्थान' की वकालत की. सावरकर ने हिन्दू के साथ संस्कृत का स्थान जोड़ा, न कि फ़ारसी का स्तान. सावरकर इस बात से असहमत थे कि हिन्दुस्तान नाम विदेशियों ने दिया था.

सावरकर ने अपनी किताब 'हिन्दुत्व: हू इज अ हिन्दू' में लिखा है, ''जब मोहम्मद का जन्म नहीं हुआ था और अरब के लोगों के बारे में दुनिया नहीं जानती थी; उसके बहुत पहले से ही इस प्राचीन देश को बाहर के लोग हिन्दू या सिंधु के तौर पर जानते थे. अरब के लोगों ने यह नाम नहीं दिया है.''

इसी किताब में सावरकर ने कहा है, ''हिन्दुस्थान का मतलब हिन्दुओं की भूमि से है. हिन्दुत्व के लिए भौगोलिक एकता बहुत ज़रूरी है. एक हिन्दू प्राथमिक रूप से यहाँ का नागरिक है या अपने पूर्वजों के कारण 'हिन्दुस्थान' का नागरिक है.''

सावरकर हिन्दुत्व को पारिभाषित करने से पहले 'हिन्दुस्थान' को पारिभाषित करते हैं. इसकी शुरुआत भौगोलिक रूप से करते हैं. वो क्षेत्रीय अखंडता के बाद धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दे पर बात करते हैं.

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सावरकर पाँच हज़ार साल पुराने हिन्दुस्थान की बात करते हैं और बताते हैं कि जब तक गज़नी ने हमला नहीं किया तब तक यहाँ 'सौंदर्य के साथ शांति' बनी रही. सावरकर बताते हैं कि साल दर साल, दशक दर दशक और सदी दर सदी मुस्लिम आक्रांताओं और हिन्दू प्रतिरोध के बीच संघर्ष जारी रहा.

सावरकर कहते हैं कि इन्हीं हमलों और उनके प्रतिरोध से हिन्दुत्व का जन्म हुआ है. सावरकर कहते हैं कि मुस्लिम शासकों से जो संघर्ष रहा, उसी से हिन्दू राष्ट्र परिभाषित होता है.

मुसलमानों को सावरकर हमेशा बाहरी ही मानते रहे. सावरकर ने 'हिन्दुत्व: हू इज अ हिन्दू' में लिखा है, ''हमारे मुसलमानों या ईसाइयों के कुछ मामलों में, जिन्हें जबरन ग़ैर-हिन्दू धर्म में धर्मांतरित किया गया, उनकी पितृभूमि भी यही है और संस्कृति का बड़ा हिस्सा भी एक जैसा ही है लेकिन फिर भी उन्हें हिन्दू नहीं माना जा सकता. हालाँकि हिन्दुओं की तरह हिन्दुस्थान उनकी भी पितृभूमि है, लेकिन पुण्यभूमि नहीं है. उनकी पुण्यभूमि सुदूर अरब है. उनकी मान्यताएं, उनके धर्मगुरु, विचार और नायक इस मिट्टी की उपज नहीं हैं. ऐसे में उनके नाम और दृष्टिकोण मूल रूप से विदेशी हैं. उनका प्यार बँटा हुआ है.''

ऑडियो कैप्शन, दारा शुकोह का दर्दनाक अंत

सावरकर के इस तर्क पर इतिहासकार इरफ़ान हबीब (2) कहते हैं कि भगत सिंह तो नास्तिक थे और उनकी कहीं कोई पुण्यभूमि ही नहीं थी. इरफ़ान हबीब कहते हैं, ''राष्ट्रवाद और धर्म का घालमेल नहीं किया जा सकता है. धर्म बिल्कुल अलग चीज़ है. धर्म से किसी का राष्ट्रवाद प्रभावित नहीं होता है.''

मुसलमानों को लेकर यह केवल सावरकर की ही राय नहीं थी बल्कि ब्रिटिश शासन के प्रशंसक रहे सर जदुनाथ सरकार ने भी कुछ ऐसा ही कहा था.

हरबंस मुखिया कहते हैं कि जदुनाथ सरकार ने मुग़ल काल पर जो भी लिखा है, वो अब बीजेपी के खांचे में बिल्कुल फिट बैठता है.

जदुनाथ सरकार ने मद्रास में 1928 में एक लेक्चर दिया था, वो भाषण 'इंडिया थ्रू द एज' शीर्षक से छपा था. इसमें जदुनाथ सरकार ने मुस्लिम शासन को विदेशी और सांस्कृतिक रूप से भिन्न शासन कहा था.

सरकार ने अपने भाषण में कहा था, ''भारत पर मुस्लिमों की जीत पहले के हमलों से एक मामले में बिल्कुल अलग थी. भारत के लोगों के लिए मुसलमान बिल्कुल अलग थे और यहाँ के लोग उन्हें कभी अपना नहीं पाए. हिन्दू और मुसलमान; और आगे चलकर हिन्दू-ईसाई भी एक साथ रहते हुए भी एक-दूसरे में घुल-मिल नहीं सके. मुसलमान आज भी अपना चेहरा मक्का की ओर करके नमाज़ अदा करते हैं.''

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सरकार ने 'इंडिया थ्रू द एज' में लिखा है कि 1200 से 1580 तक (अकबर के शासन से पहले) मुस्लिम शासक भारत की ज़मीन पर किसी सैन्य कैम्प की तरह रहे.

प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया और प्रोफ़ेसर हेरंब चतुर्वेदी सर जदुनाथ सरकार की इस बात को अतार्किक बताते हैं. हरबंस मुखिया कहते हैं, ''बाबर और हुमायूं मध्य एशिया से आए थे. अकबर का जन्म तो उमरकोट में एक राजपूत राजा के घर में हुआ था. अकबर हिन्दुस्तान से बाहर कभी नहीं गए. अकबर के बाद जितने मुग़ल शासक हुए सबका जन्म हिन्दुस्तान में ही हुआ. इन्होंने तो हिन्दुस्तान के बाहर क़दम तक नहीं रखा.''

हेरंब चतुर्वेदी कहते हैं कि भक्ति और सूफ़ी आंदोलन की वजह से मज़हब की दीवार ख़त्म हो गई थी. मुसलमान कवि कृष्ण-भक्ति की कविताएँ लिख रहे थे और राजपूत घरों में मुसलमानों की शादियां हो रही थीं. हेरंब चतुर्वेदी कहते हैं कि इससे ज़्यादा घुलना-मिलना क्या होता है?

महाराणा प्रताप

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मुस्लिम शासकों ने हिन्दुओं पर अत्याचार किया था?

मध्यकाल के मुस्लिम शासकों को कई लोग आक्रांता कहते हैं. इतिहास की अध्येता और जहाँगीर पर 'इंटिमेट पॉट्रेट ऑफ अ ग्रेट मुग़ल' किताब लिख चुकीं पार्वती शर्मा कहती हैं कि सत्ता के लिए एक दूसरे राज्य पर हमला करना कोई नई बात नहीं थी.

पार्वती कहती हैं, ''मौर्यों का शासन अफ़ग़ानिस्तान तक था, इस तरह तो वे भी आक्रांता हुए. सत्ता विस्तार और सत्ता पाने की चाहत को हम चाहे जिस रूप में देखें. इस चाहत का किसी ख़ास मज़हब से कोई रिश्ता नहीं है.''

मुस्लिम शासकों पर जब अत्याचार का आरोप लगता है तो सबसे पहले जज़िया कर की बात होती है. जज़िया को अकबर ने हटा दिया था और औरंगज़ेब ने 1679 में उसे दोबारा लगा दिया था. यह टैक्स था, जो ग़ैर-मुस्लिमों पर लगाया जाता था.

औरंगज़ेब के इस क़दम को उनकी धार्मिक कट्टरता के सबूत के तौर पर देखा जाता है. औरंगज़ेब का यह फ़ैसला राजपूतों और मराठों को भी असहज करने वाला था. कुछ इतिहासकारों का ये भी कहना है कि मुग़ल शासन को लेकर हिन्दुओं में बढ़ते विरोध की वजह से औरंगज़ेब ने जज़िया कर लगाया जो एक राजनीतिक कदम था.

इतिहासकार सतीश चंद्रा ने लिखा है कि जज़िया कर को फिर से लगाने के पीछे तब के राजनीतिक और आर्थिक पहलू भी अहम हैं. जज़िया कर फिर से लगाने के पीछे कई समकालीन इतिहासकारों ने अपनी-अपनी राय रखी है.

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सतीश चंद्र ने लिखा है, ''औरंगज़ेब के शासनकाल के आधिकारिक इतिहासकार माने जाने वाले मोहम्मद साक़ी मुस्तैद ख़ान के अनुसार, इस्लामिक शासकों को फरमान था कि वे इस्लामिक क़ानून का प्रसार करें और काफिरों के साथ उसी हिसाब से बर्ताव करें. इसी निर्देश के तहत औरंगज़ेब ने दीवानी अधिकारियों को आदेश जारी किया कि दो अप्रैल, 1679 से क़ुरान का पालन करते हुए काफ़िरों से जज़िया कर वसूला जाए.''

सतीश चंद्र ने लिखा है, ''इस सवाल का जवाब नहीं मिलता है कि शरिया का ज्ञान रखने वाले औरंगज़ेब ने सत्ता में आने के 22 साल बाद जज़िया क्यों लगाया? भारत आने वाले समकालीन यूरोपीय यात्री और कारोबारी कंपनियों के एजेंटों की जज़िया पर राय बिल्कुल ही अलग है.

सूरत में इंग्लिश फैक्ट्री के प्रमुख थॉमस रोल ने 1679 में लिखा कि "जज़िया केवल औरंगज़ेब के ख़ाली ख़ज़ाने को भरने के लिए ही नहीं लगाया गया था बल्कि ग़रीबों को मुसलमान बनने पर मजबूर करने के लिए भी लगाया गया था.''

लेकिन सतीश चंद्र इस बात से सहमत नहीं हैं कि औरंगज़ेब ने जज़िया टैक्स ग़रीब हिन्दुओं को मुसलमान बनने पर मजबूर करने के लिए लगाया था. वे कहते हैं, ''देश के बड़े हिस्सों में 400 सालों तक मुस्लिम शासन के बावजूद हिन्दू अपने धर्म में बने रहे. इस अवधि में ज़्यादातर शासकों ने जज़िया वसूला था. औरंगज़ेब को पता रहा होगा कि जज़िया को फिर से लगाने से कोई अलग नतीजा नहीं मिलेगा. मतलब कि ग़रीब हिन्दू मुसलमान नहीं बन जाएंगे.''

''ज़ाहिर है कि इस टैक्स के कारण ग़रीबों को परेशानी हुई लेकिन इसके कोई सबूत नहीं हैं कि जज़िया के कारण बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ. अगर ऐसा कुछ हुआ होता तो मुस्लिम शासकों के दरबारियों ने इसे बड़ी जीत के तौर पर देखा और दर्ज किया होता."

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सतीश चंद्र का कहना है, ''अगर इसे आर्थिक नज़रिए से देखा जाए तो ये बात सच है कि औरंगज़ेब ने जब अपने शासन के 13वें साल में वित्तीय समीक्षा की तो पाया कि पिछले 12 सालों में आमदनी से ज़्यादा ख़र्च हुआ है. इसका नतीज़ा ये हुआ कि सुल्तानों, बेगमों और शाहज़ादों के खर्चों में भी कटौती की गई. 1676 के बाद दक्षिण में लगातार युद्ध के कारण सरकारी ख़ज़ाने ख़ाली हुए. इसके अलावा पूर्वोत्तर में फ्रंटियर वार के साथ, सिसोदिया और राठौरों से भी टकराव जारी था. इन लड़ाइयों से औरंगज़ेब का न तो साम्राज्य विस्तार हुआ और न ही आर्थिक फ़ायदा हुआ."

इसके अलावा, औरंगज़ेब के ख़ज़ाने पर कई तरह के उपकरों में छूट का भी असर पड़ा था. कई लोग ये तर्क भी देते हैं कि इस्लामिक क़ानून जिन उप-करों को लगाने की अनुमति नहीं देता है, औरंगज़ेब ने उन्हें हटाया. ऐसे में शरिया के तहत जज़िया लगाने का विकल्प चुना गया.

इतिहास के अध्येता और धार्मिक राष्ट्रवाद पर किताब लिख चुके राम पुनयानी कहते हैं, ''हम पूरे मध्यकाल को केवल औरंगज़ेब के आईने से नहीं देख सकते. अगर औरगंज़ेब हिन्दुओं से जज़िया लेता था तो मुसलमानों से ज़कात भी लेता था. जज़िया तो 1.5 फ़ीसदी ही था. ज़कात इससे ज़्यादा था. जज़िया व्यक्तिगत कर था और इसमें बच्चों, महिलाओं और बुज़ुर्गों को छूट मिली हुई थी. इससे पहले अकबर ने तो जज़िया ख़त्म कर दिया था.''

मध्यकालीन भारत

भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद यानी आईसीएचआर से जुड़े जेनएयू में इतिहास के प्रोफ़ेसर उमेश अशोक कदम मानते हैं कि मध्यकाल में हिन्दुओं पर मुस्लिम शासकों ने अत्याचार किया था और जज़िया उसी भेदभावपूर्ण शासन की मिसाल है.

उमेश कदम कहते हैं, ''भारत में इस्लाम और ईसाइयत का आना सांस्कृतिक झटका था. मध्यकाल केवल दिल्ली सल्तनत और मुग़लों का इतिहास नहीं है. 8वीं सदी से 18वीं सदी के बीच हिन्दुओं की भी रियासतें थीं और बहुत बढ़िया शासन कर रही थीं. मुस्लिम शासकों ने भारतीयों की भाषा को बिल्कुल किनारे कर दिया और सब पर फ़ारसी थोप दिया. मुस्लिम शासकों ने ग़ैर-मुस्लिमों के पूजा स्थलों को भी नहीं छोड़ा. हिन्दू रियासतों पर कब्ज़ा करना मुस्लिम शासकों के लिए जिहाद था.''

हालाँकि आज़ाद भारत में भी अंग्रेज़ी भाषा को कई लोग औपनिवेशिक भाषा कहते हैं और इसी भाषा में सारा कामकाज़ तब हो रहा है जब देश की बहुसंख्यक जनता इसे नहीं समझती है. सत्ता की हमेशा से एक भाषा रही है. प्रोफ़ेसर उमेश कदम कहते हैं कि मध्यकाल में मुस्लिम शासकों ने हिन्दुओं को मुसलमान बनने पर मजबूर किया.

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धर्मांतरण

क्या वाक़ई मुस्लिम शासकों ने हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया? इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर हेरंब चतुर्वेदी कहते हैं, ''धर्मांतरण तो हुआ है. इसमें कोई शक नहीं है. लेकिन धर्मांतरण सम्राट अशोक के वक़्त में भी हुआ था. बड़ी संख्या में हिन्दुओं को बौद्ध बनाया गया था.''

''मध्यकाल में भी धर्मांतरण तीन तरीक़ों से हुआ. एक तो लोगों ने अपनी ज़मीन बचाने के लिए धर्म बदला, दूसरा सूफ़ियों के प्रभाव में ख़ुद मुसलमान बने और तीसरा युद्ध में हारने के बाद अपनी जान बचाने के लिए भी लोग मुसलमान बने. भारत में मुस्लिम शासक आए तो उनके साथ धर्म भी आया था और उनकी राजनीति में धर्म विस्तार की बात शामिल थी. शासक का जो धर्म होता है उसके प्रभाव से वहाँ की जनता बची नहीं रह सकती.''

प्रोफ़सर चतुर्वेदी कहते हैं, ''ब्रिटिश राज में भी ईसाई मिशनरियों का आगमन हुआ और धर्मांतरण भी हुआ. अगर ईसाई भी यहाँ एक हज़ार साल तक रहते तो भारत की आबादी में उनकी तादाद भी 15 फ़ीसदी होती.''

इतिहासकारों का एक तबका मुग़ल काल में औरंगज़ेब को सबसे अत्याचारी शासक के रूप में देखता है. आरसी मजूमदार की ख्याति राष्ट्रवादी इतिहासकार के रूप में है. भारतीय विद्या भवन ने 'द मुग़ल एम्पायर' नाम की एक किताब प्रकाशित की थी. इस किताब में पूरे मुग़ल काल पर अलग-अलग लेखकों के आलेख हैं. इसका संपादन आरसी मजूमदार ने ही किया है.

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इस किताब की भूमिका में आरसी मजूमदार ने लिखा है, ''अगर अकबर को छोड़ दें तो सभी मुग़ल शासक कुख्यात और धर्मांध थे. अकबर ने हिन्दुओं के साथ मेल-जोल बढ़ाया था और हिन्दुओं के ख़िलाफ़ कई चीज़ें ख़त्म की थीं. हिन्दुओं पर इस्लामिक क़ानून थोप दिए गए थे. मुसलमानों की तुलना में उनका सामाजिक और राजनीतिक दर्जा भी कमतर था. हिन्दुओं के साथ नाइंसाफ़ी मुग़लों ने दिल्ली सल्तनत की तरह ही जारी रखी थी. लेकिन औरंगज़ेब के वक़्त में यह बेइंतहा हो गया था. औरंगज़ेब ने तो जान-बूझकर हिन्दू मंदिर और मूर्तियां भी नष्ट करवाईं. इस तरह की सच्चाई हमारे कुछ नेताओं को ठीक नहीं लगती है लेकिन इतिहासकार का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए कि वो सच बताए, चाहे वो प्रिय हो या अप्रिय.''

आरसी मजूमदार ने लिखा है, ''एक इतिहास भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की छाया में लिखा गया, जो मानने को तैयार नहीं है कि मुस्लिम शासकों ने मंदिर तोड़े थे. इस इतिहास में बताने की कोशिश की गई है कि मुस्लिम शासक धार्मिक रूप से बहुत सहिष्णु थे. कुछ तो जदुनाथ सरकार के औरंगज़ेब पर किए रिसर्च को नकार देते हैं और औरंगज़ेब का ही बचाव करने लगते हैं. दिलचस्प तो यह है कि संशोधित इन्साइक्लोपीडिया ऑफ इस्लाम में औरंगज़ेब पर एक बार फिर सर विलियम इरविन ने लेख लिखा और कहा कि औरंगज़ेब पर मंदिर तोड़ने का आरोप विवादित है."

न्यू जर्सी स्थित रकर्स यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशियाई इतिहास की प्रोफ़ेसर ऑड्री ट्रुश्के ने 'औरंगज़ेब: द मैन एंड द मिथ' नाम से एक किताब लिखी है. उनका कहना है कि औरंगज़ेब में कुछ चीज़ें बहुत ख़ास थीं लेकिन अक्सर लोग उत्साह में उन्हें काले या सफ़ेद रंग में रंग देते हैं और वो चीज़ें किनारे रह जाती हैं.

मध्यकालीन भारत

ट्रुश्के कहती हैं, "हम अभी 21वीं सदी में हैं. ज़ाहिर है कि हम इतिहास को वर्तमान के हिसाब से देख रहे हैं जो ठीक नहीं है. वर्तमान के संदर्भ जब हम इतिहास को देखेंगे तो हम उसका ग़लत आकलन कर बैठेंगे. औरंगज़ेब को आज के हिन्दू-मुस्लिम टकराव के आईने में देखना ठीक नहीं होगा. कुछ लोग औरंगज़ेब को फुटबॉल की तरह अपने हितों के लिए इस्तेमाल करते हैं और यह भारत में मुस्लिम विरोधी सोच को आगे बढ़ाने में मदद करता है."

वे कहती हैं, "वर्तमान में औरंगज़ेब को हिन्दुओं से नफ़रत करने वाले धर्मांध इस्लामिक शासक के रूप में देखा जा रहा है लेकिन औरगंज़ेब का ऐतिहासिक किरदार इस छवि पर खरा नहीं उतरता है. औरंगज़ेब ने जो भी क़दम उठाए, वो आज की तारीख़ में वीभत्स समझे जाते हैं. जैसे कि हिन्दुओं और जैनों के मंदिरों को नष्ट करना, ग़ैर-मुस्लिमों पर जज़िया कर लगाना."

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ट्रुश्के का मानना है कि "इसके साथ ही औरंगज़ेब ने कई हिन्दू और जैन मंदिरों की सुरक्षा की और मुग़ल दरबार में हिन्दुओं की संख्या भी बढ़ी. जो भी औरंगज़ेब को इस्लामिक धर्मांध के तौर पर देखते हैं, उन्हें यह भी बताना चाहिए कि उसने हिन्दुओं और जैन मंदिरों की रक्षा क्यों की थी. सांप्रदायिक नज़रिया औरंगज़ेब की नीतियों को समझने में मदद नहीं कर सकता. मुझे लगता है कि औरंगज़ेब व्यावहारिक शासक था और उसके भीतर सत्ता की भूख थी और उसी के लिए सब काम कर रहा था न कि हिन्दुओं से नफ़रत के लिए काम कर रहा था."

हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने वाले आचार्य रामचंद्र शुक्ल भी मानते हैं कि मध्यकाल में हिन्दुओं में भारी निराशा थी और इसी की प्रतिक्रिया में भक्ति आंदोलन शुरू हुआ. आचार्य शुक्ल ने अपनी किताब गोस्वामी तुलसीदास में लिखा है, "देश में मुसलमान साम्राज्य के पूर्णतया प्रतिष्ठित हो जाने पर वीरोत्साह के सम्यक संचार के लिए स्वतंत्र क्षेत्र नहीं रह गया था. देश का ध्यान अपने पुरुषार्थ और बल पराक्रम की ओर से हटकर भगवान की भक्ति की ओर गया. देश का यह निराशाकाल था, जिसमें भगवान के सिवा कोई और सहारा दिखाई नहीं देता था."

हालाँकि हिन्दी साहित्य जाने-माने आलोचक हजारी प्रसाद द्विवेदी आचार्य शुक्ल के इस तर्क को ख़ारिज करते हैं और कहते हैं कि अगर ऐसा था तो भक्ति काल की शुरुआत दक्षिण से नहीं, उत्तर से होनी चाहिए थी क्योंकि मुस्लिम शासक पहले उत्तर में आए थे जबकि भक्ति आंदोलन दक्षिण से शुरू हुआ.

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मोदी सरकार क्या इतिहास 'दुरुस्त' करने में लगी है?

इलाहाबाद को प्रयागराज किया जा चुका है. दिल्ली के औरंगज़ेब रोड का नाम भी बदल दिया गया है. मुग़लसराय स्टेशन का नाम दीन दयाल उपाध्याय कर दिया गया है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैदराबाद शहर का नाम भी बदलने की बात कर रहे हैं, हल्दीघाटी की लड़ाई में राणा प्रताप को विजेता घोषित किया जा चुका है.

बीजेपी नेताओं का कहना है कि ये नाम मुस्लिम आक्रांताओं ने रखे थे और बदलने की ज़रूरत है. इतिहास की किताबें बदलने की मांग की जा रही है. आरोप लगते हैं कि बीजेपी की सरकारें भारत के बहुलतावाद को नष्ट करने में लगी हैं. योगी आदित्यनाथ कह चुके हैं कि मुग़ल भारतीयों के नायक नहीं हो सकते, न ही उनकी बनाई इमारतें हमारी धरोहर

प्रोफ़ेसर उमेश अशोक कदम कहते हैं कि सही इतिहास लाना ही होगा. वे कहते हैं, ''मध्यकाल के इतिहास को ठीक से नहीं लिखा गया है. मध्यकाल को केवल दिल्ली सल्तनत और मुग़लों के शासन के तौर पर देखा जाता है जबकि ऐसा नहीं है. मध्यकाल का जो इतिहास लिखा गया है, उसका स्रोत फ़ारसी और अरबी में लिखे गए साहित्य हैं जबकि भारतीय भाषाओं में जो कुछ उस वक़्त लिखा जा रहा था, उसकी उपेक्षा की गई है. मोदी सरकार इतिहास को ठीक कर रही है. अगर शहरों और सड़कों के नाम बदले जा रहे हैं तो ये जनआकांक्षा है और एक लोकप्रिय नेता जनआकांक्षा के लिए ही काम करता है.''

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प्रोफ़ेसर उमेश कदम कहते हैं, ''हमें ग़ुलामी के प्रतीकों को ख़ारिज करना होगा. मैं बचपन से ही सोचता था और ये बात परेशान करती थी कि लाल क़िले से आज़ाद भारत का तिरंगा क्यों लहाराया जाता है. मुझे यह कभी ठीक नहीं लगा.''

प्रोफ़ेसर उमेश कदम भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के सदस्य भी हैं. उन्होंने कहा कि परिषद इतिहास पर काम कर रही है और मध्यकाल के इतिहास को दुरुस्त करने का काम चल रहा है.

लाल क़िले को मुग़ल शासक शाहजहाँ ने बनवाया था और प्रोफ़ेसर उमेश कदम को लगता है कि ये इमारत भी ग़ुलाम भारत का ही प्रतीक है. प्रोफ़ेसर उमेश कदम कहते हैं कि भारतीय इतिहास में वामपंथियों ने तथ्यों की उपेक्षा करके लिखा है और इसे ठीक करने की ज़रूरत है.

लेकिन क्या इतिहास को 'करेक्ट' या अपने हिसाब से सही किया जा सकता है? जॉर्ज ऑरवेल ने अपने उपन्यास 1984 में लिखा है कि जिसका वर्तमान पर नियंत्रण होता है, उसी का अतीत पर भी नियंत्रण होता है.

इसका मतलब यह हुआ कि अतीत को आप जैसा चाहें, वैसा तोड़-मरोड़कर उल्टा-सीधा बना सकते हैं, क्योंकि वर्तमान में आपको इसकी ज़रूरत पड़ती है. इसी प्रवृत्ति पर जर्मन दार्शनिक जॉर्ज हेगल ने कहा है, "इतिहास से हम यही सीखते हैं कि इतिहास से कुछ नहीं सीखते हैं."

मोदी सरकार मध्यकालीन इतिहास से ख़ुद को असहज क्यों पाती है? उसे क्यों बदलने की बात कर रही है?

पार्वती शर्मा कहती हैं, "इतिहास कोई प्रतिशोध लेने का विषय नहीं होता है लेकिन शासक वर्ग इतिहास की व्याख्या अपने हिसाब से करते हैं ताकि बहुसंख्यकवाद को खाद पानी मिलता रहे. ध्रुवीकरण की राजनीति करनी है तो ये अनिवार्य हो जाता है कि ऐसे नैरेटिव गढ़े जाएँ जिनमें असली मुद्दे छुप जाएँ. पूरे मध्यकाल में देखें तो जालियाँवाला बाग़ की तरह ज़ुल्म कहीं नहीं मिलेगा. लेकिन भारत के नेताओं और जनता के मन में अंग्रेज़ों को लेकर वैसी नफ़रत नहीं है. नफ़रत मुसलमानों को लेकर है."

"अंग्रेज़ तो यहाँ रुके नहीं इसलिए उनसे नफ़रत हमारी राजनीति को काम नहीं आएगी. मुसलमान यहाँ हैं और ध्रुवीकरण के लिए उन्हीं को निशाना बनाना है. बहुसंख्यकवाद की राजनीति को ऊर्जा ये मध्यकाल से ही देंगे, न कि ब्रिटिश काल से. इन्हें लगता है कि बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर बना देने से इतिहास दुरुस्त हो जाएगा तो ये ग़लत है, भले इससे इनकी राजनीति चलती रहेगी.''

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