ज्ञानवापी और बाबरी मस्जिद में तुलना कितनी सही

ज्ञानवापी मस्जिद

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ज्ञानवापी मस्जिद का मामला वाराणसी की निचली अदालत और सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है.

इस बीच AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी का कहना है कि ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे ग़ैरकानूनी है और इसे बिलकुल वही रूप दिया जा रहा है जैसे अयोध्या में बाबरी मस्जिद के साथ किया गया था.

इस बारे में उन्होंने दो दिन पहले एक ट्वीट भी किया था. ट्वीट के साथ उन्होंने 2019 के अपने बयान का क्लिप भी लगाया है. ये बयान उन्होंने अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दिया था.

ज्ञानवापी मस्जिद और बाबरी

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अपने बयान में ओवैसी ने तब भी ये अंदेशा जाहिर किया था कि अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर ज्ञानवापी, मथुरा और देश की अन्य मस्जिदों पर भी पड़ेगा.

ओवैसी ने अपने बयान के ज़रिए लोगों से अपनी याददाश्त ताज़ा करने की गुजारिश की है.

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भारत में मुखर मुस्लिम आवाज़ों में एक है असदुद्दीन ओवैसी की आवाज. वो लोकसभा के सांसद भी है और इस लिहाज से संवैधानिक पद पर हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बाबरी मस्जिद की राह पर ज्ञानवापी मस्जिद मामला भी जा रहा है. क्या दोनों मामलों की तुलना सही है?

इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए बीबीसी ने बात की 80 और 90 के दशक के पत्रकारों से जिन्होंने उत्तर प्रदेश और केंद्र की राजनीति को क़रीब से देखा है और आज ज्ञानवापी मस्जिद का मामला भी देख रहे हैं.

कांग्रेस और बीजेपी सरकार का अंतर

"अयोध्या विवाद: एक पत्रकार की डायरी" लिखने वाले अरविंद कुमार सिंह उनमें से एक हैं.

बीबीसी से बातचीत में कहते हैं बाबरी मस्जिद प्रकरण और ज्ञानवापी मस्जिद मामला दोनों में कुछ समानताएं तो नज़र आती हैं लेकिन कुछ मामलों में फ़र्क भी है.

वो पहले दोनों के बीच के अंतर के बारे में बात करते हैं.

उनके मुताबिक़ सबसे बड़ा फ़र्क तो ये है कि 1991 में केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और उत्तर प्रदेश में भाजपा की.

उस वक़्त देश भर में अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर बनाने के लिए चल रहा आंदोलन अपने चरम पर था. पूरे देश में और ख़ासतौर पर उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक तनाव उबाल पर था. ऐसे वक़्त में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने अपनी पहल कर 18 सितंबर 1991 में उपासना स्थल क़ानून बनाया, ताकि अयोध्या विवाद का साया दूसरे धार्मिक स्थलों पर ना पड़े.

लेकिन आज केंद्र में और राज्य में दोनों जगह भाजपा की सरकार है.

साल 1991 में बने उपासना स्थल क़ानून की वैधता पर सवाल खड़े हुए हैं. दो साल से मामला सुप्रीम कोर्ट में है. केंद्र सरकार से कोर्ट ने जवाब माँगा है. लेकिन केंद्र सरकार ने अपना जवाब अभी तक दाखिल नहीं किया है.

इस लिहाज से देखें तो दोनों मामले में बड़ा फ़र्क है.

उपासना स्थल क़ानून

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साल 1991 में बना उपासना स्थल क़ानून

अरविंद कुमार आगे कहते हैं, "अयोध्या मामला जब कोर्ट पहुँचा था तब 1991 का उपासना स्थल क़ानून अस्तित्व में नहीं था.

15 अगस्त 1947 तक जिस उपासना स्थल में जिस धर्म के लोग पूजा अर्चना करते थे उसमें कोई परिवर्तन ना किया जा सके, 1991 का क़ानून इसी मक़सद से लाया गया था.

इस लिहाज से देखें तो ज्ञानवापी मामलें में ये क़ानून एक ढाल की तरह अब तक काम करता आया है. "

जबकि 1991 उपासना स्थल कानून में अयोध्या विवाद को इससे अलग रखा गया क्योंकि यह मामला आज़ादी से पहले अदालत में लंबित था.

1991 में क़ानून बनने के बाद से ही ज्ञानवापी मामला कोर्ट पहुँचा था. एक बार पहले भी मस्जिद के सर्वेक्षण की इजाजत दी गई, लेकिन इसी क़ानून की वजह से उस पर रोक भी लगी.

इस तरह से अयोध्या विवाद और ज्ञानवापी विवाद की तुलना करना सही नहीं है.

बाबरी मस्जिद में मूर्ति

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इमेज कैप्शन, मस्जिद के अंदर भगवान राम की बालरूप मूर्ति रखी थी, जो 22/23 दिसंबर की रात प्रकट हुईं अथवा तत्कालीन ज़िला मजिस्ट्रेट के सहयोग से रख दी गई थीं

काशी में मंदिर पहले से मौजूद

तीसरे बड़े अंतर का ज़िक्र करते हुए अरविंद कुमार कहते हैं, "काशी में जहाँ ज्ञानवापी मस्जिद है उसी से सटा विश्वनाथ मंदिर भी है. जबकि बाबरी मस्जिद में 1949 में मूर्तियां ले जाकर रखी गई थी. इस घटना के गवाह कई लोग हैं."

बाबरी मस्जिद में दिसंबर 1949 में जब मूर्तियों की स्थापना की गई थी.

कई जानकारों की राय है कि कोर्ट से जो मामला सुलझाने की कोशिश पहले चल रही थी, इस तरह मूर्ति स्थापना की वजह से पूरा मामला विवादित ढाँचे में तब्दील हो गया और मंदिर बनाने का एक संकल्प उस दिन जो साधु-संत समाज ने लिया, उसकी पूर्ति के लिए आगे रास्ते बनाते गए.

साल 1949 - भारत के आज़ाद होने और संविधान लागू होने के बीच का वक़्त था. केंद्र में सत्ता में थे पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत थे.

इसी साल कांग्रेस और समाजवादियों में टूट की वजह से अयोध्या में उप-चुनाव हुए, जिसमें हिंदू समाज के बड़े संत बाबा राघव दास को जीत मिली. उनके विधायक बनते ही हिंदू समाज के हौसले बुलंद हुए.

बाबरी मस्जिद का मामला इससे पहले तक क़ानूनी लड़ाई से लड़ा जा रहा था. इस वक़्त तक इस मामले का राजनीतिकरण शुरू नहीं हुआ था.

बाबा राघव दास ने जुलाई 1949 में उत्तर प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर मंदिर निर्माण की अनुमति माँगी. उत्तर प्रदेश सरकार के उप-सचिव केहर सिंह ने 20 जुलाई 1949 को फ़ैज़ाबाद डिप्टी कमिश्नर केके नायर से जल्दी रिपोर्ट माँगते हुए पूछा कि वह ज़मीन नजूल की है या नगरपालिका की.सिटी मजिस्ट्रेट ने सिफ़ारिश की कि यह नजूल की ज़मीन है और मंदिर निर्माण की अनुमति देने में कोई रुकावट नहीं है.

22-23 दिसंबर 1949 की रात अभय रामदास और उनके साथियों ने दीवार फाँदकर राम-जानकी और लक्ष्मण की मूर्तियाँ मस्जिद के अंदर रख दीं और यह प्रचार किया कि भगवान राम ने वहाँ प्रकट होकर अपने जन्मस्थान पर वापस क़ब्ज़ा प्राप्त कर लिया है.

बाबरी मस्जिद

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दोनों मस्जिदों का इतिहास

इसके अलावा दोनों मस्जिदों के इतिहास में भी थोड़ा फ़र्क है.

बाबरी मस्जिद मुगल बादशाह बाबर के आदेश पर उनके गवर्नर मीर बाक़ी ने बनवाई थी. मस्जिद पर लगे शिलालेख और सरकारी दस्तावेज़ इस बात की तस्दीक करते हैं.

जबकि विश्वनाथ मंदिर के निर्माण के बारे में आम धारणा है कि अकबर के नवरत्नों में से एक राजा टोडरमल ने दक्षिण भारत के विद्वान नारायण भट्ट की मदद से बनवाया था.

ऐतिहासिक तौर पर ये माना जाता है कि ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण मंदिर टूटने के बाद ही हुआ और मंदिर तोड़ने का आदेश औरंगज़ेब ने ही दिया.

हालांकि अब इतिहास के इन पन्नों को दोबारा से खंगाला जा रहा है.

बाबरी मस्जिद और ज्ञानवापी मंदिर में इस तरह के अंतर का ज़िक्र करते हुए अरविंद कुमार साथ ही ये भी कहते हैं दोनों मामलों में समानता की बात भी कहते हैं.

काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद को जाने का रास्ता

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ज्ञानवापी पर वीएचपी, आरएसएस और बीजेपी के बयान

बाबरी विवाद शुरुआत में अदालतों में लड़ा जा रहा था. वीएचपी और बीजेपी इससे बाद में जुड़े.

उसी तरह से ज्ञानवापी मस्जिद विवाद भी 1991 से अदालतों में लड़ा जा रहा है. फिलहाल मामला वाराणसी के सिविल कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है.

लेकिन धीरे धीरे विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरआरएस) और बीजेपी से जुड़े नेताओं के बयान भी इस मामले में आना शुरू हो गया है.

वीएचपी के राष्ट्रीय महासचिव मिलिंद परांडे ने अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए इंटरव्यू में अयोध्या और ज्ञानवापी मामले में समानताओं का ज़िक्र करते हुए कहा कि दोनों जगह मुगल आक्रांताओं ने हिंदू निशानियों को मिटाने कोशिश की जिसे सही करने में दशकों तक हिंदुओं को संघर्ष करना पड़ रहा है. साथ ही उन्होंने कहा कि इस मामले में वीएचपी, अदालत के आदेश का इंतजार करेगी.

आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार का भी एक बयान दो दिन पहले सामने आया है. समाचार एजेंसी एएनआई से उन्होंने कहा, "ज्ञानवापी, ताजमहल, कृष्ण जन्मभूमि को लेकर भारत में ही नहीं दुनिया में चर्चा चल रही है कि इन स्थानों का सत्य सामने आना चाहिए. ये सच सब जानना चाहते हैं. इसलिए नहीं की कोई द्वेष है, या कोई हिंसा है, या कोई राजनीति है. लोग ये चाहते हैं कि जितना सच और सही पता होगा देश उतना सही रास्ते पर जाएगा."

उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी इस पर बयान दिया. 16 मई को ट्विटर पर लिखा कि बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर ज्ञानवापी में बाबा महादेव के प्रकटीकरण ने देश की सनातन हिंदू परंपरा को एक पौराणिक संदेश दिया है.

केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता गिरिराज सिंह ने भी इस मामले पर बयान देते हुए एक टीवी चैनल को कहा कि जब देश का बंटवारा हुआ तभी नेहरू को चाहिए था कि आक्रांताओं की सारी निशानी मिटा देते, लेकिन नेहरू ने तुष्टिकरण की राजनीति के लिए केवल काशी, मथुरा, अयोध्या को ही विवादित नहीं रखा.

इन बयानों के आधार पर माना जा रहा है कि ज्ञानवापी मस्जिद का मामला धीरे-धीरे राजनीतिक रंग ले रहा है.

ज्ञानवापी मस्जिद

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ज्ञानवापी में 'शिवलिंग' और अयोध्या में 'रामलला'

ज्ञानवापी मस्जिद का निचली अदालत के कहने पर सर्वे कराया गया. तीन दिन तक चले इस सर्वे में मस्जिद परिसर के सर्वे में कथित शिवलिंग मिलने की बात सामने आ रही है. उस इलाके को सुरक्षित रखने की बात सुप्रीम कोर्ट ने भी कही है.

ये दावा कुछ उसी तरह का है जैसे 1949 में अयोध्या में रामलला की मूर्ति मिलने का दावा किया गया था.

बाबरी मस्जिद विध्वंस और राम जन्मभूमि आंदोलन को 80 के दशक से कवर करने वाली पत्रकार नीरजा चौधरी मानती हैं कि पूरे आंदोलन में यही सबसे अहम दिन था. बाद में हाई कोर्ट में भी सुनवाई के दौरान ये बात कही गई कि अगर उसी समय ये मूर्तियाँ तुरंत ही हटा दी जाती, तो विवाद इतना लंबा नहीं खिंचता .

बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं, "1949 के बाद 1964 में विश्व हिंदू परिषद का गठन, उसके बाद 1984 में वीएचपी का विस्तार और उनके द्वारा आयोजित यात्राओं से पूरे देश में एक माहौल बना. फिर 1989 में भारतीय जनता पार्टी ने पालमपुर कार्यसमिति में प्रस्ताव पास किया. तब जाकर ये मुद्दा बीजेपी का मुद्दा बना."

नीरजा कहती हैं, "इस लिहाज से देखें को कहीं ना कहीं ज्ञानवापी का मामला उसी रास्ते पर जाता दिख रहा है. हिंदू और हिंदुत्व की लड़ाई कई प्रतीकों के ज़रिए लड़ी जा रही है. दोबारा से ये भावनाएं भारत में उभार पर है. दो दिन बाद कोर्ट में मामला सुलझ जाता है तो ठीक, लेकिन नहीं हुआ तो ये लंबा बाबरी मस्जिद की तरह खींचेगा. 2024 तक भी जा सकता है, जब देश में लोकसभा चुनाव हैं. दोनों जगह मस्जिद थे और उससे पहले मंदिर होने का नैरेटिव बताता है कि दोनों मामले में समानता है. दोनों जगह चर्चा है कि इतिहास ग़लत है, उसे ठीक करने की ज़रूरत है, हिंदू में ये भावना अब जग रही है."

सुप्रीम कोर्ट में ज्ञानवापी मस्जिद की सुनवाई करने वाली बेंच में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा हैं. ये दोनों जज अयोध्या फैसले का भी हिस्सा रहे हैं. उसी तरह से ज्ञानवापी मस्जिद मामले में याचिकाकर्ता पाँच महिलाओं के वकील हरिशंकर जैन हैं, जो बाबरी मस्जिद मामले में भी हिंदू महासभा के वकील रह चुके हैं. मस्जिद परिसर में 'शिवलिंग' मिलने के बाद सील करने की अर्जी भी उन्हीं के नाम की है.

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